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गाय शब्द का अर्थ

गाय शब्द का अर्थ

त्वं यज्ञस्य त्वं माता सर्वदेवानां कारणम।

त्वं सर्वतीर्थानां नमस्तुतेअस्तु सदानघे।।

शशि सूर्यरूणा यस्या ललाटे वृषभ ध्वज:।

सरस्वती च हुंकारे सर्वेनागास्च कम्बले।।

क्षुर पृष्टे च गन्धर्वा वेदाश्वत्वार एव च।

मुखाग्रे सर्वतीर्थानि स्थावारानि चराणि च।।

”हे निष्पापे तुम सब देवताओं की मां, यज्ञ की कारण रूपा और सम्पूर्ण तीर्थों की तीर्थ रूपा हो। हम तुम्हें सदा नमस्कार करते हैं। तुम्हारे ललाट में चंद्रमा, सूर्य, अरूण और वर्षभध्वज शंकर विराजमान  हैं। हुंकर में सरस्वती, गल कम्बल में नागगण, खुरों में गन्धर्व और चारों वेद तथा मुखाग्र में चर-अचर सम्पूर्ण तीर्थों का वास है।’’

वेद और स्मृति में गौ का बड़ा व्यापक अर्थ है। इसमें केवल गाय, बैल और बछड़े ही नहीं बल्कि दूध, गोमूत्र और गोबर भी शामिल है। मानव इन्द्रियों को भी गौ और गौभक्षण को इंद्री अर्थात काम, क्रोध, मोह, दर्शन, श्रवण, स्वाद आदि दमन का संबोधन दिया गया है।

गावो विश्वस्य मातर: गोएं विश्व की मां हैं।

यजुर्वेद: गो:मात्रा न विद्यते अर्थात गौ अनुपमेय है।

ब्रहांड पुराण में भगवान व्यास ने गौ-सवित्री स्तोत्र में समस्त गौवंश को साक्षात विष्णु का रूप माना और इसके सम्पूर्ण अंगों में भगवान केशव का वास कहा।

पद्म पुराण का कथन है – गौमुख में षढढ्ग और पदक्रम सहित चारों वेद रहते हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार गौ सर्वदेवमयी और वेद सर्व गोमय हैं। जिस घर में गौ नहीं वह बन्धु शून्य है। गौ को आदिकाल से पवित्र और करुणा का घोतक माना गया है। मान्यतानुसार इसकी सेवा और अर्चना से मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।

”गाओ विश्वश्य जगत: प्रतिष्ठा’’

अर्थात गाय विश्व में सबसे प्रतिष्ठित है, जिसे भगवती के रूप में पूजा गया है।

”पश्व तोकाय शं गवे’’

युगे गावो मेद्यया कृशं चिद्श्रीरं चित्कुणुथा सुप्रितकम

वेद ऋचाओं में प्रभु से गौवंश को पूर्ण सुरक्षा और दीर्घ आयु की प्रार्थना की गयी है।

भद्रं ग्रहं कृणुय भद्रवाचों ब्रहदो वय उच्चयते सभासु(अथर्ववेद)

हे गौ तुम्हारी पवित्र ध्वनि हर एक को प्रसन्न करती है।

”ऐतद्रे विश्वरूपं सर्वरूपं गोरूपं’’(अथर्ववेद)

हे गौ तुम विश्व रूप हो।

रूपं अघ्न्ये ते नम: अघ्ने ते रूपाय नम: (अथर्ववेद)

हे अवध्या में तुम्हे नमन करता हूं।

(डॉ. श्रीकृष्ण मित्तल)

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