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वेस्टर्न नेशन कांसेप्ट हमारा राष्ट्रदर्शन नहीं हो सकता

वेस्टर्न नेशन कांसेप्ट  हमारा राष्ट्रदर्शन नहीं हो सकता

आज का विषय है नेशनलिज्म। मुझे इस विषय से आपत्ति है। नेशनलिज्म का भारत की किसी भी भाषा में कहीं कोई अनुवाद नहीं है। भारत में इसका जो सही शब्द है वो है राष्ट्र और राष्ट्रता। पाश्चात्य देशों में इस शब्द के कई अनुवाद किये गये हैं। इसका कारण है कि विदेशी देश में आये और उन्होंने यहां जो देखा और जो अनुभव किया वो वहां की संस्कृति में नहीं था। जो परंपरा, शब्द यहां के साहित्य में थे यहां के जीवन में, यहां के चलन में थे वो वहां नहीं थे। और जो परंपरा या शब्द  वहां थे वह उस रूप में यहां नहीं थे। दोनों देशों की परंपरा, विचार और दर्शन में विविधता है। जीती हुई जाती, जीता हुआ समाज हारे हुए समाज का मान नहीं हो जाता है। उनके आत्मगौरव और उनके  सम्मान के सभी बिंदुओं को धीरे-धीरे नष्ट करता है। वो कुछ भी ऐसा नहीं छोड़ता जिसके कारण पराधीन हुआ समाज फिर कभी खड़ा होने की हिम्मत कर सके। बार-बार ये बात पराधीन समाज के मन में बैठाने की कोशिश की जाती है कि आप सारी दुनिया में बहुत पिछड़े हैं आपके पास गर्व करने के लायक कुछ है ही नहीं। इसलिए भारत की जो परंपराएं थीं, अच्छे शब्द थे, उन्हें विकृत करके हमारे सामने रखा जाता है। राष्ट्र शब्द का अंग्रेजी में कोई समानार्थ नहीं है और न ही नेशन शब्द का भारत में कोई समानार्थ है। विश्व में धर्म का समानार्थ नहीं है और हमारे देश में रिलिज्यिस का समानार्थ नहीं है। नेशन नाम का जो शब्द है उसका कोई इतिहास नहीं है। इसलिए नेशन क्या होता है इसकी भी अलग-अलग तरह की परिभाषाएं चलती हैं। राजनीतिशास्त्र के जितने विद्वान दुनिया में है, उतनी ही तरह की परिभाषाएं प्रचलन में आ गई हैं। कुछ विद्वानों को ध्यान में आया कि समाज में स्वतंत्रता में समानता होनी चाहिए इस बात को ध्यान में रखते हुए नेशनलिज्म की कल्पना आई। और यहां से नेशन की कल्पना उभर कर आई।

18वीं और 19वीं शताब्दी में नेशन की कल्पना फ्रेंच और जर्मन रेवोल्यूशन के बाद शुरू हुई। आज जिन्हें नेशन कहा जाता है क्या उनमें समानता, बंधुत्व, स्वतंत्रता और एकता के अधिकार सभी को मिल गये हैं? और अगर नहीं मिले हैं तो ये नेशन कैसे हो गये। और अगर ये नेशन हैं और थे तो उससे पहले के नेशन, नेशन क्यों नहीं माने जाते हैं। ये एक गंभीर पहेली है, इसका जबाव किसी भी राजनीतिशास्त्र में मौजूद नहीं है। सभी की परिभाषाएं अलग हैं और सभी परिभाषाओं के आधार भी अलग-अलग हैं। किसी की परिभाषा धर्म के नाम पर है, किसी की भौगोलिक आधार पर, तो किसी की इतिहास के नाम पर, तो किसी कि  परंपराओं के आधार पर, सभी कि अलग-अलग परिभाषाएं हैं। जब इनके विचार एक नहीं हैं तो परिभाषाएं कैसे एक होंगी और उसी आधार पर ये भारत को तौलते हैं। भारत में नेशनल्जिम कभी नहीं था। उनकी जो मान्यता नेशनलिज्म की है वो मान्यता, धारणा और विचार भारत में कभी नहीं थे। और ईश्वर करे की वो भारत में कभी न आये। पाश्चात्य जगत के जो बड़े-बड़े विद्वान थे वो बड़े गर्व के साथ कहते थे कि भारत में चाहे कुछ भी था पर उसमें नेश्नलिज्म कभी नहीं थी। ये सच है कि वो जो नेशनलिज्म की परिभाषा देते हैं वो कभी भी भारत में नहीं था। क्योंकि उनकी जो मान्यता नेशनलिज्म की हैं वो मान्यता, धारणा, विचार भारत में कभी नहीं थे। भारत में बड़े-बड़े विचार, विद्वान, दार्शनिक थे लेकिन, भारत में नेशनेलिटी का कॉन्सेप्ट कभी नहीं था। लेकिन उनका जो नेशनेलिटी का कॉन्सेप्ट था वो भारत में नहीं है ये अच्छा ही है। क्योंकि, उनका कॉन्सेप्ट बहुत भिन्न प्रकार का था। उनके नेशन की कल्पना, धारणा कहां से शुरू होती है किसको पता है। पाश्चात्य देश (नेशन) हमारे राष्ट्रदर्शन नहीं हो सकते।

