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सिंहस्थ और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति

सिंहस्थ और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति

मेषराशिगते सूर्ये सिंहराशौ बृहस्पतौ।

उज्जनियां भवेत्कुंभ:सर्वसौख्य विवर्धन:।।

अर्थात सिंहस्थ कुंभ पर्व सिंह राशि के गुरु में मेष का सूर्य आने पर उज्जैन में मनता है। उज्जैन का कुंभ पर्व सिंहस्थ नाम से प्रचलित है, अत:सिंह का गुरु छोड़कर इस पर्व की कल्पना नहीं की जा सकती है। उज्जयिनी के पर्व का निर्णय यहीं के विद्वान करते हैं। कुंभ सिंहस्थ जैसे पर्वों का काल निर्णय परंपरागत प्रमाण तथा भावी ग्रहस्थिति को दृष्टि में रखकर ही होता है। अर्थात मेष राशि में सूर्य और सिंह राशि में बृहस्पति होता है तो अवंतिका नगरी में मोक्ष देने वाले सिंहस्थ कुंभ पर्व का आयोजन होता है।  इस सिंहस्थ कुंभ मेले के प्रति लोगों में कितनी आस्था है, इसे इसी से समझा जा सकता है कि इसमें तकरीबन 5 करोड़ श्रद्धालुओं ने क्षिप्रा में स्नान किया। कुंभ मेले में सिर्फ देश से ही नहीं बल्कि, विदेशों से भी भारी संख्या में सैलानी आते हैं। इसके मद्देनजर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सुरक्षा व्यवस्था से लेकर घाटों आदि को सम्यक प्रकार से व्यवस्थित रूप देने का कार्य मध्य प्रदेश सरकार द्वारा  किया जाता रहा है ।

सांस्कृतिक तौर पर देखें तो भारतीय संस्कृति के समन्वयकारी स्वरूप का एक विराट दर्शन हमें इस कुंभ मेले में होता है, जहां साधू-संतों से लेकर आमजन और नेता तथा विदेशी पर्यटकों तक का एक विशाल सैलाब उमड़ता है और ऊंच-नीच, जाति-धर्म, अमीरी-गरीबी के भेदभाव से मुक्त होकर महाकुंभ के स्नान का अक्षय पुण्य या विशेष संतोष प्राप्त करता है। हालांकि, वर्तमान समय में कुंभ मेले में बड़े साधू-संतों को मिलने वाली विशेष व्यवस्थाओं आदि के जरिये कुंभ की इस समानता की अवधारणा का क्षरण अवश्य हुआ है, जो कि अपनी परंपराओं को विकृत रूप दे देने की हमारी प्रवृत्ति का ही एक उदाहरण है।

 बहरहाल, कुंभ के विषय में अगर पौराणिक मान्यताओं पर गौर करें, तो प्रसंग है कि समुन्द्र-मंथन से उत्पन्न अमृत के घड़े (कुंभ) को असुरों से बचाने के लिए देवताओं ने बारह दिन तक समूचे ब्रह्मांड में छुपाया था। इस दौरान उन्होंने इसे धरती के जिन चार स्थानों पर रखा, वो ही चारों कुंभ के आयोजन स्थल बन गए। इलाहाबाद और हरिद्वार में गंगा का तट तथा नासिक की गोदावरी और उज्जैन की क्षिप्रा के तट, ये कुंभायोजन के चार स्थल हैं।

इन चारों स्थानों पर कुंभ के आयोजन के लिए ज्योतिष की विभिन्न अवधाराणाएं हैं, जिनके अनुसार जब जीवनवद्र्धक ग्रहों का स्वामी बृहस्पति किसी जीवन संहारक ग्रह की राशि में प्रवेश करता है, तो इस संयोग को शुभ तिथि के रूप में माना जाता है और इसी क्रम में एक समय ऐसा भी आता है, जब बृहस्पति का प्रवेश जीवनसंहारक ग्रहों के प्रधान शनि की राशि कुंभ में होता है और इसका प्रभाव बिंदु हरिद्वार बनता है।

इस स्थिति में कुंभायोजन हरिद्वार में होता है। ठीक इसी प्रकार बृहस्पति का शुक्र में और सूर्य-चन्द्र का शनि की मकर राशि में प्रवेश इलाहाबाद के लिए कुंभायोजन का योग बनाता है और यही वो समय भी होता है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं, जिसे शुभ मानते हुए मकर संक्रांति के रूप में मनाया भी जाता है।

कुछ इसी प्रकार जब बृहस्पति का प्रवेश सूर्य की सिंह राशि में होता है, तो ये संयोग नासिक की गोदावरी के लिए कुंभायोजन का सुयोग उत्पन्न करता है। बृहस्पति की सिहंस्थ स्थिति में ही अगर सूर्य मेष राशि और चंद्रमा तुला राशि में पहुंच जाए, तो ये उज्जैन के लिए कुंभ के आयोजन का संकेत होता है। वर्तमान में यही ग्रह स्थिति बनी, जिस कारण उज्जैन में कुंभायोजन किया गया था। वैसे, सामान्य जनों की समझ के लिए ये ज्योतिषीय अवधारणाएं निस्संदेह बड़ी ही जटिल प्रतीत होती हैं, पर पुरातन काल से इन्ही के आधार पर कुंभ का आयोजन होता चला आ रहा है।

