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गर्व से कहो हम हैं हथियारों के सबसे बड़े खरीददार

गर्व से कहो हम हैं हथियारों के सबसे बड़े खरीददार

भारत अपने पड़ोसी और प्रतिद्वंदी चीन से हर मामले में पीछे ही रहता है। लेकिन अब एक क्षेत्र है जिसमें हमने चीन को पीछे छोड़ दिया है वह है विदेशों से हथियार की खरीदारी। हम अब  ‘गर्व’ से कह सकते हैं हम हैं  दुनिया के सबसे बड़े हथियारों के खरीदार। हमारे बाद आता है  चीन और पाकिस्तान का नंबर। हाल ही में स्टॉकहोम के इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन में एक बार फिर यह बातें सामने आई हैं। इसके अनुसार वर्ष 2011-2015 के दौरान विश्व की सारे हथियार बिक्री में से 14 प्रतिशत हथियार हमने खरीदे। जो इस बात का प्रतीक है कि नई सरकार की देश में -मेक इन इंडिया- के तहत  हथियार निर्माण की महत्वाकांक्षी योजना बहुत कामयाब नहीं हुई है। हम अपने प्रतिद्वंदी चीन और पाकिस्तान से तीन गुना ज्यादा हथियार खरीद रहे हैं। और हमारे सबसे बड़े हथियारों के विक्रेता है रूस, अमेरिका, इजराइल और फ्रांस। आनेवाले समय में भारत का हथियार खरीद का बिल और भी ज्यादा बढऩे के आसार हैं क्योंकि मेक इन इंडिया के तहत स्वदेश में हथियारों के निर्माण को प्रगति नहीं हो पाई है। और भारत ने हथियारों की खरीद  के कई बडे सौदे किए हैं। इनमें 60000 करोड रु का 36 फ्रांसिसी रैफल लड़ाकू विमान सौदा, 39000 करोड रू का रूस से पांच एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम की खरीद शामिल है।

भारत के बाद चीन सबसे बड़ा हथियारों का आयातक है जो दुनिया की कुल हथियार बिक्री में से 4.7 प्रतिशत हथियार खरीदता है उसके बाद ऑस्टे्रलिया (3.6) और पाकिस्तान (3.3) का नंबर आता है। चीन जो हमसे पहले सबसे बड़ा हथियारों का खरीददार था उसने चमत्कार कर दिखाया। उसके इस चमत्कार को नमस्कार करना ही पड़ेगा। उसने अपने देश में इतनी तेजी से स्वदेशी हथियार उद्योग को विकसित किया कि अब वह भले ही कुछ मात्रा में दूसरे देशों से हथियार खरीदता हो मगर वह हथियारों के आयातक के साथ निर्यातक भी बन गया है। वह दुनिया के बड़े हथियार निर्यातक देशों में  भी शुमार होने लगा है और टॉप फाइव हथियार निर्यातक देशों में आ गया है। यह हमारे लिए काफी चौंकाने वाली बात है।

रूस ने पिछले पांच साल के दौरान भारत द्वारा आयातित हथियारों में 70प्रतिशत हथियार सप्लाई किए। अमेरिका ने 12 प्रतिशत और इजराइल ने 7 प्रतिशत। इस दौरान भारत ने इस दौरान नब्बे 222 एस -30 एमकेआई युद्धक विमान 27 मिग -29 के युद्धक विमान प्राप्त किए। पिछले पांच वर्षों में भारत  रूस और इजराइल के हथियारों का सबसे बड़ा आयातक रहा है। अमेरिका के लिए भारत अभी सबसे बडा आयातक नहीं बना है लेकिन पहले की तुलना में भारत की अमेरिका से हथियारों की खरीदारी कई गुना बढ़ी है। भारत और अमेरिका ने डिफेंस ट्रैड एंड टेक्नालाजी इनिशिएटीव 2012 में साइन किया था ताकि भारत के रक्षा उत्पादन क्षेत्र में अमेरिकी निवेश बढ़े लेकिन हाल ही में ओबामा की भारत यात्रा के दौरान ही इसे गति मिल पाई और दोनों देशों में चार चीजों पर ही सहमति बन पाई। यदि यह मॉडल सफल होता है तो भारत केवल अमेरिकी हथियारों का खरीददार ही नहीं होगा वरन बडे हथियारों का उत्पादक भी बनेगा जो भारत सरकार की -मेक इन इंडिया- की नीति के अनुकूल भी है।

