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आत्मविकास का मार्ग है साधना

आत्मविकास का मार्ग है साधना

आधुनिक युग में रहने वाले अनेक व्यक्ति धार्मिक चिंतनधारा से दूर भागते हैं। युवा पीढ़ी तो मजाक में ही लेती हैं। यह सब करने का समय नहीं आया है यह बोल कर खुद को अलग रखते हैं। भजन, भक्ती, साधना योग जैसी चीजों को तो हम किसी और दुनिया की चीज महसूस करते हैं। साधना की बात हम करते हैं, लेकिन हकीकत में हम इस शब्द से डरते हैं। साधना और साधक इन दोनों के नाम से हम दूर भागते हैं। साधना एक कठिन कार्य है लेकिन, इतना भी कठिन नहीं होता कि हम खुद को उससे दूर रखें। असल में साधना क्या है वह हमें ज्ञात होना चाहिए।  किसी भी कार्य को एक निष्ठाभाव से करके अन्तिम चरण तक पहुंचाने के प्रयास को साधना कहा जा सकता है। केवल जप या ध्यान को हम साधना नहीं मान सकते हैं।  विद्यार्थी का पढ़ाई करके सफल होना, गृहिणी के घर के कार्य को सुचारू रूप से करके सबके मन को प्रसन्न रखना, यहां तक कि किसान का खेती करके फसल उपजाना भी साधना ही है। जटिल साधना एक प्रयास होता है लेकिन, साधना के लिये किये जाना वाला एक-एक प्रयास कामयाब होता है व्यर्थ नहीं जाता। साधक अंतिम चरण में न पहुंच कर भी साधना द्वारा उर्धगामि होता है। साधना में साधक की निष्ठा होने के साथ-साथ उसका अग्रह होना अत्यंत आवश्यक है। साधक का मन इतना दृढ होता है कि कोई भी बाहरी की चीज उसे आसानी से विचलित नहीं कर सकती है।

साधारण  मनुष्य हमेशा साधना से डरते हैं। उन्हें लगता है कि साधना के द्वारा कहीं वह खुद न बदल जाएं। जैसे छोटा बच्चा जब विद्यालय जाता है तो उसे इसी प्रकार का भय होता है। बच्चे को विद्यालय जाने पर हर चीज नियम से करनी पड़ेगी। जबकि खुद से वह हर चीज नियम से नहीं कर पायेगा। लेकिन बाद में धीरे-धीरे वही चीज बच्चों का जीवन गढऩे में सहायक होती हैं। साधना द्वारा साधक परिवर्तित नहीं होता बल्कि, साधना द्वारा अपने आप से वाकिफ होता है। जैसे जब सुनार सोने को जलाता है तो हमें लगता है कि सोना जल रहा है। असलियत में सोना कभी नहीं जलता, केवल उसके अंदर रहने वाली व्यर्थ की चीजे ही जलती हैं, जिनके जलने के बाद सोना और भी शुद्ध और चमकदार हो जाता है। हमारे अंदर उपस्थित आत्मा का परिवर्तन नहीं होता है, बल्कि साधना द्वारा केवल आत्मा विकसित होती है।

साधना द्वारा हमारे भीतर संयमशक्ति बढ़ती है। जब हमारे अंदर संयमशक्ति उत्पन्न हो जाती है, तो हम दूसरों के मुकाबले अधिक सुखी और संतुष्ट रहते हैं। हम अपनी इन्द्रियों को वश में करके हर चीज पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। जो व्यक्ति केवल अपना कर्तव्य मान कर साधना करते हैं, उन्हें सफलता नहीं मिलती। जो इंसान अपनी साधना को अंदर से अपने ईश्वर, गुरू, परमात्मा के लिए प्रेम भाव से करते हैं उन्हें सफलता आसानी से मिलती है। जीवन में प्रेम पूर्वक साधना करने से सफलता पाने में कोई भी रूकावट नहीं आती।

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