पाश्चात्य जगत ने एक तरफ विस्तारवाद किया और दूसरी तरफ शोषण, लेकिन भारत ने दुनिया में कहीं भी उपनिवेश नहीं बनाया, किसी को गुलाम नहीं बनाया। आज विश्व व्यापार संगठन और बहुउद्देशीय कंपनियां उसी शोषण का एक रूप हैं। हमारी दार्शनिक एकता ने भौगोलिक एकता को बांधे रखा है। यह अचानक नहीं हुआ इसके लिए ऋषियों-मुनियों ने तपस्या की है। भारत में जितने आक्रमणकारी आये वह यहां के विचारों में घुल-मिल गए। सैकड़ों वर्ष पहले भारत नाम का एक देश हुआ, जिस पर विदेशीयों ने आक्रमण किये और जीते हुए लोग भी यहां विलीन हो गए।

मिस्त्र, रोम, यूनान, बेबीलोन में इसके उल्ट होता था। यही अंतर है और इसे समझना होगा। यहां मोटा-मोटा जो अंतर नजर आता है, वो यह है कि यहां आने वाले यहां आकर मिल जाते हैं। दिनकर जी कहते हैं कि भारत में एक हिन्दू नाम का समाज है जो कि मसाला कूटने वाली खल्लड़ की तरह काम करता है। ये समाज यहां आने वालों को कूट-पीस कर यहीं मिला लेता है। हमारे समाज में ऐसी ताकत है कि चाहे बाहर से कोई भी आये हम जीते या हारें उसे यहा का बना ही लेते हैं।

कहां गये रोम के एलेक्जेंडर और उनके वंशज? किसी का कुछ अता-पता नहीं, लेकिन भारत में 10 हजार साल पहले जैसे विधि-विधान से पूजा-पाठ, वेदमंत्रों का उच्चारण होता था, वो आज भी होता है। किसी पद्धति में कोई बदलाव नहीं आया। इस्लाम आगे बढ़ा तो कई देशों पर अपना वर्चस्व कायम करता हुआ आगे बढ़ा। दुनिया का कोई भी समाज उसके आगे नहीं टिक सका। पर आज हम जहां बैठे हैं वहां भी मुस्लमानों ने कई बार आक्रमण किये लेकिन, अपना अधिपत्य स्थापित नहीं कर सके,  इसका क्या कारण था? इसकी वजह थी इस देश की सात्विक भावना और राष्ट्रभावना। जिसकी वजह से आज हम हैं। अंग्रेजों के साथ हमारा 200 सालों तक संर्घष चला, इस्लाम के साथ संघर्ष चला इतने सालों तक, तो उनसे संघर्ष कौन कर रहा था? वो एक राष्ट्र था, वो अध्यात्म था। इस्लाम के सामने गुरूनानक जी थे, गुरू परंपरा थी, मीरा बाई थीं, चैत्नया महाप्रभु थे, तुकाराम थे, नामदेव थे, ऐसे हजारों लोग थे जो इस देश को और समाज को जिंदा रखे हुए थे। भारत में राष्ट्र की आत्मा नेशन की तरह राजनीति, राजा, सेना या प्रशासन में नहीं बल्कि अध्यात्म में, परंपरा में, लोगों के हृदय में थी। इस देश के लोगों ने अत्याचारों को सहा, लेकिन फिर भी अपनी अंतर आत्मा में राष्ट्र भावना को जगाये रखा। राज्य ब्रिटेन का था राष्ट्र हमारा था।

