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गंगा प्रदूषण कारण और निवारण

गंगा प्रदूषण कारण और निवारण

भारतीय संस्कृति में गंगा का स्थान अनन्य है। ढाई हजार किलोमीटर के वृहद क्षेत्र में प्रवाहित होती हुई संबंधित क्षेत्रों का तो भरण पोषण करती ही है भारत के करोड़ों लोगों की आस्था का केन्द्र भी है और उनके ह्दय में प्राणधारा के रूप में बसती है। भारत की सारी संस्कृति गंगा के किनारे पर ही पनपी है और मां गंगे भारत को सदियों से एक राष्ट्र के सूत्र में पिरोती रही हैं। प्रत्येक मांगलिक कार्यों में गंगा जल का अहम योगदान रहा है, यहां तक कि शरीर छोड़ते समय भी गंगाजल और तुलसी दल मुख में डालते हैं और संस्कार के बाद अस्थियों का विसर्जन गंगा जी में करते हैं, यह है भारतीय संस्कृति में गंगाजी का महत्व। पुण्य सलिला मां गंगा त्रिविध पापनाशिनी व मोक्ष दायिनी है। पुराणों में कहा गया है कि पतित पावनी गंगा जी के दर्शन, स्नान एवं पान मात्र से प्रत्येक व्यक्ति जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। महाभारत में कहा है।

पुनाति कीर्तिता पाप दृष्टा भद्र प्रयच्छेति।

अवगाढा च पीता च पुनात्याटसण्तरम कुलम।। (3/85/95)

अर्थात गंगा जी का नाम लिया जाए तो वह सारे पापों को समाप्त कर पवित्र कर देती हैं। दर्शन करने पर कल्याण प्रदान करती हैं तथा स्नान करने पर मनुष्य की सात पीढिय़ों को मुक्ति प्रदान करती हैं।

यावदस्थि मनुष्यीस्य गंगा स्पृनशते जलम।

तावत स पुरूषो राजन स्वर्गलोके महीयते।। (3/85/94)

अर्थात मुनष्य की हड्डी जब तक गंगा जल का स्पर्श करती हैं तब तक वह स्वर्गलोक में रहता है।

न गंगा सदृश तीर्थ न देव:। केशवात पर:।

ब्राह्मणोम्यत पर नास्ति एचमान तीर्थ पितामह: 11(3/85/96)

अर्थात गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, भगवान विष्णु से बढ़कर कोई देवता नहीं और ब्राह्मणों से बढ़कर कोई वर्ण नहीं ऐसा पितामह ब्रह्मा जी का कथन है।

य गंगा महाराज स देशस्त त तपोवनम।

सिद्धि क्षेत्र च तन्ज्ञे य गंगा तीर समाश्रितम।। (3/85/97)

अर्थात जहां गंगा बहती है वह उत्तम देश है, वही तपोवन है।

गंगा के तटवर्ती क्षेत्रों को सिद्ध क्षेत्र समझना चाहिए। ऋग्वेद के नदी सूक्त में गंगा मैया का ही आह्वान किया गया है, स्कंन्दर पुराण में गंगा जी के सहस्र नामों का वर्णन किया गया है। महर्षि बाल्मिकी ने रामायाण में गंगाष्टाक से गंगा महिमा का वर्णन किया है। आदि शंकराचार्य काशी पंचक एवं मणिकर्णिकाष्टाक में गंगा की स्तुति करते हुए कहते हैं-

रोग शोक तापं पापं हर में भगवति कुमातिकलापम।

त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वगमासि गतिमर्म खुल संसारे।।

अर्थात् हे भगवती गंगे तुम मेरे रोग, शोक, ताप तथा कुमति कलाप को हर लो तुम त्रिभुवन की सार और वसुधा का हार हो। हे देवि, इस संसार में एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो।

08-05-2016रामचरितमानस में सीताजी को गंगा जी के रूप में देखा गया है। राजा जनक ने जब सीताजी को चित्रकूट में देखा तो सीता जी ने उन्हें गंगा जी की महत्वता बताई। गीत गोविन्दा के रचयिता जयदेव ने गीत शैली में गंगा जी की स्तुति की है। महापंडित राहुल सांकृत्यान की प्रसिद्ध कृति ‘वोल्गाल से गंगा’ में गंगा जी की महिमा का अद्भुुत वर्णन किया गया है। उत्तर भारत के लोक गीतों में भी गंगा जी की महिमा का अद्भुत वर्णन किया गया है। भारतीय संस्कृति में गंगा, गीता, गाय, गायत्री तथा गोविन्देव-पंच गकारा का अति महत्व है। महाभारत में गंगाजी को त्रिपथगामिनी कहा गया है तो वाल्मिकी कृत रामायण में इसे त्रिपगथा कहा गया है वही रघुवंश कुमार संभव व शाकुन्तलम में इसे त्रिस्तोत्रा के नाम से पुकारा गया है।

