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विकास के एजेंडे ने असम में खिलाया कमल

विकास के एजेंडे ने असम में खिलाया कमल

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की सबसे बड़ी घटना है असम में भाजपा की भारी जीत। यूं तो काफी पहले से ही भाजपा की जीत की उम्मीद जताई जा रही थी लेकिन, उसकी जीत का आंकड़ा चकित करने वाला है। यह चमत्कार हो सका भाजपा के विकास के एजेंडे के कारण जो असमिया भाषी और बंगाली भाषी हिन्दुओं और हिंदू आदिवासियों को केसरिया झंडे के नीचे लाने में सफल रहा। लंबे समय से बांग्लादेशी घुसपैठ से प्रताडि़त असम के हिन्दुओं को आखिरकार अपनी ताकत दिखाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

भाजपा और असम गणपरिषद की सरकार पहले भी बनी थी, लेकिन तब यह गठबंधन विफल हुआ था, क्योंकि कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों की असुरक्षा का मुद्दा उठाकर जहां भाजपा की रणनीति को बेअसर कर दिया था, वहां 35 फीसदी मतदाता मुस्लिम हैं, वहीं  कांग्रेस ने तरुण गोगोई को मजबूत असमी नेता के रूप में पेश कर अगप की भी चलने नहीं दी थी। असम में गोगोई की तीन बार जीत इसी का नतीजा थी। लेकिन मुस्लिमों के लिए एआईयूडीएफ (ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के विकल्प के तौर पर उभरने और आईएमडीटी ऐक्ट को खत्म कर देने से अल्पसंख्यक वोटों का विभाजन हुआ, जिसने कांग्रेस को कमजोर किया। इस चुनाव में अल्पसंख्यक वोट जहां कांग्रेस और एआईयूडीएफ में बंटा, वहीं भाजपा हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के अलावा असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ गठजोड़ कर असम की पहचान  को मजबूत करनेवाली पार्टी के रूप में उभरी।

लोकसभा चुनाव में भी हमने देखा कि कम-से-कम 82 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को जीतने लायक वोट मिले थे, या उसके उम्मीदवार नम्बर दो पर थे। इससे कई विश्लेषकों ने उस समय भी कहा था कि यदि आज राज्य में चुनाव करवा दिए जाएं तो भाजपा का सत्ता में आना तय है। जब से राज्य में मुसलमान आबादी 35 फीसद का आंकड़ा पार कर गई है, और मुस्लिम पार्टी एआईयूडीएफ का राज्य में उत्थान हुआ है, तब से यहां हिंदू वोट एकजुट हो गए हंै और इसी कारण इस चुनाव में क्षेत्रीयतावाद उभर नहीं पाया। पिछले विधानसभा चुनाव में हिंदू मतदाताओं के सामने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ एक चुनौती की तरह सामने खड़ी हो गई थी, और उन्हें लगा होगा कि यदि बदरुद्दीन को नहीं रोका गया तो किसी समय वह राज्य की सत्ता हासिल कर सकते हैं। चूंकि कांग्रेस का कोई विकल्प सामने नहीं था, इसलिए लोगों ने कांग्रेस को उसकी उम्मीद से अधिक वोट दे दिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना था कि सरकार बनाने के लिए बदरुद्दीन की पार्टी का समर्थन नहीं लेना पड़े। कांग्रेस को इतनी अधिक सीटें मिलीं कि उसे सरकार बनाने के लिए मोर्चे में अपने साथ शामिल पार्टी के समर्थन की भी जरूरत नहीं रही। इस बार के चुनाव में भी हिंदू मतदाताओं के मन के डर ने मतदान में मुख्य भूमिका अदा की। इस बार भी हिंदू मतदाताओं ने कमोबेश एक ही पार्टी और उसके गठबंधन को वोट दिया और वह पार्टी थी भाजपा। इन पांच सालों में भाजपा का संगठन राज्य में जिस तेज गति से बढ़ा है, और इस दौरान लोकसभा और स्थानीय निकायों के चुनावों में जिस तरह भाजपा ने सफलता का प्रदशर्न किया है, उससे मतदाताओं में विश्वास पैदा हो गया है कि भाजपा, कांग्रेस के विकल्प के रूप में सत्ता में आ सकती है। इस बार हिंदू मतदाताओं को बेहतर विकल्प मिलने के कारण उन्होंने  कांग्रेस से पूरी तरह किनारा कर लिया।


