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सांप्रदायिक आग कैसे भड़काएं

सांप्रदायिक आग कैसे भड़काएं

खुरदा के एसपी का चेहरा मेरे सामने नहीं था, बस उनकी आवाज, वह भी भरभराती हुई, से ही मेरी पहचान थी। मेरी मुलाकत दिलीप दास से नहीं हुई थी लेकिन पिछले दो साल में हमारे समूह ने उन्हें 350 बार फोन किया था। यानी औसतन दो दिन में एक बार। शुरुआत में चार महीने वे पांच बार फोन करने पर एक बार जवाब देते थे, फिर मध्य सितंबर 2015 से जनवरी तक मेरे 50 फोन करने पर सिर्फ तीन का जवाब देते थे। उनकों अक्सर फोन करने की एक वजह यह थी कि मुझे अपनी हैसियत पर काफी गर्व था।

यही ध्यान में रखकर मैंने अपने ऊपर मासूम गायों, नाजुक-से बछड़ों और गर्वीले बैलों तथा सांड़ों को मवेशी तस्करों के चुगुल से छुड़ाने की जिम्मेदारी ओढ़ ली थी। ओडीशा का खुरदा जिला, जिसके दास मुख्य कानून पालक थे, और भद्रक जिला मवेशी तस्करों के गढ़ थे। मेरी व्यावहारिक पहचान भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (एएनबीआई) के मानद पशु कल्याण अधिकारी और एक एनजीओ गौ ज्ञान फाउंडेशन के स्वयंसेवक की थी।

ईमानदारी की बात यह है कि मैंने अपना यह अभियान तब शुरू किया था जब दूर-दूर तक भगवा पार्टी के सत्ता में पहुंचने की बात नहीं थी और भार के विचार को विदेशी समाचार एजेंसियों ने इस रूप में पुनर्परिभाषित नहीं किया था कि बीफ सेवन का अधिकार दरअसल भोजन के अधिकार और पसंद-नापसंद रखने की आजादी से जुड़ा हुआ है। कैसे कुछ छद्म लोगों ने इसे हवा दी, अब यह इतिहास है। इतिहास की गलत व्याख्या का इतना असर है कि पुलिस महानिदेशक होने के बावजूद संजीब मरीक खुद को प्राचीन इतिहास का जानकार बताते और कहते कि बीफ सेवन पर कोई पाबंदी नहीं थी। हालांकि शायद उनके कान ओडीशा के गोरक्षा कानून और पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम अधिनियम की बातें सुनने को तैयार नहीं थे।

पुलिस-अपराधी सांठगांठ

24-04-2016ओडीशा के पुलिस प्रमुख होने के नाते मरीक पिछले नवंबर तक मवेशी माफिया की करतूतों को नजरअंदाज करते रहे और इस तरह उनके मददगार बने रहे। लेकिन फिर मेरे कानों में वह सुंदर संदेश सुनने को मिला कि मरीक को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया है। उन्हें ओडीशा राज्य सड़क परिवहन निगम में दंड स्वरूप प्रमुख बना दिया गया और अब वे शायद रिटायर हो गए हैं। हालांकि मरीक की डीजीपी पद से बेआबरू विदाई का मवेशी माफिया के प्रति नरमी से कोई  लेनादेना नहीं है। फिर भी मुझे खुशी हुई।

ओडीशा के पूर्व डीजीपी की बेवजह आलोचना करने का आरोप मुझ पर लगा लेकिन यही बात ओडीशा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अमिताभ रॉय को मेरी अर्जी में भी थी और मौजूदा पर्यावरण मंत्री को लिखित शिकायत में भी। इनकी प्रतियां एडब्लूबीआई के जरिए औपचारिक रूप से मरीक को पिछली जुलाई में उनकी विदाई से पहले सौंपी गई थीं। मरीक ने उन्हें हंसी में उड़ा दिया था। वही मरीक लाल-पीले हो गए थे जब मैंने उनसे मवेशियों को बचाने के लिए सुरक्षा की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि ओडीशा के सभी आवारा पशुओं को जुटाओ और दिल्ली लेकर जाओ। यह सितंबर 2014 की बात है।

