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भारत को महाशक्ति बनाने वाले पंचतत्व

भारत को महाशक्ति बनाने वाले पंचतत्व

”भारत के पंचतत्व के मौलिक सिद्धांतों को हर भारतीय को अपनी रोजमर्रा के जीवन का अभिन्न अंग बनाना चाहिए। इससे राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र में आंतरिक ताकत मिलेगी, जिससे अंतत: भारत को विश्व बिरादरी में विश्व गुरु की अपनी भूमिका निभाने में मदद मिलेगी,  ’ यह कहना है अंतर्राष्ट्रीय  ख्याति प्राप्त ज्योतिषाचार्य और आगम शास्त्र के ज्ञाता डॉ. भानु प्रकाश शर्मा  का।  उनकी राय में आर्थिक गैर-बराबरी तथा ग्रामीण-शहरी फर्क को मिटाने और रोजगार सृजन तथा इंफ्रास्ट्रक्चर क्रांति के लिए भारत को आर्थिक रूप से विकसित करना जरूरी है। लेकिन, डॉ. शर्मा यह भी कहते हैं, ”उसी के साथ हमें यह भी आश्वस्त करने की जरूरत है कि भारत के नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को भी विकसित और समृद्ध करने की जरूरत है, ताकि हमारा देश पूरी दुनिया का आध्यात्मिक मार्ग दर्शक बन सके। दरअसल भारत ऐसा एकमात्र देश है जिसमें दुनिया के नैतिक मूल्यों की दिशा दुरुस्त करने की इच्छाशक्ति और क्षमता है।’’

गऊ

गऊ (गाय और उसकी प्रजाति) के मामले में डॉ.शर्मा ने कहा, ”गाय मानव मात्र के लिए पवित्र है। कुरान सहित कोई भी धर्म ग्रंथ गाय को मारने को मंजूरी नहीं देता। हम कहते हैं, ”गऊ विश्वास्य मातृहा’’ (गाय समूचे जगत या मानव मात्र की माता है)। हम मानते हैं और शास्त्रों में भी कहा है कि ‘गावाम अंगेशु तिस्तंती भुवनानि चतुर्दशा।’’ चिकित्सा विज्ञान ने यह साबित किया है कि गाय के दूध में किसी भी तरह के रोग को दूर करने की क्षमता है। बहुत लोगों को पता नहीं है कि गाय के घी में चावल पकाया जाए तो दो ताकतवर गैस इथलरीन-ऑक्साइड और प्रोपीलीन-ऑक्साइड निकलती हैं। दूसरी गैस कृत्रिम बारिश करा सकती है। यह भी चिकित्सा विज्ञान से प्रमाणित है कि गाय के गोबर में हैजा के विषाणु को नष्ट करने की क्षमता है।’’

डॉ. शर्मा की मांग है कि केंद्र सरकार गाय और उसकी प्रजाति को राष्ट्रीय पशु घोषित करे और बीफ का निर्यात बंद करे। वे कहते हैं, ”मैं मानता हूं कि गाय के चमड़े का हम इस्तेमाल करते हैं-कम से कम मैं तो नहीं करता- लेकिन मेरा यह भी मानना है कि इसका विकल्प तलाशा जा सकता है।

यह कोई विकट समस्या नहीं है। मेरी अपील है कि गाय और उसकी प्रजाति को प्राकृतिक मौत मरने दिया जाये, न कि बूढ़े होने पर उन्हें कसाई खाने में भेजा जाए। हम क्या अपने बूढ़े, बीमार और अशक्त जनों को त्याग देते हैं?

”हर मां-बाप को अपने बच्चों को गाय की महत्ता जरूर बतानी चाहिए, हर रोज बच्चों से गाय को दाना-पानी दिलवाना चाहिए और उसकी उपासना करवानी चाहिए। अगर यह दिनचर्या चार-पांच साल की उम्र में डाल दी गई तो यह आदत में शुमार हो जाती है और धीरे-धीरे समाज की संस्कृति में ढल जाती है।’’

इस आशंका पर कि बीफ निर्यात बंद होने पर कसाई खानों में रोजगार पाए लाखों लोग बेकार हो जाएंगे, डॉ. शर्मा ने कहा, ”प्रधानमंत्री मुद्रा योजना लेकर आए हैं जिससे छोटे उद्यमियों को उद्योग-धंधे लगाने या खुदरा कारोबार करने में मदद मिलेगी। क्या वैकल्पिक रोजगार पाना इतना मुश्किल है? मैं ऐसा नहीं समझता। बीफ पर पूरा विवाद राजनैतिक है और उसका मकसद तुष्टीकरण की वोट बैंक की राजनीति के अलावा कुछ नहीं।’’

