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पेट्रोगेट : सुरक्षा पर मजाक

पेट्रोगेट : सुरक्षा पर मजाक

By कर्नल यू.एस. राठौड़

भवन में निगरानी प्रणाली को स्थापित करने के पीछे यहां आने वाले आगंतुकों और उनकी नापाक गतिविधियों पर नजर रखना था, खासकर ऑफिस संचालन के समय।यहां तक कि किसी ने सीसीटीवी फुटेज को दुबारा देखने की भी जहमत नहीं उठाई।अगर इन फुटेज को एक समयांतर पर नियमित रूप से देखा जाता तो पॉवर बैक-अप होने के बावजूद रात में इस प्रणाली के बंद होने के कारण संदेह उत्पन्न होता।

यह सिर्फ भारत में ही हो सकता है, जहां उदासीन और अपनी आदत से मजबूर सरकार और उसके तंत्र सुरक्षा के प्रति लापरवाह रहते हैं। सुरक्षा का हमारा आतंकवाद केन्द्रित दृष्टिकोण ने हमारे उच्च सुरक्षा वाले प्रतिष्ठानों के प्रति लापरवाह बना दिया है। यह अविश्वसनीय है कि कुछ निम्न कर्मचारी और बाहरी व्यक्ति इन प्रतिष्ठानों के गलियारे में आराम से घूमते हैं और सरकारी दस्तावेजों तक पहुंच जाते हैं, फिर भी वर्षों से उनकी पहचान नहीं हो पाई है।

सुरक्षा एक मानसिक अवस्था है। एक स्थिर मन मरणासन्न सुरक्षा तंत्र में सांत्वना पाता है। हमारे सरकारी प्रतिष्ठान, चाहे वे संवेदनशीलता सूचकांक पर उच्चतम स्तर पर हों या निम्न स्तर पर, वे अपनी सुरक्षा के प्रति लापरवाही से पीडि़त हैं। इन लापरवाहियों के पीछे कई कारण हो सकते हैं। यद्यपि कॉरपोरेट घरानों के हित तो स्पष्ट हैं, लेकिन इस पूरे एपिसोड में राजनैतिक षड्यंत्र की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। कल्पना कीजिए कि केन्द्रीय वित्तमंत्री बजट भाषण पढ़ रहे हों और यह हफ्तों पहले ही देश की सड़कों पर उपलब्ध हो, जिसे कीमत अदा कर कोई भी ले सकता हो। यह वत्र्तमान व्यवस्था के लिए बड़ी शर्मिंदगी हो सकती है। जाहिर है कि इस तरह का काम सिर्फ निचले स्तर के लोग अकेले नहीं कर सकते, जब तक कि इसमें उच्च अधिकारियों की मिलीभगत न हो। अगर अन्वेषक इस पूरे संचालक और उसके लाभुक का पता लगाने में नाकाम रहते हैं तो यह एक बड़ी गलती होगी और अपने पेशे के कत्र्तव्यों का निरादर भी होगा।

भौतिक सुरक्षा की बात करते हुए किसी को आश्चर्य हो सकता है कि इन संगठनों का स्तर उठाने के लिए किए जाने वाले खर्च और आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित करने के बावजूद हमारा सुरक्षा तंत्र क्यों असफल हो जाता है?

भौतिक सुरक्षा एक प्रक्रिया संचालित सुव्यस्थित कार्य है। अगर पूरे लगन से किया जाए तो यह उद्देश्यों की पूत्र्ति करता है। एक मजबूत सुरक्षा खतरों को नाकाम करने के लिए होती है, लेकिन यह तब लाचार हो जाती है जब उसके प्रतिष्ठान उसके सुख-दुख के बारे में ख्याल नहीं करते।

सरकारी कार्यालय लापरवाह, भीड़-भाड़ और अल्प-प्रेरित व्यक्तियों वाले जगह के रूप में जाना जाता है। कर्मचारियों के बीच अपनेपन का भाव नहीं है। वैमनस्य का भाव बड़े पैमाने पर मौजूद रहता है। अतिरिक्त उत्तरदायित्व लेने के लिए कोई भी तैयार नहीं होता। सुरक्षा का मुद्दा उनके मन में या एजेंडे में सर्वोच्च नहीं होता, बल्कि वे उम्मीद करते हैं कि उनकी सुरक्षा दूसरा कोई करेगा। सुरक्षा एक सामूहिक दायित्व है, जो प्रक्रिया द्वारा पूरी तरह परिभाषित है। पेट्रोगेट का मामला सुरक्षा के उल्लंघन का स्पष्ट उदाहरण है।