गंगा जल की महिमा अपरम्पार है। वेदों में गंगा जी को कल्याणकारी कहा गया है, बल्कि  इसे देवनदी की संज्ञा दी गई है। गंगा जल को पथ्य माना गया है, गंगा जल के नित्य सेवन से अनेक असाध्य रोग स्वत: ठीक हो जाते हैं। मुगल बादशाह अकबर भी इसका मुरीद था, वह गंगा जल से अत्यधिक प्रेम करता था वह इसे अमृत समझता था, वह नित्य गंगा जल से स्नान करता था, गंगा जल का पान करता था, गंगा जल से ही भोजन बनवाता था। तुगलक जैसा मुस्लिम बादशाह केवल गंगाजल से ही स्नान करता था। सूफी साहित्य में सूफी फकीरों द्वारा गंगा जल को मंत्राभिषिक्ता कर अपने शिष्यों में बांटने का प्रमाण है। प्रसिद्ध शायर इकबाल ने अपने तराने “सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तान में” गंगा जी को हिन्दोस्तां की आबरू कहा गया है, परन्तु  इस गौरवगान से इस तथ्य पर कोई असर नहीं पड़ता है कि आज गंगा जी दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में शामिल है, जो गंगा नदी अपने उद्गम गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक ढाई हजार किलोमीटर के प्रवाह में अस्सी करोड़ से भी अधिक व्यक्तियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचा रही हो उनके लिए जीवन रेखा का काम कर रही हो, जो अपने विशाल स्वरूप में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हुई हो वह हमारी लापरवाही से हिमालय से लेकर बंगाल तक नदी तो दूर मात्र गंदे नाले का रूप धारण कर चुकी हो, वह हमारी स्वार्थपरता का एक उदाहरण है। इसके नैसर्गिक प्रवाह को बांधों के द्वारा रोका जा रहा है जिससे इसके प्राकृतिक गुण नष्ट होते जा रहे हैं। काशी विश्वविद्यालय स्थित प्रयोगशाला की एक रिपोर्ट हमें बताती है कि गंगा जल में ऑक्सीजन कंटेंट 12 होना चाहिए यही गुण गंगा जल को वर्षों तक खराब होने से बचाता है परन्तु अब स्थिति यह है कि जल में ऑक्सीजन कंटेंट मात्र 3 या इससे भी कम रह गया है। वाराणसी में दशावूवमेध घाट पर पहले से तीस से चालीस फीट तक गहरा जल था वहां अब सिल्ट की अधिकता एवं जलदोहन के कारण जलस्तर केवल घुटनों तक ही रह गया है। कुल मिलाकर जल दोहन एवं बढ़ते प्रदूषण के कारण गंगा जी लुप्त होने के कगार पर है।


नमामि गंगे

राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण के तहत समेकित गंगा संरक्षण मिशन


08-05-2016

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में सरकार की फ्लैगशिप योजना ‘नमामि गंगे’ को मंजूरी पिछले साल मई में दी गई। इस योजना के तहत गंगा नदी को समग्र तौर पर संरक्षित और स्वाच्छ करने के कदम उठाए जाएंगे। इस पर अगले पांच साल में 20 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। गंगा को स्वच्छ करने के लिए पिछले 30 साल में सरकार की ओर से खर्च की गई राशि से यह रकम चार गुना है। (भारत सरकार 1985 से चल रहे इस काम के लिए कुल चार हजार करोड़ खर्च कर चुकी है।)

सरकार ने अब इस कार्यक्रम में अहम बदलाव करते हुए गंगा नदी के किनारे बसे लोगों को स्वच्छ गंगा मिशन में शामिल करने पर ध्यान केन्द्रित किया है, ताकि इसके बेहतर और टिकाऊ नतीजे हासिल हो सके। इस संबंध में पिछले अनुभवों से सीखते हुए गंगा स्वच्छता मिशन में राज्यों और जमीनी स्तर के संस्थान जैसे शहरी स्थानीय निकाय और पंचायती राज संस्थानों को शामिल करने पर सरकार का पूरा ध्यान है। यह कार्यक्रम स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन (नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा – एनएमसीजी) की ओर से लागू किया जाएगा। राज्यों में इसके समकक्ष संगठन, जैसे स्टेट प्रोग्राम मैनेजमेंट ग्रुप्स (एसपीएमजीएस) इस कार्यक्रम को लागू करेंगे। एनएमसीजी जहां जरुरत होगी वहां फील्ड ऑफिस बनाएगा। गंगा की सफाई के लिए इस मिशन को बेहतर तरीके से लागू करने के लिए इसकी निगरानी की जाएगी और इसके लिए तीन स्तरीय व्यवस्था  बनाने का प्रस्ताव है- पहला, राष्ट्रीय स्तर पर कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय कार्यबल का गठन किया जाएगा, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर एनएमसीजी मदद करेगा। दूसरा, राज्य स्तर पर मुख्य सचिव की अध्य्क्षता में कमेटी गठित की जाएगी जिसे एसपीएमजीएस मदद करेंगे। तीसरा, जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिला स्तर पर कमेटी बनेगी।

इस कार्यक्रम को रफ्तार देने के लिए इसके तहत आने वाली सभी गतिविधियों और परियोजनाओं की पूरी फंडिंग केन्द्र करेगा। अब तक के गंगा एक्शन प्लान की विफलता को ध्यान रखते हुए केन्द्र कम-से -कम 10 साल तक इसकी सभी परिसंपत्तियों के परिचालन और रखरखाव की व्यावस्था करेगा। जहां गंगा में ज्यादा प्रदूषण है वहां पीपीपी/एसपीवी के जरिये गंगा की सफाई की जाएगी।

केन्द्र की इस योजना को और मजबूत ढंग से लागू करने के लिए चार बटालियन गंगा इको टास्क फोर्स के गठन की योजना है। यह प्रादेशिक सैन्य इकाई होगी। इसके अलावा गंगा में प्रदूषण रोकने और इसे संरक्षित करने के लिए कानून लाने पर भी विचार हो रहा है।

गंगा स्वच्छता कार्यक्रम में केन्द्रीय मंत्रालयों/एजेंसियों और राज्य सरकारों के बीच समन्वेय की व्यवस्था में सुधार लाने पर जोर होगा। इसके अलावा शहरी विकास मंत्रालय के तहत ढांचागत सुविधाओं के विकास के कार्यक्रम भी चलाए जाएंगे। पेयजल और सफाई, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत चलने वाले कार्यक्रमों के तहत निवेश किया जाएगा।

नमामि गंगे के तहत नदी के प्रदूषण को कम करने पर पूरा जोर होगा। इसमें प्रदूषण को रोकने और नालियों से बहने वाले कचरे के शोधन और उसे नदी से दूसरी ओर मोडऩे जैसे कदम उठाए जाएंगे। कचरा और सीवेज परिशोधन के लिए नई तकनीक की व्यवस्था की जाएगी।

इस योजना का सामाजिक-आर्थिक लाभ भी होगा और इससे रोजगार सृजन होने की उम्मीद है। साथ ही लोगों की जीविका का स्तर सुधरेगा और नदी किनारे रहने वाली बड़ी आबादी के स्वास्थ को भी फायदा पहुंचेगा।



