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मानसपटल पर अनुभवों का सृजन

मानसपटल पर अनुभवों का सृजन

अपने आस-पास घटित होने वाली घटनाओं से व्यक्ति बहुत कुछ समझता और सीखता है। आस-पास घटित होने वाली घटनाएं जो देखने-सुनने में आम लगती हैं लेकिन, वह इंसान को बहुत कुछ सिखा जाती हैं। बहुत कुछ ऐसा दे जाती हैं, जिन्हें व्यक्ति अवस्मरणीय बनाने के लिए शब्दों का आकार दे देता है और बाद में यही अवस्मरणीय स्मृतियां बन जाती हैं। पुस्तक ‘सृजन सागर’ भाग-२ ऐसी की कहानियों का संग्रह है, जिसमें अलग-अलग रचनाकारों की कुछ खास स्मृतियों को सृजित कर पुस्तक की रचना की गई है। पुस्तक लघुकथा, कहानी, संस्मरण का विशेषांक है। इस पुस्तक में मौजूद लघुकथा, कहानियां, संस्मरण लेखकों के वह अनुभव हैं, जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में कहीं-न-कहीं देखा-सुना और अनुभव किया है। यह उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ खास अनुभव हैं जो पाठकों को भी जिंदगी के कुछ सच्चे अनुभवों से अवगत करायेंगी।

08-05-2016पुस्तक ‘सृजन सागर’ की भाषा-शैली बहुत ही सरल हैं जिसे समझना किसी के लिए भी बहुत आसान है। पुस्तक में कुल ३४ लेखकों की लघुकथा, कहानियां और संस्मरण मौजूद हैं। हर लेखक की कहानियों, लघुकथा और संस्मरण को अलग-अलग अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हर अध्याय के रूप में प्रस्तुत की गई कहानियां रचनाकारों के जीवन के खास अनुभव हैं जिन्हें उन्होंने अपने पाठकों से साझा किया है।

सृजन सागर (भाग-२)

प्रधान संपादक: मनमोहन शर्मा ‘शरण’

प्रकाशक : अनुराधा प्रकाशन

मूल्य      : ३०० रु.

पृष्ठ        : १७४

लेखिका अंशु प्रधान की कहानी ‘सूर्यास्त’ में शीतल  की कहानी है। शीतल एक ऐसी लड़की जिसकी शादी  शैलेष से तय हो जाने के बाद उसके घर वाले उसकी किस्मत को सरहाते नहीं थक रहे थे। वहीं शीतल भी खुद पर गुमान करते नहीं थक रही थी। पर तकदीर को शायद कुछ और ही मंजूर था। शादी के बाद शीतल ने जैसा सोचा था सब कुछ उसके बिल्कुल उल्ट पाया। शादी के बाद उसके घरवालों को उसकी हर बात में, हर काम में कमी नजर आती। शीतल मात्र गलतियों का पिटारा बन कर रह गई थी। आखिर ऐसा क्या हो गया था कि शीतल के हिस्से में केवल ताने और बुराईयां ही आ रही थीं। इन सब की वजह थी सिर्फ समाज की वह बुराई जिसकी भेट न जाने आज तक कितनी लड़कियां चढ़ चुकी हैं और न जाने कितनों को इस भट्टी में और झोंका जाना बाकी है। यानी दहेज, दहेज रूपी दानव ही था जो शीतल की खुशियों को धीरे-धीरे निगलता जा रहा था। आखिरकर एक दिन इन सब से छुटकारा पाने के लिए शीतल ने खुद को काल के देवता के हाथों सौंप दिया और सदा के लिए शांत हो गई अब समाज की कोई बुराई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी वह इन सब से परे थी। लेखिका ने इस कहानी के माध्यम से दिखाया है कि समाज में दहेज रूपी दानव दिनोंदिन विकराल होता जा रहा है। उन्होंने इस समस्या को गहन चिंतन के साथ पाठकों के बीच साझा किया है।

तो वहीं लेखक गोपेश कुमार शुक्ल कि कहानी ‘मनीप्लान्ट’ में बाल मजदूरी, शराब, और मजबूरी को दर्शाया गया है। बंटी अपनी मां की बिगड़ती हालत को देख कर डॉक्टर को तो ले आया, लेकिन उसके पास डॉक्टर की फीस के पैसे नहीं थे। जिसके लिए उसे अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर बाल मजदूर बनना पड़ा। पिता की शराब पीने के कारण मौत हो जाने के बाद घर चलाना और बंटी की पढ़ाई का खर्चा मां ही उठा रही थी, लेकिन मां के बीमार पडऩे के बाद ये जिम्मेदारी बंटी के सिर आ गई। जिसके चलते वह वक्त से पहले ही परिपक्व हो गया। इस पूरी कहानी में शराब के कारण उजड़ते घर और बाल मजदूरी जैसी सामाजिक समस्याओं का जिक्र किया गया है। लेखक ने अपने पाठकों के सहयोग से समाज में बढ़ती इन बुराईयों पर अंकुश लगाने की कोशिश की है। पूरी पुस्तक में इस तरह की बहुत सी कहानियां है जो सामाजिक बुराईयों को उजागर करती हैं। तो वहीं कुछ कहानियां जीवन के अद्भुत अनुभवों को भी दर्शाती हैं।

 

 प्रीति ठाकुर

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