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मराठवाडा का सूखा सुल्तानी या आसमानी?

मराठवाडा का सूखा सुल्तानी या आसमानी?

महाराष्ट्र का मराठवाडा इलाका सूखे और अकाल का पर्याय बन चुका है। नतीजतन फसलें तबाह होने के कारण अब किसानों की आत्महत्याओं के कारण सुर्खियों में ज्यादा रहता है। मराठवाडा का लातूर इन दिनों पानी के अकाल के कारण चर्चा में है। जहां पानी का अकाल इस सीमा तक पहुंच चुका है कि सारे देश से रेल के जरिये पानी पहुंचाया जा रहा है। वहां पानी को लेकर ऐसी मारामारी रही कि पानी के लिए धारा 144 लगानी पड़ी। लातूर में पानी का अकाल चरम तक पहुंच गया है, मगर यह स्थिति सारे मराठवाडा की है। कहीं सुखकर पीली पड़ी फसलें, कहीं ऊसर पड़े खेत, पानी के अभाव से दरकती जमीन, झुलसे पेड़- यह नजारा आजकल हर कहीं देखने को मिल जाता है। लगातार तीन साल से पड़ रहे सूखे ने किसानों की तो सारी उम्मीदों पर ही पानी फेर दिया है। इस पर पानी के जबरदस्त संकट ने घेर लिया है। तालाब सूख चुके हैं। हैंडपंप बेकार हो गए हैं। कुओं में पानी नही कुएं की तली दिखाई देती है। जब अपनी ही जान के लाले पडे हों तो मवेशियों के लिए चारा पानी कहां से लाएं। मराठवाडा की धरती भी प्यासी और लोग भी प्यासे हैं।

पिछले साल मराठवाडा में जलस्तर 18 प्रतिशत था, यानी इस साल के मुकाबले काफी बेहतर। लेकिन, अबकी बार कमी बढ़ गई है। मराठवाडा के जलाशयों में अब केवल 3 प्रतिशत ही पानी रह गया है। बीड, लातूर और ओस्मानाबाद के बांधों में जलस्तर एक फीसदी से भी नीचे जा चुका है। हालांकि पानी पूरी तरह से सूखा नहीं है, सतह पर अभी भी पानी है। एक मंत्री के मुताबिक प्रमुख औद्योगिक इलाके औरंगाबाद में आने वाले कुछ महीनों में पानी बंद हो सकता है। पानी हमारी प्राथमिकता है। अभी औरंगाबाद के लिए जयकवाड़ी डैम में पर्याप्त पानी है, लेकिन इलाके के उद्योगों पर विपरीत असर पड़ सकता है। मराठवाडा में पिछले दो सालों से लगातार सूखा पड़ रहा है। 2014 से इलाके में कम बारिश हो रही है। बांधों में जल स्तर बुरी तरह से गिर गया है। लातूर का हाहाकार भले ही सारे देश को सुनाई दिया हो मगर लातूर के बाकी शहरों की भी पानी के मामले में कोई बहुत बेहतर स्थिति नहीं है।

यह सब देखने पर लगता है कि कोई क्या कर सकता है यह तो विधि के लेख हैं भुगतने ही होंगे। लेकिन इस इलाके के जानकार कहते हैं कि हम विधि को बेकार ही दोष दिए जा रहे हैं। यह विभीषिकी आसमानी नहीं सुल्तानी है। यह विधि निर्मित नहीं मनुष्य निर्मित है। विधि की विडंबना नहीं हमारे विकास मॉडल की शोकांतिका है। पिछले दिनों महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करनेवाले केंद्रिय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने महाराष्ट्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सूखा एक रात में आई हुई आपदा नहीं है, मगर राज्य शिवसेना भाजपा सरकार इसके लिए तैयारी नहीं कर रही थी। उन्होंने कहा कि सरकार को सिंचाई पर ज्यादा जोर देना चाहिए। जब तेलंगाना जैसे छोटे राज्य ने अपने बजट में 25,000 करोड़ रूपये रखे हैं तो महराष्ट्र जैसे बडे राज्य नें केवल 7000 करोड रूपये ही क्यों? गडकरी की बातें तो सही ही हैं खासकर महाराष्ट्र के संदर्भ में तो जहां मराठवाडा और विदर्भ जैसे दो क्षेत्र तो सूखा ग्रस्त रहते ही हैं। लेकिन महाराष्ट्र का अपना सिंचाई का अनुभव कम दर्दनाक नहीं हैं।

