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जनसंख्या वृद्धि शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास में बाधक

जनसंख्या वृद्धि  शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास में बाधक

भारत की जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है। किसी एक परिवार को देखकर जनसंख्या बढऩे का पता नहीं लगता, क्योंकि परिवार में सदस्यों की संख्या यदि 4 से 6 हो जाती है तो किसी न किसी तरह घर के बड़े सदस्य दु:खी-सुखी होकर अपनी आय के द्वारा सब सदस्यों के खर्च का प्रबन्ध कर ही लेते हैं। परन्तु जनसंख्या बढऩे का सबसे अधिक प्रभाव सारे देश की सामूहिक अर्थव्यवस्था को देखकर तब महसूस होता है, जब सरकारों के सामाजिक प्रयास बड़ी-बड़ी राशियां खर्च करने के बाद भी दिखाई नहीं देते। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्रियों का भी यही मत है कि जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक उन्नति का परस्पर विरोध ही चलता है। जितनी जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ती है उतना ही आर्थिक पतन होता चला जाता है।

जनसंख्या वृद्धि के प्रभावों पर यदि हम चिंतन प्रारम्भ करें तो हमें साक्षात महसूस होगा कि समाज की बहुतायत समस्याओं का कारण केवल जनसंख्या वृद्धि ही है। देश में अनाज की कमी, पानी की कमी, वायु प्रदूषण की समस्या, तेल और गैस की बढ़ती कीमतें, ईंधन के अन्य साधन, ओजोन परत के द्वारा सूर्य की किरणों में भी प्रदूषण का पैदा होना, जंगलों का कटाव, खेती की भूमि का लगातार कम होना आदि अनेकों समस्याएं केवल जनसंख्या वृद्धि के कारण लगातार भयंकर रूप लेती जा रही हैं। जनसंख्या वृद्धि के कारण ही समाज में भीड़ बढ़ रही है। सरकार और पुलिस का नियंत्रण बढ़ती जनसंख्या के कारण कम होता जाता है। परिणामस्वरूप तरह-तरह के अपराध बढ़ रहे हैं। विडम्बना यह है कि जितने अपराध पुलिस और अदालतों के समक्ष प्रस्तुत होते हैं उससे कहीं अधिक संख्या ऐसे अपराधों की भी होती है जिनके विरुद्ध पुलिस में शिकायते ही नहीं पहुंच पाती हैं। समाज में मानव बढ़ते जा रहे हैं, परन्तु मानवता के लक्षण समाप्त होते जा रहे हैं। जनसंख्या वृद्धि का प्रकोप राजनीति और लोकतंत्र पर भी देखने को मिलता है।