नमामि गंगे विफलता का नया नाम


08-05-2016

‘गंगे तव दर्शनार्थ मुक्ति:’ का उदघोष करने वाली भारतीय संस्कृति में नदियों, सरोवरों, झीलों के प्रति बड़ी पुण्य आस्था रही है। सरिताएं ही क्या, भारतीय संस्कृति तो प्रकृति की सभी शक्तियों में दैवी स्वरूप का दर्शन करती थी। लेकिन, समय के अनुसार प्रयुक्त  हो रहे जल पर जन भार बढ़ता गया, औद्योगिक बस्तियां उभरने लगीं और निर्बाध रूप से नदियों में औद्योगिक कचरा और कूड़ा-करकट तथा मल-जल प्रवाहित किए जाने लगे, फलत: पुण्यदायिनी नदियों ने अपनी पवित्रता खो दी, मानवीय कृत्यों ने उनकी पवित्रता अक्षुण्ण नहीं रहने दी। आज पावन गंगा, पावन  नहीं रह गयी, वरण वह नगरीये बस्तियों का कचरा ढोने वाली मात्र एक नदी रह गयी है। गंगा पर प्रदूषण का हमला मैदानी भाग में उतरते ही हरिद्वार से शुरू हो जाता है और फिर सागर में मिलने तक इसके 2525 किमी. लंबे बहाव मार्ग के दोनों ओर बसे शहरों का मल, कूड़ा-कचरा इसे अपने में समेटना पड़ता है। शहरी मल के अतिरिक्त उद्योगों से निकले व्यर्थ पदार्थ, रसायन, अधजली लाशें, राख आदि गंगा में मिलते रहते हैं जो इसे दूषित करते हैं। औद्योगिक अपशिष्ट और मल ऐसे 29 शहरों से आकर गंगा में गिरता है, जिनकी आबादी एक लाख से ऊपर है। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ऐसे शहरों में से केवल 15 शहरों में ही मल से निपटाने की व्यवस्था है। 23 ऐसे शहर हैं, जिनकी आबादी 55 हजार से ऊपर है, अपना मैल गंगा को सौंपते हैं। इसके अतिरिक्त 48 और छोटे-बड़े शहर अपना कचरा गंगा में प्रवाहित करते हैं। ये सभी शहर उ.प्र., बिहार और प.बंगाल में गंगा के किनारे बसे हुए हैं।  गंगोत्री से लेकर वाराणसी तक गंगा नदी में 1611 नदियां और नाले गिरते हैं तथा केवल वाराणसी के विभिन्न घाटों पर लगभग 30,000 लाशों का दाह-संस्कार होता है। इस कृत्य से लगभग डेढ़ लाख टन राख गंगा में प्रतिवर्ष प्रवाहित होती है। इतना ही नहीं, अकेले वाराणसी में ही लगभग 20 करोड़ गैलन मल की गंदगी रोज गंगा में मिलती रहती है। टनों राख के अतिरिक्त अधजली लाशें, जानवरों के ढांचे भी गंगा की धारा में गिरते ही रहते हैं। गंगा घाटी में बसे कुल 100 शहरों की गंदगी का 82 प्रतिशत ऊपर बताये गये 1 लाख से अधिक आबादी वाले 29 शहरों से आता है और इनमें से 28 शहर कुल 100 शहरों के मल संस्थानों से आने वाली गंदगी का 89 प्रतिशत हिस्सा गंगा को सौंपते हैं। कुल मिलाकर जो तस्वीर उभरती है, वह बड़ी चिंताजनक है। गंगा ही क्या, आज भारत की सारी नदियां दूषित हो चुकी हैं, चाहे वह गंगा-यमुना हो या फिर  कृष्णा-कावेरी, प्रदूषण की मार से कोई अछूती नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने चुनाव अभियानों में गंगा स्वच्छता अभियान को प्रमुख एजेंडा बनाया था और सरकार बनने के बाद इस मिशन को मंत्रालय का दर्जा दिया, साथ ही साथ ‘नमामि गंगे 2014’ की उदघोषणा की। मगर मजे की बात यह है कि इस वर्ष प्रस्तुत आम बजट में ‘नमामि गंगे’ का कोई उल्लेख ही नहीं है और अभी तक इस ‘गंगा स्वच्छता अभियान’ पर कोई पहल नहीं हुई है। अभी यह योजना कागज पर ही है, उसे अमली जामा पहनाने में कितना वक्त लगेगा, वह भविष्य के गर्भ में हैं। नए साल में सरकार ने नमामि गंगे कार्यक्रम को शुरू कर दिया। कई सारे घोषित-अघोषित लक्ष्यों को लेकर शुरू किए गए इस कार्यक्रम में रोड मैप और समय सीमा का कोई जिक्र नहीं है।

कोई नहीं जानता कि नमामि गंगे कब अपने लक्ष्य तक पहुंचेगा। उमा भारती ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगा वाहिनी सेना तैनात कर इसकी शुरूआत की। गंगा वाहिनी में पूर्व सैनिकों को जोड़ा गया है जो गंगा में डाले जा रहे प्रदूषण पर नजर रखेंगे। मंत्रालय जल्दी ही कानपुर, वाराणसी और इलाहाबाद में भी गंगा वाहिनी की नियुक्ति  करेगा। गंगा किनारे के 200 गांवों की सीवेज व्यवस्था को सीचेवाल मॉडल की तर्ज पर विकसित किया जाएगा। संत सीचेवाल ने सामुदायिक सहयोग से पंजाब की कालीबेई नदी को गंदे नाले से पवित्र नदी में तब्दील कर दिया था।

