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जिस देश में मां की कद्र नहीं होती उस देश में कभी बरकत नहीं होती

जिस देश में मां की कद्र नहीं होती उस देश में कभी बरकत नहीं होती

भारत में गाय को दूसरे मवेशियों-जानवरों से सम्मानजनक ऊंचा स्थान प्राप्त है। कुछ लोग उन्हें पवित्र मानते हैं। उनकी हर तरह की क्रूरता और कसाईखानों से रक्षा की जाती है। पश्चिम की तरह उन्हें उपभोग और चमड़े की वस्तुओं के लिए इस्तेमाल में नहीं लाया जाता। गायों का यह विशिष्ट स्थान कानून में भी निहित है। दो राज्यों को छोड़कर बाकी पूरे देश में गायों और बछड़ों के काटने पर पाबंदी है, चाहे वजहें कुछ भी हों और उनकी उम्र चाहे जितनी हो। बैल, सांड़ और भैंस को 15 साल तक की उम्र तक काटना मना है। लेकिन सम्मान और सुरक्षा के इस दिखावे के बावजूद परदे के पीछे गायों और गो-उत्पादों का धंधा धड़ल्ले से चलता है। इसमें बेइंतहा बर्बरता और क्रूरता बरती जाती है। गायों के साथ इस वहशीपन की एक बड़ी वजह यह भी है कि गायों को कसाईखाने भेजने का धंधा पूरी तरह गैर-कानूनी और गुपचुप ढंग से होता है। इसे रोकने की जिम्मेदारी वाले अधिकारियों को घूस देकर यह धंधा चलाया जाता है। इसलिए इस धंधे की कोई समीक्षा या नियमन की कोई बात नहीं होती है। कई राज्यों में बने कानूनों के बारे में राय अलग-अलग है। कुछ में कसाईखाने ले जाने की इजाजत है और कुछ में नहीं है। इसका मतलब यह है कि कसाईखाने में ले जाने वाले मवेशी को उन जगहों से ले जाया जाना चाहिए, जहां इसकी इजाजत है।

सालाना 15 लाख गायों की अनुमानित तस्करी की कहानी से पता चलता है कि आधुनिक भारत में पवित्र गायों के बारे में कैसा पाखंड और भ्रष्टाचार चल रहा है जिससे एक अनुमान के मुताबिक करीब 45.5 करोड़ डॉलर का गैर-कानूनी धंधा धड़ल्ले से चल रहा है। लेकिन आखिरकार यह सब मांग और आपूर्ति का ही खेल है। हिंदू बहुल भारत में अनुमानित 28 करोड़ गाएं हैं लेकिन कुछ मुट्ठी भर राज्यों में गायों को काटना और उनका मांस खाने की कानूनी इजाजत है। इस बीच मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में जहां बीफ बड़े चाव से खाया जाता है, वहां मवेशियों की भारी कमी होने लगी है। बांग्लादेश को बीफ की आधी आपूर्ति उसके पश्चिमी पड़ोसी की सीमा से होती है। दोनों देशों के बीच आड़ी-तिरछी सीमा 1300 मील या 4096 किमी की है। सो, भारत से सिर्फ गाय और उसकी प्रजातियों (भैंस नहीं) की तस्करी जमीन और जलमार्गों से बांग्लादेश को होती है। यह बेहद पुरानी समस्या है और अब दिनोदिन बदतर होती जा रही है। खासकर असम और पश्चिम बंगाल से मवेशियों की तस्करी इस बड़े पैमाने पर हो रही है कि बांग्लादेश सीमा पर बीफ प्रसंस्करण और चमड़े के उद्योग लग गए हैं।

पश्चिम बंगाल से मवेशियों को बांग्लादेश में तस्करी के लिए सीमा से नए रास्तों और नए गुपचुप तरीके भी तलश लिए गए हैं। हालांकि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की चौकसी की वजह से तस्करी में कुछ कमी आई है। पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश सीमा पर बीएसएफ करीब 915 किमी क्षेत्र में गश्त लगाती है। केंद्र में एनडीए सरकार के आने के बाद से मवेशी तस्करी में करीब 70 प्रतिशत की कमी आई है। पिछले साल अप्रैल में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बीएसएफ को तस्करी रोकने के निर्देश दिए थे।