पूर्वोतर का विकास देश की आर्थिक ताकत को नई ऊर्जा देगा- नरेन्द्र मोदी


PAGE 42-45_Page_1प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुवाहटी में सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में भाजपा गठबंधन सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत की। प्रधानमंत्री ने इस शपथ ग्रहण के बाद समारोह में उपस्थित विशाल जनसमुदाय को संबोधित करते हुए कहा: ”मैं सबसे पहले असमवासियों को नमन करना चाहता हूं, जिन्होंने विकास का सपना देखा और विकास की पूर्ति के लिए श्री सर्बानंद जी और उनके साथियों को सेवा करने का अवसर दिया। मैं सर्बानंद जी को भली-भांति जानता हूं। देशभर का आदिवासी समाज सर्बानंद जी पर गर्व कर सकता है। केन्द्र  में मंत्रिपरिषद के मेरे साथी के रूप में उनकी अनेक खूबियों को मैंने नजदीक से देखा है। सरलता, सहजता, मृदुलता इनको सहज साध्य  है और मुझे विश्वास है कि हमेशा प्रसन्नचित्त रहने वाले सर्बानंद जी, असम के सर्वानंद के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। पूरी मेहनत और लगन के साथ असम के भाग्य को बदलने के लिए पूरा प्रयास करेंगे। उनकी पूरी टीम भी समय का पूरा उपयोग असमवासियों के कल्याण के लिए करेगी, ऐसा मुझे विश्वास है।’’

प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा: ”मैं आज आप लोगों को विश्वास दिलाता हूं कि दिल्ली में बैठी सरकार कॉम्पिटिटिव, कोऑपरेटिव फेडरलिजस्म पर भरोसा करती है, हमारे लिए जो राज्य प्रगति करना चाहते हैं, उनको अधिक-से-अधिक ताकत देना, जो राज्य प्रगति करने की कठिनाइयां अनुभव कर रहे हैं, उनको हाथ पकड़कर के आगे ले जाने का प्रयास करना और सभी राज्य व केन्द्र सरकार, कंधे-से-कंधा मिलाकर के राज्यों को और हिन्दुस्तान को नई ऊंचाइयों पर ले जाए, उसका एक निरंतर प्रयास चल रहा है। असम को भी कभी कोई कमी महसूस नहीं होने

दी जाएगी। असम जितना दौड़ेगा, दिल्ली सरकार भी उससे एक कदम ज्यादा दौडऩे का हमेशा प्रयास करेगी।’’

साथ ही उन्होंने कहा: ”मैं असम की जनता से भी आग्रह करूंगा कि आपने जो सपना देखा है, उस सपने को पूरा करने के लिए सिर्फ चुनाव में आपका सहयोग मिले, इतना काफी नहीं है। आवश्यकता है कि लोकतंत्र भागीदारी से चले, सरकार और जनता कंधे-से-कंधा मिलाकर आगे बढ़े तो उसके अद्भुत परिणाम मिलते हैं।

असम की जनता भी कंधे- से-कंधा मिलाकर असम के भाग्य को बदलने के लिए पूरा प्रयास करेगी।’’

नरेन्द्र मोदी ने आगे कहा: ”आपने मुझे लाल किले से भी सुना है। आपने मुझे संसद के द्वार पर भी सुना है। मैं उस विचार पर विश्वास करता हूं कि देश आजाद होने के बाद चाहे केन्द्र हो, राज्य हो, जितनी भी सरकारे आईं, हर सरकार ने अपने-अपने तरीके से कुछ-न-कुछ अच्छा करने का प्रयास किया है और इसलिए जो कुछ भी अच्छा हुआ है, उस अच्छाई को और आगे बढ़ाना और जो कमियां रह गई हैं, उसको पूर्ण करके तेज गति से आगे बढ़ाना जरूरी है। असम की विरासत महान है। यह सांस्कृतिक चेतना का केन्द्र है। भारत को भी अनेक विषयों में प्रेरणा देने की ताकत इस धरती में है। उस धरती का उपयोग असम को नई ऊंचाइयों पर और देश को नई ताकत देने के लिए होगा, ये मेरा विश्वास है।’’