असल में वे एक बेहद संगठित अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहे थे जिसमें ओडीशा के लोगों की भूमिका थी और यह धंधा खरबों रुपए का था। ओडीशा चार राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झाारखंड और छत्तीसगढ़ से मवेशी तस्करी का मिलन स्थल है। पुलिस की मदद से एनएच-5 से  हर रोज दिन-रात पिक अप वैन, ट्रकों के जरिए मवेशियों को पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के कसाईखानों में पहुंचाया जाता है।

खौफनाक आंकड़े

ईद के पहले उत्तरी ओडीशा से औसतन हर रोज 4,000 से 5,000 मवेशियों की तस्करी होती है। राज्य के दक्षिणी हिस्से से करीब इतनी ही संख्या में मवेशी आंध्र प्रदेश और तेलांगना में ले जाए जाते हैं। मैंने

अदालत में हलफनामे के जरिए कहा है और ओडीशा हाईकोर्ट में जनहित याचिका (संख्या 4238) में भी कहा जा चुका है लेकिन ये आंकड़े आला पुलिस अधिकारियों को बताइए तो आसमान टूट पड़ता है।

मुझ पर हास्यास्पद बड़बोलेपन से लेकर क्या आरोप नहीं लगाए गए।

सिर्फ निचले क्रम के पुलिसवाले ही इसका खंडन नहीं कर रहे थे क्योंकि खुरदा में बेगुनिया थाने से लेकर बालासोर के खांतापाड़ा थाने के सिपाहियों, हवलदारों को ही इस गैर-कानूनी धंधे की नेटवर्किंग करनी होती है। मेरे साथी स्वयंसेवकों के पास ओडीशा के पूर्वी तट के हर जिले के पुलिसवालों, बाहुबलियों, तस्करों और बिचौलियों की फेहरिस्त है जो इस माफिया तंत्र के हिस्सा हैं।

इनमें बड़ी संख्या में हिंदू जुड़े हुए हैं। कुछ से तो मेरा परिचय है जो सार्वजनिक रूप से गो-हत्यारों के प्रति आग उगलते हैं लेकिन चुपके से तस्करों से पैसे लेकर ट्रकों को निकलवा देते हैं। ये तस्करों से मिले पुलिसवाले जानते हैं कि हम बचाव कार्य में लगे लोग क्या कर सकते हैं। हालांकि स्वस्थ गाएं, बछड़े और बैलों में ज्यादातर पसंदीदा भारतीय नस्ल के होते हैं और इनकी विदेशी बीफ बाजार में बड़ी मांग है। ये तस्करी के जरिए पश्चिम बंगाल से बांग्लादेश ले जाए जाते हैं और वहां से अरब देशों और यूरोप में निर्यात कर दिए जाते हैं। मवेशी तस्कर व्यापारी बनकर देश के हर कोने में लगने वाले मवेशी बाजारों से इनकी खरीद करते हैं। ये बाजार भी ज्यादातर गैर-कानूनी तौर पर लगते हैं। सबूत जुटाने के लिए मैंने कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और ओडीशा के ऐसे कइ्र बाजारों का दौरा किया है।

राजनैतिक वरदहस्त

मैंने दो मवेशी बाजारों को औपचारिक तौर पर बंद करवाया। एक, ओडीशा के खुरदा जिले में बेगुनिया में, जहां बीजू जनता दल सरकार का रवैया गोरक्षा कानून के प्रति अनदेखी का था। दूसरे, छत्तीसगढ़ के बालोद के कढ़ी भादर में जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार का रवैया पाखंडी था।

कोई मवेशी बाजार बंद कराने का यह मतलब नहीं है कि तसकरी या कसाईखाने का धंधा बंद हो गया। जब तक पुलिस-प्रशासन की माफिया से सांठगांठ है, गैरकानूनी धंधा धड़ल्ले से चलता रहता है। बेगुनिया और कढी भादर में यह धंधा

आज भी जारी है। बेगुनिया में अक्टूबर

2013 में जब पहली दफा पहुंचा तो मवेशी माफिया के महज तीन या चार ठिकाने थे। आज उनकी गिनती मुश्किल है। इन सभी की जानकारी स्वयंसेवकों और एसपी तथा थानेवालों को है।

मैंने दास को कई फैक्स और एसएमएस भेजा मगर उन्होंने कभी मवेशियों के जमावड़े को रोकने की कोशिश नहीं की। वे

