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स्थितप्रज्ञ

स्थितप्रज्ञ

हिंदू धर्म का महान ग्रंथ ‘गीता’ ज्ञान का भंडार है। स्वयं भगवान ही इसके रूप से आपके दिग्दर्शक बने हैं। इस ग्रंथ का एक-एक श्लोक ज्ञानवर्धक है। ‘गीता’ के गभिर ज्ञान में एक बार हम डुबकी लगाते हैं तो हमारा जीवन स्वर्ग बन जाता है। अपने ज्ञान के द्वारा जो भी व्यक्ति जीवन को सही रूप से जान लेते हैं उनका जीवन आनंदमय हो जाता है। कोई भी मुश्किल उस व्यक्ति को छू नहीं सकती। ऐसे ज्ञानी व्यक्ति ही संसार में विरल होते हैं क्योंकि सिर्फ ज्ञान की बात करने से व्यक्ति ज्ञानी नहीं होता। गं्रथ कितना भी महान हो उसे पठन की आवश्यकता है। परंतु एक बार पठन से हम अपने जीवन में परिवर्तन नहीं ला सकते, बार-बार पठन और यहां लिखी बातों को जीवन में अपनाकर ही हम जीवन में परिवर्तन ला सकते हैं। अभ्यास के बिना कोई भी कार्य सफल नहीं हो सकता है। गीता में लिखे गए कुछ शब्दों से हमारा परिचय बहुत जरूरी है जैसे ‘स्थितप्रज्ञ’ इन शब्दों का जितना भी विश्लेषण किया जाए कम होगा।

दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह: ।

वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।।

श्लोक की व्याख्या से ज्ञान होता है कि जो इंसान सुख और दुख दोनों परिस्थितियों में समभावपूर्ण रहता है वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है। लेकिन यह बात कहनी या व्याख्या करनी जितनी आसान है उससे कहीं गुना मुश्किल जीवन में लागू करने में है। सांसारिक मोह माया में लिपटे इंसान के लिए मोह माया का त्याग इतना सरल नहीं होता। कहा जाता है कि अपने जीवन को कमल के पत्ते की तरह बनाना चाहिए। कमल का पत्ता पानी में रहता है लेकिन उसके उपर पानी की बूंद पड़ते ही वह उसे आद्र नहीं कर पाता है। ठीक उसी तरह हमें अपने जीवन को बनाना चाहिए। एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का मुख्य लक्षण है आत्मसंतोष भाव ऐसे व्यक्ति हर परिस्थिति में खुश रहते हैं। उनके आसपास एक अपूर्व सकारात्मक वातावरण होता है। परमात्मा पर अटूट विश्वास ही उन्हें हर बार विजयी बनाता है। कुछ करने से पहले मनुष्य के अंदर छिपे शत्रु जैसे क्रोध, लोभ, मोह, माया आदि रूकावट पैदा करते हैं। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति सर्वप्रथम इन सभी को अपने वश में कर लेते हैं।

गीता में यह वर्णन है कि जो व्यक्ति स्थितप्रज्ञ होते हैं वे प्रभु के प्रिय होते हैं। देखा जाए तो स्थितप्रज्ञ बनना इतना आसान नहीं है। जो व्यक्ति प्रभु का प्रिय अथवा जिस पर प्रभु की असीम कृपा हो वही स्थितप्रज्ञ बन सकते हैं। ईश्वर का प्रिय बनने के लिए हमें अपनी आत्मा को एक शिशु जैसा बना लेना चाहिए। जैसे एक शिशु खुद का भला- बुरा खुद नहीं सोच सकता वरन् अपने माता-पिता के उपर छ़ोड देता है हमें भी अपनी आत्मा को सरल बना कर केवल ईश्वर के उपर ही सब कुछ छ़ोड देना चाहिए।

ईश्वर प्राप्ति की चाह में मनुष्य क्या क्या नहीं कर बैठते हैं। कोई अपना घर परिवार व समाज को छ़ोड देता है। कोई ज्ञान की तलाश में इधर-उधर भटकता है फिर भी मन को संतोष नहीं मिलता। लेकिन घर के आवध वातावरण में मन को इन सब चीजों से हटकर ऊंची सोच व प्रभु भक्ति से मन मार्जत हो जाएगा। हम स्थितप्रज्ञ बनने में सक्षम हो जाएंगे। महान से महान व्यक्तियों में व्यक्तिक्रम पाया जाता है। एक छोटे किसान या गृहणी के पास भी यह ज्ञान पाया जाता है वहां धन का प्राचुर्य नहीं पाया जाता लेकिन संतोष और तृप्ति का अपूर्व भंडार मिलता है। ऐसे व्यक्ति ही असल में स्थितप्रज्ञ होते हैं, जो केवल अपने कर्म को प्रधान मान कर आगे बढ़ते हैं। ऐसे व्यक्तिओं के मुख मंडल से अपूर्व आशा झलकती है जिसे देखकर हम आसानी से ईश्वर की उपस्थिति को जान सकते हैं।

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