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जिन्ना की तोप में कम्युनिस्टों का बारूद

जिन्ना की तोप में कम्युनिस्टों का बारूद

बेशक मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लीम लीग भारत विभाजन की कहानी के अहम किरदार थे, जिन्होंने पाकिस्तान की मांग को उसकी चरम परिणति तक पहुंचाया। लेकिन इतिहास के इस दुखद मोड़ में दूसरा दिलचस्प पेच भी है जिसे वक्त  के थपेड़ों में लोग शायद भुला चुके हैं। मुस्लिम लीग तो सांप्रदायिक थी ही, मगर सांप्रदायिकता के विरोध की रहनुमाई करने वाली घोर सेक्युलर कम्युनिस्ट पार्टी ने भी पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया था। सांप्रदायिक वैमनस्य और भारी उथल-पुथल के उस दौर में कम्युनिस्ट पार्टी एक अजीब सिद्धांत लेकर आई थी। इसके मुताबिक भारत एक राष्ट्र नहीं, कई राष्ट्रीयताओं का समुच्चय है। इसलिए हर राष्ट्रीयता को आत्मनिर्णय का अधिकार मिलना चाहिए। इसके जरिए उसने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की सांप्रदायिक और अलगाववादी मांग को जायज ठहराने की कोशिश की।

इतना ही नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी ने मुस्लिम लीग को मजबूत बनाने के लिए अपने सारे मुस्लिम कार्यकर्ताओं को उसमें शामिल होने का निर्देश भी दिया था। मुस्लिम लीग ने 1940 के बाद पाकिस्तान की मांग को पुरजोर तरीके से उठाना शुरू किया था तभी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता गंगाधर अधिकारी ‘पाकिस्तान और राष्ट्रीय एकता’ की अपनी थीसिस लेकर आए थे। इसमें हर राष्ट्रीयता को आत्मनिर्णय का अधिकार देने के आधार पर पाकिस्तान की मांग की हिमायत की गई थी। 19 सितंबर 1942 को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की पूर्ण बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया। यह प्रस्ताव ही बाद में ‘ऑन पाकिस्तान एंड नेशनल यूनिटी’ शीर्षक से भी प्रकाशित हुआ।

इस प्रस्ताव में राष्ट्रीयताओं की परिभाषा करते हुए कहा गया था, ‘भारतीय जनता के हर वर्ग जिसके पास होमलैंड के तौर पर एक क्षेत्र, सामूहिक ऐतिहासिक परंपरा, सामूहिक भाषा, संस्कृति, एक मनोवैज्ञानिक संरचना और सामूहिक आर्थिक जीवन है, उन्हें एक अलग राष्ट्रीयता माना जाएगा। उन्हें भारतीय संघ या महासंघ में एक स्वायत्त राज्य के रूप में अस्तित्व में रहने और अगर उनकी इच्छा हो तो अलग होने का अधिकार होगा।’ इस सिलसिले में पठान, पश्चिमी पंजाबी (जहां मुस्लिमों का वर्चस्व था), सिक्ख, सिंधी, हिंदुस्तानी, राजस्थानी, गुजराती, बंगाली, असमी, बिहारी, उडिय़ा, आंध्र, तमिल, कर्नाटकी, महाराष्ट्रीयन और मलयाली का राष्ट्रीयताओं के तौर पर जिक्र किया गया था। राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के इस सिद्धांत के आधार पर पाकिस्तान की मांग की भी हिमायत की गई थी।

प्रस्ताव में कहा गया था : इन अधिकारों की घोषणा ऊपर परिभाषित प्रत्येक राष्ट्रीयता के लिए होगी, इसलिए मुस्लिम धर्म वाली राष्ट्रीयताओं को स्वायत्तशासी राज्य के रूप में रहने और अलग होने का अधिकार होगा। यह घोषणा राष्ट्रीय कांग्रेस और लीग के बीच एकता का आधार हो सकती है। इसके तहत मुस्लिमों को उनके होमलैंड में जहां उनका भारी बहुमत है, उनका एक स्वायत्तशासी राज्य बनाने और अगर वे चाहें तो अलग होने का अधिकार होगा। बंगाल के पूर्वी और उत्तरी जिलों के बंगाली मुसलमान जो वहां भारी बहुमत में हैं, वे चाहें तो अपने को स्वायत्तशासी क्षेत्र ‘बंगाल राज्य’ या स्वतंत्र राज्य बना सकते हैं। यह घोषणा पाकिस्तान की मांग के न्यायपूर्ण स्वामित्व को मानती है और इसका भारत को धर्म के आधार पर दो हिस्सों में बांटने के अलगाववादी सिद्धांत से कोई लेना-देना नहीं है।

