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कैसे करें ”स्किलिंग इंडिया’’ में घोटाला

कैसे करें ”स्किलिंग इंडिया’’ में घोटाला

लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त, 2014 को अपने उद्बोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, ”हुनर के विकास से देश के विकास को मजबूती मिलेगी, अगर हमें भारत को विकास की राह पर आगे ले जाना है, तो हुनरमंद भारत हमारा पहला मिशन होना चाहिए।’’ इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में हुनर की आवश्यकता आज ही महसूस की जाने लगी है, पहले नहीं की गई थी। ऐसा कई बार देखने को मिला है कि पूरे देश में कौशल विकास और उद्यमशीलता के विकास की कोशिशें तो कई बार हुईं, लेकिन वे कामयाब नहीं हो सकीं। लगभग 20 मंत्रालय और विभाग हैं जो देश भर में 70 से अधिक कौशल विकास की योजनाएं चला रहे हैं। हालांकि इन योजनाओं में प्रशिक्षण के बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता और क्षमता में उतनी ही कमी रही, जितनी इसके लाभ में। यहां उल्लेखनीय है कि विकासित देशों के मुकाबले विकासशील देशों में कुशल कार्यबल का प्रतिशत काफी कम है। विकसित देशों में कुल कुशल कार्यबल 60 से 90 प्रतिशत है, जबकि भारत में 20-24 वर्ष की उम्र के सिर्फ 5 प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जिनमें औपचारिक व्यावसायिक कौशल देखने को मिलता है। इस तरह की परिस्थितियों में सुधार लाने के लिए कौशल विकास और उद्यमशीलता को प्रोत्साहन देने के लिए फौरन कदम उठाने की अवश्यकता है, ताकि उद्योगों की अवश्यकता पूरी हो सके और साथ ही देश के लोगों का जीवन स्तर उठाया जा सके। देश में इस तरह के विकास पर अगर ध्यान दिया जाए तो इससे ग्रामीण इलाकों में कार्यरत युवाओं को रोजगार और रोजगार के लिए कौशल विकास का अवसर प्राप्त होगा। नतीजतन, ग्रामीण युवाओं को अनौपचारिक से औपचारिक श्रम बाजार की ओर बढऩे का मौका मिलेगा और वह वैश्विक श्रम की मांग में शामिल होकर उच्च पारिश्रमिक प्राप्त कर सकें। इसी बात को ध्यान में रखकर मोदी ने कौशल विकास और उद्यमशीलता के लिए 10 नबंवर, 2014 को नए मंत्रालय का गठन किया।

लेकिन, सवाल यह उठता है कि आज हम कहां खड़े हैं? क्या हम 35 करोड़ लोगों को कौशल विकास के लक्ष्य को पूरा करने के लिए जमीनी स्तर पर योजनाओं को कार्यान्वित कर पा रहे हैं? क्या हमारी योजनाएं ग्रामीण इलाकों में उन लोगों तक पहुंच पा रही हैं जो अकुशल हैं और अनौपचारिक वेतन अर्जन कर देश के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं? क्या ग्रामीण इस पहल की तरफ आकर्षित हो रहे हैं? खैर, मेरे पास इस बात को सिद्ध करने के पर्याप्त आंकड़े मौजूद नहीं हैं कि मोदी सरकार अपने लक्ष्य को पूरा करने के निकट है भी या नहीं।

यहां यह बात भी ध्यान देने की है कि इस मिशन को पूरा करने के लिए मुख्य स्रोत राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद (एनएसडीसी) को माना जाता है जो युवाओं को विभिन्न क्षेत्रों- जैसे खुदरा, बिजली, लेखा, आतिथ्य और आईटी से संबंधित क्षेत्रों से जुड़े कौशल विकास और व्यवसायिक प्रशिक्षण प्रदान करता है। एनएसडीसी युवाओं को कौशल प्रदान करने के लिए उद्यमों, कंपनियों और संगठनों को फंड देती है। वह कौशल विकास के लिए उपयुक्त मॉडल का विकास भी करती है। भारतीय युवकों में कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय कौशल विकास कोष (एनएसडीएफ) विभिन्न सरकारी स्रोतों और अन्य दाताओं/ योगदानकर्ताओं को प्रोत्साहित करता है। कौशल विकास के लिए जो भी फंड प्राप्त होता है वह एनएसडीसी के माध्यम से ही होता है।

