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वीरगाथा ने पिरोई देशभक्ति की गाथायें वह भारत को सुरक्षित व स्मृद्ध छोड़ गये अपनी शहादत से

वीरगाथा ने पिरोई देशभक्ति की गाथायें  वह भारत को सुरक्षित व स्मृद्ध छोड़ गये अपनी शहादत से

आज ”भारत की बर्बादी’’ और ”पाकिस्तान जिंदाबाद’’ के नारे ऊंचा करने वालों, राष्ट्रगान के समय खड़े न होने वालों और ”भारत माता की जय’’ बोलने से इंकार करने वालों को हमारे सैक्युलर-उदारवादी बड़े-बड़े नेता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के ढोंग पर उनकी पीठ ठोंक कर उन्हें हीरो बना रहे हैं। ऐसे समय में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की दो इकाइयों-राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद ने अंग्रेजी में वीर गाथा और राष्ट्रीय बुक ट्रस्ट ने हमारे उन वीर सैनिकों की बहादुरी की गाथाओं के किस्से प्रकाशित किये हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न युद्धों में दुश्मन के दांत खट्टे कर दिखाये और राष्ट्र ने उनके इस महान बलिदान व बहादुरी के लिये उन्हें युद्ध के समय के सब से महान अलंकार परमवीर चक्र से सम्मानित कर अपने आपको गौरवान्वित महसूस किया। दोनों प्रकाशनों से इन वीरों की बहादुरी के रौंगटे खड़े कर देने वाले कारनामों से हमारे विद्यार्थियों व युवकों के मन में उनके प्रति श्रद्धा उपजेगी और उन पर गर्व होगा। उनके जीवन, बहादुरी व बलिदान से बच्चों के मन में भी राष्ट्र के प्रति कुछ करने की इच्छा जागेगी।

इस सफल प्रयास के पीछे प्रेरणा है मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1947-48, 1965, 1971 व 1999 में पाकिस्तान के साथ व 1962 में चीन के साथ युद्धों में, 1960-64 में कांगो व 1987-90 में श्रीलंका में शांति प्रक्रिया में भाग लेने वाले अब तक 21 वीर सेनानियों को परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया है। इनमें से एक परमवीर चक्र वायुसेना के फलाइंग ऑफिसर को 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय दिया गया था। बाकी सभी थलसेना के हिस्से गये।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की दूसरी इकाई ‘राष्ट्रीय बुक ट्रस्ट’ ने अलग-अलग पुस्तिका को प्रत्येक परमवीर चक्र प्राप्त बहादुर को समर्पित कर उसकी जीवनकथा को चित्रकथा के रूप में प्रस्तुत किया है। इसमें उनके जीवन व गौरव गाथा का बड़े सुंदर व रोचक ढंग से चित्रण किया गया है। यह बच्चों व युवकों की जिज्ञासा भी बढ़ायेगा और उन्हें एक सकारात्मक संदेश व प्रेरणा भी देगा।

वर्तमान माहौल में हमारे युवकों व विद्यार्थियों के मन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार द्वारा राष्ट्रीयता व देशभक्ति की भावना उजागर कर देने में इन दोनों ही प्रकाशनों के बहुत कारगर सिद्ध होने की आशा है।

परमवीर चक्र युद्ध के समय का सबसे उत्कृष्ट शूरवीर पुरस्कार है जो जल, थल, वायुसेना में दुश्मन का मुकाबला करते हुये अदम्य  साहस दिखाने व देश के लिये अपनी जान न्यौछावर करने वाले महान सैनिकों को दिया जाता है। इसकी स्थापना गणतंत्र दिवस 26 जनवरी, 1950 को की गई थी और 15 अगस्ता, 1947 को देश को स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से इसे लागू किया गया था।

वीर गाथा में अब तक परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले सभी 21 शूरवीरों के जीवन व उनकी बहादुरी के कारनामों का शब्दों में गुणगान किया गया है।

परमवीर चक्र के प्रथम विजेता थे मेजर सोमनाथ शर्मा जिन्हें 1947-48 के कश्मीर युद्ध का नायक माना जाता है। उन्होंने अपने एक ऑफिसर व 20 जवानों के साथ पाकिस्तान की सेना को श्रीनगर हवाई अड्डे पर कब्जा करने से तब तक रोके रखा था, जब तक कि सहायता के लिये भारत के और जवान व सामग्री नहीं पहुंची। वह तब भी डटे रहे जब दुश्मान केवल 50 गज की दूरी तक पहुंच चुका था। सेना प्रमुख कार्यालय को उन्होंने अपने अंतिम संदेश में लिखा: ”दुश्मन के सामने हम संख्या में बहुत कम हैं। हम पर दुश्मन विध्वंसक गोलाबारी कर रहा है। मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अन्तिम गोली तक लड़ता रहूंगा।’’ उनके ये शब्द अब सेना के लिये एक आदर्श मार्गदर्शन बन चुके हैं। उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित करते समय सरकार ने अपने प्रशस्ति पत्र में लिखा: ”उन्होंने साहस व उत्कृष्टता का इतना बड़ा दृष्टांत प्रस्तुत किया है जो भारतीय सेना के इतिहास में शायद ही कभी देखने को मिला है’’।

