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मुझे मिले जीवन और मौत उस घोड़े जैसी

मुझे मिले जीवन और मौत उस घोड़े जैसी

बेटा: पिताजी।

पिता: हां बेटा।

बेटा: आप चाहे अच्छा मानो या बुरा, पर मेरी तो ईश्वर से यही प्रार्थना है कि मुझे मौत दे तो घोड़े की। मैं आम आदमी की मौत नहीं चाहता जो किसी आम कीड़े-मकौड़े से ज्यादा कुछ नहीं है।

पिता: बेटा, यह तू क्या कह रहा है? मुझे तो तेरी बात समझ नहीं आ रही। अभी तेरी उम्र ही क्या है जो मृत्यु की सोचने लगा है। बेटा, फिजूल की बातें नहीं करते।

बेटा: पिताजी, लोग गुस्से में आकर कह देते हैं कि तू कुत्ते की मौत मर। यह तो बुरी बात है ना?

पिता: बिल्कुल बुरी बात। चाहे कुत्ता हो या घोड़ा, है तो जानवर ही ना। आदमी का जानवर से क्या मुकाबला? आदमी अपनी मौत मरे, जानवर की क्यों?

बेटा: पर पिताजी, मैं किसी आम घोड़े की मौत नहीं मांग रहा हूं। मैं तो उत्तराखंड  पुलिस के घोड़े शक्तिमान की मौत चाह रहा हूं। ऐसी मौत पाकर तो महान-से-महान महानुभाव भी धन्य हो जायेगा।

पिता: पर बेटा, है तो वह घोड़ा ही ना।

बेटा: पर पिताजी, उसे जो सम्मान मिला है उसे देख तो बड़े-बड़ों का दिल ललचा उठेगा: काश, मैं भी घोड़ा ही होता, वह भी पुलिस का और शक्तिमान।

पिता: हुआ क्या? बता तो सही।

बेटा: पिताजी, विरोधी दल, प्रमुखत: भाजपा, कांग्रेस की सरकार के विरूद्ध विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। वहां भीड़ को नियंत्रित करते हुये हिंसा हो गई। आरोप है कि उस समय भाजपा के एक विधायक ने शक्तिमान को डंडे से पीट दिया इतनी बुरी तरह कि उसकी टांग ही टूट गई।

पिता: फिर क्या हुआ?

बेटा: सरकार ने विधायक को गिरफ्तार कर लिया पशुओं के विरूद्ध अत्याचार के मामले में।

पिता: पर बेटा, यह घोड़ा किस के पक्ष में खड़ा था जो घायल हो गया?

बेटा: पिताजी, वह तो किसी के पक्ष में नहीं था। लगता है पुलिस जनसमूह को कंट्रोल करने के लिये उसको ले आई थी। क्रोधित जनता पर कंट्रोल के लिये घोड़ों का इस्तेमाल तो आम किया जाता है।

पिता: तो फिर विधायक पुलिस पर गुस्सा न कर उनके घोड़े पर ही क्यों बरस उठा?

बेटा: इसके बारे किसी ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है।

पिता: तो विधायक बिना बात पर ही उस बेचारे बेजुबान पर बरस पड़े? ऐसा तो नहीं कि घोड़े ने किसी को दुलत्ती मार दी हो और उसके कारण गुस्से में आकर प्रतिशोध के रूप में घोड़े को पीट दिया गया हो?

बेटा: इस बारे तो कोई कुछ नहीं कह रहा।

पिता: यह बात तो समझ नहीं आ रही।

बेटा: हां, विधायक महोदय ने इनकार किया है कि उन्होंने शक्तिमान पर प्रहार किया। उन्होंने तो यहां तक कह दिया है कि अगर यह साबित हो जाये कि उसने शक्तिमान को पीटा है तो वह अपनी टांग कटवाने के लिये तैयार हैं।

पिता: उसके बाद क्या हुआ?

बेटा: पिताजी, शक्तिमान को तो वीआईपी की तरह सम्मान दिया गया। पुलिस सम्मान तो उसे दिया जाता है जिसने कोई विलक्षण प्रतिभा का प्रदर्शन किया हो। क्या शक्तिमान ने भी कुछ ऐसा किया था?

पिता:  बेटा, यह तो बड़ों की बड़ी बातें हैं। मीडिया में तो इसकी कोई चर्चा नहीं है और न ही सरकार ने इस बारे कोई खुलासा किया है।

बेटा: तो फिर यह सम्मान कैसे मिल गया?

