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राजस्थान में भाजपा-कांग्रेस की खिचड़ी में उबाल

राजस्थान में भाजपा-कांग्रेस की खिचड़ी में उबाल

राजस्थान के राजनैतिक पटल पर इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को दिल्ली में संगठनात्मक जिम्मेदारी सौंपकर प्रदेश कांग्रेस से विदाई तथा भारतीय जनता पार्टी में अनुसूचित जाति के एक कद्दावर नेता को उत्तर प्रदेश ले जाने की इबारत लिखने की तैयारी की जा रही है। इस कवायद का हश्र क्या होगा यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन भाजपा एंव कांग्रेस की इस अंदरूनी राजनीति का निशाना उत्तर प्रदेश में 2017 तथा राजस्थान में 2018 में विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने की मंशा से जुड़ा है।

कांग्रेस की राजनीति की खिचड़ी में यह उबाल प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को सर्वमान्य नेता मानकर पार्टी के दिग्गजों से हाथ उठवाने और भावी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से जुड़ी बहस से आया। इस मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की जुबानी जंग मीडिया से होते हुए जिलों में गुटबाजी के रूप में मुखर हो रही है।

जयपुर में प्रदेश कांग्रेस की जम्बोजेट कार्यकारिणी की बैठक में वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाये गये विधायक विश्वेन्द्र सिंह ने प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के नेतृत्व में अगला विधानसभा चुनाव लड़े जाने के समर्थन में मंच पर आसीन प्रभारी महासचिव गुरूदास कामत, आशोक गहलोत सहित सभी नेताओं से हाथ उठवा लिए। भरतपुर के पूर्व राजघराने के वरिष्ठ सदस्य विश्वेन्द्र सिंह और उनकी पत्नी दिव्या सिंह भाजपा से भी सांसद रह चुके हैं। जाट-गूजर बहुल भरतपुर क्षेत्र से सचिन के पिता राजेश पायलट ने अपना चुनावी सफर शुरू किया था। कांग्रेस में अपनी राजनीतिक हैसियत का ग्राफ बढऩे से उत्साहित विश्वेन्द्र सिंह का यह राजनीतिक दाव अपने रंग दिखा गया। सर्वमान्य नेता के रूप में सचिन पायलट के समर्थन में गहलोत के हाथ उठाने से कांग्रेस पार्टी में यह संदेश माना गया कि अब पायलट ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे। मीडिया की खबरों से भी इसे हवा मिली।

गहलोत की एक टिप्पणी से यह विवाद गहरा गया जब उन्होंने साफ किया कि चुनाव प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में लड़ते हैं और मुख्यमंत्री का फैसला आलाकमान तय करता है। नेताओं की यह जुबानी जंग सोशल मीडिया तक जा पहुंची। पेशे से इंजीनियर रहे और नवनियुक्त प्रदेश सचिव सुशील आसोपा ने तो गहलोत जैसे नेता को फेसबुक पर पद की राजनीति से सन्यास लेने की जुर्रत कर दी। उनका कहना था कि ढाई साल की मेहनत में पायलट ने पार्टी को मजबूत बनाया। पार्टी की मीटिंग में सीएम पद को लेकर जिक्र तक नहीं हुआ। फिर भी दो बार सीएम, तीन बार पीसीसी चीफ, दो बार एआईसीसी महासचिव रहे नेता को भय हो गया कि उन्होंने मीडिया के सामने सीएम पद की बात करके अपनी ही पार्टी में विवाद खड़ा कर दिया है। आसोपा की टिप्पणी पर गहलोत एवं पायलट के पक्ष में पार्टी कार्यकर्ताओं ने खुलकर कमेंट किए।