भारत को विश्व का सबसे समृद्ध लोकतंत्र माना जाता है, परन्तु क्या हमारे लोकतंत्र की सफलता केवल समय पर चुनाव कराने के लक्षण तक ही सीमित है? आज के युग में क्या हमारे लोकतंत्र ने किसी भी विषय पर जनता की राय लेकर कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया है? नहीं, क्योंकि इतनी बड़ी जनसंख्या को शामिल करते हुए ऐसी प्रक्रिया सम्भव ही नहीं। जनसंख्या बढऩे के कारण ही लाचार अर्थव्यवस्था में प्रत्येक वस्तु की कीमतें बढ़ती जा रही हैं। गांवों और खेती में लोगों की रुचि समाप्त होने का कारण भी जनसंख्या ही है। एक सीमित भूमि पर घर के दो व्यक्ति कृषि का काम करें तो भी उतनी कमाई और चार व्यक्ति काम करें तो भी उतनी ही कमाई। इसलिए हर परिवार यह सोचता है कि दो व्यक्तियों को शहर किसी नये रोजगार के लिए क्यों न भेज दिया जाये। परिणामत: खेती तो लगातार कमजोर होती जा रही है और शहरों में रोजगार बनाम बेरोजगार का द्वन्द्व तेज होता जा रहा है। शहर की जनसंख्या बढऩे के कारण वाहनों की संख्या भी बढ़ रही है। गाडिय़ों के सम-विषम नम्बरों के आधार पर अलग-अलग दिन चलने का नियम बनाकर नये-नये प्रयोग किये जा रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या के कारण बहुमंजिला इमारतों का प्रचलन तेज होता जा रहा है। हर व्यक्ति जानता है कि बहुमंजिला इमारतें सदैव खतरे का घर बनी रहती हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की विभिन्न संस्थाएं जब शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों और बच्चों का अनुपात निर्धारित करती हैं तो हमारी सरकारें उस अनुपात का पालन नहीं कर पातीं, क्योंकि अधिक जनसंख्या के कारण एक कक्षा में अधिक बच्चों को प्रविष्ट करना पड़ता है। इसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यदि रोगियों की एक निर्धारित संख्या पर एक डॉक्टर के अनुपात का निर्देश जारी होता है तो जनसंख्या वृद्धि के कारण हम उसका भी पालन नहीं कर पाते जिसके परिणामस्वरूप भारी संख्या में रोगियों को जांचने की जिम्मेदारी एक-एक चिकित्सक पर आ जाती है। इसी प्रकार पुलिस की संख्या और नागरिकों की संख्या के अन्तर्राष्ट्रीय अनुपात का भी हम अनुसरण नहीं कर पाते। यही हालत न्यायाधीशों और जनसंख्या अनुपात पर भी देखने को मिलती है जिसके कारण सारे देश में लम्बित मुकदमों की संख्या प्रतिवर्ष लगातार बढ़ती चली जाती है। जनसंख्या वृद्धि के कारण ही हम सामाजिक और आर्थिक अपराधों के निवारण की भी कोई योजना लागू नहीं कर पाते। हमारे देश में बढ़ती बेरोजगारी तो सीधे ही जनसंख्या वृद्धि के साथ जुड़ी हुई समस्या है। आज यदि किसी एक पद का विज्ञापन निकलता है तो उस एक पद पर नौकरी चाहने वाले प्रार्थी कई हजारों की संख्या में होते हैं। यहां तक कि उच्च शिक्षा प्राप्त युवक एक सामान्य क्लर्क और यहां तक कि चपरासी के पद तक के लिए आवेदन देने को मजबूर होते हैं।

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हमारे इस लेख का प्रमुख चिंतन इस प्रश्न पर है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए कौन क्या कर सकता है? संयुक्त राष्ट्र संघ स्वयं सारे संसार की जनसंख्या वृद्धि को लेकर चिन्तित है। मैंने संसद में स्वास्थ्य मंत्रालय के समक्ष इस सम्बन्ध में एक प्रश्न प्रस्तुत किया कि संयुक्त राष्ट्र संघ भारत को जनसंख्या नियंत्रण के लिए कितनी सहायता देता है और उस सहायता से क्या कार्य किये जाते हैं और उनका क्या परिणाम निकला है। यदि यह परिणाम संतोषजनक नहीं है तो भारत सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाने की योजना बना सकती है? मेरे इस प्रश्न के उत्तर में स्वास्थ्य मंत्री जे.पी.नड्डा जी ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने विगत चार वर्षों के दौरान लगभग 1 करोड़ 65 लाख डॉलर की राशि जनसंख्या नियंत्रण के प्रचार तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी सहायता के लिए भारत सरकार को दी है। सरकार के अनुसार इस सहायता कार्य के संतोषजनक परिणाम निकले हैं। 1991 से 2001 के दशक में जनसंख्या वृद्धि 21.5 प्रतिशत थी जो 2001 से 2011 के दशक में घटकर 17.7 प्रतिशत पर आ गई है। भारत सरकार जनसंख्या नियंत्रण के लिए कई उपाय कर रही है, जिन्हें सारे देश में स्वास्थ्य कल्याण केन्द्रों के माध्यम से गांव-गांव तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। ‘आशाÓ नामक योजना के  माध्यम से विवाह के बाद दो वर्ष तक बच्चा न होने पर दम्पत्ति को कुछ प्रोत्साहन राशि दी जाती है। दो बच्चों के बीच में तीन वर्ष का अन्तर रखने वाले दम्पत्ति को भी यही प्रोत्साहन राशि दी जाती है। दो बच्चों के बाद स्थाई रूप से गर्भ निरोधक उपाय करने वाले दम्पत्ति को कुछ अधिक प्रोत्साहन राशि दी जाती है। परिवार नियोजन 2020 का लक्ष्य राष्ट्रीय स्तर पर सभी राज्यों के लिए निर्धारित किया गया है।

