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सूरत कपड़ा उद्योग मंदी से बेहाल

सूरत कपड़ा उद्योग  मंदी से बेहाल

पिछले 2-3 महीनों से सूरत का कपड़ा उद्योग मंदी के दौर से गुजर रहा है। ऐसे बहुत से पावर लूम यूनिटस हैं, जिन्होंने अपना प्रोडक्शन 50 प्रतिशत तक बंद कर दिया है। इसके अलावा मार्केट में डिमांड न होने से उनके पास ग्रे-फैब्रिक्स बेकार पड़ा है। यही हाल पूरे देश में देखने को मिल रहा है। भिवाड़ी में भी लोगों ने अपना प्रोडक्शन घटा कर 50 प्रतिशत कर दिया है। ऐसा भी माना जाता है की चीन, इंडोनेशिया, बांग्लादेश जैसे देशों से कपड़ों की डंपिंग ने यह स्थिति पैदा की है — जितेन्द्र वखारिया

सूरत कपड़ा बाजार सिंथेटिक वस्त्र निर्माण का बहुत बड़ा हब है जो ना सिर्फ  भारतीय बाजार बल्कि, सम्पूर्ण विश्व का सिरमौर है। सूरत टेक्सटाइल ट्रेड इंडस्ट्रीज से जुड़े 7 लाख लूम्स, 450 प्रोसेस हाउस तथा 1.10 लाख वैल्यू एडिशन एम्ब्रोइडरी मशीन तथा 165 मार्केटों के 65,000 ट्रेडर्स के अथक प्रयासों से आज मध्यम वर्ग से लेकर आम आदमी को रोजगार उपलब्ध हुआ है। झोपड़पट्टी में रहने वाली घरेलू महिलाओं को भी वैल्यू एडिशन का कार्य उपलब्ध करा कर महिला रोजगार को बढ़ाने में भी सहयोगी बने हैं। लेकिन, आज फैशन का बदलता ट्रेंड, सिंथेटिक कपड़ों की घटती मांग और ऊपर से मंदी इसकी सबसे ज्यादा मार सूरत के कारोबारियों पर पड़ी है। अगर बिक्री हो भी रही है, तो पेमेंट नहीं मिल रही है। अकेले सूरत के टेक्सटाइल ट्रेडर्स की 20,000 करोड़ रुपये तक की रकम बाजार में फंसी हुई है।

साड़ी और ड्रेस मेटेरियल की ट्रेडिंग करने वाले कारोबारियों के पास आज न तो बड़े ऑर्डर हैं और ना ही बड़ी पूंजी। बाजार में चल रही मंदी की वजह से इनकी काफी पेमेंट भी अटकी हुई है। कारोबारी माल की सप्लाई तो कर रहे हैं लेकिन, पेमेंट का कोई ठिकाना नहीं है।

सूरत के करीब 40,000 कारोबारियों का एक जैसा ही हाल है, जो कपड़ा खरीदकर मिलों में डाईंग और प्रिंटिंग का काम करवाकर थोक बाजार में बेचते हैं। दरअसल सूरत के कपड़ा बाजार में पिछले एक से डेढ़ साल से जबर्दस्त मंदी चल रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है फैशन का बदलता ट्रेंड और चीन का इस मार्किट में दखल।


सरकार हमारी अनदेखी कर रही है


22-05-2016सूरत कपड़ा उद्योग के व्यवसायी उद्योग में आई मंदी से काफी परेशान हैं और बार-बार सरकार से इस ओर ध्यान देने की अपील कर रहे हैं। इसी संदर्भ में अशोक जीरावाला, अध्यक्ष, फोगवा, से उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता महेन्द्र राउत ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:-

सूरत टेक्सटाइल उद्योग में आई मंदी का जिम्मेदार आप किसे मानते हैं?

इसका पूरा दारोमदार कपड़ा उद्योग पर है। साथ ही प्रोडक्शन का भी इस मंदी में रोल है। इससे जुड़े सभी लोग एक ही तरह के कपड़े के प्रोडक्शन में लगे हैं, जिससे सालाना कुछ महीनों में मंदी का माहौल हो जाता है। लेकिन, अभी जो माहौल है मंडी का वो कहीं-न-कहीं हमारी अनदेखी है। सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो हमें फलने-फूलने का मौका दें। मोदीजी मेक इन इंडिया की बात करते हैं, जो जाहिर तौर पर घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने का प्रयास है। लेकिन, सरकार सूरत के टेक्सटाइल उद्योग जो की विश्वस्तरीय हैं इनकी अनदेखी कर रही है। हमारी मांग है कि कम-से-कम आयातित कपड़ों पर ड्यूटी बढ़ाई जाए।

प्रतिदिन कितने कपड़ों का उत्पादन होता है?