राष्ट्र और नेशन में अंतर है। नेशन ब्रिटिशर्स का था इसमें कोई दोराय नहीं है। बागडोर सारी उनके हाथ में थी, राजा उनका, सेना उनकी, सत्ता पर भी उनका अधिकार था। लेकिन, राष्ट्र की अंतर आत्मा उनके हाथ में नहीं थी। राष्ट्र की आत्मा लोकमान्य तिलक, मदनमोहन मालवीय, विवेकानंद, महार्षि दयानंद, स्वामी श्रृद्धानंद, लाला लाजपत राय के हाथों में थी, जिनके साथ करोड़ों लोग थे। इनके एक बार वंदे मातरम का नारा लगाने पर हजारों लोग त्याग के लिए आगे आ गये। इस देशभक्ति के पीछे एक अध्यात्मिक आह्वान था। पाश्चात्य देशों में नेशन के पीछे एक सेना है, लडऩे की प्रवृत्ति है, अपना राज्य स्थापित करने की भावना है। पाश्चात्य देशों में हम और तुम की भावना है, इसलिए हम और तुम साथ नहीं आ सकते, जबकि भारतीय राष्ट्र दर्शन आप और मैं का भेद नहीं करता। पाश्चात्य जगत का आधार ही हम और तुम की भावना पर टिका है। हमारे देखते-देखते कितने नेशन बन गये और न जाने इनके भी कितने टुकड़े होकर अलग-अलग नेशन बन गये। इसकी वजह है कि उनमें साथ रहने की भावना नहीं हैं। असहिष्णु भावना है इन नेशनों में जिसके आधार पर टुकड़े होते चले जा रहे हैं। पिछले 20-21 सालों में 50 नये नेशन बन गये ये बड़ी ही आश्चार्यजनक बात है। इन्होंने आपस में आने वाले अंतर को कैसे भी संभालने की कोशिश नहीं की। इनका इतिहास कहता है इनके पुरखों के काले कारनामे कहते हैं कि भारत में, एशिया में, अमेरिका में, लैटिन अमेरिका में, क्या-क्या किया इन्होंने। शोषण करना और अपनी बात को उन पर थोपना यही इनकी नीति है। एक ओर शोषण करना दूसरी तरफ विस्तारवाद यह नेशन का सबसे बड़ा उदाहरण है।

1600 वर्ष पूर्व कालीदास के मेघदूत के वक्त भी राष्ट्र था और आज भी है। हमें इस बात का गर्व है कि भारत में किसी ने अलग से कॉलोनी नहीं बनाई, किसी को दास नहीं बनाया। हमें गर्व है कि भारत ने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा कि विश्व के किसी दूसरे देश को अपना गुलाम बनाना है या मनुष्य की बिक्री करके हमें पैसा कमाना है। पश्चिमी जगत के नेशन के पीछे एक धारण है, आवश्यकता है, लेकिन राष्ट्र में ऐसी कोई भावना नहीं है। दिल्ली से गंगा सागर तक 2500 किलोमीटर तक गंगा, जमुना का सुंदर मैदान पड़ा है, इतना सुंदर दृश्य, सुंदर ऋतुएं जो हमारी आवश्यकता से कई गुणा अधिक हमें देती हैं। हमें इस धरती पर कृषि करने की भी आवश्यकता नहीं थी सब संपन्नता थी। हमारे देश का दर्शन संपन्नता, निपुणता में से उत्पन्न हुआ है। लेकिन इनके यहां प्रकृति बहुत विपरीत है, उपजाऊ जमीन बहुत सीमित है। इस सीमित जमीन को बचा कर रख पाना बहुत कठिन काम था। इस जमीन पर भी साल में एक-आधा फसल ही जैसे-तैसे हो पाती थी। जमीन रेगिस्तानी है, पथरीली है अत: इस जमीन को कैसे भी बचाकर रखना था। इसका संरक्षण करना था और जरूरत पडऩे पर दूसरों की जमीन को लूट कर लाना ये काम था इन नेशन्स का। संसाधन कम थे इनके पास इसलिए इनका सारा समाज मिलकर लड़ता था, मिलकर आक्रमण करते थे ये लोग। उनकी प्रवृत्ति ऐसी इसलिए थी, क्योंकि उनकी प्रकृति ऐसी थी।