जयपुर से जोधपुर जाते समय गहलोत ने पायलट के संसदीय क्षेत्र अजमेर में पार्टी में खींचतान की अटकलों के बीच मीडिया से बातचीत में फिर कहा चुनाव तो सदैव पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एवं विधायक दल के नेता के नेतृत्व में ही लड़े जाते हैं। कांग्रेस के पुन:सतारूढ़ होने पर मुख्यमंत्री आलाकमान तय करेगा। इसके साथ ही मीटिंग में हाथ उठवाये जाने के सवाल पर गहलोत ने दोहराया कि विश्वेन्द्र सिंह तो सभी को एक साथ बांधने के लिए ऐसा करते रहे हैं। यह उनकी फितरत है। वे मेरे समर्थन में भी हाथ उठवा चुके हैं। लेकिन गहलोत के सर्किट हाउस पहुंचने से पहले नजारा कुछ अलग था। वहां पायलट समर्थन में नारेबाजी हो रही थी, लेकिन गहलोत के पहुंचते ही उनके समर्थकों ने नारे लगाये। अलबत्ता गहलोत ने मीडिया से बात करते समय पायलट समर्थक अजमेर शहर कांग्रेस अध्यक्ष विनय जैन को साथ बिठाया। इस बीच सचिन पायलट ने दिल्ली में पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी, प्रदेश प्रभारी महासचिव गुरूदास कामत, महासचिव सीपी जोशी तथा बाडमेर से सांसद रहे प्रदेश सचिव हरीश चौधरी से मुलाकात की। नेताओं की बयानबाजी के बीच पायलट की गहलोत के प्रभाव क्षेत्र जोधपुर संभाग में सीमावर्ती बाड़मेर जिले की ढाई दिवसीय यात्रा को शक की नजरों से देखा गया। सोनिया से भेंट के बाद पायलट का स्वर बदला हुआ था। ताजा बयान में गहलोत को सीनियर लीडर मानते हुए पायलट ने कहा कि उनके लंबे राजनीतिक अनुभव की हमें और पार्टी दोनों को आवश्यकता है। उन्हें बहुत सालों तक हमारे साथ मिल कर पार्टी के लिए काम करना है। बाडमेर के धोरीमन्ना में पत्रकारों से बातचीत में पायलट ने इस विवाद पर विराम लगाते हुए यहां तक कह दिया कि गहलोत मेरे पितातुल्य हैं। उनके साथ मुख्यमंत्री पद को लेकर मेरी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। हालांकि इससे पहले दौसा में पायलट ने दावा किया कि वह ऐसे प्रदेशाध्यक्ष हैं, जिन्हे सभी वरिष्ठ नेताओं का सहयोग प्राप्त है। गहलोत से विवाद की खबरों पर पायलट की टिप्पणी थी कि उनका किसी से कोई मदभेद नहीं है। यह लोगों में भ्रांति फैलाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ”हमारा सीएम कैसा हो सचिन पायलट जैसा हो। नारा लगाकर अपनी मंशा प्रकट कर दी। पायलट अपने पिता एंव माता रमा पायलट के बाद दौसा संसदीय क्षेत्र का भी प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

उधर गहलोत ने डूंगरपुर दौरे में पत्रकारों से फिर कहा कि पार्टी नेतृत्व ही मुख्यमंत्री का फैसला करेगा। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री के पद को लेकर जो चल रहा है वह बिल्कुल सच नहीं है। उन्होंने कहा कि गुटबाजी जैसा कोई मसला नहीं है यह पार्टी का अंदरूनी मामला है और सब कुछ प्रक्रिया के अनुसार ही हो रहा है। पूरी पार्टी एक साथ मिलकर चल रही है और सभी एकजुट हैं।

प्रदेश प्रभारी महासचिव गुरूदास कामत ने इस विवाद पर कटाक्ष करते हुए कहा कि पार्टी में आलाकमान से ऊपर कोई नहीं है। प्रदेश में गुटबाजी को नकारते हुए उन्होंने गहलोत को भी अपना नेता माना और यह भी साफ किया कि पीसीसी बैठक में अचानक विश्वेन्द्र सिंह ने जो हाथ खड़े करवाए वह ठीक नहीं था।  इसका मुझे पहले से पता नहीं था। कामत ने सवाल किया कि जब सचिन दो साल से अध्यक्ष है और किसी ने विरोध नहीं किया फिर बैठक में हाथ खड़े करवाने की जरूरत ही क्यों? अलबत्ता कामत के इस बयान से पायलट एवं गहलोत खेमें के बीच उठा विवाद फिलहाल तो थम गया है, लेकिन खिचड़ी की ऊपरी पर्त  पर जमी पपड़ी के नीचे की भभक कितनी और कब तक ठंडी हो पाती है यह कहना मुश्किल है। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का यह मानना है कि देर-सवेर अशोक गहलोत जैसे अनुभवी एवं कद्दावर नेता को पार्टी संगठन में महत्वपूर्ण पद दिया जा सकता है। अठारह बरस तक रिकॉर्ड पार्टी अध्यक्ष का दायित्व संभाल रही 70 वर्षीय सोनिया गांधी को संगठन में फेरबदल करना है। ऐसे में गहलोत जैसे विश्वास पात्र को संगठन के खजाने की चाबी भी थमायी जा सकती है। लेकिन, यह सब पश्चिम बंगाल, असम, केरल चुनाव के बाद होना है।

