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कांग्रेस कगार पर नहीं हो सकती

कांग्रेस कगार पर नहीं हो सकती

यह सही है कि आंकड़े अक्सर अद्र्धसत्य ही जाहिर करते हैं लेकिन धारणाओं के बनिस्बत वे सच के ज्यादा करीब होते हैं। मसलन, पांच राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरि के हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों के नतीजों के बारे में महज मोटे आंकड़ों पर गौर करें तो इन राज्यों की कुल 824 सीटों में से कांग्रेस को 115 जबकि भाजपा को 64 सीटें ही मिली हैं। लेकिन आम धारणा यह है कि राष्ट्रीय परिदृश्य पर कांग्रेस का शामियाना सिमटता जा रहा है और उसकी जगह भाजपा लेती जा रही है। न आंकड़े झूठ बोल रहे हैं, न ये धारणाएं गलत हैं। दोनों की सच्चाइयों के योग से वह असलियत उभरती है जिससे देश की सियासत के बदलते रंगों का अंदाजा होता है।

भाजपा पूर्वोत्तर के बड़े राज्य असम में धूम-धड़ाके के साथ लगभग आधी 60 सीटें (कुल सीटें 126) हासिल करने में कामयाब हो पाई है। लेकिन यह ध्यान में रखना होगा कि उसकी यह विजय कांग्रेस के एक धड़े के बड़े नेता हेमंत विस्वा सर्मा (जिन पर भाजपा ही पहले भ्रष्टाचार के कई मामलों में हमलावर रही है और हाल तक उनकी जांच बैठाने का वादा करती रही है) को शामिल करने और असम गण परिषद तथा बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट से गठजोड़ कायम करने से हुआ है। इस मायने में दिल्ली में भले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह फूलों की बारिश के बीच अपने सिर जीत का सेहरा बांध लें मगर राज्य में यह सर्बानंद सोनोवाल, हेमंत विस्वा सर्मा और प्रफुल्ल महंत की तिकड़ी के परिश्रम से ही हुआ है। सर्बानंद भी एक समय अगप में ही रहे हैं। एक तथ्य यह भी है कि भाजपा को यह हासिल करने में कम -से-कम हाल के तीन चुनाव और केंद्र में एक अदद सरकार की दरकार पड़ी है।

PAGE 46-49_Page_1इस लिहाज से देखें तो उसे पश्चिम बंगाल, केरल या तमिलनाडु में अपनी पैठ बनाने में अभी काफी वक्त लगेगा। केरल में 1 और बंगाल में 3 सीटें उसे जो मिली हैं, वह भी लंबे समय की आरएसएस की सक्रियता के बाद हासिल हुई हैं और मोदी-शाह की टोली के आक्रामक प्रचार अभियान का सिर्फ इतना फर्क पड़ा है कि कुछ वोट प्रतिशत बढ़ गया है। वह भी बंगाल और तमिलनाडु में उसका वोट प्रतिशत 2014 के मुकाबले घटा है। असम में भाजपा की वोट हिस्सेदारी (29.5 प्रतिशत) काफी बढ़कर भी कांग्रेस (31 प्रतिशत) के मुकाबले कम है। अगर भाजपा की वोट हिस्सेदारी में अगप के (8.1) और बोडो पीपुल्स फ्रंट के (3.9) वोट प्रतिशत को जोड़ दें तब भी वह 41.5 प्रतिशत ही बैठता है, जो कांग्रेस और बदरूद्दीन अजमल के ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के 13 प्रतिशत वोट के योग 44 प्रतिशत से कम हैं। इसलिए ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के अपने नारे को साकार करने के लिए भाजपा को अभी काफी लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी।

यह भी गौर किया जाना चाहिए कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली एनडीए की सरकार बनी थी तब भी पूर्वोत्तर और बंगाल के साथ केरल वगैरह में भाजपा के प्रति दिलचस्पी कुछ बढ़ गई थी। यहां तक कि केंद्र में कश्मीर की नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी सरीखी पार्टियां भी अलग-अलग समय में उसकी हमकदम बन गई थीं। लेकिन केंद्र की सरकार बदलते ही समीकरण बदलने लगे थे। इसलिए भाजपा के विस्तार के लिए केंद्र में सरकार जरूरी है। कांग्रेस के लिए भी ठीक यही स्थिति है लेकिन, उसकी विरासत और लंबे समय से पूरे देश में मौजूदगी की वजह से राज्यों में उसकी धाराणाएं हमेशा मौजूद रहती हैं। इसी एहसास से भाजपा के बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी कुछ इस तरह अपने पार्टीवालों को चेताते रहे हैं कि कांग्रेस उस महानदी की तरह है जो किसी भी भारी बरसात से सैकड़ों नदी-नालों के पानी से लबालबा हो उठती है, इसलिए उसे खत्म हुआ मानने का भ्रम नहीं पालना चाहिए।