वीर गाथा में इन सभी महान सपूतों को परमवीर चक्र से सम्मानित करते समय पढ़े गये प्रशस्ति उल्लेखों को उद्धघृत किया गया है जिसमें उनकी वीरता के किस्से कहे गये हैं। उसमें इन वीरों के सम्मान में डाक विभाग द्वारा डाक टिकट जारी किये जाने का चित्र सहित ब्यौरा भी दिया गया है।

अपने साथियों के मन में वीरता की चिंगारी सुलगाते हुये लॅास नायक कर्म सिंह अपनी ठेठ पंजाबी में कहते हैं: ”जदों असीं इत्थे जान दे दांगे तां साड्डी कीमत वद जावेगी’’ (जब हम यहां अपनी कुर्बानी दे देंगे तो हमारी कीमत बढ़ जायेगी)।

कंपनी क्वार्टर मास्टर हवल्दार अब्दुल हमीद ने 1965 के युद्ध में खेमकरन सैक्टर में अपनी रिकौयललैस बंदूक के साथ ही अमेरीका में निर्मित व तब तक जीवित माने जाने वाले 7 पैट्टन टैंकों की वहां कब्र बना दी थी। वह दुश्मनों से तब तक लड़ते रहे, जब तक कि एक गोले ने उन्हें आहत नहीं कर दिया।

फलाईंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों ने अपनी कमान को संदेश भेजा कि वह दो पाकिस्तानी हवाई लड़ाकू सेबरज जहाजों का पीछा कर रहे हैं और उन्हें बचकर भागने नहीं देंगे।

22-05-2016

अपने पिता ब्रिगेडियर खेत्रपाल को युद्धक्षेत्र से अपनी कुर्बानी के पांच दिन पूर्व अपने हाथ से लिखे एक पत्र में कैप्टन अरूण खेत्रपाल ने लिखा: ”मैं यहां मजे में हूं’’। जब उनके टैंक का एक भाग क्षतिग्रस्त हो गया और उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें आदेश दिया कि वह टेंक छोड़ कर अपनी रक्षा करें तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से यह आदेश न मानते हुये कहा: ”नहीं सर, मैं टैंक नहीं छोड़ूंगा। मेरी बंदूक अभी काम कर रही है और मैं उन्हें (दुश्मनों को) नहीं छोड़ूंगा’’।

लैफ्टिनेंट मनोज कुमार पाण्डेय की अदम्य जोश की झलक उनकी डायरी के उस पन्ने से मिली जिसमें उन्होंने अंग्रजी में लिखा था If death strikes before I prove my blood, I promise (swear) I will kill death’’ (अपना खून साबित कर पाने से पहले यदि मौत मेरे पास आई तो मैं वादा करता हूं (कसम खाता हूं ) मैं मौत को ही मार कर रख दूंगा)।

कारगिल युद्ध में परमवीर चक्र पाने वाले योद्धा ग्रेनेडियर योगिंद्र सिंह यादव भारत के इतिहास के अब तक के सब से कम उम्र वाले योद्धा हैं। उनका जन्म 10 मई 1980 को हुआ था और 19 वर्षं की आयु में ही उन्होंने 3-4 जुलाई 1999 की रात को वीरगति प्राप्त) कर ली।

भारत के इन सभी महान सपूतों के रोंगटे खड़े कर देने वाले कारनामें वर्तमान पीढ़ी के लिये ही नहीं बल्कि, पूरे देश को एक ही संदेश छोड़ गये हैं- हम से पहले कर्तव्य, देश पहले हम बाद में। उनकी महान कुर्बानियां अंग्रेजी के महान कवि लॉर्ड टेनीसन की उन पंक्तियों की याद दिलाती हैं, जिसमें उन्होंने लिखा कि देश के लिये कुछ करते समय कोई तर्क-वितर्क, अगर-मगर नहीं होता। तब तो मौका होता है बस करो या मरो का।

अम्बा चरण वशिष्ठ

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