05-06-2016

उन्होंने जोर देकर कहा: ”मैं हमेशा इस बात पर बल देता हूं कि भारत का विकास सर्व-समावेशी हो, भारत का विकास संतुलित हो, भारत का विकास सार्वदेशिक हो और इसके लिए हिन्दुस्तान का पूर्वी छोर, अगर विकास से वंचित रहेगा तो भारत समृद्ध नहीं हो सकता। अगर भारत का पश्चिमी छोर, आगे बढ़ता है तो भारत का पूर्वी छोर भी उतनी ही गति से आगे बढऩा चाहिए और असम, बंगाल, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, ओडिशा, नॉर्थ ईस्ट, ये सारे क्षेत्र हिन्दुस्तान को आने वाले दशकों में एक नई आर्थिक ताकत दे सकते हैं, गति को नई ऊर्जा दे सकते हैं।’’

प्रधानमंत्री ने कहा: ”पूर्व के देशों में भारत का प्रभाव और पहचान बनाने में भारत के इस भू-भाग का बड़ा महत्वहै। यह अष्टेलक्ष्मीक प्रदेश कभी सेवन सिस्टर प्रदेश कहा जाता था।  नॉर्थ-ईस्ट का विकास सिर्फ हिन्दुस्तान का नहीं, हमारे पूर्व के देशों में भी प्रभाव पैदा करने की ताकत रखता है और इसलिए संपूर्ण नॉर्थ-ईस्ट के विकास के लिए असम एक बहुत बड़ा केन्द्र बिन्दु है। उसको आगे बढ़ाने की दिशा में केन्द्र  और राज्य मिलकर काम करेंगे, यह मैं आपको विश्वास दिलाता हूं।’’


जिस तरह 2008 में कर्नाटक में सरकार बनाकर भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण में अपना प्रवेश द्वार खोला था, उसी तरह 2016 में असम में अपने गठबंधन के साथ पूर्ण बहुमत से जीत हासिल करके भाजपा ने पूर्वोंत्तर में अपने प्रसार के लिए रास्ता खोल लिया है।

तरुण गोगोई को आसाम में हराना किसी बड़े कारनामे से कम नहीं है। जहां असम में कांग्रेस की हार का कारण 15 साल पुरानी एंटी इंकम्बेंसी बताई जा रही है तो वहीं भाजपा की कुशल रणनीति का भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि भाजपा ने दो बाहरी लोगों को अपना बनाकर इस चुनाव में विजय हासिल की। भाजपा जिन दो बड़े चेहरों के बल पर चुनाव लड़ रही थी, वे दोनों ही अपनी मूल शिक्षा-दीक्षा में संघी या भाजपाई नहीं हैं। एक हैं सर्बानंद सोनोवाल और दूसरे हैं हेमंत बिस्वसर्मा। असम में बीजेपी की जीत के नायक केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनेवाल और हेमंत बिस्वसर्मा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों नेताओं का पांच साल पहले तक बीजेपी से कोई नाता नहीं था। सोनेवाल असम गण परिषद में रह चुके हैं, जबकि तरुण गोगोई ने नाराज होकर सर्मा बीजेपी में शामिल हुए थे। राजनीतिक जानकार पहले से ही अनुमान लगा रहे थे कि सर्मा के आने से असम में बीजेपी की सरकार बनने की संभावना प्रबल है। कभी तरुण गोगोई के दाहिने हाथ रहे सर्मा के चुनावी प्रबंधन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि साल 2011 में कांग्रेस को मिली भारी जीत का श्रेय गोगोई ने सर्मा को दिया था। वहीं सर्मा इस चुनाव में गोगोई के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन कर उभरे। सर्मा ने पिछले साल अगस्त महीने में भाजपा में शामिल हुए थे। उन्हें राज्य में भाजपा का प्रचार प्रमुख बनाया गया था। राज्य के असमिया भाषी समुदाय में सर्मा जबरदस्त लोकप्रिय  है। गुवाहाटी के अभिजात्य कैफे में आने-जाने वालों से लेकर सिवासागर के कारोबारी, सिलचर के प्रोफेसर तक उनकी तारीफ करते हैं। सर्मा इस समय बीजेपी के एकमात्र नेता हैं जो राज्य के ब्रह्मपुत्र और बराक वैली क्षेत्र में समान रूप से लोकप्रिय हैं। सोनोवाल की छवि आक्रामक युवा नेता की रही है। असम की राजनीति में उन्हें जातिय नायक के तौर पर भी देखा जाता है। भाजपा के साथ उनकी राजनीतिक यात्रा 2011 से शुरू होती है। इसी साल भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बनाया। पार्टी ने सोनोवाल को आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया था। आखिरकार 2012 में सोनोवाल को असम भाजपा की कमान दे दी गई। बिहार में मिली चुनावी हार से सबक लेते हुए बीजेपी नेतृत्व ने असम में स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने का फैसला किया और इस साल सोनेवाल को राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया था।