अंग्रेजी के जानेमाने लेखक जार्ज बर्नाड शॉ ने एक बार टिप्पणी की थी मनुष्य इतिहास से यह सीखता है कि मनुष्य इतिहास से कुछ नहीं सीखता। कम से कम भारत के मामले में यह टिप्पणी सोलह आने खरी है। भारत चीन युद्ध को 50 से ज्यादा साल हो गए। यह युद्ध हम इसलिए हारे क्योंकि हम तलवार गलाकर तकली बनाने वाले देश थे। हम जंग लडने चले थे मगर हमारी सामान्य सी तैयारी तक नहीं थी। हमारे देश के सैनिकों के पास न  कारगर हथियार थे न गोला बारूद, न ठंडी जगहों पर पहनने के लिए जरूरी कपड़े। नतीजतन हमारी शर्मनाक हार हुई। चीन ने आज भी हमारी हजारों एकड़ जमीन पर कब्जा किया हुआ है। कम से कम इस हार से सबक लेकर तो हमें  युद्ध सामग्री के मामले में आत्मनिर्भर होना चाहिए था। अपनी सेना को आधुनिक हथियारों से लैस करना चाहिए था लेकिन तलख्  हकीकत  यह है कि इतने साल बाद भी हम हथियारों के उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं। बहुत सारी बुनियादी सैनिक सामग्री  तक के लिए विदेशी आयात पर निर्भर है।

हमारा देश बड़ा अजीब है हम एटम बम बना चुके हैं। हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित राकेट चांद पर जा चुके हैं, मंगल की ओर भी हमारे राकेट अग्रसर हैं, आईटी में हमारी धाक दुनिया मानती है। हम उच्च तकनीक पर आधारित काम बहुत आसानी से कर लेते हैं लेकिन एक काम हम  नहीं कर पाते तो अपने देश में अपने सैनिकों के लडऩे के लिए हथियार नहीं बना पाते। अच्छी क्वालिटी की बंदूके, तोप, लड़ाकू विमान, मिसाइलें, टैंक आदि बनाना हमारे बस की बात नहीं है। वो तो हमें विदेशों से ही खरीदने पड़ते हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे पास इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है। हमारे देश में 50 लेबोरेटरिज है जहां रक्षा अनुसंधान होता है  40 कारखाने है जहां रक्षा सामग्री का उत्पादन होता है। लेकिन यह सब बेमतलब है। पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने एक बार कहा था सामरिक स्वायत्तता के बारे में हमारे दावों का तब तक कोई विशेष अर्थ नहीं है जब तक कि हमारा रक्षा उत्पादन हमारे देश में नहीं होता। अगर हमारा देश अपने स्तर पर बड़े हथियार विकसित और निर्मित नहीं कर सकता है तो यह बड़ी सामरिक कमजोरी है।

हमारा देश रक्षा तैयारियों के मामले में कमाल का लापरवाह रहा है। आजादी को 67 साल हो गए लेकिन हमारा देश रक्षा उत्पादनों के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। कारण यह है कि हमारे देश का सरकारी क्षेत्र  वह चाहे रक्षा अनुसंधान का हो या उत्पादन का अपने निकम्मेपन के लिए मशहूर है। 2007 में रक्षा मंत्रालय ने रामाराव कमेटी से रक्षा अनुसंधान क्षेत्र की प्रमुख सरकारी  संस्था डीआरडीओ के कामकाज की समीक्षा करने को कहा था। इस कमेटी की रपट के नतीजे इतने चौंकानेवाले थे कि उन्हें तुरंत गोपनीय घोषित कर दिया गया। यहां तक कि संसदीय स्थायी समिति को भी नहीं दिया गया। दूसरी तरफ हम छह दशकों से बड़े पैमाने पर कई तरह के छोटे-बड़े हथियार और रक्षा प्रणालियां विदेशों से खरीद रहे हैं और इतने बड़े पैमाने पर खरीद रहे हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े हथियारों के खरीदार बन गए हैं। विदेशों से हथियार खरीदने की नीति का ही नतीजा है कि हमारा इन हथियारों और रक्षा उपकरण पर अनाप शनाप खर्च हो रहा है। इसके अलावा रक्षा उपकरण यदि देश में बनते तो हमारे देश के उद्योग विकसित होते, हमारा देश आत्मनिर्भर होता और लाखों लोगों को रोजगार मिलता। लेकिन विदेशों से हथियार खरीदने की हमारी नीति के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा।