चार महीने बाद गृह मंत्री ने मवेशी तस्करी में आई कमी को अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया। उन्होंने कहा कि हर साल करीब 20-22 लाख मवेशियों की तस्करी हुआ करती थी जो 2015 में घटकर 2-2.5 लाख पर आ गई है।

भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद बीएसएफ के जवानों को मवेशी तस्करों को गोली मारने के आदेश जारी किए गए हैं, इससे तस्करी में काफी कमी आई है। दिसंबर 2015 में राज्यसभा में एक लिखित जवाब में गृह राज्यमंत्री किरन रिजूजू ने कहा, ”इस साल बांग्लादेश सीमा पर बीएसएफ ने 21 अपराधियों को मार गिराया जिनमें 16 कथित तौर पर मवेशी तस्कर थे।

गौरतलब यह भी है कि भारत में बीफ 150 रुपए किलो बिकता है जबकि बांग्लादेश में 350 रुपए किलो बिकता है। तस्करी में कमी से कीमतें काफी बढ़ गई हैं। तस्करी में जोखिम बढ़ गया है पर धंधा मुनाफे वाला हो गया है। कम से कम 60,000 गायों की रोजाना बांग्लादेश में सीमा के रास्ते तस्करी हुआ करती थी। हालांकि यह आंकड़ा अनुमान पर आधारित है। पिछले 2-3 साल में उत्तरी बंगाल के खासकर कूचबिहार और अलीपुर द्वार जिलों से तस्करी पुलिस की निष्क्रियता से काफी बढ़ी है। इसके अलावा ताकतवर राजनैतिक नेताओं का भी इसके पीछे हाथ रहा है। इन जिलों में गाय चोरी के मामलों में भारी इजाफा हुआ है। इसमें ज्यादातर बांग्लादेसी मुसलमान जुड़े हुए हैं।

दक्षिण बंगाल में तस्करी का तरीका

यहां गाएं राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, ओडीशा, बिहार, झारखंड वगैरह से दो बड़े हाट में लाई जाती हैं। ये हाट हैं चिंसुरा संभाग के पांडुआ और मोरघाट। इसके अलावा आरामबाग संभाग के मायापुर में भी एक हाट है। अमूमन गायों से भरे ट्रक नदिया ईश्वर गुप्त सेतु, कल्याणी-बैरकपुर एक्सप्रेस वे के रास्ते नीलगंज, जेस्सर रोड से बनगांव सीमा पर पहुंचते हैं।

24-04-2016

कुछ गाएं हरिघाटा और बिरोही हाट में पहुंचती हैं। एक और रूट कल्याणी, एनएच-34, चाकदा, चाकदा-बनगांव रोड है। चौकसी कड़ी होने से अब ये ट्रक तेतुलिया से बांग्लादेश में घुस रहे हैं। दूसरी सीमा अंगरैल की है। अंगरैल के तीन तरफ इच्छामति नदी है जो दोनों देशों में बहती है।

बांग्लादेश में बीफ 12,000-14,000 रुपए प्रति क्विंटल बिकता है। हरियाणा और राजस्थान की बड़ी गायों में अमूूमन 2.5-3 क्विंटल वजन होता है। यानी उसकी कीमत 50,000 रुपए से ज्यादा की होती है। तस्कर अमूमन एक नुकीले डंडे रखते हैं ताकि बीएसएफ वालों से घिरने पर गायों को भड़का दें। वे हमला करने के लिए अपने साथ दाव (कटार) भी रखते हैं। वे देसी पिस्तौल और बमों का भी इस्तेमाल करते हैं। सीमा पार कर ये तस्कर वहां जिन्हें मवेशी सौंपते हैं, वे गोरूपति कहलाते हैं। वहां दोपहर तक रुकते हैं और फिर टहलते हुए या ट्रेन पकड़ कर सरेआम अपने घर लौट आते हैं।

उत्तर बंगाल में तस्करी का तरीका

उत्तर बंगाल में तस्करी के दो रूट हैं। मोटे तौर पर ये माल्दा जिले से लगे 172 किमी लंबी सीमा का इस्तेमाल करते हैं। गाएं गुजरात, पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार से लाई जाती हैं। इनमें ज्यादातर गाएं झारखंड के गोंड हाट में पहुंचती हैं। यहां से उनकी खेप साहेबगंज पहुंचती है। वहां से मवेशियों को राजमहल के जरिए हमीदपुर चार ले जाया जाता है। वहां से वैष्णवनगर और मुर्शिदाबाद के निमिता में ले जाया जाता है। इसके अलावा राजमहल से धुलियां और पाकुर की राह भी अपनाई जाती है। पाकुर में गायों पर नंबर की मुहर लगा दी जाती है।