हालांकि, इसके बाद यह भी कहा कि अलग होने के इस अधार को मान्यता देने से जरूरी नहीं कि असल में अलगाव पैदा हो। इसकी बजाय आपसी संदेह के दूर होने से एकता आएगी जो कल के स्वतंत्र भारत में बृहत्तर एकता का आधार बन सकती है। जाहिर है कि मुसलिम बहुल राज्यों को आत्मनिर्णय के नाम पर अलग होने का अधिकार देकर पाकिस्तान की मांग का समर्थन करना ठीक वैसा ही था जैसे सीधे नहीं, हाथ को घुमा कर नाक पकड़ी जाए।

सुप्रसिद्ध नववामपंथी चिंतक तारिक अली ने भाकपा के आत्मनिर्णय वाले प्रस्ताव पर टिप्पणी की है कि ‘भाकपा के पाकिस्तान और नेशनल यूनिटी’ पैंफ्लेट में लेनिन के राष्ट्रीयता संबंधी विचारों का घटिया विकृतिकरण है। इसमें भाकपा के सिद्धांतकारों ने धर्म का राष्ट्रीयता के साथ घालमेल कर दिया और अंत में वे एक ऐसा मिश्रण लेकर आए जिसमें सभी राष्ट्रीयताओं के अहम निर्णय की वकालत की गई थी।

भाकपा के प्रस्ताव की एक उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें सिक्खों को भी एक राष्ट्रीयता माना गया है। सिक्खों को अलग राष्ट्रीयता मानना उस समय कुछ सिक्ख संगठनों द्वारा उठाई जा रही अलग सिक्ख राष्ट्र की मांग का सैद्धांतिक समर्थन ही था। सिक्खों को भी अलग राष्ट्रीयता इस बात की परिचायक थी कि कम्युनिस्ट पार्टी धर्म को भी अलग राष्ट्रीयता का आदार मानने लगी थी। अन्यथा वह सिक्ख और पंजाब को दो अलग राष्ट्रीयता नहीं मानती।

22-05-2016

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की एक दारुण शोकांतिका यह रही है कि उसकी डोर हमेशा कम्युनिस्ट इंटरनेशनल का प्रकारांतर से सोवियत संघ के नेताओं के हाथ में रही। इसलिए ज्यादातर महत्वपूर्ण फैसले मास्को में लिए जाते रहे। दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत में कम्युनिस्ट पार्टी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष का दम भरती रही। तभी अंतर्राष्ट्रीय स्थिति ने पलटी खाई। अब सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हिटलर ने सोवियत संघ पर भी हमला कर दिया। इसके साथ ही कम्युनिस्ट इंटरनेशनल या सोवियत नेताओं के इशारे पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी अपना रंग बदला। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष की बजाय अब उसके लिए हिटलर के फासिज्म के खिलाफ संघर्ष और उसके लिए अंग्रेजों के साथ सहयोग ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया। पार्टी के रवैये में आए परिवर्तन के बाद कम्युनिस्ट नेता जेलों से रिहा कर दिए गए, क्योंकि वे अंग्रेज सरकार के युद्ध: प्रयासों में मदद करने को तैयार हो गए थे।

इसके बाद सार्वजनिक तौर पर कम्युनिस्ट भले ही साम्राज्यवाद विरोधी तेवर अपनाते रहे, मगर उनकी रणनीति यह थी कि कांग्रेस अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष को स्थगित कर दे और उनके युद्ध-प्रयासों में मदद करे। इसी नीति के तहत उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का भी विरोध किया। दरअसल, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने भाकपा पर यह नीति थोप कर उससे साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन की अगुवाई करने का सुनहरा अवसर छीन लिया था। तब भाकपा साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन की अगुवा बन कर उभर सकती थी, क्योंकि कांग्रेस के सारे नेता जेल में थे।