08-05-2016

करीबन दो साल के कार्यकाल के बावजूद सरकार काम करने के बजाए प्रतीकों का सहारा ले रही है। जब एक्शन प्लान चरम पर होना चाहिए था, तब सरकार पायलट प्रोजेक्ट की शुरूआत कर रही है। गौरतलब तो यह है की जब गंगा किनारे हजारों गांव हैं, तब सिर्फ कुछ गांवों में निवेश करने से गंगा कैसे साफ होगी? क्या सरकार अगले चुनावों में जाने से पहले यह कहकर बचना चाहती है कि हमने शुरूआत तो की। अब तय हुआ है कि गंगा को निर्मल बनाने के लिए सरकार सार्वजनिक-निजी-साझेदारी (पीपीपी) मॉडल का सहारा लेगी। इस मॉडल के तहत निजी क्षेत्र या केंद्र और राज्य के विभिन्न विभागों को साथ लेकर विशेष कंपनियां बनाई जाएंगी। ये कंपनियां घरेलू और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट जल के प्रबंधन और इस्तेमाल का काम करेंगी।

इस काम के लिए बनने वाली विशेष कंपनियां भूजल के सीमित इस्तेमाल पर जोर देंगी। लेकिन इस मॉडल में यह कहीं नहीं कहा गया कि गंगा में पानी बरकरार रखने के लिए क्या किया जाएगा। क्या गंगा  अपशिष्ट  डालने वाले कानपुर और वाराणसी जैसे शहरों को यह कहा जा सकता है कि वे अपने पानी का इंतजाम खुद करें और गंगा पर बोझ न बनें।

ये कंपनियां अपशिष्ट जल को साफ भी करेगी। यह एक कदम है, अपशिष्ट जल के बाजार की दिशा में। जो सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन जब पर्यावरण संरक्षण बाजार के हाथों में आ जाए तो चिंता स्वाभाविक है। हालांकि, पीपीपी मॉडल की जरूरत भी शायद इसलिए पड़ी, क्योंकि गंगा और यमुना में बने सीवेज प्लांटों में से 30 फीसद तो बंद ही है और बांकी भी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं।

ऐसा लगता है की जैसे इन्हीं सवालों से बचने के लिए गंगा मंत्रालय ने अपनी सालाना प्रेस वार्ता को रद्द कर दिया और एकतरफा संवाद करते हुए जय गंगे का नारा लगाता हुआ पत्र जारी कर दिया। प्रेस वार्ता होती ये सवाल भी होते कि किन जगहों पर गंगा अब तक साफ हुई? और अब तक गंगा बेसिन के लिए निर्धारित बजट को खर्च क्यों नहीं किया गया? हालांकि, केंद्र गंगा पर होने वाले सभी परियोजनाओं को सौ फीसदी वित्त पोषित करने की घोषणा कर चुकी है, लेकिन तब भी  राज्य सरकारों का नजरिया गंगा को लेकर उपेक्षित ही है। खर्च का पूरा अंश देने के बाद भी राज्य सरकारों से नमामि गंगे पर सहयोग की उम्मीद कम ही है।

उत्तर प्रदेश जैसे राज्य नमामि गंगे को राजनीति से तौल रहे हैं। सरकार प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के डिस्चार्ज प्वाइंट पर यंत्र लगाने जा रही है, ताकि 15 मिनट से ज्यादा डिस्चार्ज होने पर कानूनी कार्रवाई की जा सके। डिस्चार्ज प्वाइंट पर यंत्र लगाने वाले अनेक प्रयास अब तक देख-रेख के अभाव में दम तोड़ चुके हैं।

इस तरह के यंत्र की खरीदी में भ्रष्टाचार की भारी आशंका रहती है और सप्लायर कंपनियां भी खरीद के बाद की सेवा में विफल रहती है। कुल मिलाकर नमामि गंगे में स्पष्ट दिशा-निर्देशों का पूरी तरह अभाव है, उसमें सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं की चिंता भी नजर नहीं आ रही। कोर्ट कई बार सरकार को गंगा के हित में सीधी कार्रवाई करने का आदेश दे चुका है। लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी के चलते न तो टेनरीज हट पा रही हैं और न ही आश्रम और रिहायशी अवैध निर्माणों को ही हटाया जा सका है। उमा भारती को समझना होगा, ये नारों, संकल्पों, वादों और प्रतीकों से आगे बढऩे का समय है। कुछ कर दिखाने का समय है।

नीलाभ कृष्णा



जल संसाधन मंत्रालय की उपलब्धियां


08-05-2016

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय तीन आयामी उद्देश्यों के साथ जल संसाधनों के प्रभावी उपयोग, समग्रता और स्थिरता के लिए काम करता है। केंद्र में नई एनडीए सरकार बनने के साथ ही जल संसाधन मंत्रालय को पुनर्गठित किया गया। जल संसाधन मंत्रालय में नदी विकास और गंगा संरक्षण को जोड़ दिया गया। अब इसका नाम जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय हो गया है। वर्ष 2014 के दौरान मंत्रालय का मुख्य जोर गंगा नदी के कायाकल्प, नदियों को आपस में जोडऩे और घाट विकास तथा उनके सौंदर्यीकरण के अलावा अन्य मुद्दों पर रहा।

गंगा नदी का संरक्षण

गंगा संरक्षण कार्य के संदर्भ में मंत्रालय ने अगस्त 2014 को राजपत्र अधिसूचना जारी की। गंगा और उसकी सहायक नदियों को एक पहल के अंतर्गत रखा गया। गंगा संरक्षण की प्राथमिकता में इसकी पारिस्थिति की अखंडता को कायम रखते हुए ‘अविरल धारा’ और ‘निर्मल धारा’ को सुनिश्चित करना है। केंद्रीय बजट 2014-15 में गंगा कंजर्वेशन मिशन के तहत ‘नमामि गंगे’ की स्थापना करते हुए गंगा संरक्षण के लिए 2037 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया था। गंगा संरक्षण के लिए तीन योजना लघु अवधि, मध्यम अवधि और एक लंबी अवधि की कार्य योजना तैयार की गई है। यह पहले से ही राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरबीपी) द्वारा स्वीकृत परियोजनाओं में शामिल है। वर्तमान में विश्व बैंक ने एनजीआरबीपी परियोजना के लिए 7000 करोड़ रुपये की राशि मुहैया कराई है, जबकि वाराणसी में परियोजना के लिए जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन (जेआईसीए) ने 496.90 करोड़ रुपये का बजट मुहैया कराया है।

