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मेरे आदर्श माल्या

मेरे आदर्श माल्या

बेटा: पिताजी।

पिता: हां, बेटा।

बेटा: आपके लिये खुशखबरी।

पिता: क्या?

बेटा: भारत से एक विजय माल्या तो चला गया पर एक और पैदा हो गया है।

पिता: कौन?

बेटा: मैं।

पिता: मेरे को बेटा, दु:ख ही इस बात का है कि तूने कुछ किया तो है नहीं पर शेखचिल्ली वाली बातें अवश्य की हैं। कभी कुछ कर तो दिखाया पहीं है।

बेटा: पिताजी, मैं इस बार सब कुछ कर दिखाऊंगा।

पिता: 40 साल की तेरी उम्र हो गई। अभी तक तो कुछ कर दिखाया नहीं है। यदि मैं तुझे पैसे देने बन्द कर दूं तो तू भूखा मर जायेगा। तेरी बीवी तुझे छोड़ कर चली जायेगी।

बेटा: पर पिताजी, मैं सच बोल रहा हूं। मैं माल्या से भी आगे निकल जाऊंगा।

पिता: उसने तो बेटा 10 हज़ार करोड़ रूपये का ऋण ले लिया और भाग गया। तुझे तो कोई बैंक 10 रूपये का उधार नहीं देगा।

बेटा: पिताजी, आप मुझे निरूत्साहित मत किया करिये। इस बार तो बिलकुल ही नहीं। मुझे करने दीजिये जो मैं करना चाहता हूं।

पिता: बैंक तो तुझे एक पैसा उधार नहीं देंगे जब तक कि उनसे तू कोई झूठ नहीं बोलेगा या धोखा नहीं देगा।

बेटा: पिताजी, मैं वही करूंगा जो उसने किया। यदि उसने सच ही बोला होता तो क्या बैंक आज उसे इतना बड़ा ऋण दे देते। यदि सच ही बोला होता तो आज वह ऋण भी वापस कर देता और उसे बाहर भी भागना न पड़ता। उसी आधार पर तो बैंक मुझे आज ऋण देंगे।

पिता: तू तो झूठ बोल कर फंस जायेगा।

बेटा: पिताजी, झूठ बोलना इस देश में अपराध नहीं है।

पिता: कैसे?

बेटा: संविधान ने हम सब को अभिव्यक्ति की पूरी स्वतन्त्रता का अधिकार दिया है।

पिता: तो क्या संविधान ने झूठ बोलने का भी अधिकार देता है?

बेटा: पिताजी, मेरे को यह बताओ कि संविधान की किस धारा में लिखा है कि नागरिक झूठ नहीं बोल सकता?

पिता: संविधान में ऐसा लिखा है या नहीं पर यह है तो गलत।

बेटा: पिताजी, आप जैसे लोग बोलने की स्वतन्त्रता पर जो अंकुश लगाने की बात कर रहे हैं उसी कारण ही तो देश में हालात बिगड़ गये हैं।

पिता: अच्छा, तो तू यह चाहता है कि हम तुझे झूठ बोलने से भी न रोके?

बेटा: आप कानूनन रोक ही नहीं सकते।

पिता: तू फिज़ूल की बातें मत कर।

बेटा: पिताजी, अगर जनता के झूठ बोलने के अधिकार पर अंकुश लगाया गया तो देश में क्रान्ति हो जायेगी। सारा काम ठप्प हो जायेगा।

पिता: कैसे?

बेटा: पिताजी, यहां तो राजनीति व सरकार ही झूठ की बैसाखी पर चलती है। यदि नेता दिन में 10-20 बार झूठ न बोले तो उनकी रोटी हज़म नहीं होती। राजनीति की दुकान पर तो ताला ही लग जायेगा।

पिता: आज तो मुझे तेरी बातें ही समझ

नहीं आ रहीं। तू कुछ बहकी-बहकी सी बातें कर रहा है।

बेटा: यह पिताजी, इसलिये कि आपने आज तक मुझे कुछ नहीं करने दिया। मुझे सदा कानून और परम्पराओं की बेडिय़ों से जकड़े रखा। आज इस भारत में 400 साल की पुरानी रूढ़ीवादी परम्पराओं को तोड़ कर महिलाओं को शनि मन्दिर में पूजा का अधिकार मिला है। आप तो इसका विरोध ही कर रहे थे न?

पिता: मैं तो वहीं कहूंगा जो मुझे ठीक लगता है।

बेटा: बस आप अपने कानून व परम्परायें अपने पास ही रखो। मुझे अपना काम करने दो और अपने आदर्शों व परम्पराओं की बीच में टांग मत अड़ाना।

पिता: बेटा, यह तो हमारी जड़ें हैं। जड़ें ही कट गईं तो वृक्ष कैसे खड़ा रहेगा?

