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आपराधिक लापरवाही

आपराधिक लापरवाही

केरल के पुत्तिंगल मंदिर में आतिशबाजी बेकाबू हो गई और उससे हुए भयावह हादसे में 113 लोगों की मौत हो गई जिससे पूरा देश हिल उठा। यह मंदिर प्रबंधक कमेटी की भयंकर लापरवाही का ही नतीजा है। इस त्रासदी की भयावहता को देखकर लगता है कि हम कितने आत्मकेंद्रीत हो गए हैं और दूसरों की जिंदगियों की सुरक्षा के प्रति कितने लापरवाह हो गए हैं। यह रवैया इतना आम हो गया है कि हम सड़क के नियमों को पालन करने की भी परवाह नहीं करते। गौरतलब है कि पुत्तिंगल त्रासदी कोई अपवाद नहीं है क्योंकि पिछले कुछ सालों में पहले उसी राज्य में ऐसी ही घटनाओं में 500 से अधिक लोग जिंदा जल गए थे। फिर भी संबंधित आयोजक ऐसी त्रासदियों से बचने के लिए सुरक्षा के उपायों के प्रति इतने लापरवाह बने रहते हैं, यह देखकर डर लगने लगता है। जब दूसरों की सुरक्षा और जानमाल दांव पर लगी हो तो नियमों को तोडऩा और जोखिम उठाना कोई साहसिक कार्य नहीं कहलाया जा सकता। यह तो शैतानियत ही है। इससे तो ऐसे सवाल उठते हैं कि क्या हमें आतंकवादियों के हमले की दरकार है? हम खुद ही त्रासदी और तबाही बुलाने के काबिल हैं, जो तमाम आतंकवादी हमलों के योग से भी ज्यादा घातक असर पैदा करते हैं। हमें हर जीवन की कीमत को समझना सीखना होगा। यहां यह वाकई तारीफ के काबिल है कि प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने त्रासदी की बारीकियों पर गौर किया और आगजनी तथा भीड़ प्रबंधन के मुद्दों पर लोगों का ध्यान विस्तार से दिलाया लेकिन शायद कोई भी त्रासदी के असली मसलों पर ध्यान नहीं दे रहा है। किसी भी टिप्पणीकार ने यह नहीं समझा कि प्रशासन को आतिशबाजी पर प्रतिबंध लगाना चाहिए था, ना कि धार्मिक आयोजन पर। इसके अलावा जिला मजिस्ट्रेट जिला आपदा प्रबंधन कमेटी के भी चेयरमैन हैं इसलिए उनसे उम्मीद की जानी चाहिए कि वे आयोजन की विशालता का अंदाजा लगाकर जोखिम टालने की व्यवस्था करते। इसलिए यह भी सवाल उठता है कि क्या डीएम या पुलिस ने कोई ऐसे बड़े आयोजन के बारे में जोखिम का प्रोफेशनल तरीके से आंकलन किया था? भीड़ को नियंत्रित करने के लिए क्या उपाय किए गए थे?  यह कहने की जरूरत नहीं कि अमूमन श्रद्धालुओं को नियंत्रित करने का आयोजक कोई तरीका नहीं अपनाते। अमूमन स्थानीय लोगों की कोई कमेटी होती है जिसमें कुछ वित्त का प्रबंधन करने के लिए संदिग्ध उपाय अपनाते हैं और कुछ वो होते हैं जिनकी पहुंच ऊंची राजनैतिक बिरादरी तक होती है। केरल ऐसी त्रासदी को और नहीं झेल सकता। यह अच्छी बात है कि केंद्र फौरन मदद लेकर पहुंच गया और प्रधानमंत्री तत्काल घटनास्थल पर पहुंच गए। वे विमान में घायलों के इलाज के लिए डॉक्टरों की टीम साथ में ले गए थे। लेकिन इस त्रासदी में  सबसे बुरा पहलू यह है कि हमारा ध्यान इसकी भीषणता को देखकर ही गया। अगर एक या दो लोग मारे गए होते तो शायद मामले को रफ-दफा कर दिया गया होता। इसकी वजह यह है कि हमारा समाज आदमी की जिंदगियों में ज्यादा तवज्जो नहीं देता। सरकार को जरूरी उपाय और रोकथाम की व्यवस्था तो करनी होगी लेकिन लोगों को अपना रवैया बदलना चाहिए।

परंपरा से ही एक देश और समाज के रूप में सुरक्षा के प्रति हमारी सावधानी बेहद कम है। फिलहाल इस घटना से तो लोगों में थोड़े समय के लिए जागरूकता बढ़ जाएगी लेकिन इसके प्रति सावधानियां फिर भी नहीं ली जाएंगी या बेमन से कुछ उपाय कर दिए जाएंगे। तथ्य यह भी है कि भीड़भाड़ भरे धार्मिक आयोजनों के प्रति लापरवाहियों की बात आम है। कानून का पालन कराने वाली सरकारी एजेंसियां भी कड़ाई से सुरक्षा मानकों के पालन पर जोर नहीं देतीं। इससे हल्की-सी गड़बड़ी भी भयावह त्रासदी का कारण बन जाती है। दुर्घटनाएं तो होती हैं लेकिन मौजूदा मामले में तो लोग सचमुच आग से ही खेल रहे थे। इसलिए इस त्रासदी से सबक लेना चाहिए। भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए सुरक्षा मानक तय किए जाने चाहिए और जागरूकता फैलाई जानी चाहिए।

हालांकि यह आश्चर्यजनक और क्रूरता की इंतहा जैसा लगता है कि एक देवास्म बोर्ड के अध्यक्ष प्रो. माधवन कुट्टी ने आतिशबाजी पर प्रतिबंध के खिलाफ रवैया अपनाया है। लेकिन इससे कई जिंदगियों को तबाही को रोका जा सकता था। पुराने जमाने में आतिशबाजी मोहक लगती थी जब घर और सड़कें  बिजली से रोशन नहीं हुआ करती थीं। मगर अब तो भीड़ भरे शहरों-गांवों में पटाखे वायु और शोर प्रदूषण ही पैदा करते हैं। धार्मिक श्रद्धा जाहिर करने के पारंपरिक तरीके भजन-पूजन, नृत्य, कला और खेल के रूप मे हैं ही। आतिशबाजी पर जोर से तो लगता है कि मंदिर प्रशासन इस आयोजन का व्यावसायिक दोहन करना चाहता है और श्रद्धालुओं को उपभोक्ता में बदलना चाहता है। यहां ऐसा लगता है कि मंदिर अब पवित्र देवस्थान ही नहीं रह गए हैं, क्योंकि श्रद्धालुओं को उनके साथ जुड़ी चमक-दमक ज्यादा भाती है। प्रार्थना तो महज छोटा-सा कर्मकांड बनकर रह जाता है और उससे जुड़ा मेला-उत्सव ही बड़ा हो जाता है जिसे कट्टïर तत्व, राजनैतिक नेता और कारपोरेट घराने ज्यादा तूल देते हैं। श्रद्धा को आतिशबाजी से नहीं ढका जा सकता। सो, जब तक लोगों को कथित ‘धर्म गुरु’ गुमराह करते रहेंगे तक तक ऐसी त्रासदियां होती रह सकती हैं क्योंकि ये धर्म गुरु राजनैतिक ज्यादा हैं और तब धर्म के नाम पर सिर्फ ढकोसला ही बचा रहेगा।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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