यूं तो इन चारों ही स्थानों का कुंभ स्नान फलदायी आस्था से पुष्ट है, पर इलाहाबाद के संगम तट का कुंभ स्नान इनमे भी श्रेष्ठ माना जा सकता है, क्योंकि, यह गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम का वो अद्भुुत स्थल है, जिसके प्रति लोगों के मन में अनायास ही अनंत श्रद्धा का भंडार है, उस पर यदि कुंभ का शुभ योग बने तो कहना ही क्या!

वैसे, ज्योतिष-विज्ञान की उपयुक्त मान्यताओं से अलग श्रद्धालुजनों की अपनी एक सीधी और सरल मान्यता भी है कि सकारात्मक शक्तियों द्वारा नकारात्मक शक्तियों के दुष्प्रभाव को रोकने का एकजुट प्रयास ही कुंभ की पृष्ठभूमि है।

अब चूंकि, अधिकांश भारतीय पर्वों में लोकरंजन ही नहीं लोककल्याण का भाव भी निहित होता है और इस कुंभ के सम्बन्ध में भी श्रद्धालुओं का यही मत है कि कुंभ के स्नान से मानव के दोष तो मिटते ही हैं, संसार की विपत्तियों का भी नाश होता है। लेकिन श्रद्धालुओं के इस आस्थापूर्ण मत से इतर यदि तार्किक दृष्टि से विचार करें तो भी यही स्पष्ट होता है कि कुंभ पर्वों का उद्देश्य केवल आस्थापूर्ति और लोकरंजन ही नहीं है, बल्कि इसमे लोककल्याण का भाव भी निहित है।

देखा जाए तो पालक-पोषक होने के कारण और कुछ पौराणिक आस्थाओं के कारण भी, भारत में पुरातन काल से ही नदियों को मां का स्थान प्राप्त रहा है। ऐसे में, बहुत से विद्वानों का ऐसा मानना है कि प्राचीनकाल से निरंतर आयोजित हो रहे इन कुंभ पर्वों का एक प्रमुख उद्देश्य नदी-संरक्षण भी है।

यकीनन अगर हम स्वयं भी आस्था व अध्यात्म के दायरे से थोड़ा बाहर आकर तार्किकता से कुंभ के उद्देश्य पर विचार करें, तो विद्वानों का ये कथन काफी हद तक उचित व व्यवहारिक ही प्रतीत होता है। चूंकि इस बात की पूरी संभावना है कि हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों द्वारा नदियों के प्रति मातृगत आस्था का प्रतिस्थापन व उनमे स्नान को धर्म से जोडऩे का विधान, उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए ही किया गया होगा तथा इसी क्रम में नदियों में स्नान को और महत्वपूर्ण रूप देने के लिए कुंभ जैसे स्नान पर्व की परिकल्पना भी की गई होगी।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि कहीं न कहीं उनका यह मानना रहा होगा कि लोग यदि नदियों के प्रति श्रद्धालु होंगे तो उनकी देख-रेख, साफ-सफाई और संरक्षण करेंगे तथा कुंभ जैसे स्नान पर्वों के समय एकजुट होकर नदियों के लिए कार्य करेंगे ताकि उनमे स्नान आदि कर सकें।

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विचार महाकुंभ : दुनिया के नाम सन्देश

22 अप्रैल से शुरू हुए सिंहस्थ कुंभ के तहत 12 से 14 मई तक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत और समापन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हुए।

‘अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ’ के तहत उज्जैन के करीब निनोरा में तीन दिवसीय (12 से 14 मई तक) संगोष्ठी हुई, जिसमें कृषि, कुटीर उद्योग, महिला सशक्तीकरण और स्वच्छता एवं सरिता जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। संगोष्ठी में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न विषय के विद्वान शामिल हुए। कार्यक्रम स्थल पर प्राचीन भारतीय संस्कृति के विकास तथा मध्यप्रदेश के विकास पर केंद्रित प्रदर्शनियां लगाई गईं। साथ ही इस महाकुंभ में 100 देशों के लोग शामिल हुए और करीब 6,000 से अधिक बुद्धिजीवी कार्यक्रम का हिस्सा बनें।