24-04-2016

हमारे देश के नेता इस स्थिति से बहुत खुश है ऐसा नहीं है। पिछली सरकार के रक्षामंत्री एके एंटोनी ने कई बार कहा कि विदेशी हथियार निर्माताओं पर भारत की निर्भरता खत्म होनी चाहिए। इसके लिए नीतियां भी बनाई गईं  लेकिन केवल इच्छाओं के घोड़ों की सवारी करके आत्मनिर्भरता के लक्ष्य तक नहीं पहुंचा जा सकता। कई विशेषज्ञों को तो लगता है कि भारत को आयातित हथियार खरीदने का नशा है जो आसानी से छूटने वाला नहीं है। इस साल भी हम बड़े पैमाने पर हथियार खरीदने वाले हैं क्योंकि हथियार खरीदना हमारी मजबूरी है, हम स्वदेशी हथियार उद्योग को विकसित करने में नाकाम रहे है।

स्वीडिश थिंक टैंक इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के उपाध्यक्ष पीटर डी वेजेमैन कहते हैं कि उन्हें लगता है कि विश्व में भारत के अलावा शायद ही कोई ऐसा देश होगा जिसने हथियार उद्योग स्थापित करने की बेतहाशा  कोशिश न की होगी लेकिन इतनी बुरी तरह असफल रहा होगा। उन्हें नहीं लगता कि भारत ने जो नए हथियार विकसित किए हैं उससे इस इतिहास में कोई खास बदलाव होनेवाला है। उनका मानना है कि भारत द्वारा निर्मित  लडाकू विमानों, टैंको और तोपों की गुणवत्ता संदिग्ध है। हाल ही में सनडे स्टैडर्ड में छपी खबर के मुताबिक भारतीय सेना में स्वदेशी शोध और अनुसंधान संस्थान डीआरडीओ द्वारा 32 वर्ष, और 1000 करोड़ से ज्यादा की लागत से बनाए मिसाइल सिस्टम आकाश को इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि वह उसकी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। और अब सेना अपने लिए उपयुक्त मिसाइल सिस्टम खरीदेगी।

अमेरिका और रूस जैसे देशों की पूरी अर्थव्यवस्था ही हथियारों के निर्माण पर चलती है। वे अभी भी सबसे बड़े हथियार निर्यातक देशों में ही शुमार हैं। भारत रक्षा बजट के लिहाज से आठवें नंबर पर है हमसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में से बाकी सभी देशों के पास अपना स्वदेशी हथियार उद्योग है। हम पिछले कई दशकों से मुख्य रूप से सोवियत संघ या रूस से ही सबसे ज्यादा हथियार खरीदते रहे हैं। हम अपनी जरूरत के 70 प्रतिशत हथियार रूस से ही खरीदते थे।

हथियारों के मामले में विदेशों पर निर्भरता घोटालों को जन्म देती है। पिछले दिनों आगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हैलीकाफ्टरो में घोटाला बहुत चर्चा में है। दरअसल रक्षा सौदों और घोटालों का चोली दामन का साथ रहा है। रक्षा सौदा हो उसमें घोटाला होने के आरोप न लगें यह संभव नहीं है। हालांकि बोफोर्स घोटाले से सबक लेकर सरकारें बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखती हैं इतना फूंक-फूंक कर कि सेना के विभिन्न अंगों की हथियारों और सुरक्षा प्रणलियों की खरीद के मामले में हम पिछड़ते जा रहे हैं। पिछले कुछ दशकों के दौरान बोफोर्स, स्कोरपियन, एचडीडब्लू पनडुब्बी, आदि रक्षा घोटाले समय-समय पर चर्चा में रहे हैं।

