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कांग्रेस की अगस्ता उड़ान

कांग्रेस की अगस्ता उड़ान

एक वक्त वह भी था जब भारत को उसके महापुरुषों रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, गोपाबंधु दास और ऐसे ही अनेक नेताओं के लिए जाना जाता था। लेकिन नई पीढ़ी ए.राजा, कनिमोझी, कलमाड़ी, बंगारू लक्ष्मण और ऐसे अनेक नेताओं का नाम सुनकर उलझन में पड़ सकती है। भ्रष्ट नेताओं की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि सबका यहां जिक्र करना संभव नहीं है। देश की आत्मा लगभग हर रोज के घोटालों और भ्रष्टाचार की दास्तां से दागदार हो गई है। मीडिया की सुर्खियों और 24 घंटे हल्ला मचाने वाले टीवी चैनलों पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि देश में भ्रष्टाचार के अलावा कुछ होता ही नहीं है। मानो नेताओं के बीच भ्रष्टचार के मामलों में शिरकत करने की कोई अंधी दौड़ चल रही हो। और भ्रष्टाचार में गहरे धंसे होने के बावजूद लोकतंत्र में दोबारा चुनकर आ जाते हैं और हमारे देश के नायक बन जाते हैं।

अब देश अगस्तावेस्टलैंड हेलिकॉप्टर सौदे में भ्रष्टाचार और घूसखोरी की खबरों से हिल उठा है। मिलान की अदालत के फैसले में भारतीय वायुसेना के अधिकारियों, अफसरों, नेताओं के नाम आने से हड़कंप मचा हुआ है। इन्हें वीवीआईपी इस्तेमाल के लिए 12 वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद के लिए सौदेबाजी के दौरान बिचौलियों से रिश्वत मिली थी। इनमें पूर्व वायुसेना प्रमुख एस.पी.त्यागी तथा उनके रिश्तेदारों, तब के रक्षा सचिव, कोई एपी और अनेक लोगों के नाम हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इतालवी अदालत के फैसले में जिक्र हुए सिगनोरा गांधी और दूसरों के खिलाफ कोई ”पुख्ता’’ सबूत नहीं हैं। लेकिन, अगर मामले से इनका कोई लेना-देना नहीं है, तो इन नामों की चर्चा ही क्यों की गई है? क्या इतालवी अदालत कोई राजनैतिक खेल खेल रही है? इसमें साफ है कि इन ताकतवर राजनैतिक नेताओं को ”मैनेज’’ किया गया। इसी तरह यह भी आरोप है कि सौदे के पक्ष में या तथ्यों से गुमराह करने वाली खबरें लिखने के लिए 20 पत्रकारों को ”मैनेज’’ किया गया था। यह शर्मनाक है और मीडिया के एक वर्ग ने इन पत्रकारों की निंदा करने से भी परहेज किया है। क्या कोई यह मान सकता है कि करोड़ों रुपये के इस सौदे में यूपीए सरकार के ऊपरी हलकों को इसकी बारीकियों की जानकारी नहीं थी? यूपीए के राज में सोनिया सलाहकार परिषद की अध्यक्ष रही हैं और यह कहना कि उन्हें सौदे की जानकारी नहीं होगी, जान-बूझकर आंख मूंदने जैसा है। कांग्रेस के नेता अगर यह कह रहे हैं कि नेतृत्व इससे अनजान था तो यह भ्रष्टाचार के मसले पर गंभीरता का माखौल उड़ाने जैसा ही है। भारत के इतिहास में पहली दफा ऊंची राजनैतिक शक्चिसयतें तकनीकी फैसले में ”दखलंदाजी’’ करती पाई गई हैं। जाहिर है, भ्रष्टाचार में धंसे यूपीए-2 के राज में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिक का फर्क मिट-सा गया था। इसलिए छुपाने के लिए महज बयानबाजी बोफोर्स और उसमें इतालवी लोगों की शिरकत की याद को ताजा कर देती है।

यहां यह कहना गैर-वाजिब नहीं है कि इतालवी अदालत के फैसले में जिन लोगों का जिक्र आया है, अगर वे दोषी नहीं हैं तो क्या वे देश के सुप्रीम कोर्ट में स्वेच्छा से ऐसा हलफनामा दाखिल करेंगे, जहां अंतत: यह मामला पहुंचेगा कि जब तक जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होती और उनका नाम बरी नहीं हो जाता, तब तक वे चिकित्सकीय आधार पर भी देश से बाहर नहीं जाएंगे और अपना पासपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जमा करा देंगे? आखिर सुप्रीम कोर्ट ही हमारे संविधान के मुताबिक आम आदमी और कानून का अंतिम रक्षक है। इसकी वजह है कि ऊंचे और असरदार लोग ऐसा मानते हैं जैसे वे कानून से ऊपर हों। इस पृष्ठभूमि में सिर्फ सर्वोच्च अदालत ही कानून तोडऩे वालों को दंडित करता है और उस पर अंकुश रखता है। कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व इस चुनौती को स्वीकार नहीं कर सकता है। उसका फोकस तो झूठे वादों और सरकारी खजाने से खैरात बांटकर वोट बटोरने में है। सिर्फ न्यायपालिका ही इस कीचड़ को साफ करने की ताकत रखती है। हालांकि, उसकी अपनी समस्याएं भी हैं।

यह मानना जायज है कि जब देश में दूसरी सभी संस्थाएं नाकाम हो जाती हैं तो सुप्रीम कोर्ट ही देश की व्यवस्थाओं की रक्षा करने के लिए आगे आता है। हालांकि, विडंबना देखिए कि इटली की अदालत ने भारतीयों को घूस देने वालों को दंडित कर दिया, लेकिन भारत में घूस पाने वालों को राजनैतिक नेताओं ने छुट्टा छोड़ दिया। मुझे नहीं लगता कि कोई मीडिया या अखबार इस पर गंभीरता दिखा रहा है। शायद उन्हें लग रहा है कि कांग्रेस या यूपीए के घोटालों में कोई नई बात नहीं है, इसलिए चिंता करने की जरूरत नहीं। छोटे-छोटे मामलों पर हल्ला मचाने वाले वाममोर्चें की चुप्पी भी अचरज भरी है। इसलिए केद्र सरकार को बहस में समय बर्बाद किए बगैर पक्की निष्ठा वाले न्यायाधीशों की अगुवाई में उच्च स्तरीय जांच आयोग का गठन करना चाहिए और इतालवियों से घूस पाने वाले असली दोषियों का पता लगाना चाहिए। सरकार को इस आयोग की पूरी मदद करनी चाहिए, ताकि समय पर रिपोर्ट आ जाए और दोषियों को सजा दी जा सके।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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