कई देशों ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के उपाय किये हैं। जैसे चीन और वियतनाम में किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता केवल पहले दो बच्चों तक ही सीमित रहती है। ईरान सरकार ने भी परिवार नियोजन को अपनी राष्ट्रीय नीति बनाया हुआ है। सरकार ने अपने प्रचार कार्यक्रमों में यह स्पष्ट किया कि इस्लाम दो बच्चों के परिवार का समर्थन करता है। ईरान सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की औषधियां तथा अन्य गर्भ निरोधक वस्तुएं जनता में बांटनी प्रारम्भ की। हालांकि 2006 में सत्ता परिवर्तन के बाद इन नीतियों को शिथिल कर दिया गया।

जनसंख्या वृद्धि से ही जुड़ी कुछ अन्य व्यक्तिगत और पारिवारिक समस्याएं भी काफी भयावह होती है। विशेष रूप से अधिक बच्चे पैदा करने वाली स्त्रियों का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता चला जाता है। गर्भाधान के दौरान या बच्चे को जन्म देते समय प्रतिवर्ष लाखों स्त्रियां दम तोडऩे के लिए मजबूर हो जाती हैं, क्योंकि बार-बार गर्भधारण करने से उनका शरीर लगातार कमजोर होता चला जाता है। 18 वर्ष से पूर्व विवाह होने पर तो गर्भाधान के कारण मृत्यु की सम्भावनाएं और अधिक हो जाती हैं। ऐसी अवस्था में तो बच्चों का स्वास्थ्य और अधिक संख्या में मृत्यु भी विशेष चिंता का विषय है। इसी प्रकार 40 वर्ष की अवस्था के बाद भी गर्भाधान के यही खतरे स्त्रियों के सिर पर मंडराते हैं। इसलिए बार-बार गर्भधारण न करने के प्रति परिवारों के पुरुषों को भी जागरूक किया जाना चाहिए। सरकार के स्वास्थ्य रक्षा प्रयास बहुतायत स्थानीय केन्द्रों के माध्यम से महिलाओं तक ही अपनी पहुंच बना पाते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय को इस जनसंख्या नियंत्रण के अभियान की सफलता के लिए स्वास्थ्य केन्द्रों के साथ-साथ पंचायतों को जोडऩे की विशेष पहल करनी चाहिए जिससे पुरुष वर्ग को खासतौर पर जनसंख्या नियंत्रण के लिए जागरूक किया जा सके। यदि सरकार अधिक बच्चे पैदा करने की समस्या को मां और बच्चे के स्वास्थ्य से जोड़कर पंचायतों के माध्यम से प्रचार योजना के अन्तर्गत लाये तो अवश्य ही जनसंख्या नियंत्रण में तेज गति से सफलता प्राप्त होगी। सरकारों के साथ-साथ भारत के समग्र समाज को एक समान रूप से अब एक विचार-मंथन करना चाहिए कि यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, चहुंमुखी विकास तथा सुख-शांति और समृद्धि चाहिए, तो जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण के लिए सब वर्गों को सामूहिक प्रयास करने ही पड़ेंगे।

अविनाश राय खन्ना

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के उपाध्यक्ष हैं)

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