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जल के बिना यह भी कोई जीना

जल के बिना यह भी कोई जीना

गर्मियों के बढऩे के साथ पानी की समस्या गंभीर होने लगी है। इस साल गर्मियां जल्दी शुरू हो गईं इसलिए आने वाले मई-जून के दिनों में जब गर्मियां तेज होंगी तो यह संकट और गंभीर हो जाएगा। विडंबना देखिए कि भारत में उपलब्ध पानी करीब 3 खरब घन मीटर है, जो साल के 365 दिनों में 128 करोड़ की आबादी के हिसाब से प्रतिदिन प्रति व्यक्ति करीब 7,000 लीटर बैठता है, वह भी पानी के संकट से बेहाल है। तथ्य यह है कि सतह पर उपलब्ध करीब 90 प्रतिशत पानी बर्बाद हो जाता है, उसका संचय नहीं हो पाता। दूसरी सच्चाई यह है कि महज 5 प्रतिशत अतिरिक्त जल संचय से भारत पानी के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो सकता है।  इस तरह, अगर हम अपने यहां उपलब्ध पानी का 85 प्रतिशत बहा भी दें तब भी भारत के पास अपनी जरूरत के लायक पर्याप्त पानी है। महाराष्ट भी इसी श्रेणी में आता है, जहां साल-दर-साल सूखा तबाही मचा रहा है। समस्या पानी की अनुपलद्ब्रधता नहीं है, बल्कि यह लोगों की नाकाबिलियत, लापरवाही और उदासीनता की है। हर सरकार का सभी लोगों को उनकी जरूरतों के अनुसार पानी मुहैया कराना पहला काम होना चाहिए।

यहां यह जिक्र करना जरूरी है कि विकास के नाम पर हमने अपने जल क्षेत्र को बर्बाद कर लिया है। उद्योग और रीयल स्टेट वाले लगभग समूचा भूमिगत जल सोख ले रहे हैं। लगातार चेतावनियों के बावजूद पानी का आपराधिक दोहन जारी है। इसकी जानकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को नहीं है, ऐसा भी नहीं है। नुकसान इतना हो चुका है कि उसकी भरपाई मुश्किल है। अब सवाल है कि क्या यही असली विकास है? अपने प्राकृतिक संसाधनों को नष्टï करके नौकरियां नहीं लाई जा सकती हैं। रोजगार तो हमारे जंगल, जल स्रोत और पेड़-पौधों की विविधता को विकसित करने और कचरे के कुशल प्रबंधन से ही पैदा होंगे। इस पृष्ठभूमि में देखने पर यह आश्चर्य नहीं होता कि हमारे बांध गर्मियों में सूखे ही रहेंगे। यह सालाना मामला हो गया है। इसलिए पानी की बर्बादी के बदले सरकार को बांधों, झीलों को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए, उनके किनारों को मजबूत करना चाहिए, उनकी जल संग्रहण क्षमता का विस्तार करना चाहिए। संबंधित राज्य सरकारों को भी गर्मियों में अपने जल संसाधनों के सालाना रखरखाव पर जरूर ध्यान देना चाहिए। लेकिन इस मामले में कुछ हरकत बमुश्किल ही दिखती है।

बरसात में पानी की हर बूंद का संचय किया जाना चाहिए और भूमिगत जलस्तर को बनाए रखने के काम लाया जाना चाहिए। बरसात में बहते पानी को इकट्ठा करने के लिए छोटे-छोटे बांध बनाकर स्थानीय ग्रामीणों की पानी की जरूरतों को पूरा किया जाना चाहिए। लातूर जैसे इलाकों में सैकड़ों-हजारों की संक्चया में तालाब और पोखरों का निर्माण करके बरसात के पानी का संचय किया जाना चाहिए, जिससे इलाके में भूगर्भ जल का स्तर भी बढ़ेगा।

आजादी के 60 साल बाद भी हमारे देश में जल संसाधन के संचय की दिशा में काफी कुछ नहीं हुआ है। बरसात ही पानी का मुक्चय स्रोत है और उसे संचय करने का कोई इंतजाम नहीं है। देश में इस दौरान वनों, जलाशयों, पर्वतों का बड़े पैमाने पर विनाश देखा गया है। इससे बरसात का चक्र बिगड़ा है जिससे कई जगह बाढ़ तबाही लाती है, तो कई इलाके सूखे से परेशान हो जाते हैं। यहां यह बताना भी जरूरी है कि वनों के विनाश से सिर्फ बरसात का चक्र ही नहीं बिगड़ा है, बल्कि इससे मिट्टïी की उर्वरता भी घटी है। इससे कृषि उत्पादोंं में गिरावट आई है और गांवों में आमदनी घटी है।

अनियमित और नाकाफी बरसात से साल भर पीने के पानी का संकट बना रहता है और कुछ ऊंचाई वाले इलाके में हरियाली एकदम सूख गई है। लगातार पेड़ों/झाडिय़ों को काटने और घास को चारे के लिए अधिक इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरा शक्ति लगातार घटती जा रही है। किसान भी खेतों की हल्की जुताई करते हैं जिससे यह समस्या और घनी हुई है। गांवों की साझा जमीन और जल स्रोतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। इससे लगातार जल स्रोतों की परिस्थितियां बदल रही हैं। इसे रोकना होगा। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए भी बरसात के पानी के संचय का इंतजाम करना होगा, ताकि कृषि उपज बढ़े।

भले देर हो गई है, फिर भी हमें आत्मनिरीक्षण करना होगा कि हमने लालच, जंगलों में बेरोकटोक घुसपैठ, बिना सोचे-विचारे पेड़ों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण और प्रदूषण से जीवन मात्र के लिए ही संकट पैदा कर लिया है। यहां यह जिक्र किया जा सकता है कि तमिलनाडु की मुक्चयमंत्री जे.जयललिता ने हाल ही के चुनाव के लिए अपने नामांकन पत्र में अपनी संपत्ति का खुलासा 113.7 करोड़ रु. किया है, जबकि उनके धुर प्रतिद्वंद्वी द्रमुक प्रमुख एम. करुणानिधि ने अपनी संपत्ति 63 करोड़ रु. बतई है। देश में ऐसे लाखों लोग हैं जिनकी जेब में अरबों रुपए हैं लेकिन उनमें अधिकांश सामाजिक उत्थान की गतिविधि में कोई रुचि नहीं लेते, ताकि जरूरतमंदों के चेहरों पर भी कुछ मुस्कुराहट आए। उन्हें भी कुछ खाना-पानी मिले। इसलिए आईए इस हालात को बदलने की दिशा में हाथ मिलाएं। परिवार में हर बच्चे को प्राकृतिक हरियाली का महत्व बताया जाना चाहिए। हमें अपने बच्चों को मुश्किल दौर में साधारण जीवन यापन के लाभ को बताना चाहिए।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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