एनएसडीसी की स्थापना 31 जुलाई, 2008 में कंपनी अधिनियम की धारा 25 के तहत सीमित देय के साथ सार्वजनिक कंपनी के रूप में की गई थी। इसकी स्थापना लाभ के उद्देशय से नहीं हुई थी। 1956 के अनुसार 10 करोड़ की इक्विटी पूंजी थी, जिसमें 51 प्रतिशत (5.10 करोड़) और 49 प्रतिशत (4.90 करोड़) की सदस्यता निजी क्षेत्र और भारत सरकार की रही। सार्वजनिक निजी भागीदारी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) का कौशल विकास के क्षेत्र में कल्पना की गई थी। वित्त मंत्रालय ने सरकारी एजेंसियों, द्विपक्षीय/ बहुपक्षीय और अन्य एजेंसियों से धन प्राप्तकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए  अर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) के द्वारा इंडियन ट्रस्ट एक्ट 1882 के तहत एनएसडीएफ को एक ट्रस्ट के रूप में (23 दिसंबर,2008) शामिल किया गया था। 31 मार्च, 2015 तक एनएसडीएफ को सरकारी एजेंसियों से 3,300.74 करोड़ की धन राशि प्राप्त हो चुकी थी।

एनएसडीएफ ने एनएसडीसी के वार्षिक कार्य योजना और कार्य योजना के लिए मिलने वाले फंड की मंजूरी की जांच की तो पता चला कि 31 मार्च, 2015 तक एनएसडीसी को 2,362.90  करोड़ रुपये कौशल विकास और योजनाओं के निष्पादन के लिए प्राप्त हो चुका था। भारत सरकार ने जुलाई 31 2014 को एक अधिसूचना जारी करते हुए राष्ट्रीय कौशल विकास फंड और राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद के कार्यों को आर्थिक मामलों के विभाग से कौशल विकास युवा मामले, खेल और उद्यमशीलता मंत्रालय में हस्तांतरित किया जिसे बाद में नए बने कौशल विकास और उद्यमशीलता के अधीन कर दिया गया। जबकि राष्ट्रीय कौशल विकास फंड और राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद के रिश्तों पर वैसे ही सवाल उठते रहे हैं क्योंकि दोनों विभागों के अध्यक्ष एक ही हैं। गौरतलब है कीराष्ट्रीय कौशल विकास परिषद पर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) से गाज गिरने के बावजूद दोनों संस्थानों में जवाबदेही तय करने की कोई कोशिश नजऱ नहीं आ रही जबकि दोनों संस्थानों के बोर्ड में अभी भी वही लोग बैठे हैं जो सालों से इन संस्थाओं पर अपना कब्जा जमाए बैठे हैं।

10-04-2016

एनएसडीसी ने कैग रिपोर्ट को ऐसे लिया मानो कुद हुआ ही नहीं है। ऐसा माना जाता है कि एनएसडीसी के सीईओ और सीओओ को बाहर का रास्ता दिखाना महज एक छलावा है, ताकि बोर्ड में बैठे बड़े उद्यमियों को बचाया जा सके, जो कि सभी अहर्ताएं पूरी किये बगैर फैसले लेते हैं। एनएसडीसी के पिछले सीईओ को उद्योग संगठनों के द्वारा ही चुना गया था। इस बात से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगला सीईओ भी उद्योग संगठनों के द्वारा ही चुना जा सकता है। एनएसडीसी पर उद्योग संगठनों का वर्चस्व है। इस स्थिति को देख कर तो यह उम्मीद करना मुश्किल है कि इस विभाग में कोई पेशेवर व्यक्ति इस विभाग का नेतृत्व कर पायेगा। स्थिति यह हो गई है की कोई भी व्यक्ति औद्योगिक स्वार्थी तत्वों से बचे बगैर उस आज़ादी का अनुभव कर ही नहीं सकता जो उसे अपने पैरों पर खड़ा करने की ताकत दे। औद्योगिक संगठनों का इस बात पर जोर देना कि उनका ही आदमी मंत्रालय में हो, यह दर्शाता है कि वे हमेशा की तरह ही लोन देने की प्रक्रिया, इक्विटी और निवेश की प्रक्रिया पर अपना कब्ज़ा जमाए रखना चाहते हैं ताकि किसी भी जवाबदेही से बचा जा सके।

