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भारत के सर्वांगीण विकास के लिए भगवद्गीता का संदेश

भारत के सर्वांगीण विकास के लिए भगवद्गीता का संदेश

भारतीय राष्ट्र, संस्कृति और समाज का सबसे बुनियादी पहलू यह है कि हम कर्तव्य आधारित समाज हैं, अधिकार आधारित समाजों से बिल्कुल अलग। अधिकार और कर्तव्य में गुणात्मक फर्क होता है। कर्तव्य में नि:स्वार्थ भाव की प्रधानता होती है, जबकि अधिकार का आधार स्वार्थपरकता होता है। इसलिए भारतीय संस्कृति में कर्तव्य पालन को अधिक महत्व दिया गया है। भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में 47वें श्लोक में ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ के संदेश का यही सार है, जिसका अर्थ होता है ‘आपका अधिकार अपने कर्तव्य पालन में है।’ इसलिए करीब पांच हजार साल पहले महाभारत की रचना हुई थी, गीता इसी का एक हिस्सा है और उसमें हर व्यक्ति के चार मौलिक कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं :

ऋणेश्चतुर्भि: संयुक्ता जायंते मानवा भुवि।

पितृदेवर्षिमनुजैर्देयं तेभ्यश्च धर्मत:।।

हर मनुष्य को चार पवित्र कर्तव्य पूरे करने ही चाहिए। ये हैं देवऋण, पितृऋण, ऋषिऋण और मानवऋण।

(महाभारत 120-17-20)

मानव जीवन और प्राकृतिक संसाधन तथा ईश्वर से दूसरी धन-संपत्ति प्राप्त करने के बाद हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह ईश्वर के प्रति श्रद्धा अर्पित करे। इसी तरह जीवन जीने के लायक सक्षम बनानें के लिए ज्ञान देने वाले शिक्षकों या ऋषियों के प्रति भी हरेक का पवित्र कर्तव्य है कि वह अपने ज्ञान को समस्त मानव और जीवों की सेवा करे और उन्हें ज्ञान दे। फिर, वैवाहिक जीवन से प्राप्त बच्चों के प्रति हर मां-बाप का दायित्व है कि वह हर बच्चे का अच्छे से पालन-पोषण करे, उन्हें सभी जरूरी शिक्षा और चरित्र मुहैया कराए, ताकि समाज में अच्छे नागरिकों की आपूर्ति लगातार बनी रहे। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण पवित्र दायित्व यह है कि हर कोई मानव मात्र की हर तरीके से मदद करे। इसे ही पांच हजार साल पहले रचित महाभारत में ‘मानव ऋण’ कहा गया है।

एक और प्राचीन ग्रंथ विष्णु पुराण में भारत की सीमाओं का ही वर्णन नहीं है, बल्कि भारतीय सामाजिक जीवन के अनिवार्य आयाम की भी चर्चा की गई है :

उत्तरं यत़ समुद्रस्य हिमादे्रश्चैव दक्षिणं।

वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र संतति:

”समुद्र से उत्तर और हिमालय से दक्षिण का भू-भाग भारत है और इसके लोग भारतीय यानी भारत के वंशज हैं।’’

अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने।

यतो हि कर्मभूरेषा अतोन्याभोगभूमय:।।

  ”जम्बू द्वीप में स्थित भारत महान है। वजह यह है कि यह कर्मभूमि आधारित देश है। दुनिया के बाकी देश सुविधा या अधिकार आधारित देश हैं।

भारत के अलावा दूसरे देशों में अधिकारों के भोग को महत्व दिया गया है। इसी वजह से वे भोग के देश या अधिकारों पर आधारित देश हैं। इससे भारत दूसरे देशों से अलग हो जाता है। यही भगवद्गीता का सार संदेश है क्योंकि ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ का अर्थ होता है ‘आपका अधिकार अपने कर्तव्य पालन में है।’

हमारे राष्ट्रगौरव महात्मा गांधी ने अपनी किताब ‘आजाद भारत की मेरी तस्वीर’ में आजादी के कुछ ही दिन पहले लिखा :

भारत दुनिया में मेरा प्रिय देश है, सिर्फ इसलिए नहीं कि यह मेरा देश है, बल्कि इसलिए कि मैंने इसमें महानतम अच्छाईयां खोज ली हैं। भारत का सभी कुछ मुझे आकर्षित करता है। यहां वह सब कुछ है जो ऊंची-से-ऊंची आकांक्षाओं वाला कोई इंसान चाहे। भारत अनिवार्य रूप से कर्म भूमि है न कि भोग भूमि। यह कहकर महात्मा गांधी ने स्वीकार किया कि हमारा कर्तव्य आधारित समाज है।