सवाल उठता है कि हम अपनी जरूरत के हथियारों का उत्पादन क्यों नहीं कर पाते। भारत की  एक बड़ी समस्या यह है कि भारत का सरकारी क्षेत्र भ्रष्ट और असक्षम है उसके पास न तो उच्च तकनीक वाले  हथियार बनाने की क्षमता है न बड़े पैमाने पर हथियार बनाने की। मनोज जोशी जैसे रक्षा विशेषक्ष तो कहते हैं कि हमारा रक्षा उत्पादन औद्योगिक ढांचा पूरीतरह आउट डेटेड है। उसे या तो डिसमेंटल कर देना चाहिए या फिर प्रायवेट सेक्टर को हस्तांतरित कर देना चाहिए। हमारे पास दस लाख  सैनिकों वाली  सेना है मगर  हम अपनी जरूरत के 75 प्रतिशत हथियार अब भी विदेशों से खरीदते हैं। हम राइफल टैंक और लडाकू विमान तो छोडि़ए सैनिकों के लिए अच्छी क्वालिटी के कपडे और जूते तक विदेशों से खरीदते हैं। कारण यह है कि हमारा सरकारी क्षेत्र असक्षम है और निजी क्षेत्र को हमने रक्षा उत्पादन में शामिल नहीं किया।  नतीजा यह है कि हम औने पौने दामों पर विदेशों से हथियार खरीदते है। यदि हथियारों का हम अपने देश में उत्पादन करते तो न केवल पैसा कम लगता वरन हमारे देश के लाखों लोगों को रोजगार मिलता। यदि हम हथियार उत्पादन में महारत हासिल कर सकें  तो विदेशों को हथियार निर्यात भी कर सकते है। अब मोदी सरकार हथियार निर्माण के क्षेत्र में निजी क्षेत्र और विदेशी पूंजी को बढ़ावा देनी की बात कर रही है मगर इसके नतीजे मिलने में समय लगेगा तब तक बड़े पैमाने पर हथियार खरीदते रहने का कोई विकल्प नहीं हैं। अभी भारत सरकार ने मेक इन इंडिया के तहत हथियार निर्माण के लिए प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की सीमा 49 प्रतिशत रखी है। लेकिन विश्व की तमाम बड़ी हथियार निर्माण कंपनियों का मानना है कि इसके जरिये नवीनतम तकनीक वाले हथियारों का निर्माण नहीं हो पाएगा जो स्वदेशी हथियार उद्योग को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जरूरी है। इसके लिए विदेशी प्रत्यक्ष पूंजी निवेश की सीमा को काफी बढाना जरूरी है। दरअसल वैश्विक हथियार निर्माण उद्योग में पेचीदगियां इतनी ज्यादा है कि इस क्षेत्र में मेक इन इंडिया को सफल होने में काफी वक्त लगेगा। वैसे इस वर्ष गोवा में होने वाले डिफेंस एक्सपो में 490 विदेशी हथियार कंपनिया हिस्सा ले रही हैं।

24-04-2016

हालांकि थिंक टैंक इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट  ने माना है कि मोदी सरकार देश में हथियारों के निर्माण की नीति पर बहुत बल दे रही है लेकिन उसका कहना है कि भारत की हथियार बनाने की क्षमता बहुत संदिग्ध है। इसलिए यह मकसद नामुमकिन न सही पर आसान भी नहीं है। लेकिन अगर हम अपना हथियार उद्योग स्थापित करने में सफल हो गए तो हथियार ही एक ऐसा उद्योग है जिसमें कभी मंदी नहीं आती और मुनाफा जबरदस्त है। घरेलू हथियार उद्योग हमें रक्षा सामग्री के मामले में आत्म निर्भर बनाएगा ही और आर्थिक तौर पर खुशहाल भी। इस तरह हमें अच्छे दिन लाने में मदद करेगा।

सतीश पेडणेकर

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