पिता: बेटा, सरकार मेहरबान हो जाये तो कुछ भी हो सकता है।

बेटा: पर पिताजी, सरकार मेहरबान हो जाये तो किसी को कुछ भी दे सकती है। आपने समाचारों में पढ़ा होगा कि सेना के डॉग स्कवैड के एक कुत्ते को सरकार कोई बड़ा सम्मान या पुरस्कार देने पर विचार कर रही है।

पिता: अच्छा? उसने क्या किया?

बेटा: पठानकोट एयरबेस पर जब आतंकी हमला हुआ था तो इससे पहले कि एक छुपा हुआ आतंकी कोई नुकसान पहुंचा पाता उस कुत्ते ने ही उसे ढूंढ निकाला था और उसकी सहायता से ही उसे मार गिराना संभव हो सका था।

पिता: यह तो बेटा उस कुत्ते ने वाकई एक बड़े कमाल का कारनामा कर दिखाया है और उसे सम्मान व पुरस्कार तो मिलना ही चाहिये। उसने तो देश की बड़ी सेवा व रक्षा की है।

बेटा: पर इनको आप कुत्ता मत पुकारा करो। लोग नाराज हो जाते हैं।

पिता: बेटा, कुत्ता तो कुत्ता ही रहेगा। चाहे वह कहीं रहे, कुछ करे उसकी जाति तो नहीं बदल जायेगी।

बेटा: पिताजी, यह तो बहादुर कुत्ते हैं। लोग तो घर के पालतू कुत्ते, को कुत्ता नहीं बोलने देते। वह कहते हैं कि उसे उसके नाम से पुकारो।

पिता: पर उसकी जाति या नस्ल तो नहीं बदल सकती।

बेटा: हम तो पिताजी अपने जनतंत्र को जाति के अभिशाप से मुक्त करना चाहते हैं और आप हैं कि बार-बार जाति की ही बात करते जा रहे हैं।

पिता: जातिविहीन समाज की बात तो एक ढकोसला मात्र है, एक पाखंड और कल्पना। भारत में तो मुझे दो-चार सदियों तक यह सम्भव होता नहीं दिखता। जो जातिवाद का विरोध करते हैं वह ही अपने नाम के साथ अपनी जाति लिखते हैं। जाति के नाम पर राजनीति करते हैं और वोट मांगते हैं।

बेटा: यहां तक तो आपकी बात ठीक है। यदि हम अपनी जुबान के सच्चे हैं तो इस पर अमल क्यों नहीं करते? फिर हमने जाति आधारित आरक्षण व सुविधायें क्यों दे रखी हैं? जब किसी को उसकी जाति बताओ तो अपराध पर जब उसने अपनी जाति के आधार पर कोई आरक्षण या सुविधा प्राप्त करनी होती है तो वह बड़े गर्व से कहता है कि मैं अमुक जाति से हूं।

पिता: यही तो मेरा तर्क है।

बेटा: पर पिताजी, कुछ भी है हम एक ईमानदार प्रयास तो कर ही रहे हैं कि समाज में समानता हो।

पिता: तो तुम कुत्ते, बिल्ली, घोड़े और गधे में भी समानता ले आओगे?

बेटा: यह कैसे संभव हो पायेगा?

पिता: यही तो मैं कह रहा हूं।

बेटा: पर पिताजी, विदेश में तो ऐसा है। आपको याद है कि जब अमेरीकी राष्ट्रपति ओबामा भारत आये थे तो उनकी सुरक्षा के लिये वहां के सुरक्षाकर्मी ही नहीं उनके साथ कुछ कुत्ते भी आये थे। वह भी राष्ट्रपति की सुरक्षा के ही अंग थे। उन्हें भी दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में अलग कमरे दिये गये थे। वैसे तो हमारे होटल भारत के किसी कुत्ते को होटल के अंदर घूसने नहीं देते।

पिता: फिर होटल वालों ने यह कैसे होने दिया? वह तो भारत के अपने और विदेश के कुत्तों में भेदभाव कर रहे हैं। किसी ने यह सवाल क्यों नहीं उठाया?