कैग कि रिपोर्ट इस सत्य को इंगित करती है कि संस्थाओं के लिए ऋण उपलब्ध करने की एनएसडीसी की गतिविधियों को गैर-बैकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) के तहत परिभाषित किया गया है। भारतीय रिजर्व बैंक, भारत में एनबीएफसी क्षेत्र का नियामक है। डीईए ने भारतीय रिजर्व बैंक को इसके नियामन से एनएसडीसी को मुक्त कर देने के लिए राजी कर लिया था, क्योंकि ये काम एनएसडीएफ के द्वारा किया गया था। हालांकि, एनएसडीएफ द्वारा किसी तरह का कोई विनियामक निरीक्षण नहीं कराया गया था। यह नियामक कार्य नवंबर 2014 में निजी एजेंसी को सौंपा गया था। माइक्रो-प्रूडेंशियल नियमन के कार्य को सभी के समक्ष लाने के लिए एक महत्वपूर्ण विनियामक कार्यप्रणाली है जो सहज ढंग से प्रवर्तन तंत्र में शमिल है। इस विनियामक कार्य के लिए निजी एजेंसी को नियुक्ति किया गया, लेकिन इसे आरबीआई के हाथों से बाहर लेना उचित निर्णय नहीं था। एनएसडीसी की माइक्रो-प्रूडेंशियल नियमन करने के लिए नवंबर 2014 में एक निजी एजेंसी आईएल ऐंड एफएस ट्रस्ट कंपनी लिमिटेड को नियुक्त किया गया था। लेकिन, यह विवाद का मुद्दा बन गया क्योंकि, ये एक व्यापार समूह का हिस्सा था। 2010-11 में  इसकी फंडिग 159 करोड़ रुपए एनएसडीसी के द्वारा मंजूर की गई थी और मार्च 2015 तक 89.97 करोड़ रुपए का व्यय किया जा चुका था। इसके अलावा नियुक्ति प्रक्रिया भी प्रतिबंधात्मक और योग्यता के मापदंड के मुताबिक अनियमित बनी हुई थी।

कैग की रिपोर्ट में ठोस सबूत पेश करने के बाद बोर्ड नेतृत्व के खिलाफ कार्रवाई करने की उम्मीद की गई थी ताकि इस संस्थान में उद्योगों का बोलबाला कम हो सके। कैग की रिपोर्ट में यह दर्शाया गया था कि एनएसडीएफ को वित्तीय योगदान के लिए ही सरकार/ सरकारी संस्थानों, बहुपक्षीय और द्विपक्षीय और निजी क्षेत्रों द्वारा बनाया गया था। हालांकि स्थापना के बाद से एनएसडीएफ ने सिर्फ सरकारी स्रोतों से ही धन प्राप्त किया। 49 प्रतिशत इक्विटी स्वामित्व के साथ ही एनएसडीएफ में सरकार की हिस्सेदारी 99.78 प्रतिशत थी। हालांकि सरकार के स्वामित्व अधिकार एनएसडीसी में सरकार के वित्तीय योगदान के अनुरूप नहीं थे। कैग की रिपोर्ट के अनुसार हालांकि सरकार एनएसडीसी में सबसे बड़े एकल शेयर धारक थी और एनएसडीसी के वित्तीय सहयोग में एकमात्र योगदान था। एनएसडीसी के निदेशक मंडल पर सरकार के अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के कारण निर्णय लेने की भूमिका सीमित थी। सरकार के इस संस्थान पर कमजोर पड़ते प्रभाव के कारण एनएसडीसी को 2011 में पब्लिक लिमिटेड कंपनी से एक प्रइवेट कंपनी में तबदील कर दिया गया, जिससे एनएसडीसी का शासन तंत्र कमजोर पड़ गया। कैग की रिपोर्ट यह भी कहती है कि कैबिनेट की मंजूरी और एनएसडीएफ के ट्रस्ट डीड एनएसडीसी के ऊपर एक पर्यवेक्षी भूमिका निर्धारित करती है, लेकिन इन सब की विस्तृत रूपरेखा के तौर-तरीकों का स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया। एनएसडीएफ अपनी पर्यवेक्षी भूमिका में अप्रभावी थी। फिर भी ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं जहां एनएसडीसी ने प्रभावी तरके से एनएसडीएफ के पर्यवेक्षी भूमिका से इनकार किया है। एक ही व्यक्ति ने बहुत ही चतुराई से एनएसडीएफ और एनएसडीसी की चेयरमैन के पद को हथिया लिया और सरकार इस दुर्दशा को मूक दर्शक बनी देखती रही।

इससे पहले की बहुत देर हो जाये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस विकट स्थिति से निपटने की जरूरत है। ऐसी परिस्थितियों से मोदी के हुनरमंद भारत के सपने की गंभीरता नष्ट हो सकती है। उस सपने को जमीन पर उतारना मुयिकल हो सकता है। बैंकों और सरकारी विभाग की जानकारी में होते हुए भी विजय माल्या हजारों करोड़ का कर्ज लेकर देश से निकले में सफल हो गये। कहीं विजय माल्य प्रकरण की तरह यह भी दूसरा मामला न बन जाए। एनएसडीसी के साथ ही इस मामले का दोष मोदी सरकार पर न आ जाये कि कैग की गंभीर आलोचना के बावजूद मोदी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया अपने ही सपने को बर्बाद होते देखती रही।

Mr.-Prakash-Nanda

प्रकाश नंदा

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