उन संदेशों को बेकार मानकर खारिज कर देते थे। वे हमारे आंकड़ों पर यकीन नहीं करते थे। खुरदा के तस्कर हर महीने ओडीशा से पश्चिम बंगाल में तस्करी किए जाने वाले 1.25 लाख मवेशियों में 40 प्रतिशत का योगदान करते थे।

न्याय न मिलना

माफिया को पुलिस शह की वजह से स्वयंसेवक एफआईआर या अदालती मुकदमों में उलझाने से कतराते थे। अदालतों के साथ मेरा अपना अनुभव कष्टकारी रहा है। 2013 में बेगुनिया थाने के तहत कुसुपल्ला से मैंने 358 मवेशियों को बचाया। उन्हें कानून की परवाह न करके गांव के सरपंच बुल्ला स्वैन की रखवाली में दे दिया गया। फिर सरपंच से माफिया तक और उनके जरिए कसाईखाने पहुंच गईं। अदालत में पुलिस ने कहा कि मवेशी चोरी हो गए। मैं 45 दिनों तक खुरदा की अदालत में चप्पलें घिसता रहा। न्याय न मिलने पर मैं ओडीशा हाईकोर्ट में पहुंचा। वहां दो साल बाद भी मामला लटका पड़ा है।

लेकिन बचाव कार्य ने मुझे जमीनी राजनीति से वाकिफ करा दिया। मुझे इस दौरान गो-तस्करी पर अलग-अलग तरह के विचार जानने को मिले। हिंदू व्यापारियों के लिए यह सबसे फायदेमंद धंधा है। मुस्लिम तस्करों के लिए गाय दूसरे मवेशियों की तरह ही एक पशु है। कुछ कट्टर मुसलमानों के लिए यह हिंदुओं से बदला भंजाने का तरीका है जो दूसरे उपायों से वे नहीं कर पाते। और हिंदू कट्टरपंथियों के लिए मुस्लिम विरोध का का एक माकूल मोर्चा है।

पुजनीय गोवंश

लेकिन सेकुलर लोगों, हिंदुओ और जैनियों की विशाल आबादी के लिए गाय और बैल पूजनीय हैं जिन्हें वे बेहद प्यार करते हैं। गोवंश पर जब आघात होता है तो इस विशाल बहुसंख्या को दुख होता है जो देश के हर क्षेत्र, वर्ग में पसरे हुए हैं। उनमें गो-हत्यारों और पुलिस-प्रशासन को उनकी मदद से नाराजगी भी भारी है।

आला पुलिस अधिकारी या तो इसे कोई समस्या नहीं मानते या फिर ‘सांप्रदायिक रूप से संवेदनशीलÓ मसले में हाथ डालने से डरते हैं। मैं अब तक यह जान गया था कि इस धंधे में काफी तादाद में मुसलमान हैं और खूंखार माफिया भी हैं। अगर उन पर पुलिस छापे मारती है तो उधर से प्रतिक्रिया होगी और दंगे भड़क सकते हैं। यही दलील पुलिस को कार्रवाई से रोकती है और गोरक्षा कानून धरा रह जाता है।

तूफान के पहले की शांति

खुरदा के एसपी ने मवेशी तस्करों को पकडऩे की लगातार कॉल अनसुनी कर दी। आज कदब सांप्रदायिक दंगों के प्रति काफी संवेदनशील हो गया है। 27 दिसंबर 2015 को तस्करी की घंटों पहले खबर दी गई लेकिन खुरदा के एसपी ने कुछ नहीं किया। बंगुनेया थाने की पुलिस मौके पर नहीं पहुंची। दो ट्रकों में 121 मवेशी ठुंसे हुए थे। इन्हें गांववालों ने पकड़ा था। कइ्र गाएं तो दम घुटने से मर गई थीं। जब ट्रक बेगुनिया थाने में लाए गए और एफआइआर (संख्या 194/15) लिखी गई तब अगले दिन की दोपहर हो चुकी था।

मवेशी फर्जी पशु कल्याण कार्यकर्ताओं को दे दिए गए। हमने खुरदा जिला अदालत में बेगुनिया थाने की इस गड़बड़झाले के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। इसके