ग्राम

गांव ही लघु भारत हैं। वेदों में कहा गया है, ”धनिक श्रोत्रियो राजा, नदी वैद्यस्थ पंचमहा, पंचयात्रा नवीदयंते सतात्र दिवस वसेत….’’ ऐसे गांव में रहना चाहिए, जहां कोई धनी हो (कोई व्यापारी) जो बुरे दिनों में गांव का ख्याल रख सके, कोई आध्यात्मिक या ज्ञानवान व्यक्ति हो जो गांव को सही मार्ग बता सके, एक राजा हो जो प्रजा की रक्षा करे, हमारी बुनियादी जरूरतों के लिए एक नदी हो और एक वैद्य हो जो बीमार लोगों का इलाज कर सके। यह सुंदर अवधारणा है, जहां स्थितियों को पेचीदा बनाए बगैर लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें। गांव में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर बहसें होती हैं। गांव में ही लोग कुनबे में रहते हैं, भाईचारे और दोस्ती के साथ रहते हैं। हाल के दशकों में राजनीति की वजह से माहौल जरूर कुछ बिगड़ा है, लेकिन गांव ही हमारे रीति-रिवाजों, संस्कृति, परंपरा और धरोहरों का रखवाला है।

”हमने लाखों लोगों को देखा है जो शहरों में नकली, कृत्रिम और मशीनी जीवन से तंग आकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं की ओर लौटना चाहते हैं। इससे परिवार के सदस्यों के बीच रिश्तों की कड़वाहट का अकल्पनीय पहलू पैदा होता जा रहा है।

”अगर हम सभी मायनों में एक राष्ट्र बने रहते हैं, न सिर्फ भौतिक रूप से, बल्कि अपने नैतिक मूल्यों, संस्कृति और परंपरा के मायने में भी एक बने रहते हैं तो हम अपने परिवार और उसके मूल्यों को मजबूत कर सकेंगे जो हम अपने गांव में ही पा सकते हैं। आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक रूप से जीवंत गांव ही किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक समृद्धि की पृष्ठभूमि तैयार कर सकते हैं।’’

08-05-2016

गंगे

”…गंगे च यमुने चैव, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी, सन्निधिम् कुरु:…’’ गंगा नदी हमारी राष्ट्रीय पहचान है। यह हमारी जीवनदायिनी है, यह सिर्फ हमारे तन को ही साफ नहीं करती, बल्कि आध्यात्मिक सफाई भी करती है, कोई ऐसा पल नहीं होता जब लोग गंगा को याद नहीं करते, इस कदर कि एक हिंदी फिल्म में गीत भी है, ”गंगा मेरी मां का नाम, बाप का नाम हिमाला…’’ दुनिया में हर आत्मा की ईच्छा होती है कि उसकी मृत्यु पवित्र गंगा के तट पर हो या कम से कम उसकी अस्थियां उसमें बहाई जाएं। गंगा का नाम लेते ही एक रोमांच सा उठता है। गंगा को देखते ही वैराग्य होने लगता है, गंगा में डुबकी लगाकर शरीर तृप्त हो जाता है, हर किसी की मनोकामना पूरी हो जाती है, ऐसी इस नदी की पवित्र शक्ति है।

वेदों में कहा गया है, ”…गंगा गंगेति यो भ्रूयात, यो ज्ञानानाम स्थारपि, मुचयाते पापेभ्य, विष्णु लोकम सगच्छति…’’ इसका यही मतलब है कि मां गंगा में एक डुबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं। इसका यह मतलब नहीं होता कि आप करते जाइए और गंगा में डुबकी लगाकर पाप धोते जाइए। इसका आध्यात्मिक पहलू यह है कि गंगा में पाप धोने की क्षमता है।

डॉ. शर्मा बताते हैं, ”मेरा एक शिष्य इंग्लैंड में रहता है। उसने एक बार मुझसे कहा कि मशहूर पॉप गायक जॉर्ज हैरिसन ने  गंगा के घाट पर मरने की इच्छा व्यक्त की थी लेकिन उसकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। हालांकि उसका अग्रि-संस्कार हुआ और उसकी अस्थियां बनारस में बहाई गईं। वह इस्कान का अनुयायी बन गया था और गीता तथा गंगा से बहुत प्रभावित था।

”यह जानकर हार्दिक खुशी होती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने गंगा को (भौतिक रूप से) साफ करने की महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की है। मैंने खुद देखा है कि बनारस में गंगा के घाट कुछ साफ हुए हैं लेकिन काफी कुछ करने की जरूरत है, ताकि लाखों लोग गंगा की सफाई में सक्रिय हों। मसलन, हमने मांडया जिले अपने मंदिर शहर श्रीपटनम में कावेरी सफाई योजना शुरू की है। उसमें हमने लोगों को बड़ी संख्या में लगाया है। मोदी जी ने कॉरपोरेट घरानों और सेलेब्रटी लोगों को इस काम में लगाया है, यह सही है पर लोगों को स्वेच्छा से सेवा करनी चाहिए। मैं जल संसाधन मंत्रालय से अपील करता हूं कि गंगा की सफाई में दक्षिण भारत के लोगों को शामिल करने की भी कोई कार्य-योजना बनाई जाए।

