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सिंहस्थ महाकुंभ संस्कृति, अध्यात्म और सामाजिक समरसता का संगम

सिंहस्थ महाकुंभ  संस्कृति, अध्यात्म और सामाजिक समरसता का संगम

मध्य प्रदेश का प्रसिद्ध आध्यात्मिक शहर उज्जैन आजकल दो महत्वपूर्ण वजहों से चर्चा में है। पहला सिंहस्थ महाकुंभ — इस पावन अवसर पर चारों जगतगुरू शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, अखाड़ा प्रमुख और विभिन्न समुदायों के संत आध्यात्मिक प्रवचन और मोक्षदायनी क्षिप्रा में स्नान कर महाकाली के दर्शनों के लिए पहुंचे हैं। दूसरा कारण है कि मध्य प्रदेश सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय वैचारिक महाकुंभ का आयोजन किया है। इस महापर्व में हिस्सा लेने के लिए भारत, श्रीलंका, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश और मलेशिया के विभिन्न समुदायों के नेतागण और साधू-संत भी पहुंचे हैं। प्रधानमंत्री नेरन्द्र मोदी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, आरएसएस के भैयाजी जोशी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, गायत्री परिवार के डॉ. प्रवीण पंड्या, स्वामी अवधेशानंदजी, चिदानन्द मुनी, स्वामी रामदेव जी, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केन्द्र सरकार के कई वरिष्ट मंत्रियों के इस विचार मंथन में हिस्सा लेने से इसकी महत्ता कई गुणा और बढ़ गई है।

इस अंतर्राष्ट्रीय वैचारिक महाकुंभ का मुख्य उद्देश्य भारतीय विचार, सामाजिक सद्भाव की विचारधारा को और अधिक मजबूत बनाने की इच्छा से किया गया। भारत में विचारों का बहुत महत्व है जो कई श्रेणियों में देखने को मिलता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण क्षिप्रा नदी पर बने रामघाट पर देखने को मिलता है। ये घाट शैव और वैष्णवों के लिये ही बना है। दलित संतों के लिए वाल्मीकि घाट बना है। महाकुंभ एक ऐसा महापर्व है जहां सभी एक समान हैं। महाकुंभ के अवसर पर क्षिप्रा नदीं में डूबकी लगाने वाले लाखों श्रद्धालु जो कोसों दूर से इस पवित्र स्नान के लिए आते हैं, मोक्षदायनी क्षिप्रा उनमें कोई भेदभाव नहीं करती। हालांकि हम अपने समाज में प्रचीनकाल से ही भेदभाव देखते आ रहे हैं इसी भेदभाव की वजह से कुछ लोगों की बिल्कुल अनदेखी कर दी जाती है तो, कुछ विकास के शिखर पर पहुंच जाते हैं।

22-05-2016

यह सिर्फ असमानता की भावना की वजह से ही देखने को मिलता है। लेकिन हमारी संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में विश्वास करती है। सभी के लिए न्याय और विकास में विश्वास करती है।

भाजपा सरकार ने सामाजिक बदलाव और सामाजिक सद्भाव को अंतर्राष्ट्रीय स्तर प्रदान करने के लिए सिंहस्थ महाकुंभ का एक उपकरण की भांति फायदा उठाया है। हर बारह सालों में एक बार महाकुंभ पड़ता है। महाकुंभ हरिद्वार, नासिक, इलाहबाद और उज्जैन में से किसी एक शहर में ही पड़ता है। इस अवसर पर साधू-संत पारंपरिक और धार्मिक संस्कारों का आयोजन करते हैं। लेकिन इस बार स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में भाजपा ने कुछ बेहतरीन कार्यों को अंजाम देने के लिए इसे बिल्कुल नया आकार और अर्थ दे दिया है। इस दौरान विभिन्न सत्रों में स्वच्छ गंगा, पर्यावरण, जलवायु  परिवर्तन, कृषि और कुटीर उद्योगों पर चर्चा भी हुई।

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सभी को सनातन मूल्यों का मान करना चाहिए: भागवत