महाराष्ट्र देश में सबसे अधिक आधुनिक तीर्थ यानी बांध बनाने वाला राज्य है। जहां 1845 बड़े बांध बने। यहां हम आपको बता दें। 15 मीटर ऊंचे या 600 लाख क्यूसिक मीटर संग्रहण क्षमता वाले बांध को बड़ा बांध कहा जाता है। लेकिन इसके बावजूद महाराष्ट्र के कई इलाके प्यासे है, बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। इसकी वजह यह है कि पहले की सरकारों ने पानी के संसाधनों का इतना अपराधपूर्ण दुरूपयोग किया कि बांध होने के बावजूद भी मराठवाडा जैसे कई इलाके सूखे के शिकार हो रहे हैं। मराठवाडा में तो 90 प्रतिशत क्षेत्र में सिंचाई की कोई सुविधा ही नहीं हैं। दरअसल हुआ यह कि इतनी बडी संख्या में बांध तो बने, लेकिन राजनीतिज्ञों ने बांध बनवाए वहां जहां उनके सहकारी चीनी कारखानें और डेयरी आदि जैसे, व्यावसायिक हित थे न कि वहां जिससे आम किसानों को लाभ हो सके। इसके अलावा क्षेत्रीय संतुलन का भी ख्याल नहीं रखा गया। सिंचाई के अभाव के कारण तो बहुत सारी जमीन कृषि के लिए बेकार हो गई।

गले तक भ्रष्टाचार में डूबे महाराष्ट्र की त्रासदी तब सारे देश के सामने उजागर हो गई, जब महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री अजित पवार का सिंचाई घोटाला उजागर हुआ। उन पर आरोप है कि उनके कार्यकाल में सिचाई परियोजनाओं पर 72,000 करोड़ रूपये खर्च हुए मगर राज्य की सिंचाई की क्षमता में कोई बढोतरी नहीं हुई। सारा पैसा राजनेता डकार गए। इस तरह सिंचाई खेतों की नहीं नेताओं के जेबों की हुई।

यह सही है कि दो वर्षों के दौरान कम बारिश हुई। मराठवाडा जैसे हमेशा ही पानी किल्लत से त्रस्त क्षेत्र में 40 प्रतिशत कम बारिश हुई, लेकिन केवल यही मराठवाडा के अभूतपूर्व  सूखे के संकट की वजह नहीं है।

यदि हम सारे राज्य में हुई बारिश के आंकड़ों पर सरसरी नजर डालें तो बारिश की कमी के कारण सूखा पडने का तर्क हजम नहीं होता। पिछले वर्ष महाराष्ट्र में 1300 एमएम बारिश हुई जो बारिश के राष्ट्रीय औसत 1100 से ज्यादा है। राज्य के कोंकण जैसे इलाकों में तो 3000 एमएम बारिश हुई। मराठवाडा जैसे सूखाग्रस्त इलाके में औसत 882 एमएम बारिश हुई और विदर्भ में 1034 एमएम। इसकी तुलना बहुत सूखे या राजस्थान के रेंगिस्तानी इलाकों से कीजिए, जहां आमतौर पर 400 एमएम से ज्यादा बारिश नहीं होती। ऐसे में राजस्थान के हालात उतने बुरे नहीं हैं जितने महाराष्ट्र के हैं। इसका जवाब केवल इतना ही है कि महाराष्ट्र में जल प्रबंधन के मामले में अपराधपूर्ण लापरवाही की गई। यदि 1958 में महाराष्ट्र बनने के बाद बनी तमाम सरकारों में एक बात कॉमन है तो यह कि सभी ने पानी संग्रहण और भूमिगत जलस्तर को बढाने की अहम समस्याओं की घोर उपेक्षा की ।