नेशनल गंगा मॉनिटरिंग सेंटर (एनजीएमसी) गंगा संरक्षण के महत्वपूर्ण पहलुओं की निगरानी के लिए एक नोडल केंद्र के रूप में स्थापित किया गया है। इसका कार्य सूचना प्रौद्योगिकी और अन्य माध्यमों से गंगा के जल और उसके प्रवाह के लिए इस नदी में विभिन्न स्थानों की पहचान करना है। इसके लिए केंद्र सूचना प्रोद्यौगिकी की मदद आदि लेता है।

सरकार ने नमामि गंगे परियोजना के तहत नदी के किनारे बसे सभी गांवों को खुले में शौच से मुक्त करने का प्रस्ताव रखा है।

गंगा संरक्षण के तहत निम्नलिखत कदम उठाए गए हैं:

लएनजीआरबीपी का विस्तार किया गया है जिसमें जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री को उपाध्यक्ष के तौर पर और गंगा के पूर्ण विकास से संबंधित अन्य मंत्रियों को शामिल किया गया है।

ल6 जून 2014 को सचिवों का समूह बनाया गया जिसके माध्यम से विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय में सुधार आया है। सचिवों के समूह ने 10 बैठकें की और उसने 28 अगस्त 2014 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

लप्रथम राष्ट्रीय वार्ता गंगा मंथन 7 जुलाई 2014 को आयोजित की गई जिसमें सभी मान्यताओं के 500 से अधिक आध्यात्मिक नेताओं, शिक्षाविदों और टेक्नोक्रेट, गैर-सरकारी संगठनों एवं पर्यावरणविदों व नीति निर्माताओं ने विचार-विमर्श में सक्रिय रूप से भाग लिया। विचार, सुझाव और लोगों को इसमें शामिल करने के उद्देश्य से 12 सितंबर 2014 को एनएमसीजी ने एक वेबसाइट शुरू की।

लपर्यावरणीय प्रवाह पर अंतरिम सिफारिश के लिए (डब्ल्यू आर, आरडी एवं जीआर) के अपर सचिवों और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक समिति गठित की गई है।

लपर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने खनन पर मौजूदा दिशानिर्देशों को संशोधित करने के लिए एक समिति का गठन किया है।

नदियों को जोडऩे की योजना (आईएलआर)

नदियों को जोडऩे की योजना से अतिरिक्त रूप से लाभ यह होगा कि 3.5 करोड़ हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जा सकेगी। इस बढ़ोतरी से 14 करोड़ हेक्टेयर भूमि सिंचाई की क्षमता बढ़कर 17.5 करोड़ हेक्टेयर हो जाएगी। साथ ही 34,000 मेगावाट की बिजली उत्पादित होगी। इसके अलावा बाढ़ नियंत्रण, नौपरिवहन, मत्स्य पालन, पानी के खारेपन तथा जल प्रदूषण पर रोक लगेगी। नदियों को जोडऩे की योजना राष्ट्रीय महत्व की एक योजना है। इसका उद्देश्य देश के हर हिस्से में पानी का बराबर बंटवारा है। साथ ही इससे बाढ़ और सूखा प्रभावित क्षेत्रों को लाभ होगा। राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (एनडब्लयूडीए) ने अपनी व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करने के लिए 30 लिंकों, प्रायद्वीपीय घटक के अधीन 16 और तथा हिमालयाई घटक के अधीन 14 लिंकों की पहचान की है। इनमें से प्रायद्वीपीय घटक के 14 लिंकों को और हिमालयाई घटक के 02 लिंको (भारतीय हिस्से में) के बारे में व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार की गई है। सात अन्य लिंक के संबंध में सर्वेक्षण और जांच भी पूरी हो चुकी है और उनकी व्यवहार्यता रिपोर्ट के मसौदे का संकलन किया गया है।

वर्ष 2014 में नदी जोडऩे की पहली परियोजना केन-बेतवा को जोडऩे से शुरू किया गया। केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत केन नदी पर 221 किमी लिंक कैनाल के साथ एक बांध बनाया जाना है जिससे 6.35 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हो सकेगी औऱ 13.42 लाख लोगों को पीने का पानी मुहैया कराया जा सकेगा। इसके अलावा मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में 78 मेगावाट की पन बिजली भी पैदा की जा सकेगी।

जन संसाधन मंत्री की अध्यक्षता में आईएलआर पर एक विशेष समिति का गठन किया गया है जो इसके कामकाज की निगरानी करेगी। प्रौद्योगिकी उन्नयन नवीनतम तकनीक के उपयोग से नदी के पानी के प्रबंधन तंत्र का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। विश्व बैंक की मदद से गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी के लिए एक तंत्र को विकसित करने को लेकर हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। साथ ही इसका उपयोग देश के दूसरे हिस्सों में भी किया जा सकेगा। इस परियोजना की लागत 3000 करोड़ है।

जलवाही क्षेत्र की मैपिंग

देश में 8.89 लाख वर्ग किलोमीटर के जलवाही क्षेत्र की मैपिंग के लिए एक महत्वाकांक्षी नेशनल एक्यूफायर मैपिंग एंड मैनेजमेंट प्रोग्राम(एनएक्यूयूआईएम)को शुरू किया गया है। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर पांच राज्यों के छह इलाकों में एक्यूफायर मैपिंग को शुरू किया गया है। इनमें महाराष्ट्र (नागपुर का हिस्सा), राजस्थान (दौसा और जैसलमेर जिले का क्षेत्र), बिहार (पटना का हिस्सा), कर्नाटक (तुमकुर का हिस्सा) और तमिलनाडु (कुड्डलुर जिला) शामिल है। इन इलाकों में सटीक और तेज एक्यूफायर मैपिंग के लिए उन्नत हेलीबर्न ट्रांजिट इलेक्ट्रोमैग्नेट सर्वे का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस संबंध में आंकड़ों को एकत्रित कर लिया गया है। विश्लेषण और वैज्ञानिक जांच के बाद इसे प्रस्तुत किया जाएगा। आंकड़ों में भूजल संसाधनों के लिए संभावित स्थान की पहचान सहित विभिन्न पन भू-वैज्ञानिक इलाकों में जलवाही स्तर की मैपिंग में प्रौद्योगिकियों की प्रभावकारिता शामिल है। इस योजना पर 2051 करोड़ रुपये का खर्च आ रहा है जिसे इस मंत्रालय ने एक्यूफायर मैपिंग के लिए 16वीं योजना में रखा है।