उज्जैन के निकट निन्नोरा गांव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत और अन्य माननीय अतिथिओं जिसमे स्वामी अवधेशानंद गिरी, आध्यात्मिक गुरु प्रणव पंड्या, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राज्यसभा सांसद अनिल माधव दवे ने वैचारिक महाकुंभ का शुभारम्भ किया। अपने उद्घाटन भाषण में मोहन भगवत ने कहा: ”धर्म के चार आधार हैं, सत्य, विज्ञान, स्वछता और समर्पण। इन सब के आधार पर ही हमे सही जीवन जीने का सलीका सीखना होगा। विज्ञान और आध्यात्म कभी एक दूसरे के खिलाफ नहीं रहे हैं और ना हैं। सही जीवन का सलीका सीखते हुए हमें अपने देश के काल और परिस्थिति का भी ध्यान रखना होगा। आज सारा विश्व संघर्ष की जगह सहयोग की भावना से उत्प्रेरित है। एक अच्छा शासक अच्छी नीतियां ला सकता है लेकिन अगर लोग ही उसकी अवहेलना करे तो कोई फायदा नहीं होता। न सिर्फ शासक बल्कि लोगो को सनातन मूल्यों का मान करना चाहिए।


भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चुनावों में व्यस्तता होने के बावजूद महाकुंभ में शामिल होने के लिये समय निकाला जिस कारण भाजपा विरोधियों को और धर्मनिरपेक्ष मीडिया को उन पर तंज कसने का मौका मिल गया  कि वो इस पावन अवसर को राजनीतिक रंग देने का प्रयास कर रहे हैं। अमित शाह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, अवधेशानन्दजी, सत्यमित्रानन्दजी, चिदानन्द मुनी, तीन महामंडलेश्वर, शंकराचार्य, पीठाधीश और दलित संतों समेत सीधे उज्जैन के वाल्मीकि धाम पहुंचे। अमित शाह का वाल्मीकि घाट पर जाना सीधे तौर पर दलितों को संदेश देना है– वाल्मीकि धाम जो पहले सिर्फ दलितों के लिए आध्यत्मिक स्थल था, अब यह धाम आध्यात्मिकता के एक प्रतीक के रूप में सामने नजर आ रहा है।  इससे पहले उज्जैन में पड़े कुंभ में कभी भी क्षिप्रा के वाल्मीकि घाट पर इस तरह की साज-सजावट और समुचित व्यवस्था नहीं देखी गई थी और न ही यहां बने आश्रमों में इतने प्रसिद्ध संतों और महात्माओं को देखा गया था। और न ही इतने वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं को यहां कभी देखा गया था। ये यहां आने वाले मेहमानों के लिए एक बड़ा मंच बन गया है। यहां पर महर्षि वाल्मीकि, रविदास, कबीर, बी. आर. अंबेडकर और शंकराचार्यों की तस्वीरें प्रमुख रूप से लगी देखी गई।

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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और अमित शाह दोनों ने अलग-अलग समुदायों से मंच पर उपस्थित सभी संतों का सम्मान किया। अमित शाह ने महर्षि वाल्मीकि की तस्वीर पर फूलमाला अर्पित की। यह समरसता का संदेश था कि दलित भी हिंदू समाज का ही एक अहम हिस्सा हैं। यह हिंदू समाज में इनका अनुसरण करने के लिए एक अच्छी पहल थी, जैसा की सभी जानते हैं कि यह पहले से ही हिंदू समाज का हिस्सा रहे हैं। लेकिन कुछ विभाजनकारी लोगों का इन्हें समाज से अलग करने और गुमराह करने के पीछे स्पष्ट उद्देश्य और एजेंडा है। राजनीतिज्ञ विशेषज्ञों और स्पष्ट रूप से मीडिया के लाइव शो में प्रदर्शन करने वालों के लिये यह एक ज्वलंत मुद्दा है। उनके लिये यह एक राजनीतिक सिहंस्थ था क्योंकि इसमें दलितों को आकर्षित करने की कोशिश की गई, जो उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के दौरान मायावती को प्रभावित कर सकता है। लेकिन वाल्मीकि धाम के स्वामी उमेशनाथजी महाराज ने भाजपा के इस सौहार्दपूर्ण रवैये को देखकर अपनी प्रसन्नता जाहिर करते हुए बताया कि कैसे दलित समाज से जुड़े महर्षि वाल्मीकि और गुरू रविदास ने लोगों के आध्यात्मिक उत्थान के लिये अपना योगदान दिया। अमित शाह ने गुजरात से संबंध रखने वाले  सोहनदासजी महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित की जो दलित धर्म के लिए एक आदर्शस्वरूप थे। सिंहस्थ महाकुंभ में भाजपा ने धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिकता को एक साथ लेकर चलने का जो प्रयास किया वह काफी मायनों में सही रहा। अमित शाह ने कहा कि इस समुदाय की सबसे बड़ी समस्या और चुनौती यह हैकि इसे कैसे मुख्यधारा में लाया जाये। उन्होंने यह भी इंगित किया कि यह जिम्मेदारी उनके और बाकी आध्यात्मिक गुरूओं की जिम्मेदारी भी बनती है कि वह समरसता के भाव को आगे ले जायें और यह भी देखें कि यह सच में धरातल पर हो न कि शब्दों तक ही सीमित रहे।


