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अंग्रेजों के खिलाफ पोस्टर चिपकाने वाला युवराज

अंग्रेजों के खिलाफ पोस्टर चिपकाने वाला युवराज

यह कल्पना ही असम्भव जान पड़ती है कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की पांच बड़ी रियासतों में शामिल जोधपुर के तत्कालीन युवराज ने खुद अद्र्धरात्रि में अपने शहर में अंग्रेजों के खिलाफ पोस्टर चिपका कर जनता को महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई में भागीदारी के लिए प्रेरित किया।

यह दुस्साहस दिखाया युवराज हनवंत सिंह ने,जिन्होंने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की राजा-महाराजाओं को चुनाव से दूर रहने की चेतावनी की परवाह न करके 1952 के प्रथम आम चुनाव में राजस्थान के मारवाड़ इलाके में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था। देश विभाजन के समय उन्होंने समझ बूझ एवं कूटनीति से मारवाड़ की जनता के हितों की रक्षा करते हुए विशेष पैकेज लेकर रियासत का विलय भारत संघ में किया।

पुराने समय में यह परंपरा प्रचलित थी कि राजा-महाराजा अपनी प्रजा का हाल-चाल जानने के लिए रात्रि में वेश बदलकर निकला करते थे। लेकिन यह किस्सा है बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक के आस-पास का। तब ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन-जागरण चरम पर था और देश भर में अंग्रेजों-भारत छोड़ो का नारा परवान चढ़ रहा था। महाराजा उम्मेद सिंह के पांच पुत्रों में से सबसे बड़े हनवंत सिंह को काउंसिल ऑफ  मिनिस्टर्स में शामिल कर महक माखास में बैठने का निर्देश मिला। पहले ही दिन फरियाद लेकर आयी एक हरिजन महिला के हाथ से आवेदन पत्र लेकर इस हस्ती ने छुआछूत की बुराई को ठेंगा दिखा दिया। दिन में राज-काज की व्यस्तता और रात में गांधी जी के आजादी के सपने देखने में बीतती। मन करता कुछ करने का। फिर क्या युवराज रात-रात भर पैलेस से गायब रहने लगे। कुछ दिन चली इस हरकत से चिंतित युवरानी कृष्णा के सब्र का बांध टूट गया। उस रात वह जागती रहीं। तीन बजने को थे। सहसा युवरानी ने कक्ष में आते युवराज को हाथ में लिया पैकेट बैग में रखते हुए देखा। नींद की जगह आंखों में सवाल, पत्नी की नाराजगी और पति की मनुहार के इन क्षणों में अधीर कृष्णा बस यही विनती कर पायी- आप आधी रात अकेले किसी को बताये बिना नहीं जाया करें। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बात आगे बढ़ी और युवराज को वेश बदल कर रियासत के शहरी परकोटे की गलियों-चौराहों पर छिपते-छिपाते किए जाने वाले अपने विशेष काम का भेद खोलने को मजबूर होना पड़ा।

अपनी जीवन संगिनी कृष्णा के समक्ष युवराज हनवंत सिंह ने जो राज खोला-वह चौंकाने वाला था। पोलो, घुड़सवारी तथा विमान उड़ाने से लेकर शौकिया जादूगरी में माहिर हनवंत वेश बदलकर पर कोटे में जाते जिससे वह किसी की पहचान में नहीं आ पाते। इससे पहले अपनी रणनीति को अंजाम देने के लिए उन्होंने रियासत के गुप्तचरों से शहर पर कोटे के भीतर जाने वाले मार्ग एवं दरवाजों का विवरण जाना और मेहरानगढ़ के निकट चांद पोल का रास्ता मुनासिब समझा। फिर ब्रह्मपुरी तथा नव चौकियां इलाके में करीब आधी रात तक चलने वाली हथाइयों (गप्प गोष्ठियों) के बाद सूनेपन में चौकीदारों का फेरा बचाकर अपने विशेष काम के रूप में पोस्टर चिपकाये।

आशंकित कृष्णा के सवालों की झड़ी में हनवंत का कहना था कि वो जो कुछ कर रहे हैं, यह उन के दिल की आवाज है- यह कहते हुए उन्होंने बैग में रखे पैकेट को निकाला जिस के साथ एक छोटी शीशी में देसी गोंद का घोल भरा हुआ था। उत्सुकता से कृष्णा ने पैकेट खोला जिसमें करीने से कुछ पोस्टर्स रखे हुए थे। सफेद एवं मटमैले इन कागजी पोस्टरों पर टेढ़ी-मेढ़ी बड़ी इबारत में ब्रिटिश विरोधी नारे लिखे हुए थे।