08-05-2016

गीता

गीता सभी जाति, धर्म, पूजा पद्धति, नस्ल, देश और महादेश सभी के मानव मात्र के लिए आध्यात्मिक संदेश है। भगवान कृष्ण समूचे विश्व के गुरु हैं। ”….वासुदेवसुतम् देवम्, कामसा चानूरा मर्दनम्, देवकी परमानंदम्, कृष्णाम् वंदे जगत्गुरुम्….’’ वे जीवन और मृत्यु का रहस्य बताने वाले पहले शिक्षक हैं। एक मायने में हम सभी अर्जुन हैं और यह फैसला नहीं कर पाते कि किस रास्ते जाना चाहिए। हमारे पास कृष्ण नहीं हैं लेकिन, गीता के रूप में हमारे पास सर्वकालिक उनका आध्यात्मिक संदेश है। उन्होंने कुछ भी बाकी नहीं छोड़ा है और किसी को संदेह में नहीं रहने दिया है।

सही ही कहा है कि ”….सर्वोपनिषदो गाओ, दोग्ध गोपालनंदन:, पार्थो वतसहा सुधीरभेक्ता:, दुग्धम गीतारुतम महत….’’ इससे गीता के सर्वकालिक महत्व प्रासंगिकता का पता चलता है। इसमें सभी समस्याओं का समाधान है। कृष्ण हमें बताते हैं कि क्रोध, हताशा, असहायता, असमंजस से कैसे पार पाया जाए और यह भी बताते हैं कि आनंद, खुशी के पलों में कैसा व्यवहार करना चाहिए। इस मायने में कृष्ण महान मैनेजमेंट गुरु हैं। वे हमें मैनेजमेंट का गुर सिखाते हैं।

स्वामी विवेकानंद ने गीता को काफी महत्व दिया। उनके सभी उपदेश गीता के आध्यात्मिक संदेशों पर आधारित हैं। रामकृष्ण मिशन की एक किताब ”समाज को बदलने के आध्यात्मिक मूल्य’’ हैं। यह विवेकानंद के भाषणों का संकलन है, जो गीता पर आधारित है। इसमें कहा गया है, ”समाज बदलता रहता है, क्योंकि यह जीवंत है, उसे नई स्थितियों के अनुरूप बदलना होगा। इसी वजह से हमारा भारतीय समाज और हमारा देश बचा हुआ है। लेकिन समय बदल गया है, क्या इसीलिए समाज को हमेशा बनाए रखने वाले आध्यात्मिक मूल्य भी बदल जाने चाहिए? कृष्ण कहते हैं और स्वामी विवेकानंद उस पर जोर देकर कहते हैं कि नहीं। समाज को बनाए रखने वाले मूल्य नहीं बदलने चाहिए। ये समय सिद्ध मूल्य व्यवस्था है और इसे कृष्ण ने सिखाया है। यह मनुष्य को ईश्वर की वरदान की तरह है जिसका हमेशा पालन किया जाना चाहिए।

गायत्री

गायत्री मंत्र को चारों वेदों की जननी माना जाता है। इसमें समूचे ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा और अच्छाई के संचार की क्षमता है। गायत्री मंत्र ”अगोचर शक्ति’’ है। इस मंत्र के उच्चारण मात्र से व्यक्ति में ऊर्जा का संचार होने लगता है। ”ओम भुर्भुव: स्वह, तत्सर वितुर वरेणयम, भर्गो देवस्य धीमहि धीयो, यान:  प्रचोदयात….’’ इस पवित्र श्लोक का कुल सार यह है कि देवी गायत्री हममें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें और अच्छाई की राह दिखाएं। डॉ. शर्मा के मुताबिक ”कोई भी काम पर जाने से पहले दिन में 12 बार गायत्री मंत्र का उच्चारण कर लेता है तो वह जानबूझकर कोई गलत काम नहीं करेगा। यह इस मंत्र की सकारात्मक शक्ति है।’’

डॉ. भानु प्रकाश शर्मा की राय में इन पंचतत्वों के सिद्धांत के पालन और समृद्धि से समाज में गुणात्मक बदलाव आएगा और देश में जमीनी स्तर पर एक सांस्कृतिक क्रांति आ जाएगी। ”करोड़ों लोगों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद है। दरअसल हम उन्हें अवतार की तरह मानते हैं जो हमारे देश को आर्थिक, सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर ले जाने को आए हैं। हमें एहसास है कि यह कठिन कार्य है और इसके लिए दूर की सोच की जरूरत है। फिर भी भारत और उसके बाहर भी रहने वाले करोड़ों लोगों को हमारे देश के इस दौर में मोदी जी में ही आशा की किरण नजर आती है। आर्थिक और बुनियादी संरचना के क्षेत्र में तो कुछ होता दिख रहा है, लेकिन देश में नैतिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक मूल्यों को मजबूत करने की जरूरत है। इसी के साथ हमें देश को सामरिक मामले में भी मजबूत करने की जरूरत है, ताकि इस धरती पर कोई ताकत हमारी ओर बुरी नजर से देखने की हिम्मत न जुटा सके। हम सामरिक रूप से जब तक मजबूत नहीं होंगे, अपने ऊंचे दर्शन पर इतराने का कोई मतलब नहीं बनता है। दुनिया उसी को पूजती है जो सैन्य और सांस्कृतिक दोनों ही तरह

की ताकत रखता है। मोदी जी हमारी सबसे बड़ी उम्मीद हैं।

एस.ए. हेमंत कुमार

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