                (उदय इंडिया ब्यूरो)


 


तकनीक का सहारा


08-05-2016

‘नमामि गंगे’ योजना को अमली जामा पहनाने के लिए मोदी सरकार ने एक अनूठे प्रयास का सहारा लिया है। इसके अंतर्गत गंगा नदी की सतही गंदगी को दूर करने के लिए एक योजना लायी गयी है जो की भुवन गंगा नामक मोबाइल एप्लीकेशन से जुड़ा होगा।  सरकार यह प्रोजेक्ट निम्नलिखित दस शहरो में चलाएगी-हरिद्वार, वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर, मथुरा और वृंदावन, गढ़मुक्तेश्वर, पटना, कोलकाता, साहिबगंज और नबद्वीप। इस योजना को इसरो के जीओ इंफोमेटिक्स सेटेलाइट से जोडऩे से गंगा नदी में प्रदूषण की रियल टाइम जानकारी और निगरानी भी हो सकेगी। इस सारी योजना का सार यह है की गंगा नदी में तैरते रहते कचरे का निपटारा किया जाए, ताकि लोगों को लग सके की सरकार गंगा की सफाई के प्रति सचमुच प्रतिबद्ध है। इस योजना में घाट सफाई, नदी के सतह की सफाई और नाले से नदी में गिरने वाले कचरे की रोकथाम पर पूरा ध्यान केंद्रित किया गया है। नदी की सतह की सफाई के लिए स्टीमर, ट्रैश स्किम्मर मशीनें, और ट्रैश बूम्स जैसी चीजें नदी के सतह पर तैरते रहने वाले कचरे की सफाई के लिए इन सभी दस जगहों पर प्रयोग में लायी जाएंगी। घाटों की साफ-सफाई के साथ गंगा नदी के दूसरे किनारे और नदी के अंदर की भी सफाई तेजी से होगी। स्टीमर के जरिए घाट के चारों तरफ सर्वे कर उसकी रिपोर्ट तैयार की जाएगी।

सरकार को गंगा की सफाई के लिए प्रतिबद्ध दिखने के लिए सभी घाटों पर गंदगी हटाने के लिए ऐयरेटर्स का प्रयोग भी किया जाएगा ताकि जनता को दिखे की काम हो रहा है। इसके अलावा 118 वैसी जगहें जहां नाला-गंगा का जुड़ाव हो रहा है वहां रियल टाइम मॉनीटर्स लगने की भी योजना है, ताकि सफाई नियमित रूप से होती रहे और जल की शुद्धता बरकरार रह सके। एक पायलट योजना के तहत 10 ऐसी जगहों को चिन्हित कर काम शुरू किया जा चुका है।

इन सबके अलावा सरकार एक भुवन गंगा मोबाइल एप्प भी ला रही है जिससे जनता गंगा में कही भी कचरा दिखने पर तुरंत अपने स्मार्टफोन से फोटो खींच अपलोड कर सकेंगे। एक बार फोटो अपलोड हो जाने की स्थिति में जिस भी कांट्रेक्टर को उस क्षेत्र की सफाई का जिम्मा दिया गया होगा उस पर कार्रवाई की जा सकेगी। करीब 20,000 करोड़ के नमामि गंगे योजना का मुख्य उद्देश्य ही जनता की भागीदारी है तो इस एप्प के जरिये सरकार ने उस तरफ एक कदम और बढ़ाया है।

                (उदय इंडिया ब्यूरो)