महाराष्ट्र के भयावह पानी समस्या की  खलनायक है गन्ने की फसल। इसने महाराष्ट्र का बहुत ही अजीब तरीके से विकास किया गरीबी के महासागर में कुछ समृद्धि के द्वीप खड़े कर दिए हैं, लेकिन इस समृद्धि का खामियाजा बाकी महाराष्ट्र को भुगतना पड़ रहा है। महाराष्ट्र के निर्माण के साथ ही राजनीतिज्ञों की छत्रछाया में सहकारी चीनी मिलों की श्रृंखला पश्चिमी महाराष्ट्र में खड़ी होने लगी थी। धीरे-धीरे यह बीमारी राज्य के बाकी इलाकों में भी फैलने लगी। आज महाराष्ट्र में 205 सहकारी चीनी मिले हैं, इसके अलावा 80 प्राइवेट चीनी मिलें है। ये सहकारी मिले नाम के लिए सहकारी हैं इनमें ज्यादातर पर राजनीतिक दलों और खासकर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेताओं का कब्जा है। जो सत्तारूढ़ होने के कारण राज्य के सत्ता केंद्रों पर हावी रहे हैं। इसलिए वे मनमाना खेल करते रहे हैं। गन्ने के फसल की एक सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह निरंतर पानी पीने वाली फसल है। इसे बारह महीने कई फीट पानी में रखना पड़ता है। इसका अंदाज आप इस तथ्य से लगा सकते है कि राज्य के 4 प्रतिशत कृषि जमीन पर ही गन्ने की फसल होती है मगर उस पर 71 प्रतिशत सिंचित पानी खर्च होता है। यह बात सारी सरकारें जानती थीं तब भी राज्य में चीनी मिलों की संख्या बढ़ती गई जिसे किसी सरकार ने नहीं रोका, क्योंकि ज्यादातर इन मिलों को चलाने वाले राजनेता ही हुआ करते थे। पहले चीनी मिलों पर कांग्रेस का ही कब्जा था मगर बाद में विपक्षी राजनेताओं को भी इसका चस्का लग गया। जो भी नामी राजनेता होता वह अपने राजनीतिक साम्राज्य को मजबूत करने के लिए चीनी मिल जरूर बनवाता। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे की भी चीनी मिलें थीं। पहले मिले केवल पश्चिमी महाराष्ट्र तक ही सीमित थी. फिर मराठवाडा जैसे सूखाग्रस्त इलाके में भी बनने लगीं। यहां अब 70 चीनी मिलें हैं इनमें से 20 तो पिछले तीन चार सालों में ही बनी हैं। इस इलाके में जहां दस प्रतिशत जमीन ही सिंचित है, वहां गन्ने की फसलों की प्यास तो हैंडपंप से ही पूरी की जाती है नतीजतन भूमिगत जलस्तर तली तक पहुंच गया है। कई विशेषज्ञ चेतावनी दे चुके हैं यदि मराठवाडा में विकास के रंग-ढंग नहीं बदले गए तो मराठवाडा अगले दो दशकों में महाराष्ट्र का पहला रेगिस्तान बन जाएगा। वैसे महाराष्ट्र के कई इसी तरह के इलाके हैं। पुणे में 62 चीनी मिलें है मतलब वह पीछे नहीं हैं। पुणे और मराठवाडा में फर्क इतना है कि पुणे में कुछ नदियां है मराठवाडा में वह भी नहीं हैं।

इसलिए मराठवाडा सूखे की मार सहने के लिए अभिशप्त है। यह सूखा आस्मानी कम और सुल्तानी ज्यादा है लेकिन, सुल्तानों की नींद खुलती ही नहीं।

बहुत से जानकार कहते हैं कि भारत और इजराइल के बीच बरसों से बैठके होती रहती हैं मगर हम कभी उससे सूखे की स्थिति से निपटने की सिंचाई तकनीक कभी नहीं सीखते। इजराइल पानी की भारी किल्लत वाला देश है जिसने आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रयोग कर सूखे पर विजय पाई है। भारत को भी सूखे पर विजय पाने के लिए उन तकनीकों का इस्तेमाल करना चाहिए।

 सतीश पेडणेकर

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