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मैं भी तेरी मां हूं बेटे

मैं भी तेरी मां हूं बेटे

मुझको कहते गाय,

दूध पिलाती, तुझे पालती,

बनकर पन्ना घाय।

मुझे पता है इस कलयुग में

बढ़ती कितनी भूख

जल विहीन खेतों पर अंकुर

प्यासे जाते सूख।

तू निर्दोष मनुज है, तुझको

लगी किसी की हाय।

मुझे काटकर भूख मिटाता

तो तेरा क्या दोष,

पाल-पोस कर मैं ही तुझको

दे न सकी संतोष।

शायद तेरे पास नहीं था

कोई और उपाय।

ईंधन, खाद दिया मैंने सब

झेले मिट्टी-रेत,

मेरे सुत ने जुतकर हल में

जोत तेरे खेत

फिर भी तूने मारा मुझको

भूल सभी व्यवसाय।

मानव से दानव बन बैठा

लगा किसी का श्राप,

अनजाने में करता जाता

कैसा भीषण पाप।

अच्छा ही है तेरे हाथों

होती मैं निसकाय।

अपने बेटों के हाथों से

गौ माता कट जाए,

इससे पहले क्यों न स्वयं ही

धरती मां फट जाए।

वह भी रहे न इस दुनिया में

जो मां का पर्याय।

धरती माता, भारत मां

और गंगे का दुख देख

मां की बलि दें बेटे, कैसा

उल्टा विधि का लेख।

एक-एक की बारी अब तो,

कहीं नहीं दो राय।

मां हूं इसीलिए हे भगवन्

मांगू यह वरदान,

मैं मर जाऊं पुत्रों को दे

अक्षय जीवन-दान।

रक्षक हों या भक्षक मेरे,

उनकी टले बलाय।

साभार: प्रणाम कपिला पुस्तक से

 

विजय लक्ष्मी ‘विभा’

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