केन्द्र में पहली बार अपने बलबूते सतारूढ़ भाजपा दूसरी पार्टी खेलने के मकसद से उत्तर प्रदेश पर फोक्स कर रही है। राजस्थान में भाजपा के संगठन महामंत्री रहे पूर्व सांसद ओम माथुर उत्तर प्रदेश के प्रभारी हैं तथा विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री रहे सुनील बंसल उनकी टीम में शामिल हैं। ओम माथुर अपनी पिछली जयपुर यात्रा के दौरान उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री और वर्तमान में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह से शिष्टाचार भेंट कर चुके हैं। लेकिन, एक डेढ़ घंटे की इस मुलाकत को राजनीतिक दृष्टि से अहम माना गया था। अब राज्य में एक संवैधानिक पद पर आसीन अनुसूचित जाति के एक कद्दावर नेता को उत्तर प्रदेश में लाये जाने की अटकलें भी तेज हो गई हैं। यद्यपि इस नेता ने अनौपचारिक चर्चा में इस संभावना को सिरे से नकार दिया है। लेकिन, समझा जाता है कि बसपा सुप्रीमों मायाावती के दलित वोट बैंक पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालने के मकसद से यह नुस्खा आजमाया जा सकता है। संसद के बजट सत्र के बाद इस संभावना को मूर्तरूप देने के बावत कोई निर्णय लिए जाने की उम्मीद है।

24-04-2016

गौरतलब है कि राजस्थान के नागौर में मार्च के द्वितीय सप्ताह में सम्पन्न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सर्वोच्च नियामक इकाई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, संगठन महामंत्री रामलाल सहित सात वरिष्ठ पदाधिकारी सम्मलित हुए थे। अमित शाह की संघ प्रमुख डॉ.मोहन भागवत सहित अन्य पदाधिकारियों से हुई बातचीत में उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर चर्चा होना स्वाभाविक था। प्रतिनिधि सभा की बैठक के पश्चात् संगठनात्मक दृष्टि से संघ प्रचारकों के कार्यक्षेत्र में फेर बदल किया गया। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 में होने वाले चुनाव के महत्व को देखते हुए संघ में तीसरी बड़ी हस्ती के नाते सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोलो ‘दत्ता जी’ अब लखनऊ को अपना केन्द्र बनाकर कार्य करेंगे। दत्ता जी विद्यार्थी परिषद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ कार्य कर चुके हैं। यह समझा जाता है कि दत्ता जी संघ और भाजपा के बीच बेहतर तालमेल कायम कर सकेंगे। देशभर में सामाजिक सांस्कृतिक दृष्टि से संघ की पहुंच का दायित्व भी दत्ता पर है। नागौर की प्रतिनिधि सभा में संघ ने सामाजिक समरसता से जुटी गतिविधियों में तेजी लाने का निश्चय किया है। इसीलिए संघ ने उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय तक अपनी पहुंच के उद्देश्य से लगभग एक दर्जन प्रचारकों के प्रवास का कार्यक्रम बनाया है।

यद्यपि राजस्थान में भाजपा सरकार को अभी सवा दो साल हुए हैं, लेकिन सतारूढ़ दल के साथ प्रतिपक्ष कांग्रेस ने 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर तैयारियां शुरू कर दी हैं। कांग्रेस ने पार्टी संगठन की मजबूती के लिए जिला एवं मंडल स्तर पर सम्मेलन की योजना बनाई है। विधानसभा के बजट सत्र में विभिन्न मुद्दों पर कांग्रेस ने सरकार को घेरने के काफी प्रयास किए। इस बार मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मुखर विरोधी वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने सरकार को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। कोटा के तेज तर्रार विधायक प्रहलाद गुंजल सहित भाजपा के कुछ अन्य विधायकों ने भी सरकार के मंत्रियों को घेरा। इससे कई बार लगा कि सत्ता पक्ष ही प्रतिपक्ष की भूमिका में आ गया है। सत्र के दौरान विधायक दल की बैठक में परिपत्र देकर विधायकों को अपना रिपोर्ट कार्ड तैयार करने के निर्देश दिए गए। विधायकों को अपने निर्वाचन क्षेत्र में पिछले दो साल में कराये गये काम का विस्तृत ब्यौरा तीस अप्रैल तक देना है। भाजपा कार्यसमिति का विस्तार होना है, लेकिन इसकी बैठक में वरिष्ठ मंत्री गुलाब चंद कटारिया का मंच पर नहीं बैठना पार्टी में व्याप्त असंतोष को दर्शा गया। कोटा सहित विभिन्न जिलों की बैठकों में अपनी सरकार के प्रति रोष की अभिव्यक्ति के संकेत अच्छे नहीं हैं।

जयपुर से गुलाब बत्रा

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