यहां से नदी का रास्ता पकड़ा जाता है। माल्दा से बांग्लादेश की सीमा पर 50 किमी का नदी क्षेत्र है। गायों को लंबी लोहे की जंजीरों से बांध दिया जाता है। उन्हें राखाल या चरवाहे गंगा घाट जक ले जाते हैं। वे गायों को नदी के रास्ते तैरा कर बांग्लादेश पहुंचाते हैं। यह तस्करी अमूमन रात में होती है। एक जोड़ी गाय को गंगा पार कराने पर राखाल को 3,000 रुपए मिलते हैं।

गाएं बांग्लादेश में गोमोस्तापुर थाने के नवाबगंज चपाई में पहुंचती हैं। वहां विभिन्न कसाईखानों में ले जाने के लिए मालिकाना दस्तावेज तैयार किया जाता है।

दूसरा रूट सीमा पर जमीन के रास्ते है। यह झारखंड से शाम्सीघाट, रतनपुर हाट, हबीबपुर हाट, हरिश्चंद्रपुर, केदारपाड़ा, कुतादह, सोनघाट का रास्ता है। बांग्लादेश की सीमा का एक बड़ा हिस्सा बिना बाड़ का है इसलिए तस्करी आसान है। यहां से मवेशी पेंगाबाड़ी, नवगांव, रोहानपुस कसाईखानों में ले जाए जाते हैं।

लेकिन दिल्ली जिसे ‘पाप या अपराध’ मानता है, बांग्लादेश उसे सीमा के आर-पार सामान्य कारोबार मानता है। इसलिए 16-17 नवंबर को दोनों देशों के गृह सचिव स्तर की बातचीत में बांग्लादेश ने बीएसएफ की चौकसी के कारण देश में बीफ की कीमतें चढऩे का सवाल उठाया। ढाका की ओर से कथित तौर पर दिल्ली से यह आग्रह भी किया गया कि मवेशी तस्करों पर ‘सख्ती न बरती’ जाए। बीएसएफ ने बांग्लादेश सीमा पर मवेशी तस्करी वाली 64 चौकियों की पहचान की है। बीएसएफ की चौकियां ज्यादातर बांस की मचान होती हैं जिन पर रात को पहरा दिया जाता है। सुबह इन चौकियों पर लोग अपने मवेशी चराने सीमा पार जाते हैं। जवान इन्हें शाम के पहले लौट आने की हिदायत देते हैं। मवेशी तस्करी इस साल 90 प्रतिशत तक घट गई है। यह इलाका उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद और माल्दा का है और इसी रास्ते 80 प्रतिशत गैर-कानूनी गतिविधियां चलती हैं। बीएसएफ ने गड्ढे खोदकर कर 2 फुट ऊंची जीआइ पाइप गाड़ी है जिसके नतीजे अच्छे मिल रहे हैं। लेकिन पुख्ता चौकसी के लिए बीएसएफ को हथियार, गाडिय़ों और नदी पर गश्त के लिए मोटर बोट की दरकार है।

दशकों से इस इलाके के लोगों का जीवन मवेशियों की सीमा के आर-पार तस्करी से चलता रहा है। यह धंधा पारिवारिक किस्म का हो गया है, जो पीढिय़ों से चला आ रहा है। ये जानते हैं कि बीएसएफ को कैसे चकमा देना है, क्या सुरक्षित रास्ता है। मवेशी तस्करी में इतना पैसा है कि देानों ओर के सीमा पर बसे लोगों की कमाई का आसान जरिया है। ज्यादातर भारतीय किसानों के लिए भी गाय की अहमियत पहले की तरह नहीं रह गई है। ट्रैकटरों ने बैलों को बेकाम कर दिया है। इसलिए मवेशियों की कसाईखाने में कानूनी, गैर-कानूनी बिक्री बढ़ गई है। इसके अलावा बांग्लादेश में बीफ की कीमत बढऩे से भी बंगाल से मवेशियों की तस्करी बढ़ गई है। यह अपवित्र धंधा है।

नीलाभ कृष्ण

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