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बिन कहे, सब कुछ

बिन कहे, सब कुछ

व्यंग्य कभी-कभी लोगों को गुदगुदाने का काम करता है तो कभी-कभी लोगों की भावनाओं पर भी घात करता है। व्यंग्य समाज एवं व्यक्ति की दुर्बलताओं, अवगुणों, मिथ्याचार, असंगति का उद्घाटन करता है, किन्तु यह उद्घाटन हंसी उड़ाने के लिए नहीं किया जाता है, इस प्रक्रिया में वेदना और कसक होती है। यदि व्यंग्यकार सामाजिक दृष्टि से सजग नहीं है तो विसंगतियों की पहचान करने में चूक कर सकता है फलस्वरूप व्यग्ंय के नाम पर विनोद, कटाक्ष, उपहास लिख सकता है। व्यंग्य का प्रयोजन हास्य, विनोद एवं मनोरंजन उत्पन्न करना नहीं होता, व्यंग्य संयमपूर्ण सृजन है। व्यंग्य करुणा से संचालित होता है अत: उसमें नैतिकता बोध होता है, व्यंग्यकार सामाजिक उत्तरदायित्व को तीव्रता से महसूस करता है।

PAGE 56-57पुस्तक ‘ईमानदार व्यक्ति की परिभाषा’ लेखक कुशलेन्द्र श्रीवास्तव का एक व्यग्ंय संग्रह है। इसमें कई व्यंग्यात्मक कथायें हैं जिनमें लेखक ने परिस्थतियों को ध्यान में रखते हुए व्यंग्य के जरिये अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है। एक बेहतर समाज और बेहतर मनुष्य की प्रतिष्ठा ही व्यंग्य साहित्य का लक्ष्य है। यह भी सच है कि साहित्य की रचना जीवन-मूल्यों की अभिव्यक्ति के लिये ही होती है, जीवन मूल्य काल विशेष के सामूहिक अनुभवों से निर्मित होते हैं, व्यक्ति के रूप में साहित्यकार इन अनुभवों को भोगता है, किन्तु केवल उसके व्यक्तिगत अनुभवों की अभिव्यक्ति साहित्य का निर्माण नहीं करती है, जब साहित्यकार इन अनुभवों को व्यापक परिवेश के माध्यम से देखता है तब उसकी सृजन दृष्टि व्यापक हो जाती है तब ही श्रेष्ठ एवं सार्थक साहित्य का जन्म होता है।

ईमानदार व्यक्ति की परिभाषा

लेखक                    : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

प्रकाशक             : अनुराधा प्रकाशन

मूल्य                      : 200 रु.

पृष्ठ                        : 96

लेखक कुशलेन्द्र श्रीवास्तव की व्यंग्य रचनाओं में सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव दृष्टिगत होता है किन्तु कुछ रचनाओं में कटाक्ष, उपहास और विनोद का भाव इतना प्रबल है कि रचना का व्यंग्य समग्र प्रभाव नहीं पड़ा है। लेखक कुशलेन्द्र श्रीवास्तव की रचनाएं अत्यधिक प्रभावशली हैं जो सीधे हमारे सामाजिक जीवन से साक्षात्कार कराती हैं। उदाहरणस्वरूप– ‘साहित्यकार की अंतिम यात्रा’’, ”ईमानदार व्यक्ति की परिभाषा’’, ”रावण का पुतला’’, ”सरकारी ऑफिसर का तिलिस्म’’ आदि रचनाएं आदर्श व्यंग्य की सभी शर्तों को पूरा करती हैं, इन रचनाओं का स्थायी महत्व है, सामायिक नहीं।

ईमानदार व्यक्ति की परिभाषा में लेखक ने नेता जी की टिकट को लेकर व्यंग्य किया है कि कैसे वह टिकट की लाइन में लगें हैं। इसके लिए वह नित नया कुर्ता बदल कर तैयार रहते हैं कि न जाने कब उनका नंबर आ जाये और जब इंटरव्यू का नंबर आया तो उनसे सवाल पूछें गये–थानें में कितनी रिर्पोर्ट दर्ज हैं? जवाब था एक भी नहीं, दूसरा सवाल स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार के कितने आरोप लगे हैं? एक भी नहीं। तीसरा सवाल भ्रष्टाचार करने का कितना मन करता है?  बिल्कुल नहीं। चौथा सवाल किस गुट में शामिल हो? किसी में नहीं। बस फिर क्या था हाईकमान नाराज नजर आने लगे और कहा कि तुम्हारे पास नहीं के अलावा और कोई बात नहीं क्या जवाब में? फिर वहीं जी नहीं। बस फिर क्या नेताजी की ईमानदार नेता बनने के चक्कर में टिकट ही कट गई। इस तरह के तमाम व्यंग्य इस पुस्तक में मौजूद हैं जो हमारे समाज की कुछ बुराईयों को व्यंग्य के रूप में इंग्ति करती हैं। इस पुस्तक में लेखक के 20 अलग-अलग व्यंग्य हैं। जो समाज की बुराईयों को दर्शाते हैं।

लेखक कुशलेन्द्र श्रीवास्तव में यह सृजन दृष्टि सार्थक अभिव्यक्ति करने में समर्थ सिद्ध हुई हैं साथ ही जीवन के प्रति उनका यथार्थवादी दृष्टिकोण उनका सामाजिक सरोकार उनके व्यंग्य को व्यक्तिगत सीमाओं से निकालकर सामाजिक पृष्ठभूमि पर स्थापित करने में सक्षम है। कुशलेन्द्र श्रीवास्तव का रचनाकर्म दायित्वपूर्ण सृजन है। उनकी व्यंग्य रचनाएं सामाजिक चेतना और परिवर्तन की पृष्टभूमि को प्रस्तुत करने में सक्ष्म हैं।

प्रीति ठाकुर

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