एक दूसरा आंकड़ा देखें तो तस्वीर ज्यादा साफ होती है। वाम मोर्चे को इन चुनावों में 124 सीटें (बंगाल में 33 और केरल में 91), तृणमूल कांग्रेस को 211 सीटें, अन्नाद्रमुक को 134 सीटें, द्रमुक को 94 सीटें मिली हैं। यानी कांग्रेस और भाजपा के मुकाबले इनका पलड़ा अपने-अपने राज्यों में काफी भारी है। यह भी गौर कर सकते हैं कि इनके दबदबे वाले इलाकों में भाजपा की पैठ न के बराबर ही है। असल में राज्यों में क्षत्रपों के उभार के कारण केंद्र की सियासत हाल के लंबे दौर में राज्यों पर ज्यादा-से-ज्यादा आश्रित होती गई है। यह भी गौर करें कि जिन राज्यों में कोई क्षेत्रीय दल प्रभावी नहीं हैं, उन्हीं में भाजपा कांग्रेस को विस्थापित करने में कामयाब हो पा रही है और उसे यह मुकाम बहुत हद तक कांग्रेस से टूटे नेताओं को शामिल करके हासिल हो पा रहा है, जिन पर वही तमाम तरह के आरोप मढ़ती रही है और दागी बताती रही है। ऐसे में उसका ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का दावा तो बेमानी हो ही गया है, खास विचारधारा की पार्टी कहलाने पर भी कई तरह के सवाल उठ सकते हैं। बेशक, उसके पितृ संगठन आरएसएस की अपनी सोच है लेकिन मोदी के ‘विकास, विकास, विकास’ के एजेंडे में वह कितना फिट बैठता है, इस पर पर्याप्त विवाद की गुंजाइश है।

मोदी का यह विकास उसी नव-उदारवादी धारा और ‘क्रोनी कैपटलिज्म’ का आक्रामक पर्याय है, जो कांग्रेस कुछ नरमी के साथ करने की बात करती है। और मौजूदा चुनावों को देखें तो पांच राज्यों में से कम-से-कम तीन राज्यों में जनादेश ऐसी सरकारों के लिए पूरे बहुमत से मिला है, जो इसके विपरीत गरीब समर्थक सब्सिडी और राज्य की कल्याणकारी भूमिका पर अधिक जोर देती हैं। यहां तक कि असम में वोट लोगों को अधिक सहूलियत दिलाने के नाम पर मिला है, न कि मोदी के ‘विकास, विकास, विकास’ को। यह मोदी के चुनावी भाषणों से भी स्पष्ट है। यह भी गौर किया जाना चाहिए कि असम में मोदी और शाह के आक्रामक अभियान को सीमित करना पड़ा। उनके दौरे कम हुए। उन्हें इतना श्रेय जरूर जाता है कि उन्होंने हालात के मद्देनजर फैसले लिए।

दरअसल पिछले साल दिल्ली और बिहार में हार का सामना करने के बाद इस साल भाजपा ने वह सबक गले लगा लिया जिसकी बात उसके विरोधी दलों की ओर से हो रही थी। बिहार में नीतीश की अगुवाई में भाजपा के खिलाफ गठबंधन बनाकर जीत हासिल करने के बाद इस फॉर्मूले पर चलने के बोल तो कांग्रेस नेतृत्व की ओर से उठे थे, लेकिन असम में इस सीख पर चलने का भाजपा ने फैसला किया और वह उसमें सफल हुई। मोदी और शाह के बदले सर्बानंद सोनोवाल और हेमंत विस्वा सर्मा को खुलकर खेलने दिया गया। कांग्रेस असम के मुख्यमंत्री (अब पूर्व) तरुण गोगोई को दो बातों को मनाने में नाकाम रही। एक, गठजोड़ बनाएं और दूसरे स्थानीय मूल निवासियों की पहचान को ज्यादा तवज्जो दें। गोगोई के लिए एक तो 15 साल के राज से लोगों का मोहभंग और दूसरे अपने सांसद बेटे को उत्तराधिकारी बनाने के लालच में दूसरे नेताओं की उपेक्षा तथा गठजोड़ के बदले अकेले करिश्मा दिखाने की जिद्द भारी पड़ी।