अभिगमन नियंत्रण, खोज एवं तलाशी किसी भी सुरक्षा प्रतिष्ठान को गति प्रदान करता है। शास्त्री भवन में तीन बाहरी व्यक्ति फर्जी पहचान पत्र के आधार पर अंदर और बाहर टहलते हैं, यहां तक कि देर रात में भी। वे बिना किसी अधिकृति के चालक वाली कार से आते हैं, जिस पर सिर्फ स्टीकर लगा होता है, जो जाहिर करता है कि इसका प्रयोग अतीत में कभी सरकार के काम के लिए किया गया होगा। अपराधी अगर एक बार मुख्य द्वार के सुरक्षाकर्मी की आंख में धूल झोंकने में कामयाब हो जाते थे तो आगे कोई समस्या नहीं होती थी।

बायोमैट्रिक सुरक्षा के युग में अगर फर्जी कागज के आधार पर व्यक्ति और गाडिय़ां संवेदनशील संस्थान में प्रवेश पा जाती हैं तो इससे जाहिर हो जाता है कि न ही हम आधुनिक सुरक्षा खतरों को समझ पाए हैं और न ही इसके जरिए हम इसका प्रयोग समझ पाए हैं।

शास्त्री भवन में चार मंत्रालयों के कार्यालय हैं और इसकी सुरक्षा केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के माध्यम से की जाती है। संबंधित मंत्रालय की आंतरिक सुरक्षा के लिए अपना निगरानी और सुरक्षा तंत्र विभाग होता है। एक वरिष्ठ पुलिस या खुफिया अधिकारी इस विभाग का प्रमुख होता है। लेकिन, यहां सारा लॉजिक बेमानी हो जाती है जब वहां एक ऐसा व्यक्ति मिलता है जिसने 2012 में अपनी अस्थायी नौकरी छोड़ दी हो और छद्मवेश में वहां का अब भी कर्मचारी बनकर मुख्य द्वार से कार्यालय तक अपनी पहुंच बनाए रखता हो।

क्या इस जगह पर पहचान पत्र जारी करने और वापस जमा कराने का कोई सिस्टम नहीं था? क्या इन पहचान पत्रों का कभी नवीनीकरण हुआ? क्या अस्थायी और स्थायी कर्मचारियों के लिए अलग-अलग या एक ही तरह के पहचान पत्र जारी किए जाते थे? क्या उन कर्मचारियों का विवरण सीआईएसएफ के साथ साझा किया गया, जो सेवानिवृत्त हो चुके थे या जिन्हें हटाया गया था? मंत्रालय में आने वाले आगंतुकों के विवरण के बारे में किसी ने सीआईएसएफ से विवरण मांगा? ऐसा सामने आया है कि अपराधी रात में यहां आते थे।

भवन में निगरानी प्रणाली को स्थापित करने के पीछे यहां आने वाले आगंतुकों और उनकी नापाक गतिविधियों पर नजर रखना था, खासकर ऑफिस संचालन के समय। यहां तक कि किसी ने सीसीटीवी फुटेज को देखने की भी जहमत नहीं उठाई। अगर इन फुटेज को एक समयांतर पर नियमित देखा जाता तो पॉवर बैक-अप होने के बावजूद रात में इस प्रणाली के बंद होने के कारण संदेह उत्पन्न होता।

ऑफिस समाप्त होने के बाद सरकारी कार्यालयों में घर जाने के लिए कर्मचारियों में भगदड़ मच जाती है। यह ऑफिस को खुला छोड़कर जाने और केयरटेकर को चाबी नहीं सौंपने का बहाना नहीं हो सकता। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि अपराधियों के पास डुप्लीकेट चाबी बनवाने के लिए पर्याप्त समय और अवसर थे। प्रतिष्ठान कार्यालय कि चाबी के प्रबंधन पर विशेष ध्यान देता है। कर्मचारियों को केयरटेकर के पास चाबी जमा करने और वापस लेने के लिए मनोनीत किया जाता है। ऐसा लगता है कि मंत्रालय में ताला लगाने और सील करने की व्यवस्था सही नहीं थी।