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असम की कुल 126 विधानसभा सीटों पर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने न सिर्फ बहुमत के लिए जरूरी 64 का आंकड़ा पार किया, बल्कि मिशन 84 के नारे को भी हकीकत में बदल दिया।

राज्य के बहुसंख्यक लोग लंबे कांग्रेसी शासन के बाद भाजपा को एक मौका देना चाहते थे। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह अपील अच्छी लगी कि असम के विकास के लिए राज्य और केंद्र में एक दल की सरकार का होना जरूरी है। यह भी सच है कि भले ही गोगोई की छवि साफ सुथरी हो, लेकिन उनकी सरकार और प्रशासन की चाल-ढाल से लोग संतुष्ट नहीं थे। इसके अलावा भाजपा ने बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे को जबर्दस्त तरीके से उठाया।

जबकि कांग्रेस निचले असम में 50 फीसदी से भी ज्यादा बांग्लादेशी मुसलमानों के वोट बैंक के मुद्दे पर कठघरे में खड़ी नजर आई। भाजपा ने बांग्लादेश से भारत आने वाले मुसलमानों की घुसपैठ रोकने और हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा करके राज्य में हिंदू धु्रवीकरण का भी कार्ड खोलने में कामयाबी हासिल की। साथ ही भाजपा ने चुनाव पूर्व गठबंधन करने में कांग्रेस को पछाड़ दिया। कांग्रेस ने सिर्फ एक स्थानीय बोडो संगठन के साथ छोटा सा गठबंधन किया और ज्यादातर सीटों पर खुद चुनाव लड़ी। वहीं भाजपा ने असम गण परिषद और बोडो पीपुल्स फ्रंट के साथ मजबूत गठबंधन बनाया। इसका फायदा भाजपा को ऊपरी, मध्य और निचले तीनों इलाकों में मिला।

इसी तरह इत्र व्यापारी और बांग्लादेशी मुसलमानों के नेता बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईडीयूएफ ने भी कांग्रेस के साथ गठबंधन की खासी कोशिश की। लेकिन गोगोई तैयार नहीं हुए। उनका तर्क था कि इससे राज्य में भाजपा हिंदू-मुस्लिम धु्रवीकरण कराने में कामयाब रहेगी। एआईयूडीफ के अलग चुनाव लडऩे से करीब 35 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले असम में मुस्लिम मतों का बंटवारा हो गया। इसका फायदा भी भाजपा गठबंधन को मिला। जबकि कांग्रेस को उम्मीद थी कि मुसलमानों का एकमुश्त समर्थन उसे मिलेगा।

असम में सत्ता मिलने पर उत्साहित भाजपा पूर्वोंत्तर के दूसरे राज्यों में अपनी सरकार बनाने की कोशिश कर सकती है। उसने अरुणाचल प्रदेश में विवादास्पद तरीके से राष्ट्रपति शासन लगाया ही साथ ही मणिपुर पर भी अब भाजपा की नजर हो सकती है, जहां न सिर्फ हिंदुओं की पर्याप्त आबादी है, बल्कि वे लोग ओकराम इबोबी सिंह की नीतियों से नाखुश भी हैं। अनेक भाजपा नेता असम की जीत को पूर्वोंत्तर के महत्वपूर्ण राज्यों में अपनी पहुंच बढ़ाने की नीति के साथ जोड़कर देख रहे हैं।

सतीश पेडणेकर

 

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