इसलिए राजनैतिक आजादी मिलने के बाद हमारा संविधान बना तो उसके पहले अध्याय में ही मौलिक दायित्वों का जिक्र किया गया। यह मान लिया गया कि हर नागरिक को अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए कुछ मौलिक अधिकार के प्रति जागरूक और शिक्षित करने के लिए यही काफी है।  यह चूक हमारे राष्ट्रीय जीवन के लिए काफी महंगी साबित हुई है। हालांकि बाद में इसका एहसास हुआ तो मूलभूत दायित्वों में एक अध्याय खंड-4ए में अनुच्छेद 51ए जोड़कर बनाया गया। खासकर अनुच्छेद 51ए की धारा (1) में कहा गया है:

51ए : मूलभूत दायित्व- हर नागरिक का यह दायित्व होगा कि

(1) व्यक्ति और समाज के हर क्षेत्र में बेहतर हासिल करने की कोशिश करेगा, ताकि राष्ट्र लगातार उच्च स्तर की उपलब्धियों की ओर बढ़ता जाए।

अनुच्छेद 51ए में यह स्पष्ट है कि राष्ट्र के प्रति हर व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अपने देशवासियों के ज्ञान में इजाफा करे। यही सिद्धांत महाभारत में ‘मानव ऋण’ कहा गया है।

हालांकि यह अनुच्छेद संविधान में प्रारंभ से रहना चाहिए था, लेकिन यह छूट गया। हमारी संसद ने 42वें संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 51ए को जोड़ा। कहा गया है कि नहीं से देर भली।

वेदों में सिर्फ तीन ऋण या दायित्व का जिक्र है जिसे हर व्यक्ति को पूरा करना चाहिए। ये हैं देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण।

महाभारत के रचयिता वेदव्यास को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने तीन ऋणों को पूरा करने को ही मावनता के लिए पर्याप्त नहीं माना और इसलिए उसमें ‘मानव ऋण’ जोड़ा, जो इस उद्धरण से स्पष्ट है।

भगवद्गीता कहा गया है :

स्वे स्वे कर्मध्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।

”हर व्यक्ति अपने दायित्वों को पूरा करके जीवन की सफलता हासिल कर सकता है।’’

                (भगवद्गीता 18-45)

यह उद्धरण राज्य सभा के मुख्य द्वार पर सुनहरे अक्षरों में अंकित है। गीता का यह संदेश आज के दौर में सबसे प्रासंगिक हो गया है जब दायित्व पूरा करने में नाकामी हासिल हो रही है या भ्रष्टाचार सिर्फ निर्वाचित प्रतिनिधियों में ही नहीं बढ़ रहा है, बल्कि कुछेक प्रशासनिक पदों और न्यायपालिका या जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों में बढ़ रहा है। यह रोग आम लोगों को लग रहा है। जैसा कि हम अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की रिपोर्टों में लगातार देखते रहते हैं। यहां तक कि डॉक्टर भी हड़ताल पर चले जाते हैं और अपना दायित्व पूरा नहीं करते जिससे राष्ट्रीय जीवन की भारी क्षति होती है।

यह आम बात है कि हर कोई सब कुछ नहीं कर सकता। हर व्यक्ति राज्य की सेवा में या निजी नौकरियों में अलग-अलग दायित्व निभाता है। गीता का संदेश यही है कि हर किसी को ईमानदारी से उसे जो भी काम दिया गया हो, उसे पूरा करना चाहिए, इस प्रक्रिया में वह अपने निजी जीवन में भी सफलता हासिल करेगा और राष्ट्र का भी भला करेगा। यह राष्ट्र के विकास के लिए जरूरी है। जैसा कि संस्कृत के इस श्लोक में कहा गया है :

सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दु:खमाप्नुयात्।।

”सभी सुखी हों

सभी रोग-मुक्त हों

सभी का शुभ हो

किसी को दुख न हो’’

देवनागरी लिपी में यह श्लोक हमारे संसद भवन के द्वार पर सुनहरे अक्षरों में लिखा है। इससे जाहिर होता है कि दायित्वों को निभाना ही राष्ट्रीय विचार का सार है। इस तरह सभी के लिए आप ”खुशी का अधिकार’’ हासिल कर सकते हैं। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है- ”अपना कर्तव्य करो और बाकी ईशवर पर छोड़ दो’’ और भारत के सर्वांगीण विकास में योगदान करें।

न्यायमूर्ति (रिटायर्ड) डॉ. एम. रामा जोइस

(लेखक पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के भूतपूर्व मुख्य न्यायधीश और राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)

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