यह आंतरिक सूत्र का काम था। चपरासी और क्लर्क, दोनों को ऑफिस के कामकाज की बेहतर जानकारी होती है और सूचनाएं चोरी करने का काम भी दोनों मिलकर करते हैं। क्या किसी ने इस बात पर गौर किया कि मंत्री का चपरासी, जो कि सेवानिवृत्त होने वाला है, ऑफिस बंद के बाद देर तक क्यों ठहरता है? सेंट्रल रजिस्ट्री में चपरासी और क्लर्क दोनों साथ में क्यों रूकना पसंद करते हैं? सेंट्रल रजिस्ट्री एक संवेदनशील डेस्क होता है, जहां से ईमेल भेजे और प्राप्त किए जाते हैं। इसे संभालने वाले क्लर्क का एक निश्चित समयांतर पर बदलाव किया जाता है। लेकिन, इस बारे में सोचने के लिए किसी के पास समय नहीं था। एक बात और भी चौंकाने वाली है, वह है कि क्या अल्प शिक्षित ये कर्मचारी अपने ‘बॉस’ की जरूरत के हिसाब से एकदम सही दस्तावेज पाने में इतने सक्षम कैसे हैं?

सभी मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रम के कार्यालयों में हर साल इंटेलिजेंस ब्यूरो द्वारा सुरक्षा ऑडिट किया जाता है। क्या शास्त्री भवन में कभी शारीरिक हमला या घुसपैठ जांच किए गए? क्या गुप्तचरों ने मंत्रालय में कुछ गड़बड़ पाया या सिर्फ यह दिखावा है? आईबी की ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर मंत्रालय के निगरानी और सुरक्षा विभाग ने क्या कदम उठाए? शायद कुछ नहीं।

कार्यालयों में फोटो कॉपी करने वाली मशीनों का नियंत्रित प्रयोग कुछ निष्कर्ष तक ले गई होतीं, यदि उसके संचालक ने इसे लॉगबुक में अंकित करने पर ध्यान दिया होता। कहा जाता है कि फोटो कॉपी मशीन में छुटे कागज की खोज, दरअसल पेट्रोगेट की खोज है।

यह एपिसोड आगंतुकों और पत्रकारों को प्रबंधित करने की समस्या की ओर भी ध्यान दिलाता है। कायदे से सभी आगंतुक पूर्वसूचित होने चाहिए। अधिकारियों को आगंतुकों से ऑफिस में नहीं मुलाकात करनी चाहिए। पत्रकारों को विज्ञप्ति उनके जनसंपर्क अधिकारी से प्राप्त करनी चाहिए और अपने सूत्र तैयार करने के चक्कर में नहीं पडऩा चाहिए। इससे अंतत: सुरक्षा को ही खतरा होता है।

अभी तक फिजिकल सिक्योरिटी में खामी का ही मामला प्रकाश में आया है। सुरक्षा तंत्र खामी के दौरान प्रतिष्ठान में साईबर जासूसी का मामला भी सामने आ जाए तो आश्चर्य की बात नहीं होगी। अगर बड़े पैमाने पर डेटा को चुराया या नष्ट किया गया होगा तो यह भी देशहित में खतरनाक है।

यह सिर्फ पेट्रोलियम मंत्रालय का मामला नहीं है, पेट्रोगेट की तरह इसी तरह के मामले दूसरे मंत्रालयों और विभागों के साथ भी है। सभी कमजोरियों के बावजूद सुरक्षा हमारा स्नायुतंत्र है। पेट्रोगेट का मामला क्या हमारे रवैये में बदलाव लाएगा? या फिर यह मामला भी मंत्रालय के हमेशा की तरह होने वाले कार्यों के नाम पर दब कर रह जाएगा।

एक सामान्य आदमी जो एक ही दिन में कई बार शाबासी पाता और कार्यस्थल पर कड़े सुरक्षा इंतजाम के बीच से गुजरता है, वह इन सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा खामियों से खुश नहीं होगा।

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