ऐसे पोस्टरों पर आश्चर्य जताने पर युवराज का सीधा सपाट जवाब था- मैं जोधपुर रियासत के लोगों को जगाना चाहता हूं। अंग्रेजों के साथ महाराजा (उम्मेद सिंह) के सम्बंध चाहे जैसे हों। मेरा दिल कहता है कि गांधी जी जो आह्वान कर रहे हैं, उसमें मारवाड़ के लोगों को उनके साथ होना चाहिए। विलायत में पढ़ते समय मन में यह विचार आता था कि हमारे खज़़ाने और धरती-धन को लूटने वाले अंग्रेज आलीशान बंगलों में जिंदगी के मजे लें और हम यहां हिंदुस्तान में आजादी के लिए तरसें। ब्रिटिश शासकों के प्रति हनवंत के विद्रोह के भाव को पिता उम्मेद सिंह भी नहीं जान पाये थे। खाने की मेज पर ऐसे मुद्दों पर चर्चा के दौरान हनवंत का मुखर होना युवा जोश का एक पहलू मान लिया जाता था।

जोखिम भरे इस काम तथा राजघराने की प्रतिष्ठा और इन पोस्टरों के असर से जुड़े सवाल पर युवराज की टिप्पणी थी-शहर में अंग्रेजों के खिलाफ प्रभात फेरियों में लोगों की संख्या बढ़ रही है। हथाईयों पर भी पोस्टर चर्चा का विषय बने हुए हैं। गोंद के बारे में युवराज की सफाई थी- इस काम के लिए पैलेस के ऑफिस से गोंद लेना एक तरह की चोरी होती, लिहाजा कूमठ के पेड़ से गोंद इकट्ठी कर घोल तैयार किया।

इस साफगोई से कृष्णा की मुस्कान में पति के प्रति गुस्सा, आशंका तथा संदेह के बादल छट चुके थे। इन्हीं क्षणों में कृष्णा को अपना बचपन याद आया जब 1931-32 में गुजरात में अहमदाबाद से 125 किमी दूर ध्रांग रियासत के महाराजा घनश्याम सिंह की यह राजकुमारी कृष्णा अपने भाई मेघराज के साथ शक्ति मां मंदिर से लौटते समय आजादी के दीवानों की टोली देखकर उनके साथ गुजराती में- गांधी बैठा घोड़े, सरकार हाथ जोड़े, म्हारा बंधु स्वराज लेम्बुसेल छेरे…. गीत गा उठती थी।

08-05-2016

उस मन स्थिति में कृष्णा ने आजादी की लड़ाई में पति के योगदान के साथ जुड़कर गोंद तैयार करने की जिम्मेदारी लेने का इरादा जताया। मारवाड़ में भीषण अकाल में लोगों को काम देकर राहत देने के मकसद से महाराजा उम्मेद सिंह द्वारा बनवाए गए छीतर पैलेस और बाद में उम्मेद पैलेस के रूप में विख्यात हुए इस शानदार आधुनिक महल में आजादी की लड़ाई में राजघराने के इस युवराज के अद्भुत कारनामे से जुड़े रहस्योद्घाटन के प्रसंग को, उस रात पति-पत्नी के बीच हुए संवाद को पत्रकार एवं रंगकर्मी अयोध्या प्रसाद गौड़ ने अपनी नव प्रकाशित पुस्तक ‘द रॉयल ब्लू’ में रोचक अंदाज में संजोया है। पूर्व सांसद कृष्ण कुमारी की रोमांचक गाथा उपन्यासिक शैली में आजादी और देश विभाजन से जुड़े घटनाक्रम की बारीकियों को अनावृत करती हैं।