साथ दिल्ली से मेरा समन्वय खत्म हो

गया। मैंने स्वयंसेवकों से सांप्रदायिक

तनाव और बेगुनिया थाने के एफआइआर के बारे में सुना।

कहानी कुछ ऐसी है : 28 दिसंबर को ट्रकों की जब्ती से करीब 60 लाख रुपए का घाटा झेलने वाले मवेशी माफिया ने अपने हिंदू ‘दोस्तोंÓ के जरिए फंसाकर कुछ स्वयंसेवकों को बुरी तरह पीटा। यह घटना 12 जनवरी को आधी रात के बाद की है। इन लड़कों के माबाईल छीन लिए गए। ये रात भर झाडिय़ों में छुपे रहे। सुबह बेगुनिया थाने

पहुंचने पर उन्होंने पाया कि तस्करों ने वहां पहले से शिकायत लिखवा दी है। माफिया

की शिकायत रात 2 बजे लिखी गई

जबकि स्वयंसेवकों की 13 जनवरी को शाम को लिखी गई।

इस घटना से स्वयंसेवकों ने बचाव कार्य कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया। लेकिन 9 फरवरी को उन्हें बराबरी करने का मौका मिल गया। एक पिकअप वैन से पांच मवेशियों को बचाने के बाद उन लोगों ने तस्करों से मारपीट की। ये लोग पुलिस का रवैया जानते थे इसलिए थाने में नहीं गए। बाद में तस्करों ने दो हिंदू लड़कों को अगवा करके मस्जिद में बंद कर दिया। फिर कुछ बुजुर्ग मुसलमानों के हस्तक्षेप से उन्हें छोड़ा गया।

आमना-सामना

फिर, 10 फरवरी की सुबह करीब 300 हिंदू लाठी-डंडे के साथ मुसिलत तस्कर के घर गए लेकिन वह नहीं मिला। हिंदुओं का दावा है कि मुसलमानों ने झोपड़ी में आग लगाकर हिंदुओं पर आरोप मढ़ दिया। इससे 90 हिंदुओं के खिलाफ मुकदमे लगा दिए गए। इस घटना के पहले पुलिस ने तस्करों के साथी के खिलाफ मामला दर्ज करने से

24-04-2016मना कर दिया था जिसने एक मंदिर के शिवलिंग में चोट पहुंचाकर उसे सोशल साइट पर डाल दिया था। कदब में दस दिन तक दोनों ओर से इस पर बातचीत होती रही कि कैसे गो-तस्करी रोकी जाए और अमन-चैन से रहा जाए।

फिर 20 फरवरी को एक कुख्यात बिचौलिया बत्तापानी गांव में आया हिंदुओं को सुलह करने को मनाने लगा। लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हुआ और टकराव अभी बना हुआ है।

मुझे बताया गया कि 21 फरवरी को कुछ हिंदुओं के आम और काजू के बागान में आग लगा दी गई, ताकि कुछ मुसलमानों के मवेशी तस्करी में लगे घाटों का बदला लिया जा सके। फिलहाल दोनों तरफ टकराव की स्थिति बनी हुई है। गांव में पुलिस का पहरा बैठा दिया गया है। जिला मजिस्ट्रेट ने शांति सभा का आयोजन किया लेकिन खास फर्क नहीं आया। कदब का यह तनाव अब फैलने लगा है। बाकी खुरदा में मवेशी तस्करी धड़ल्ले से चल रही है।

कदब से कोई 12 किमी. दूर लोढाचुआ गांव में 2 मार्च 2016 को एक बलेरो से पांच गायों को बचाया गया, उन्हें खुला छोड़ दिया गया और तस्करों को पीटा गया। पुलिस को खबर करने की परवाह नहीं की गई। मैंने एक से संपर्क कर कहा कि कानून हाथ में लेना ठीक नहीं तो जवाब आया कि ”आपके होश ठिकाने हैं न कि हमसे पुलिस की मदद लेन को कह रहे हैं? मैं चुप हो गया।

कदब आज उसी मवेशी तस्करी की वजह से सांप्रदायिक भट्ठी की तरह सुलग रहा है जिस पर कभी पुलिस ने गौर करना जरूरी नहीं समझा। मैं अब भी हैरान हूं कि दादरी की घटना और आगरा में संघ की बैठक के दौरान ”आखिरी लड़ाई की बातों के बीच आज भी पुलिसवाले कैसे गो-तस्करी की घटनाओं को नजरअंदाज कर सकते हैं? यह सवाल खुरदा के एसपी को खुद से पूछना चाहिए।

खुरदा से जगप्रीत लुथरा

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