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भय से विजय

भय से विजय

सफलता की सीढ़ी पर चढ़ते हुए कभी-कभी कोई चीज हमें आगे बढऩे से रोकती है और कभी-कभी हमें इतना नीचे घसीट कर ले आती है कि फिर ऊपर उठने की हिम्मत ही नहीं रहती है। मनुष्य को सफल होने के लिए इन सभी चीजों का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। हमें मन में आने वाले भय से खुद को नाकामयाब होने से रोकना चाहिए। भय एक सहज प्रवृत्ति है। किसी के पास यह अधिक होता है तो कोई भयशून्य और निडर होता है। हम मन में भयरूपी एक छोटे से पौधे को रोप देते हैं और यह धीरे-धीरे बढ़ते हुए एक विशाल द्रुम की आकृति ले लेता है। पहले तो हमें यह समझना चाहिए कि हमारे भीतर भय कितना है। क्योंकि, कुछ हद तक भय हमारी सुरक्षा के लिए फलप्रद होता है, लेकिन अधिक भय हमारी सोचने की क्षमता को नष्ट कर देता है। यह बिना युद्ध किये मैदान से भागकर हार स्वीकार करने जैसी बात हो जाती है। कभी-कभी तो अधिक भय मनुष्य की मृत्यु का भी कारण बन जाती है। एक बार नदी में एक नाव डूब गई। नाव में सवार सभी लोगों की मौत हो गई। बाद में यह पता चला कि नदी में जितना पानी था उसमें तो कोई डूब ही नहीं सकता था, क्योंकि पानी ज्यादा गहरा नहीं था। उस पानी में तो कोई भी आराम से खड़ा हो सकता था। लेकिन नाव में सवार सभी लोगों के मन में डूबने का डर था, इसलिए उन्होंने कोशिश नहीं कि और वह डूब गये। उनके भय ने उन्हें नाकामयाब कर दिया। इसलिए हमें जिस चीज से भय लगता है पहले उसका सत्य जान लेना बहुत जरूरी है। यह भी देखा गया है कि सत्य को खोजते हुए भय धीरे-धीरे कम होता जाता है। हम जिस चीज से डरते हैं वह वास्तव में उतनी भयंकर नहीं होती है जितना हम समझते हैं। इसलिए भय से मुक्ती पाने के लिए सर्वप्रथम सत्य को जानना जरूरी है।

भय से मुक्ती पाने के लिए दूसरा रास्ता आत्मविश्वास और धैर्य है। स्वामी शिवानन्द जी ने भय को महामारी से अधिक भयंकर बताया है। महामारी से जितने लोगों के प्राण जाते हैं, उससे कहीं अधिक प्राण महामारी के फैलने के डर से लोगों के चले जाते हैं। आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए हमें पहले भगवान पर विश्वास को बढ़ाना होगा। सतसंग, सतचिंतन द्वारा हमारे भीतर भगवान पर विश्वास पैदा होता है और इस विश्वास से आत्मविश्वास जागृत होता है। हमारे भीतर का यह विश्वास ही है जो हमें आने वाले भय से सामना करने के लिए सक्ष्म बनाता है। एक बार भयभीत करने वाली वस्तु से हम सामना कर लेते हैं तो हमारा आधा भय खत्म हो जाता है।

भय से मुक्ति पाने के लिए एक और रास्ता है। हमें अपने आत्मस्वरूप का ज्ञान होना चाहिए। जैसे की गीता में यह दर्शाया गया है कि आत्मा का स्वरूप होता है। आत्मा का जन्म या मृत्यु नहीं होती। ऐसा सोचकर हम अपने भीतर से मृत्यु के भय को दूर कर सकते हैं। जीवन को ठीक से समझने पर बहुत सी समस्याएं और डर खत्म होने लगते हैं। हम इस क्षण स्थायी दुनिया में जिस चीज से डर रहे हैं, हो सकता है हम कल उसी चीज का सामना कर लेने के बाद निडर हो जायें। इसलिए कुछ चीजों का ध्यान करके हम अगर अपने भीतर के भय पर विजय प्राप्त कर सकेंगे तो हम दुनिया में सिर उठाकर रह पाएंगे।

उपाली अपराजिता रथ

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