प्रतिदिन करीब चार करोड़ मीटर कपड़े का उत्पादन होता है। अब उसमे 3 करोड़ मीटर की तो खपत हो जाती है, लेकिन बाकी का एक करोड़ मीटर कपड़ा तो बेकार ही पड़ा रहता है। तो इससे भी मंदी बढ़ती है।

इस मंदी के पीछे मुख्य कारण क्या हैं ?

मुख्य वजह तो चीन के द्वारा कपड़ा डंपिंग करना है। अब जनता को जब सस्ता कपड़ा मिलेगा तो वह सस्ता ही लेगी। चीन न सिर्फ कपडे डंप कर रहा है बल्कि, इम्पोर्ट ड्यूटी की भी चोरी करता है, जिससे व्यापारियों के साथ-साथ सरकार को भी नुकसान होता है। हमने शंकर सिंह वाघेला जब कपडा मंत्री थे तो उनसे कहकर स्कैनर भी लगवाया था पर कोई फायदा नहीं हुआ।

इस मंदी से मजदूरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

जब व्यापारी परेशान हैं तो मजदूर पर भी प्रभाव पड़ेगा ही। करीब साढ़े छह लाख मजदूर इस मंदी से प्रभावित होंगे। क्योंकि, यह उद्योग तो घर-घर से जुड़ा है, महिलाएं भी इस काम से जुड़ी हैं तो पूरा चैनल ही प्रभावित होगा।

इस समस्या से बचने के लिए आपकी सरकार से क्या मांगे हैं?

हमने सरकार के सामने अपनी मांगे रखी हैं लेकिन, सरकार हमारी अनदेखी कर रही है। सरकार की मंशा ही नहीं है इस ओर कुछ करने की। सरकार को अपने घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए नीतियां बननी पड़ेगी। अभी ज्वैलरी एसोसिएशन वालों की 45 दिन तक हड़ताल चली, लेकिन कुछ नहीं हुआ। हम सिर्फ मेक इन इंडिया की बातें करते रहेंगे और कुछ करेंगे नहीं तो कैसे चलेगा। सरकार को इस तरफ ध्यान देना ही होगा।


22-05-2016

साथ ही सरकार की नीतियां जिससे कॉटन फेब्रिक्स की उत्पादन लागत सिंथेटिक्स फेब्रिक के बराबर है। ऊपर से चीन, भारत सहित दुनिया के बाजारों में सस्ते कपड़े डंप कर रहा है, जिससे सूरत में तैयार होने वाले कपड़े की मांग काफी कम हुई है। पहले जहां कपड़े की सप्लाई पर हाथों-हाथ पेमेंट मिल जाता था, अब 6-12 महीने की देरी हो रही है। ऐसे में कारोबारी 3-10 फीसदी तक छूट देकर कैश में सौदा कर रहे हैं। इन्ही सब समस्याओं को देखते हुए फेडरेशन ऑफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन (फोस्टा) ने निम्नलिखित मांगे सरकार के सामने रखी हैं।

  • गारमेंट इंडस्ट्रीज का हब बनना चाहिए साथ ही रियायती दरों पर जगह उपलब्ध कराई जाए।
  • गारमेंट इंडस्ट्रीज को 5 साल तक टैक्स मुक्त शहर घोषित करना चाहिए।
  • सूरत कपड़ा उद्योग को टीयूएफ का लाभ मात्र वीवर्स प्रोसेसर को मशीनरी पर मिलता है, परन्तु कपडे के रिसर्च के लिए प्रोसेसर/ट्रेडर्स को लाभ मिले ऐसी योजना बने।
  • एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए चीन की तरह टैक्स फ्री योजना को अमल में लाया जाना चाहिए।

सूरत कपड़ा बाजार आज प्रतिदिन 4 करोड़ मीटर कपड़े का उत्पादन कर पूरे विश्व में सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। इस बढ़त को बनाए रखने के लिए और प्रधानमंत्री मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सरकार को मंदी से जूझते इस उद्योग पर ध्यान देना चाहिए।

कपड़ा बाजार के उत्पादन को बढ़ाने के लिए सरकार की तरफ से योजनाएं तो बहुत हैं पर कपड़ा बेचने की मार्केटिंग को लेकर सरकार की तरफ से किसी भी तरह का सहयोग व्यापारियों को नहीं मिल रहा है। पहले जो 30 प्रतिशत का सब्सिडी व्यापारियों को मिलता था वह भी इस सरकार ने घटा कर 20 प्रतिशत कर दिया है। अब अगर इसी तरह इन थोक कारोबारियों की अनदेखी होती रही तो इन्हें मजबूरन अपना कारोबार समेटना पड़ सकता है।

 सूरत से महेन्द्र राउत

 

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