गंगा केवल नदी नहीं है यह भारत की जीवन धारा है। यह देश की आस्था एवं सभ्यता, संस्कृति से जुड़ी होने के कारण भारत की शाश्वत पहचान है परन्तु विडम्बना है कि गंगा जी को मां कहने वाले भारतीय ही या यू कहिए हिन्दू ही गंगा मां को प्रदूषित कर रहे हैं। कारखानों का जो हजारों टन कूड़ा कचरा गंगा जी में गिराया जाता है वही गंगा जी को प्रदूषित करने का कारण है। उन कारखानों के मालिक भारतीय हैं, जो प्रतिदिन गंगाजल का आचमन करने वाले है, प्रत्येक मांगलिक कार्यों में गंगाजल का प्रयोग करने वाले हैं वही लोग गंगा जी को सबसे ज्यादा प्रदूषित करने में लगे हुए हैं। सीवरेज के द्वारा जो मलमूत्र प्रतिदिन गिराया जा रहा है वे सरकारें भारतीय सरकारें हैं वे विदेशी सरकारें नहीं हैं फिर ये विरोध आचरण क्यों? आज गंगा नदी विश्व की छठी सर्वाधिक प्रदूषित नदी बन चुकी है। गंगा उद्योगों से 80 प्रतिशत, नगरों से 15 प्रतिशत तथा पर्यटन या धार्मिक कर्मकाण्ड से पांच-पांच प्रतिशत प्रदूषित होती है। शहरीकरण और औद्योगिक विकास ने प्रदूषण के स्तर को दस गुना बढ़ा दिया है। शहरी विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार 118 शहरों का 3847 मिलियन लीटर सीवरेज गंगा जी में गिरता है जबकि ट्रीटमेंट क्षमता 879 मिलियन लीटर की है। इसके कछारी क्षेत्र में एक करोड़ टन उर्वरक प्रयोग में लाए जाते हैं जिसमें 5 लाख टन गंगा जी में बहा दिया जाता है। 1500 टन कीटनाशक भी गंगा जी में बहा दिया जाता है। कपड़ा मिलों, बूचडख़ानों और अस्पतालों से निकाला कूड़ा कचरा तथा रसायन भी गंगा जी में बहा दिया जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार 400 करोड़ लीटर अशोधित अपद्रव्य तथा 900 करोड़ अशोधित गंदा पानी गंगा जी में जाता है। गंगा जी जब पहाड़ों से निकलकर मैदानीभाग में आती है तो हरिद्वार से ही उसमें प्रदूषण की शुरुआत हो जाती है। नरौरा परमाणु संयत्र के लिए गंगा के पानी का प्रयोग किया जाता है जिससे रेडियो धर्मिता पैदा होती है जो गंगा जी को प्रदूषित करती है। प्रदूषण की चरम स्थिति कानपुर में है। कानपुर में ही लगभग 400 चमड़े के कारखाने हैं इनसे प्रतिदिन पांच करोड़ लीटर कचरा निकलता है जिसमें 90 लाख लीटर ही ट्रीट हो पाता है। चमड़ा शोधन से होने वाला प्रदूषण सबसे गंभीर है जिसके कारण भूमिगत जल भी प्रदूषित हो रहा है। प्रयाग, वाराणसी, कानपुर इन स्थानों पर गंगा जी सबसे ज्यादा प्रदूषित हो रही है। प्रयाग का पवित्र संगम और कुंभ मेला आस्था का प्रतीक है इसी प्रकार वाराणसी भी आस्था का केन्द्र है इन दोनों स्थानों पर शवदाह, पिंडदान, अस्थि विसर्जन, शवविसर्जन करने की प्राचीन मान्यताएं हैं जिसके कारण गंगा का प्रदूषण सभी मान्य सीमाओं को पार कर जाता है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड तथा बंगाल के 900 से अधिक कारखाने गंगा में गंदगी प्रवाहित कर रहे हैं। विश्व में केवल गंगाजी में रेडियो आइसोटोप रेडन नामक तत्व है जिसके कारण पानी में कीड़े नहीं पड़ते और पानी वर्षों तक पीने योग्य साफ  बना रहता है, इस प्रदूषण के कारण यह तत्व विलुप्त होने के कगार पर है। गंगा जी में कोलीफार्म बैक्टीरिया की दर 500 से अधिक नहीं होनी चाहिए, परन्तु वह अब हजारों में पहुंच चुकी है। गंगा के बहाव क्षेत्र में खेतों में पैदावार की गिरावट 30 से 60 प्रतिशत दर्ज की जा रही है।

गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का कार्य लगभग 35 वर्ष पूर्व आरंभ किया गया था। 1979 में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने प्रदूषण की विकरालता को समझते हुए एक समीक्षा की थी। सन् 1985 में गंगा एक्शन प्लान की शुरूआत हुई थी। 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा कार्य योजना आरंभ किया। 1986 में वाराणसी में गंगा को साफ  रखने के लिए तीन सीवरेज शोधक यंत्र लगाए गए, ताकि सीवर का मलमूत्र गंगा जी में न मिले। लेकिन संयत्र जल्दी ही सफेद हाथी बन गए। वाराणसी का दानापुर संयत्र तो कभी आरंभ ही नहीं हुआ, 1995-96 में कैग ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि बिहार सरकार ने करोड़ो रूपये बिना खर्च किए वापस कर दिए, सरकारी उदासीनता का यह एक बड़ा उदाहरण है। हरिद्वार में गंगा की सफाई के दौरान हर की पौड़ी पर गंगा जी की सफाई के बजाय गंगा नहर की सफाई कर डाली देश के साथ इससे बड़ा मजाक क्या होगा जिन्हें गंगा नदी और गंगा नहर के अन्तर का ही नहीं पता। पर्यावरणविद् प्रो. वीरभद्र के अनुसार यह गंगा कार्य योजनाओं की नाकामी का रोल माडल है। गंगा कार्य योजना सरकार द्वारा प्रायोजित थी उसमें जनभागीदारी बिल्कुल नहीं थी पर्यावरणविद् एम.सी. मेहता के अनुसार यही उसकी असफलता का कारण है। एक बार इलाहाबाद तथा वाराणसी में विसर्जित शवों को खाने के लिए गंगा नदी में कछुए छोड़े गए लेकिन लोग उन कछुओं को ही मार कर खा गए। गंगा में घटती ऑक्सीजन के कारण मछलियों का अकाल पड़ता जा रहा है इसलिए गंगा की जो बस्तियां आबाद की गई वे भी उजड़ती जा रहीं हैं। गंगा बेसिन अथॉरिटी की स्थापना 2009 में हुई परन्तु कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकले,1986 से गंगा कार्य योजना पर अरबों रूपये खर्च किए जा चुके हैं परन्तु गंगा जी साफ  होने की अपेक्षा मैली होती गई, जब जून 1985 में गंगा एक्शन प्लान की शुरूआत हुई तब उसमें उत्तर प्रदेश के 6, बिहार के 4 और प. बंगाल के 15 शहरों पर ध्यान देने की योजना थी उस पर कितना काम हुआ जग जाहिर है। परन्तु गंगा की सफाई पर 4000 करोड़ से भी अधिक की धन राशि खर्च की जा चुकी है। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद ने रियल टाइम इफ्यूलेंट मॉनिटरिंग सिस्टम लगाने का निर्देश गंगा किनारे चलने वाली 13 बड़ी मिलों और तीन दर्जन छोटे कारखानों को दिया है, इसके अतिरिक्त सभी औद्योगिक ईकाइयां डिस्पले बोर्ड भी लगाएंगी जो कारखानों से निकलने वाले घ्वनि प्रदूषण, जल प्रदूषण तथा वायु प्रदूषण की रियल टाइम मॉनिटरिंग को डिस्पले बोर्ड पर दिखएगा। दिसंबर 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र  सरकार से जवाब मांगा था कि 25 साल बीत गए बहुत सी-कमेटियां तथा प्राधिकरण बने, लेकिन गंगा प्रदूषण की समस्या कम नहीं हुई बेहतर होगा कि एक केन्द्रीय उच्चाधिकार समिति बने जिसमें संबंधित राज्यों के भी प्रतिनिधि हों, गंगा सफाई परियोजना की जमीनी स्तर पर सफलता सुनिश्चित करने के लिए जिला स्तर पर भी समितियां गठित की जाए। इन समितियों में नौकरशाह, टेक्नोक्रेट, जनप्रतिनिधि और गैर-सरकारी संगठनों को भी शामिल किया जाए तब केन्द्र सरकार ने इन प्रावधानों को मानते हुए एक हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में दिया कि सन 2020 के बाद पतित पावनी गंगा मैली नहीं रहेगी, यह गंगा को स्वच्छ तथा निर्मल बनाने की केन्द्र सरकार की मिशन क्लीन गंगा की नई समय सीमा है, हलफनामे में कहा गया कि मिशन के तहत सुनिश्चित किया जाएगा कि 2020 के बाद गैर-शोधित सीवर और औद्योगिक कचरा गंगा में न बहाया जाए। गंगा की सफाई अभियान को केन्द्र और राज्यों के सामूहिक प्रयत्न से सफल बनाने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण गठित किया गया जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री और सदस्यों के रूप में संबंधित राज्यों  के मुख्यमंत्री तथा दस विशेषज्ञ सदस्य होंगे जो गंगा की सफाई योजना, उसके खर्च, निगरानी और समायोजन का काम देखेगी।