ऐतिहासिक घटनाक्रम के अनुसार शिमला में नाटकीय बैठक के बाद ब्रिटिश शासन के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन तीन जून 1947 को भारत पाकिस्तान विभाजन का संदेश दे चुके थे। उन्होंने 25 जुलाई को चैंबर ऑफ प्रिंसेज को अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि-इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट के जरिए 15 अगस्त को सभी रियासतों को ब्रिटिश क्राउन के प्रति जवाबदेही आजादी हासिल हो जाएगी। इससे पहले माउंट बेटन ने देसी रियासतों से विलय पत्र हस्ताक्षर करने का अनुरोध किया था। वहीं 5 जुलाई को मिनिस्टरी ऑफ स्टेट्स अस्तित्व में आई जिसके मंत्री सरदार वल्लाभ भाई पटेल और सचिव वीपी मेनन थे।

सामाजिकता ने-बाने में बंटवारे की साजिश की पृष्ठभूमि में अनिश्चितता के भंवर में फंसी देशी रियासतों से जुड़े अनेक प्रसंग जगजाहिर हो चुके हैं। माउंटआबू में 9 जून को महाराजा उम्मेद सिंह के देहावसान के बाद जोधपुर रियासत के 38 वें महाराजा के रूप में 21 जून 1947 को हनवंत सिंह के राजतिलक समारोह में रियासत के भविष्य से जुड़े सवालों को लेकर कुचक्र रचे जाने लगे थे।

भोपाल के नवाब की राजतिलक में गैर-मौजूदगी के बावजूद उनकी गुपचुप जोधपुर यात्रा एवं महाराजा से गुप्त बैठक में रियासत को पाकिस्तान में मिलाये जाने की कथित साजिश और बाद में हनवंत सिंह की दिल्ली यात्राओं से जुड़ी खबरों को लोक परिषद के नेताओं तथा उनके मुखपत्र प्रजासेवक ने प्रकाशित कर फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन अफवाहों को फैलाने में तथा दिल्ली में बैठे आकाओं को महाराजा की गतिविधियों से अवगत कराने में घर के भेदियों की भी मिलीभगत रही थी।

हनवंत सिंह ने बाहर-भीतर के घटनाचक्र पर पैनी नजर रखते हुए मारवाड़ रियासत की जनता के हितों को सदैव ध्यान में रखा। उन्होंने लॉर्डमाउंटबेटन को 14 जुलाई की दोपहर भोज में अधिकतर रियासतों के भारत में विलय तथा 28 जुलाई को वायसराय हाउस में रिसेप्शन के दौरान भी जोधपुर रियासत के विलय के संकेत दे दिए थे।

रियासतों की गुटबाजी एवं शर्तों के बीच रियासतों के विलय से जुड़ी प्रक्रिया में बैठकों के इस दौर में हनवंत ने पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना, वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन, सरदार पटेल और वी.पी. मेनन से मुलाकात की। देश विभाजन के दौर में इन बैठकों में महात्मा गांधी के गायब रहने से चिंतित हनवंत सिंह ने महारानी कृष्णा को अपनी व्यथा बताई गांधी जी जिनके संदेश एवं अनबन की खबर सुनकर लोगों में जोश जगाने के लिए मैं आधी रात पैलेस से निकल कर पोस्टर चिपकाने का काम कर लेता था। अब वो ही गांधी जी अचानक बैठकों से गायब हैं।

जिन्ना ने तो 6 अगस्त की मुलाकात में जोधपुर रियासत को कराची बंदरगाह के निर्बाध और फ्रीपोर्ट की तरह काम लेने, राजपूत सरदारों को शस्त्र आयात की छूट, जोधपुर-हैदराबाद यानी सिंध रेलवे का अधिकार रखने, अकाल झेल रही रियासत की जनता को अनाज सप्लाई की एक तरफा शर्तें मंजूर करते हुए पाकिस्तान में विलय का ब्लेंक चैक ऑफर दिया था। लेकिन उन्होंने राजमाता और राठौड़ सरदारों से बातचीत के बहाने तब विलयपत्र पर हस्ताक्षर टाल दिए।

08-05-2016लॉर्ड माउंटबेटन से 9 अगस्त की मुलाकात में जिन्ना से हुई भेंट तथा शर्तों को लेकर हनवंत सिंह की तीखी नोकझोंक हुई और उन्हें अपनी जासूसी का भी संकेत वायसराय को दिया। अगले दिन पटेल ने हनवंत के पिता उम्मेद सिंह से अपने आत्मीय रिश्तों की याद दिलाकर विलय के लिए मना लिया और तीन प्रमुख शर्तों–राजपूत सरदारों को हथियार आयात की अनुमति देने, अकाल प्रभावित गांवों में खाद्य सामग्री पहुंचाने तथा जोधपुर से कच्छ बंदरगाह तक रेलवे लाइन बिछाने–की मांग प्रमुख थी।

