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फैशन के रंग

फैशन के रंग

भारतीय नारियों में फैशन के रंग और ढंग समय के साथ बदलते रहे। टे्रडिशन और फ्यूजन फंडे ने आज की नारी को 21वीं सदी में नया रूप और आकार देकर एक खास अंदाज में पेश किया है। फैशन ग्लैमरस का ही एक रूप है जो आमतौर पर तड़क-भड़क लाइफ स्टाइल से जोड़कर देखा जाता है। भारतीय कला जगत का अतीत अपनी अनूठी परंपरागत फैशन कला के लिए मशहूर रहा है। चंदेरी, बनारसी, महेश्वरी साडिय़ों के रंग रूप अपने अनूठेपन के लिए जाने जाते हैं। फैशन को आम आदमी से जोडऩे में फिल्म और फिल्मी कलाकारों का विशेष योगदान रहा है। युवाओं में बदलते फैशन के रंग रूप के पीछे फिल्मों का महत्व समझा जा सकता है।

भारतीय फिल्मों में अभिनेत्रियों द्वारा पहनावे और फैशन का अपना ही मुकाम है। सलवार कमीज पंजाब का परिधान होने के बावजूद सारे देश में इसे प्रसिद्धि दिलाने में 1941 की एक फिल्म खजान्वी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लाहौर में बनी इस फिल्म में अभिनेत्री रमोला ने पंजाबी सलवार कमीज पहनी थी। इस फिल्म में उनके इस स्टाइल को इतनी लोकप्रियता मिली कि मीना शौरी, मुमताज, वीणा जैसी अभिनेत्रियों ने भी साड़ी की जगह सलवार कमीज को अपनाया। पहले सभी अभिनेत्रियां साड़ी में पर्दे पर दिखाई देती थी। साड़ी के साथ ब्लाउज का रूप रंग भी फिल्मों के चलते बदला है। फिल्म अभिनेत्री लीला चिटणीस और देविका रानी ने चोली को नया रंगरूप दिया।

फैशन के मामले में सही तौर पर क्रान्ति 50 के दशक में अभिनेत्री नर्गिस ने फिल्म आवारा और बेवफा में स्वमिंग सूट पहनकर शुरू की। जब पहली बार सेट पर आईं तो पूरे सिनेमा जगत में तहलका मच गया। नर्गिस के खाते में  पैंट को फैशन के रूप में अपनाने का श्रेय भी जाता है। उन्होंने ही फैशन के मामले में फिल्म अंदाज से साड़ी ब्लाउज को भी नये रूप में पहनकर नये स्टाइल को जन्म दिया।

अभिनेत्री बेगमपारा, शीला रमानी व नादरा हॉलीवुड ड्रेस डिजाईनरों से बहुत अधिक प्रभावित थीं और उन्होंने उनके बताये टिप्स के अनुसार भारतीय वस्त्रों को नये रंग रूप में प्रस्तुत करने के लिए अपने ड्रेस डिजाइनरों को प्रोत्साहित किया। नादिरा एक कंधे से खुला ब्लाउज उस समय पहनती थी। कोई दूसरी हिरोइन उस वक्त खुला ब्लाउज पहनने की हिम्मत नहीं दिखा पा रही थी।

60 के दशक में वहिदा रहमान और अस्सी के दशक में रेखा ने बंद गले के ब्लाउज पहने। गीताबाली की बांहे बहुत संदुर थी पर वे उन्हें पफ स्लीव्ज में छिपाए रहती थी। सत्तर के दशक में प्रेम कहानी में मुमताज और नब्बे के दशक में 1942-ए-लव स्टोरी में मनीषा कोईराला ने भी पफ स्लीव्ज का ऐसा ही ब्लाउज पहना मधुबाला को तो अपनी अदाओं पर निर्भर रहना पड़ता था, क्योंकि उनकी फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट थी। उन फिल्मों में साड़ी और ब्लाउज बैकग्राउंड में मिल जाते थे। इसलिए ज्यादातर हीरोइनें गहरे रंग के ब्लाउज व हल्के रंग की साड़ी पहनती थी।  मीना कुमारी घाघरे ऐसे पहनती थीं, जिनमें उनकी मोटी कमर छिप जाए।