बेटा: यह फिलासफी तो अब आप अपने तक ही सीमित रखो।

पिता: बेटा, यह बहुत गलत बात होगी।

बेटा: पिताजी, आप इन दकियानूसी बातों से ही चिपके रहो। हमारे नेता तो कह रहे हैं कि हमें देश की बर्बादी चाहने की भी आज़ादी है। भारत माता की जय न बोलने की स्वतन्त्रता पर भी हमारा अधिकार है। राष्ट्रगान बजे तो यह हमारी स्वतन्त्रता है कि हम उसके सम्मान में खड़े होने का किसी पर एहसान करें या न करें। और आप हैं जो कह रहे हैं कि झूठ बोलने का अधिकार नहीं है।

पिता: मैं तो कहूंगा चाहे किसी को अच्छा लगे या न लगे।

बेटा: पिताजी, आप मेरे को यह बताओ कि हर चुनाव में हमारे नेता हम से बहुत कुछ वादे कर जाते हैं। वह तो आसमान से तारे तोड़ कर ला देने का भी आश्वासन दे देते हैं। पर बाद में कितने हैं जो अपने वादों पर खरे उतरते हैं? सब झूठ बोलते हैं। है कोई राजनेता या अधिकारी जिसको झूठ बोलने के लिये सज़ा दी गई हो? यदि नहीं तो स्पष्ट हैं कि झूठ बोलना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे कोई छीन नहीं सकता।

पिता: बेटा, कुछ भी बोल। झूठ तो झूठ ही है। वह कभी क्षम्य नहीं हो सकता। हमारी आस्था और परम्परा पर निर्णय अदालतें नहीं देंगी। एक ओर तो हमारा संविधान कहता है भारत एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र हैं  और दूसरी ओर अदालतें पंथिक धारणाओं और परम्पराओं पर अपने फैसले सुना रही हैं।

बेटा: पिताजी, धर्म-कर्म की बातें व्यवसाय में नहीं चलतीं। इसी चक्कर में तो मैं कुछ कर न सका। ऊपर से आप सदा मुझे कोसते ही रहते हैं। आपने कभी मुझे प्रोत्साहित व उत्साहित नहीं किया।

पिता: चल, फिज़ूल की बातें छोड़। मुझे बता तू करना क्या चाहता है?

बेटा: मैं पिताजी, एक फैक्टरी खड़ी करने के लिये बैंक से दस करोड़ का उधार ले लूंगा।

पिता: तू तो ऐसे बोल रहा है जैसे कि बैंक तेरे बाप का है और जैसे तू मुझसे दस रूपये मांगता है और मैं निकाल कर दे देता हूं, वैसे ही बैंक भी तुझे दस करोड़ दे देगा।

बेटा: क्यों नहीं देगा? मैं जो वह चाहेंगे मैं पूरे कागज उन्हें दे दूंगा।

पिता: और बस तुझे 10 करोड़ मिल जायेंगे।

बेटा: पिताजी, जैसे बैंक वालों ने माल्या को दिये, वैसे ही मुझे भी देंगे।

पिता: बेटा, ऐसे नहीं है। बैंक वाले कई प्रकार की सिक्योरिटी मांगेंगे, गारंटी मांगेंगे। अपनी पूरी तसल्ली करेंगे कि ऋण वापस मिल जायेगा, तभी पैसा देंगे।

बेटा: वह वही करेंगे जो माल्या के लिये किया।

पिता: वह बहुत तसल्ली करेंगे बेटा। मुझे तो उम्मीद कम है।

बेटा: पिताजी, आप तो निराशावादी हैं। यदि उन्होंने वही तसल्ली करनी है जो उसके मामले में की तब तो मुझे ऋण अवश्य मिलेगा।

पिता: कैसे?

बेटा: ऐसे जैसे कि अब बैंक ऋण वापसी के लिये उनके दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं

और मायूस लौट रहे हैं। तो फिर उनकी तसल्ली का क्या हुआ?

पिता: तुम्हारी यह भी बात मानी। तुम्हें 10 करोड़ ऋण मिल गया। पर तू माल्या का मुकाबला कैसे करेगा? उसकी तो कारोबारी सल्तनत बहुत बड़ी है। उसने तो 9 हज़ार करोड़ देने हैं बैंकों के।

बेटा: मेरी तो अभी शुरूआत ही होगी न। आगे देखिये क्या होता है। मैं एक बैंक के ऋण का हवाला देकर औरों से भी ऋण ऐंठता जाऊंगा। एक का ऋण भरूंगा, दूसरे से उठा लूंगा। पिताजी, काम करना है तो तरीके भी ढूंढने पड़ेंगे। कामयाब व्यक्तियों के आदर्शों व कारनामों से सीख लेनी पड़ेगी ही।

पिता: बेटा, वह तो लंदन भाग गया। तेरे पास तो छुपने की भी जगह नहीं है।

बेटा: आप चिन्ता न करो पिताजी। अब तक जिन्होंने बड़े-बड़े ऋण लिये हैं उनका कुछ हुआ है क्या? सब ऐश कर रहे हैं।

पिता: भई तू जान। अगर कल को मुझे पूछने आ गया तो मैं तो सच ही बोलूंगा।

बेटा: पिताजी, आप चिन्ता मत करिये। मैं आपकी तरह डरने वाला नहीं हूं। आपने खेती के लिये ऋण लिया था। फसल फेल हो गई। लौटा न सके। जब बैंक वालों ने दो बार तकाज़े के लिये अपने कर्मचारी भेजे तो आपने डर कर अपनी ज़मीन कौड़ी के भाव बेच दी और ऋण चुका दिया।