इस संगोष्ठी के समापन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया के नाम भारत का संदेश दिया। श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना के साथ सिंहस्थ घोषणापत्र जारी करते हुए उन्होंने 51 अमृत बिंदुओं पर चर्चा की। इसमें नारी शक्ति, कृषि, कुटीर, जल संरक्षण और पर्यावरण जैसे 51 बिंदुओं को शामिल किया गया है। इस अवसर पर मोदी ने कहा कि समाज के लिए नि:स्वार्थ भाव से काम करने वाले लोगों की शुभ शक्तियों को एक दिशा में लगना होगा। संत समाज के आशीर्वाद से अपना भाषण शुरू करते हुए मोदी ने कहा कि कुंभ अद्भुत सामाजिक संरचना है, इससे समाज की दिशा तय होती थी। महाकुंभ सिर्फ नागा साधुओं का मेला नहीं बल्कि, दुनिया को सीख देने की परंपरा है। सिंहस्त मेले के प्रबंधन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा–कुंभ शानदार प्रबंधन का एक अद्भुत उदाहरण है। दुनिया को इसे केस स्टडी के तौर पर अपनाना चाहिए।

मोदी ने संतों से आह्वान किया कि वह लोग हर साल एक हफ्ता भक्तों के साथ इस तरह का विचार मंथन करें और समाज से जुड़े मुद्दों पर रोडमैप तैयार करें। आतंकवाद और ग्लोबल वार्मिंग को दुनिया के लिए खतरा बताते हुए मोदी ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का नारा दोहराया। उन्होंने कहा कि दुनिया के साथ मिलकर चलने के लिए रूढि़वादी पुरानी परंपराओं को बदलने की जरूरत है। हमारी इतने वर्षों की परंपरा को दुनिया को उसी की भाषा में समझाने की जरुरत पर भी उन्होंने बल दिया। इस आयोजन को सफल बनाने के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जमकर तारीफ की।

सिंहस्त के बहाने

सिंहस्त कुंभ से जब प्रधानमंत्री मोदी ने 51 अमृत बिन्दुओं को जारी करते हुए दुनिया को सन्देश दिया, इससे यह साफ हो गया की मोदी सरकार कल्चरल डिप्लोमेसी को बढ़ावा दे रही हैं। पिछले डेढ़ साल से लगातार मोदी सरकार ने तमाम ऐसे कदम उठाये हैं जिससे यह प्रतीत होता है कि अपने पारंपरिक ज्ञान और सम्बन्धों का प्रचार-प्रसार किया जा रहा हो।  नेपाल में जा कर पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा अर्चना करना, ढाका में ढाकेश्वरी मंदिर जाना, जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ बनारस के दशास्वमेध घाट पर गंगा आरती करना, और फिर सितंबर 2014 में क्योटो में बौद्ध मंदिरों में जाना, यह सभी घटनाएं इसी बात की तरफ इशारा करती हैं।

पिछले कुछ समय से लगातार मोदी सरकार इस तरफ प्रयासरत रही है की कैसे दुनिया के सामने अपने सालों से अर्जित किये हुए आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार करें। वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक गणनाओं में अध्यात्म का पुट डाल कर मोदी दुनिया को बताना चाहते हैं कि हमारे देश की इतने सालों पुरानी परंपराएं और ज्ञान ही विश्व के तमाम संकटों के निवारण के लिए काफी हंै। एशिया के देशों के बीच अपनी प्रबुद्धता साबित करने के लिए मोदी सरकार अपने ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी पर लगातार काम कर रही है। अंतर्राष्ट्रीय बुद्ध दिवस मनाने का आइडिया भी मोदी जी का ही था। बुद्ध की शिक्षाएं ही एक ऐसी कड़ी है जो सभी एशियाई देशों को जोड़ती हैं, फिर चाहे वह चीन हो, श्रीलंका हो, वियतनाम हो या फिर कम्बोडिया हो। मोदी सरकार ने विदेश नीति में अन्य देशों से सांस्कृतिक रिश्तों पर जोर डालना शुरू किया है जो की अब तक नदारद थी।

सऊदी अरब में जा कर वहां के सबसे बड़े मस्जिद जायेद ग्रैंड में जाना और अबु धाबी के शासकों के साथ सेल्फी लेना, लोग अभी तक भूले नहीं होंगे। फिर अभी अपनी ईरान की यात्रा के दौरान तेहरान में गुरुद्वारा जाना और फिर ईरान के साथ पुराने सांस्कृतिक रिश्तों का बखान करना, यह सारी चीजें इसी बात की तरफ इशारा करती हैं।

यह कहना जल्दबाजी होगी की मोदी सरकार के इन कदमों से विश्व के देश भारत के प्रति अपने रवैये में बदलाव करेंगे, लेकिन यह भारत के पास नया साधन है जिससे वो अपने राष्ट्रहित का ख्याल रख सके। मोदी लोगो की आकांक्षा की मूर्त हंै और भारतीय संस्कृति पर उनके जोर ने ही उन्हें लोगो का प्रिय बनाया है तो उनका यह कल्चरल डिप्लोमेसी का प्रयोग देश के लिए फायदेमंद साबित होना चाहिए।

नीलाभ कृष्ण

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