सत्तर के दशक में शर्मिला टैगोर व रंजीता ने भी ऐसे ही घाघरे पहने। लेकिन हेलन की देहयष्टि इतनी सुंदर थी कि वे स्ट्रैफ्लेस गाउन पहनती थीं। मिनी स्कर्ट भी। लेकिन वे अपना पेट कभी नहीं उघडऩे देती थीं। इसके लिए वे स्किन कलर के महीन कपड़े पहनती थीं। साधना ने फिल्म वक्त तथा पड़ोसन से चूड़ीदार पाजामे का फैशन चलाया, जिसे करिश्मा कपूर ने नब्बे के दशक में राजा हिन्दुस्तानी में फिर से जिंदा किया। बॉबी से डिम्पल कपाडिया ने किशोरियों को नया फैशन दिया। हेमा मालिनी हमेशा साड़ी में ही अच्छी लगीं। तो द बर्निंग टे्रन में चौड़े वेलबाटम को पहन कर स्कूली बालाओं में इस परिधान को पहचान दिलाई हिप्पीबादी फैशन का सूत्रपात इसी फिल्म से हुआ।

फैशन के सारे नियम तोड़ सत्तर के दशक में जीनत अमान ने हरे रामा हरे कृष्णा में पहने लंबे कुंडल और टॉप रातों रात लोकप्रिय हो गए। कुर्बानी से खुलापन फैशन का अंग बना बाद में रवीना टंडन ने नब्बे के दशक में उसे फिर आजमाया। कॉलेज की लड़कियों को फैशन दिया जीनत अमान और नीतू सिंह ने। नब्बे के दशक में यह काम उर्मिला मातोंडकर ने किया। अस्सी के दशक में फिल्मी हरोइनों के फैशन में बहुत बदलाव आए। शुरूआती बोल्डनेस के बाद रेखा ने चाइना सिल्क व शिफॉन की एक से बढ़कर एक इन्द्रधनुषी रंगों की साडिय़ां पहनी। खुले बाल से उन्होंने इन साडिय़ों की छटा और बढ़ा दी। वे भारतीय महिलाओं के पहनावे का प्रतीक बन गई। यह शैली कभी चलन से बाहर नहीं हुई। यही काम बाद में श्रीदेवी ने किया। जयाप्रदा और भानुप्रिया ने भी। उमराव जान की और रेखा की पोशाकें तो किंवदंती है। यही हालत पाकीजा की मीना कुमारी की पोषाकों की थी।

मध्यम युग के लिए किसी किरदार की पोशाक तय करते समय आज भी इन्हीं दो फिल्मों को देखकर डिजाइनर अपना काम चला लेते हैं। टीना मुनीम ने साड़ी के साथ पाश्चातय पहनावों को भी लोकप्रिय किया। स्वीमिंग कॉस्टयूम का प्रचलन मास्टर विनायक ने विलाशी ईश्वर फिल्म नायिका शोभना समर्थ को पहनाकर शुरू किया बाद में शोभना की बेटी नूतन ने दिल्ली का ठग फिल्म में यही ड्रेस पहनी, मुनमुन सेन ने भी इस परिधान को लोकप्रिय बनाया।

नब्बे के दशक में करिश्मा और उर्मिला ने क्रांति कर दी और उन्होंने मिनी स्कर्ट को सहज स्वीकृति दिला दी। अब माताएं अपनी बेटियों के मिनी स्कर्ट पहनने पर रोक नहीं लगाती। लेकिन साड़ी का फैशन कभी खत्म नहीं होगा। मिस्टर इण्डिया में श्रीदेवी, बेटा व हम आपके हैं कौन में माधुरी दीक्षित ने साड़ी ही पहनी थी। हम दिल दे चुके सनम में ऐश्वर्या राय की साडिय़ों की कलात्मकता को भला कोई कैसे भूल सकता है। हालांकि ये साडिय़ां वैजयंती माला और देविका रानी की याद भी दिलाती हैं।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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