जोधपुर रियासत का भारत में विलय का दिन 11 अगस्त नाटकीय घटना चक्र से भरा था। भोपाल नवाब से संक्षिप्त मुलाकात के बाद हनवंत सिंह वायसराय पहुंच गए थे। लॉर्ड माउंटबेटन की मौजूदगी में उन्होंने सरदार पटेल से हुई चर्चा तथा जोधपुर रियासत की प्रमुख शर्तों का संदर्भ दिया, लेकिन वी.पी. मेनन की बेरुखी से हनवंत सिंह नाराज हो उठ खड़े हुए। माउंटबेटन ने तत्काल हस्तक्षेप किया और अनमने मेनन को शर्तों के मुताबिक विलयपत्र पर हस्ताक्षर कराने के निर्देश दिए। वे पास के कक्ष में हैदराबाद प्रतिनिधि मंडल चले गए। हनवंत सिंह ने अपनी जैकेट से पैन निकाला। बड़े आकार के पैन से हस्ताक्षर कर उन्होंने नाटकीय अंदाज में पैन के पिछले हिस्से में बनी पिस्तौल मेनन पर तान दी।

घबराये मेनन वायसराय के पास भागे और उन्हें हनवंत सिंह की कारगुजारी बता अपने साथ लेकर आये। बदहवास मेनन के साथ माउंटबेटन भी एकबारगी पैन-पिस्तौल देखकर चौंक गए। मुस्कुराते हुए हनवंत सिंह ने जोधपुर में बने इस विशिष्ठ पैन की जानकारी देकर वायसराय को पैन रखने का आग्रह किया। खैर इस नाटकीय अंदाज के चलते जोधपुर रियासत की भारत में विलय पर मोहर लग चुकी थी। विभाजन के साथ 15 अगस्त 1947 को भारत को ब्रिटिश दासता से मुक्ति मिली। शासन की संसदीय प्रणाली के अंतर्गत जनवरी 1952 में लोकसभा एवं राजस्थान विधानसभा के लिए पहला आम चुनाव हुआ। पंडित जवाहरलाल नेहरू भरतपुर की आम सभा में राजा-महाराजाओं को चुनाव से दूर रहने की हिदायत दे चुके थे।

नेहरू के कथन की प्रतिक्रिया में हनवंत सिंह का बयान हिंदुस्तान टाईम्स के 6 दिसंबर 1951 के अंक में छपा। उन्होंने कहा कि राजाओं को सक्रिय राजनीति में शामिल होने से कोई नहीं रोक सकता। खुद हनवंत सिंह भी चुनाव लड़े और अपने समर्थकों को मैदान में उतारा। लोक परिषद एवं कांग्रेस के दिग्गज नेता जयनारायण व्यास से चुनावी समझौता नहीं हो पाया। हनवंत सिंह ने जोधपुर लोकसभा क्षेत्र और जोधपुर विधानसभा क्षेत्र से व्यास के खिलाफ परचा दाखिल किया। व्यासजी के सामने आहोर से माधो सिंह को चुनाव लड़वाया गया। रामराज्य परिषद और महाराजा समर्थकों ने मारवाड़ की 35 सीटों पर चुनाव लड़ा।

जोधपुर के घंटाघर गिरदी कोट में हनवंत सिंह ने ‘मैं था सूंदूर नहीं’ नारे के साथ चुनाव प्रचार का आगाज किया। चुनाव नतीजे अप्रत्याशित थे। जोधपुर डिवीजन में महाराजा समर्थक 35 में से 31 सीटों पर विजयी हुए। जयनारायण व्यास से दोनों सीटों पर महाराजा हनवंत सिंह जीते, लेकिन मतगणना के दिन विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया। समय चक्र बदला। रियासत की जनता से अपने रिश्तों का वास्ता देकर कृष्णा कुमारी ने मार्च 1971  में चुनाव जीतकर अपने पति के सपने को पूरा किया। उनकी पुत्री चन्द्रेश कुमारी 2009 में जोधपुर से विजयी होकर कांग्रेस सरकार में मंत्री बनीं।

जयपुर से गुलाब बत्रा

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