उनकी इस जिद्द को कांग्रेस आलाकमान ने भी अपने आलस्य और अहंकार में परवान चढऩे दिया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का इससे नाकारापन ही साबित हुआ है। नतीजों के बाद हेमंत विस्वा सर्मा ने एक इंटरव्यू में कहा कि राहुल गांधी के पास तो हम लोगों से मिलने का समय ही नहीं था। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले साल जुलाई में वे राहुल से मिले थे तो वे कतई गंभीर नहीं लग रहे थे, बल्कि उनकी बातचीत घूम-फिरकर कुत्तों पर आकर सिमट जाती थी। हेमंत विस्वा सर्मा के मुताबिक, उन्होंने तब भी राहुल से कहा था कि यही रवैया रहा तो 25 से ज्यादा सीटें नहीं जीत पाएंगे लेकिन, राहुल ने कहा कि वे जीतेंगे। कांग्रेस और राहुल गांधी को अपने सारे कुनबे को साथ लेकर चलने की नीति के बारे में सोचना होगा, वरना भाजपा उन्हीं के कुनबे के नेताओं से अपनी राह आसान करती रहेगी। उन्हें असम में गठबंधन बनाने में मदद करने की पेशकश नीतीश कुमार ने भी की थी और कहा था कि वे बदरूद्दीन अजमल और अगप से बातचीत कर सकते हैं। लेकिन राहुल इसके लिए गोगोई को मनाने में कामयाब नहीं हो पाए। इसके बदले अगप से भाजपा ने गठजोड़ कर लिया।

हालांकि कांग्रेस को बंगाल में वाममोर्चे के गठजोड़ से फायदा हुआ। उसे पिछले विधानसभा के मुकाबले दोगुनी सीटें मिल गईं। अब वामपंथियों का कहना है कि उनका वोट तो कांगे्रेस को मिला पर कांग्रेस ने अपना वोट उन्हें नहीं दिलवाया। बंगाल का समीकरण जानने वालों को यह अंदाजा होना चाहिए कि कांग्रेस और वाम के वोट एक-दूसरे से नहीं मिल सकते। खैर! केरल में तो वाममोर्चे ने कांग्रेस को अच्छा सबक सिखा कर इसकी कुछ भरपाई कर ली है। तमिलनाडु में कांग्रेस को द्रमुक से साझा का कोई खास फर्क नहीं पड़ा। हालांकि द्रमुक गठजोड़ की हार में करुणानिधि के बेटों स्टालिन और एम.के.अलागिरी की टकराहटों का ज्यादा असर है, न कि कांग्रेस का। वहां साबित हुआ कि द्रमुक के बारे में राय अभी ज्यादा नहीं बदली है। फिर भी उसकी सीटें बढ़ गईं।

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अब यह देखना जरूरी है केंद्र की सियासत पर इसका क्या असर पडऩे वाला है। ममता बनर्जी और जयललिता दोनों ही कांग्रेस का विरोध झेल चुकी हैं और दोनों के मन में ही खटास है। इसलिए मोदी सरकार के लिए खासकर राज्यसभा में राहें कुछ आसान हो सकती हैं। ममता ने जीएसटी पर समर्थन की हामी भरी ही है। इस तरह कांग्रेस के हाथ से फिलहाल तो बाजी छूटती जा रही है। लेकिन मोदी सरकार की दिक्कत यह भी है कि उसके कट्टर संघ परिवारी रह-रहकर ऐसा विवाद छेड़ देते हैं जिससे माहौल कटु हो जाता है। अगर उस पर मोदी काबू पा सकें तो उनकी राहें आसान हो सकती हैं। हालांकि अगले साल बड़ी चुनौती है। उत्तर प्रदेश, गुजरात जैसे बड़े राज्य हैं, जहां भाजपा की परीक्षा होनी है। इसलिए 2019 की केंद्र की लड़ाई के पहले अभी बहुत कुछ होना है।

हरिमोहन मिश्र

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