बेटा: इसलिये कि वह अमेरीका के थे। यदि भारतीय होते तो हमारे राजनीतिक दलों व मीडिया ने हो-हल्ला खड़ा कर देना था। दूसरे अमेरीका सरकार उनका पूरा खर्चा भी दे रही थी।

पिता: खर्चा तो बेटा, हमारे भी कई कुत्ता प्रेमी देने को तैयार होते हैं। पर हमारे होटल फिर भी इजाजत नहीं देते।

बेटा: यही तो विडम्बना है, पिताजी। यही नहीं। जब होटल के एक बैरे ने एक को कुत्ता  कह दिया तो अमेरीकी अफसर भड़क उठे थे। उन्होंने उसे झिड़क कर कहा: उन्हें कुत्ता मत कहो। वह तो सेना के अफसर हैं और उनका अपना-अपना रैंक है। बेचारा बैरा खिसियाना होकर चुप हो गया कि कहीं ये अमेरीकी अफसर उसकी शिकायत ही न कर दे उसके बड़े अफसर से। उसने क्षमा मांग ली यह कहकर कि वह नादान है। मुश्किल से उसकी नौकरी बची होगी।

पिता: यह तो मुझे बड़ी अजीब बात लगती है।

बेटा: आपको लगे अजीब, पर है तो यह सच्चाई। इसीलिये तो मैं मौत आम आदमी की नहीं, उस महान घोड़े शक्तिमान की मांग रहा हूं।

पिता: पर बेटा, पुलिस के हाथों तो हर तीसरे दिन आम लोग पिटते हैं। उनकी टांगें भी

टूटती हैं। कई बार तो जानें भी चली जाती हैं। पर कभी किसी पुलिसवाले को सूली पर चढ़ाया गया?

बेटा: पिताजी, वह आम आदमी होते हैं। पर वह तो पुलिस का घोड़ा था। किसी की क्या हिम्मत कि वह उस घोड़े पर हाथ उठा लेता? उसे जख्मी कर देना तो बहुत बड़ी व बुरी बात है।

पिता: अच्छा, आम आदमी की कोई कीमत नहीं होती। एक ओर तो राजनीतिक दल ढिढ़ोरा पीटते हैं कि हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का हक है और उन्हीं की सरकारें प्रदेशों में जनता पर लाठियां बरसाती हैं, जब वह विरोध प्रदर्शन कर अभिव्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते हैं।

बेटा: यही तो विडम्बना है पिताजी। एक ओर तो हमारे राजनीतिक दल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिये संसद व विधानसभा की कार्यवाही नहीं चलने देते और वहीं दूसरी ओर अपने ही विधायकों व सांसदों की जुबान पर ताला लगा देते हैं। उत्तराखंड में क्याहुआ? वहां विधायकों ने अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग कर प्रदेश के मुख्यमंत्री  के विरूद्ध आवाज उठाई। यही उनकी अनुशासनहीनता बन गई। उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया।

पिता: तब यह तो दोगलापन हुआ।

बेटा: इसीलिये तो मैं कहता हूं कि आदमी की बजाय कुत्तेऔर घोड़े का जीवन और मौत बेहतर है। जब पुलिस की कार्रवाई में कोई व्यक्ति मर जाता है या बुरी तरह घायल हो जाता है तो सत्तापक्ष का कोई नेता कभी घायलों को देखने पहुंचता है क्या? यदि कोई आता है तो बस अपनी राजनीति खेलने।

पिता: तेरी यह बात तो ठीक है।

बेटा: पिताजी, आपको पता है कि घायल शक्तिमान को देखने मुख्यमंत्री दो बार गये। उसी घटना में कुछ लोग भी घायल हुये। पर मुख्यमंत्री तो क्या कोई मंत्री तक उनकी सुधबुध लेने नहीं गया। शक्तिमान के उपचार के लिये भूटान से एक अमेरीकी विशेषज्ञ हवाई जहाज से लाये गये। शक्तिमान की एक वीआईपी की तरह देखभाल हुई।

पिता: मैंने पढ़ा कि जब उसकी मौत हुई तो मुख्यमंत्री उसके अन्तिम संस्कार में शामिल हुये और उसकी आत्मा की शान्ति के लिये प्रार्थना की। उसकी मौत पर राज्यपाल व देश के अनेक गणमान्य महानुभावों व नेताओं ने उसे श्रद्धांजलि दी।

बेटा: मुझे तो लगता है पिताजी, अगला चुनाव शक्तिमान की शहादत पर लड़ा जायेगा।

पिता: बिल्कुल लड़ा जा सकता है। इस देश में तो बेटा आलू और प्याज के दामों पर सरकारें हार व जीत जाती हैं, शक्तिमान तो भला घोड़ा था और वह भी पुलिस का।

बेटा: बात तो आपकी ठीक है पिताजी। इसीलिये तो मैं चाहता हूं कि मुझे मौत मिले तो उस घोड़े की जो पुलिस का था और जिसका नाम था शक्तिमान और जिसका पुलिस सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार किया गया।

पिता: बेटा, तेरे से बहुत पहले तो मैं जाऊंगा। उसके बाद क्या होगा, वह तो ईश्वर ही जाने।

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