लेकिन, विडंबना यह रही कि कांग्रेस के नेता तो जेलों में रह कर भी आंदोलन वापस लेने से इंकार करते रहे। मगर कम्युनिस्ट जेलों के बाहर थे और कांग्रेस की हरसंभव मदद कर रहे थे। इस संदर्भ में उन्होंने कांग्रेस-लीग की एकता और अंग्रेजों के युद्ध प्रयासों में मदद की वकालत करना शुरू किया। लेकिन कांग्रेस-लीग की एकता तब तक संभव नहीं थी जब तक लीग की पाकिस्तान की मांग को नहीं मान लिया जाता। इसलिए राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के अधिकार के जरिए पाकिस्तान की मांग को सही साबित करने की कोशिश की गई। वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता सज्जाद जहीर ने ‘अ केस फॉर कांग्रेस-लीग यूनिटी’ (पीपुल्स पब्लिशिंग हाऊस, 1944)में पाकिस्तान की मांग को ‘भारत के मुसलमानों में पैदा हुई राजनीतिक चेतना की तार्किक परिणति’ बताया था।

अंग्रेजों के युद्ध प्रयासों में मदद के लिए कम्युनिस्ट कांग्रेस-लीग एकता की हिमायत कर रहे थे और इसे हासिल करने के लिए मुसलिम लीग की उस मांग का समर्थन कर रहे थे जो दिनोंदिन ज्यादा अलगाववादी होती जा रही थी। कम्युनिस्टों ने कभी मुसलिम लीग की आलोचना नहीं की। वे तब भी मूकदर्शक बने रहे जब 1944 में गांधी-जिन्ना वार्ता टूट गई, क्योंकि गांधी को जिन्ना की पाकिस्तान की मांग मंजूर नहीं थी। उस समय भाकपा के महासचिव पीसी जोशी ने तो काफी दिलचस्प टिप्पणी की थी कि, ‘गांधी जिन्ना की मांग के पीछे खड़ी आजादी को देख नहीं पा रहे हैं।’

पाकिस्तान की मांग को वैधता प्रदान करने में भाकपा की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कम्युनिस्टों के ही एक हमसफर और जाने-माने लेखक अब्बास ने कहा था – भारत भाकपा की वजह से मारा गया जिसने मुसलिम अलगाववादियों की पाकिस्तान की तर्कहीन और राष्ट्रविरोधी मांग को वैचारिक आधार प्रदान किया। होमलैंड, राष्ट्रीयताएं, आत्मनिर्णय आदि वह बारूद था जो कम्युनिस्टों ने पाकिस्तान की सेना को सप्लाई किया था।

‘सेमिनार’ के पूर्व संपादक रमेश थापर की पत्नी राज थापर ने कम्युनिस्टों की पाकिस्तान की मांग के समर्थन और उसे बौद्धिक आधार प्रदान करने की कोशिशों पर टिप्पणी करते हुए अपनी आत्मकथा ‘ऑल दीज इयर्स’ में लिखा है, ‘वे विभाजन पूर्व भारत के दिन थे। महात्मा गांधी और कांग्रेस पार्टी देश को दो धार्मिक इकाइयों में बांटने के विचार को भगाने की कोशिश कर रहे थे जिसके लिए जिन्ना का तर्क था -मुसलमानों के लिए आत्मनिर्णय। मुझे इस बात पर दुख था कि जिन्ना देश को खतरनाक मोड़ पर ले आए थे।’

राज थापर आगे लिखती हैं, ‘जब मोहन (मोहन कुमार मंगलम) जो समर्पित और कम्युनिस्ट था, इस शब्दावली के पक्ष में दिन-रात दलीलें देता था, मेरा मन करता था कि उस पर और अन्य लोगों पर चीजें फेंक मारूं जो यह समझने को तैयार नहीं थे कि आत्मनिर्णय धर्म पर आधारित नहीं हो सकता। संस्कृति और धर्म पर्यायवाची नहीं हैं। क्या वे राजनीति और सामाजिक संरचना के एक सामान्य तथ्य को भूल गए थे? पंजाबी होने के मायने समझाते हुए मेरे जबड़े दर्द करने लगे थे। पंजाबी होने का मतलब है हिंदू, सिक्ख और मुसलमानों की साझी भाषा संस्कृति। मुझे आज तक नहीं समझ आया कि पाकिस्तान के कम्युनिस्ट-समर्थन के पीछे क्या वजह थी? किन निहित स्वार्थों के वशीभूत उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं और उनकी ऊर्जा को हमारे राष्ट्र-जीवन की सबसे प्रतिक्रियावादी प्रवृत्ति की मदद करने को मजबूर किया।’