पिता: बेटा, इज्ज़तदार आदमी के लिये अपनी इज्जत प्यारी होती है, धन नहीं।

बेटा: तो नुक्सान में कौन रहा? आप ही न। चाचाजी ने भी तो आपकी तरह ही ऋण लिया था। लौटाया? जब बैंक वाले आते थे तो वह पूरे दम से कह देते थे – मेरे पास पैसे नहीं हैं। मैं कहां से दूं? तुमने जो करना है कर लो। हुआ क्या? अन्त में सरकार ने उन जैसों का ऋण माफ कर दिया और आप हाथ मसलते रह गये। फायदे में रहे बेशर्म और नुक्सान में रहे आप जैसे इज्ज़़तदार। इसी लिये तो मुझे पंजाबी की उस कहावत पर विश्वास होता है —जिसने की शर्म, उसके फूटे कर्म।

पिता: बेटा, इज्ज़त का कोई मोल नहीं होता।

बेटा: पिताजी, आजकल फायदे में वह रहते हैं जो सोच-समझ कर प्लान बनाते हैं। मेरा एक दोस्त बता रहा था कि उसके एक सहयोगी ने उससे 100 रूपये उधार मांगे और कहा मैं कल लौटा दूंगा। उसने वैसा ही किया। कुछ दिन बाद उसने 500 मांगे। वह भी ठीक समय पर लौटा दिये। उस पर मेरे दोस्त का विश्वास बढ़ता गया। पर साथ ही ऋण की मांग भी बढ़ती गई। एक दिन उसने 50 हज़ार मांग लिये और कहा कि मैं तीन मास बाद लौटा दूंगा। आज तीन साल हो गये हैं। मेरा दोस्त परेशान फिर रहा है।

पिता: तो तू भी ऐसा ही करेगा?

बेटा: पिताजी, कामयाबी के लिये तो मैं हर हथियार अपनाऊंगा।

पिता: तब तो मुझे अखबार में विज्ञापन ही देना पड़ेगा कि मेरा तेरे से कोई लेना-देना नहीं है और तुम्हारी लेन-देनदारियों के लिये मैं जि़म्मेवार नहीं हूंगा।

बेटा: पिताजी, आप निश्चिन्त रहो। किसी का कुछ हुआ है? भोपाल गैस का आरोपी एंडरसन विदेश में मर गया पर सरकार के हाथ उस तक न पहुंच सके। बोफर्स काण्ड आरोपी क्वात्रोची। आईपीएल के ललित कुमार मोदी। और अब माल्या का क्या होगा? लन्दन में ऐश करेगा। आप निश्चिन्त रहो। मैं भी बाहर भाग जाऊंगा। आपको भी विदेश की सैर व मौज करवा दूंगा। आप कभी विदेश तो गये नहीं हैं। मैं ही कराऊंगा आपको बाहर की मौज— आपका सुपुत्र।

पिता: मुझे नहीं करनी विदेश की यात्रा

व ऐश।

बेटा: पिताजी, आप तो ऐसे ही घबरा जाते हैं। मैंने तो अभी कुछ किया ही नहीं।

पिता: बेटा, मैं तो तेरी बातें सुनकर ही घबरा रहा हूं। तू कैसे बदल रहा है?

बेटा: पिताजी, मेरा एक दोसत सुना रहा था कि उसका बाप एक सरकारी अफसर था। उस पर घूंसखोरी का आरोप लगा। कई दिन वह हवालात में रहा। सरकार ने उसे निलंबित कर दिया। इसी बीच वह सेवानिवृत भी हो गया पर उसपर अदालतों में मुकद्दमें चल रहे हैं। उसका बाप खुले आम कहता फिरता है कि रिश्वत खाने की चीज़ है और मैंने खाई। जो कमाया वह मेरे पास है। अदालतें अपना काम करेंगी और वह अपनी ऐश। वह कहता है कि वह सदा जि़न्दा तो रहेगा नहीं। इससे पहले कि मामला सब से ऊंची अदालत तक पहुंचे वह ईश्वर को प्यारा हो चुका होगा। उसकी कमाई बेटे के पास रह जायेगी और सरकार देखती रह जायेगी।

पिता: पर बेटा, तू मुझ से कोई उम्मीद मत रखना। मैं तेरे इन गलत कारनामों में शामिल नहीं हूंगा।

बेटा: पिताजी, आप मुझ पर इतनी मेहरबानी रखना कि अपनी ज़ुबान बन्द रखना। मुझे डराना न, धमकाना न और निरूत्साहित मत करना।

पिता: तू इतनी मेहरबानी करना कि अन्तिम दिनों में मुझे जेल में मत सड़ाना।

बेटा: पिताजी, मैं आपसे वादा करता हूं। चाहे कुछ हो जाये मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। आखिर मुझे भी आपका ख्याल है।

पिता: तो अब सो जा। शेखचिल्ली की बातें अब बहुत हो गईं।

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