सिंहस्थ महाकुंभ का महत्व


‘सिंहस्थ’ उज्जैन का अत्यन्त पवित्र पर्व है, जो पौराणिक आधार पर वर्णित ग्रह-नक्षत्रों के विशिष्त संयोग के उपस्थित होने पर क्षिप्रा-स्नान के पुण्य-लाभ के लिए जनता द्वारा मनाया जाता है। ‘सिंहस्थ’ इस पर्व का संक्षिप्त नाम है। इसका साधारण अर्थ है– ‘सिंह पर स्थित’ — परन्तु विशेष अर्थ यह है कि जब बृहस्पति सिंह राशि पर स्थित हो और अन्य पूरे दस योग एक साथ उपस्थित हों तब उज्जैन में क्षिप्रा-स्नान अत्यन्त पुण्यदायक होता है। ऐसे योग प्रति बारहवें वर्ष में समन्वित होते हैं, जिनका उल्लेख स्कंद पुराण में है।

जब वैशाख मास हो, शुक्ल पक्ष हो और बृहस्पति सिंह राशि पर, सूर्य मेष राशि पर तथा चन्द्रमा तुला राशि पर हो साथ ही स्वाति नक्षत्र, पूर्णिमा तिथि, व्यतिपात योग और सोमवार का दिन हो तो उज्जैन में क्षिप्रा-स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

क्षिप्रा- स्नान तो अन्य स्थानों में भी किये जा सकते हैं, फिर उज्जैन में ही सिंहस्थ क्यों मनाया जाता है, इसका विशेष कारण है। भारत में चार स्थान ऐसे हैं जहां ‘कुंभ’ के पवित्र स्नान-पर्व मनाये जाते हैं। वे स्थान हैं- प्रयाग, हरिद्वार, नासिक तथा उज्जैन। प्रयाग एवं हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर गंगा-स्नान का महात्म्य है, नासिक में गोदावरी स्नान तथा उज्जैन में क्षिप्रा-स्नान का।


शाह ने ये भी कहा कि केन्द्र में मोदी सरकार है जो भारतीय सांस्कृती और सामाजिक परंपराओं को मजबूत करने के लिए काम कर रही है। अपने इस उद्देश्य को सफल करने के लिए उन्हें आशीर्वाद की जरूरत है।

शाह वाल्मीकि धाम के साथ ही महामंडलेश्वरों और कई दूसरे संतों का सम्मान करने के लिए भी दूसरे अखाड़ों में भी पहुंचे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के साथ अमित शाह दीनदयाल पुरम नाम के एक स्थान पर भी संतों को सम्मानित करने के लिए पहुंचे।

 22-05-2016वाह, वाह शिवराज भईया

उज्जैन के मंदिरों की गलियों में घूमते हुये यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि किस तरह से सरकार ने आधारभूत संरचनाओं का विकास किया है साथ ही सरकारी अफसर हर जगह श्रद्धालुओं की मदद को तत्पर देखे जा सकते हैं। उज्जैन की ओर जाती हुई सभी सड़कें काफी चौड़ी हैं और सभी जगह प्याऊ और स्वच्छता की व्यवस्था देखी जा सकती है। हर दूसरे दिन शिवराज सिंहस्थ कुंभस्थल की व्यवस्थाओं का जायजा लेने पहुंचते हैं। भारी बारीश की वजह से कुछ समस्याएं जरूर आईं लेकिन, हमें सभी आध्यात्मिक समूहों की हिम्मत को सराहना होगा। लाखों लोग के आध्यत्मिक गुरूओं के ज्ञान से लाभान्वित हो रहे हैं। उज्जैन का पूरा माहौल ही आध्यात्मिक हो गया है। ऐसा लगता है जैसे उज्जैन शहर ऊर्जा स्रोत के रूप में बदल गया है। यह जानकर बड़ा ही अच्छा लगता है कि हमारी परंपराएं और हमारा देश कितना महान है।

 उज्जैन से विशेष संवाददाता

 

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