कम्युनिस्ट पार्टी ने विभाजन पूर्व के दौर में सबसे अजीब फैसला तो यह किया कि अपने मुस्लिम सदस्यों को लीग में शामिल होने का निर्देश दिया। इन मुसलिम कामरेडों से कहा गया था कि वे पाकिस्तान की नई राष्ट्रीयता को मजबूत बनाने में सक्रिय भूमिका निभाएं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कम्युनिस्ट पार्टी के छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टुडेंटस फेडरेशन का मुस्लिम लीग के छात्र संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम स्टुडेंटस फेडरेशन में विलय हो गया था। हम्जा अल्वी जो स्वयं कम्युनिस्ट थे, ने लिखा है, ‘एआईएसएफ को भंग करने के आदेश ऊपर से आए थे और सदस्यों को निर्देश दिया गया था कि ऑल इंडिया मुस्लिम स्टुडेंटस फेडरेशन में शामिल हों। पंजाब में डैनियल लतीफी को बुला कर राज्य मुस्लिम लीग का ऑफिस सेक्रेटरी बनने को कहा गया था।’ इस तरह कम्युनिस्ट पार्टी के कई कामरेड देखते-देखते मुस्लिम लीग में स्थानीय स्तर पर नेता बन गए।

तारिक अली ने अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान-मिलिट्री रूल ऑर पीपुल्स पावर’ में कम्युनिस्टों के इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि, कम्युनिस्ट पार्टी के मुस्लिम कैडर में से बहुत से लोगों ने लीग को अपने घर जैसा महसूस किया। उनकी वर्गीय पृष्ठभूमि ने उनके जुड़ाव को बढ़ाया। इन ‘उग्रवादियों’ में से कई कभी भी लीग से वापिस लौट कर नहीं आए। भाकपा ने लीग के सामंती जमीदारों के मुकाबले बुर्जुआ खेमे को मजबूत बनाने के लिए लीग में घुसपैठ की थी। यह योजना स्तालिन के दो चरणों में क्रांति के सिद्धांत के अनुकूल थी। मगर उन्हें अपने सर्वोत्तम कैडर को खोना पड़ा। इसका भाकपा के भीतर विरोध भी हुआ, मगर उसे तुरंत दबा दिया गया और उन्हें कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की सलाह से अवगत करा दिया।

इतिहासकार मुशीरुल हसन कम्युनिस्टों की मुसलिम लीग में घुसपैठ को दूसरे नजरिए से देखते हैं – भाकपा के आंदोलन में सबसे बड़ी बाधा कांग्रेस थी इस राष्ट्रवादी पार्टी का स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शक्तिशाली जनाधार था। भाकपा कांग्रेस को भारतीय राष्ट्रीय बुर्जुआ पार्टी मानती थी। भाकपा ने अपने मुस्लिम सदस्यों की मुस्लिम लीग में घुसपैठ कराई ताकि, छोटी बुर्जुआ पार्टी की मदद कर बड़ी बुर्जुआ पार्टी कांग्रेस को कमजोर बनाया जा सके।

कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति क्या थी इस बारे में मतभेद हो सकते हैं, मगर यह एक सच्चाई है कि कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया था और इसके साथ इस अलगाववादी मांग को उठानेवाली घोर सांप्रदायिक मुस्लिम लीग को मजबूर करने की पूरी कोशिश की। मगर इतिहास की विडंबना यह है कि पाकिस्तान बनने के बाद मुस्लिम लीग ने वहां कम्युनिस्टों का कठोरता से दमन किया, उन्हें कभी पनपने नहीं दिया। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान में कम्युनिस्ट आंदोलन को फैलाने के लिए अपने दो वरिष्ठ नेताओं डॉ. अशरफ और सज्जाद जहीर को पाकिस्तान भेजा, मगर उन्हें पाकिस्तान पहुंचते ही गिरफ्तार कर लिया गया। दस साल जेल में रहने के बाद जब उन्हें रिहा किया गया तो उन्होंने भारत लौटने में ही अपनी खैर मानी।

सतीश पेडणेकर

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