गंगा की सफाई अभियान को आगे बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने गंभीरता दिखाते हुए 2014 में “नमामि गंगे” परियोजना की घोषणा की। इसके अतिरिक्त पांच केन्द्रीय मंत्रियों की एक समिति बनाई जिसमें शहरी विकास जल संसाधन मंत्री, पेयजल मंत्री, पर्यावरण मंत्री तथा टूरिज्म मंत्री  होंगे। इसके अंतर्गत 2037 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई। इस बारे में केन्द्रीय मंत्री कलराज मिश्र ने बताया कि गंगा किनारों के घाटों के विकास के लिए 100 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। निर्मल धारा योजना के अंतर्गत गंगा घाट पर बसे 118 नगरों में जल मल शुद्धिकरण के लिए इंफ्रास्ट्रचर विकास की योजना बनाई गई है जिस पर 51,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। 2022 तक गंगा किनारे बसे सभी गांवों को खुले शौच से पूरी तरह मुक्तकरने का संकल्पहै। राष्ट्रीय गंगा निगरानी केन्द्र का गठन करके नदी नियामक नियमों को सख्ती से लागू किया जाएगा। गंगा ज्ञान केन्द्र की स्थापना की जाएगी, नदी विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी। जलीय जीवन की सुरक्षा दी जाएगी जिनमें कछुए, डॉल्फिन और घडिय़ाल शामिल है, बालू खनन पर नए नियम बनाने की योजना है।

गंगा की सफाई के लिए सात मंत्रालय एकजुट हो गए हैं इस सिलसिले में 2 फरवरी 2016 को इन मंत्रालयों की एक बैठक हुई और परस्पर सहमति से इन मंत्रालयों ने एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए। सरकार ने गंगा को साफ  करने के लिए 2015 से 2020 के बीच बीस हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। गंगा की सफाई के लिए सात मंत्रालय मिलकर काम करेंगे जो अगले तीन साल में गंगा को एक बार फिर उसके पुराने स्वरूप में लाने के लिए काम करेंगे, ये मंत्रालय हैं– नदी विकास एवं गंगा संरक्षण, मानव संसाधन विकास, स्वच्छता एवं पेयजल, ग्रामीण विकास पर्यटन, आयुष, युवा एवं खेल मामले तथा पोत परिवहन मंत्रालय। इन मंत्रालयों ने एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं जिसमें गंगा को निर्मल करने के लिए सात वर्किंग पॉइंटस तय किए गए हैं और 21 सूत्री कार्यक्रम बनाया गया है। इसे सभी मंत्रालय आपसी सहमति से पूरा करेंगे। गंगा संरक्षण मंत्रालय सभी मंत्रालयों के बीच समन्वय बनाने का काम करेगा। इन मंत्रालयों की भूमिका निम्न प्रकार होगी-

  • मानव संसाधन विकास मंत्रालय साफ -सफाई के साथ जैव विविधता के बारे में गंगा किनारों के क्षेत्रों में जागरूकता और पर्यावरण साक्षरता का प्रसार करेगी।
  • जल संसाधन मंत्रालय गंगा और यमुना किनारे बने जल शोधन संयत्रों से साफ पानी की सप्लाई (पीने के लिए नहीं) करेगा।
  • ग्रामीण विकास मंत्रालय मनरेगा और अन्य परियोजनाओं को गंगा सफाई की मुहिम से जोड़ेगा।
  • पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय गांवों में इसका प्रसार करेगा।
  • पर्यटन मंत्रालय इकोलॉजी को बेहतर बनाने के लिए इको टूरिज्म को प्रोत्साहित करेगा।
  • आयुष मंत्रालय गंगा तटीय क्षेत्रों में औषधियों और पौधों के विकास का काम करेगा।
  • पोत परिवहन मंत्रालय नदी परिवहन की आधारभूत संरचना तैयार करेगा।
  • युवा एवं खेल मंत्रालय गंगा की सफाई और वनीकरण को बढ़ावा देगा।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी प्रदूषित होती जा रही गंगा के लिए उसे शुद्धिकरण के लिए कठोर कदम उठाने का निर्णय लिया है। एन.जी.टी. प्रमुख न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार ने हरिद्वार से कानपुर के बीच स्थित उद्योगों को नोटिस जारी करके कहा है कि उद्योगों से निकलने वाला कचरा इसी प्रकार गंगा नदी में डाला जाता रहा तो उन्हें बंद कर दिया जाएगा।

श्रीकृष्ण मुदगिल

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