विविधताएं प्रकृति का नैसर्गिक नियम है। कभी-कभी लोग कहते हैं कि हमारे यहां विविधता में एकता है, लेकिन मैं कहता हूं कि विविधता में एकता हो ही नहीं सकती। हमारी एकता विविधता में प्रकट होती है। हमारी एकता दर्शनिक और मौलिक है, इसलिए विविधता में एकता है। हम लोगों को रस्सी में बांध कर एक नहीं कर रहे हैं। हमारा मूल एक है, हमारी राष्ट्र भावना ने सारी विविधताओं को एक बना कर रखा है, इसलिए हम एक हैं। किंतु आश्चार्य होता है कि स्पेन और पुर्तगाल दो भाषा एक साथ नहीं हैं, आयरिश और इंगलिश दो भाषा एक साथ नहीं, जर्मन और फै्रंच दोनों एक  साथ नहीं रह सकती हैं, लेकिन भारत में सैकड़ों तरह की परंपराएं, भाषा, विभिन्न प्रकार का खान-पान, पहनावा अलग-अलग होते हुए भी एक साथ हैं। ये हमारी राष्ट्र भावना ही है जो इतना अलग-अलग होते हुए भी सभी को एक साथ संभाल कर रखे हुए है। हमारी दार्शनिक एकता ने भौगोलिक एकता को बनाये रखा है।

इस देश की धरती पर पैदा होने वाले प्रत्येक व्यक्ति के मन की एक ही भावना है कि सबका भला हो। नेशन का कॉन्सेप्ट लोगों का शोषण करना है और अपना अधिपत्य स्थापित करना है लेकिन, राष्ट्र की भावना है ‘सर्वे भवन्तु सुखिना’। पाश्चात्य जगत का नेशनलिज्म हमारे राष्ट्र को डसता है। विदेशियों के 200 साल के शासन से हमारे लोगों के मन में भी ऐसे भाव आते हैं कि ये काम तो सरकार करेगी, वो काम भी सरकार का ही है। लेकिन, राष्ट्र की भावना बनाये रखने के लिए कम-से-कम काम सरकार का और ज्यादा-से-ज्यादा काम समाज का है। हमारे बच्चों को संस्कार सरकार देगी? हमारे घर के झगड़े सरकार निपटायेगी? हमारे समाज को सरकार बनायेगी? जब लोग चार धाम की यात्रा पर निकलते हैं तब भाषा, राज्य आड़े नहीं आते, कैसे लोग आगे बढ़कर लोगोंं का स्वागत करते हैं ये भावना कहां से आती है राष्ट्र से न कि सरकार से। अध्यात्मिक भावनाओं के साथ जो भाव आता है उसे संस्कृति कहते हैं। आध्यात्मिक भाव को साथ लेकर लोगों ने जो भी काम किये वो सुस्ंकृति है। देश के  हर व्यक्ति के जीवन के हर हिस्से में ये संस्कृति प्रकट होती है, ये भाव प्रकट होते हैं। सारे भू-मंडल को जोड़ कर रखने के लिए हमने तरह-तरह की कल्पनाएं की हैं, हजारों सालों से इस राष्ट्र भाव को भौगोलिक दृष्टि से, सांस्कृतिक दृष्टि से जिसने बना कर रखा है उसका नाम हिंदुत्व है। ये हिंदुत्व ही है जो अनेक संकट के काल में भी इस भावना को लगातार लेकर आगे बढ़ता चला आया है। कहीं डगमगाया नहीं है। कोटी-कोटी जन्मों के पुण्य फलीभूत होते है तब जाकर कहीं भारतवर्ष में जन्म मिलता है। राष्ट्र का जो मूल तत्व है उसे समझ कर राष्ट्र के, समाज के विचार को दूर तक पहुंचायेंगे तो इन सारी समस्याओं का समाधान खुद मिल जायेगा।

यह लेख लेखक द्वारा ग्रुप ऑफ इंटेलैक्चुअल्स एंड एकेडमीशियन्स की पहली वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित समारोह में दिए गए भाषण पर आधारित है

कृष्ण गोपाल

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