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कांग्रेस मुक्त भारत

कांग्रेस मुक्त भारत

पांच विधानसभा चुनाव के नतीजे भाजपा, तृणमूल  और अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियों और वामदलों के लिए अच्छी खबर लेकर आए हैं। मगर कांग्रेस के लिए तो यह सदमा है। कांग्रेस जो हाल ही में उत्तराखंड में अपनी जीत पर फूली नहीं समा रही थी उसके लिए ये नतीजे खतरे की घंटी है कि अब भी उसने अपने तौर-तरीके नहीं बदले तो नरेंद्र मोदी का ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ का सपना पूरा होते देर नहीं लगेगी। दरअसल मोदी ने ही लोकसभा चुनाव के दौरान ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ का नारा बुलंद किया था। इन विधानसभा चुनावों में दो कांग्रेस शासित राज्यों केरल और असम में कांग्रेस की करारी हार ने यह साबित कर दिया कि कांग्रेस इस दिशा में तेजी से बढ़ रही है। अगर ऐसा हुआ तो यह 130 साल पुरानी और कभी देश पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस का यह दुर्भाग्य होगा। यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भी शुभ नहीं होगा, क्योंकि मजबूत विपक्ष उसकी जरूरत होती है। लेकिन, कांग्रेस तेजी से ह्रास की तरफ बढ़ रही है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस चुनाव ही नहीं हारी हिम्मत भी हार गई है। इतिहास में दशकों सत्ता की सियासत करने वाली इस पार्टी ने 2014 के लोकसभा में चुनाव में जैसा खराब प्रदर्शन किया, वह पूरे देश के लिए चौंकाने वाला ही रहा। कभी जिस कांग्रेस ने इतनी शानदार जीत हासिल की थी कि भाजपा केवल दो सीटों पर सिमट के रह गई थी, अब उसके सामने विपक्ष बनने के लिए जरूरी सीटें पाने के लाले पड़े हैं। इसके बाद से कांग्रेस का सिमटने का दौर शुरू हो गया। लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली, जम्मू- कश्मीर उसके हाथ से निकल गए हैं। एकमात्र बिहार ऐसा राज्य है जहां है वह लालू और नीतीश के महागठबंधन के कंधों पर चढ़कर कांग्रेस विधानसभा चुनावों में अपनी स्थिति सुधारने में सफल रही।

अब तक कांग्रेस की 7 राज्यों में उत्तर पूर्व में मेघालय, मिजोरम, मणिपुर और असम, दक्षिण में केरल और कर्नाटक, उत्तर में हिमाचल और उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकारें थी। इस तरह 11 प्रतिशत आबादी वाले राज्यों में कांग्रेस (बिहार को छोड़कर) की सरकारें थी। जबकि 36 प्रतिशत आबादी वाले राज्यों पर भाजपा की सरकारें हैं। हाल ही के विधानसभा चुनावों में केरल और असम में कांग्रेस की हार से कांग्रेस की स्थिति अत्यंत दयनीय यानी केवल 6 प्रतिशत आबादी वाले राज्यों में ही कांग्रेस की सरकार होगी। यह हालत आने वाले समय में और खराब हो सकती है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी अगले साल चुनाव होने वाले हैं। यहां एक बार जो पार्टी सत्ता में रहती है, वो अमूमन अगली बार बाहर हो जाती है। ऐसे में कांग्रेस के लिए इस राज्य में अपनी सरकार को बचा पाना मुश्किल दिख रहा है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति जमा करने के मामले में सीबीआई की जांच चल रही है और उनके लिए पद पर बने रहना आसान नहीं होगा। उत्तराखंड में भी कांग्रेस के हालात अच्छे नहीं हैं। बहुगुणा और 9 विधायकों के कांग्रेस छोडऩे से वह कमजोर हुई है। हरीश रावत ने विधानसभा में अन्य दलों का साथ लेकर अपनी सरकार बचा ली, मगर विधानसभा चुनाव जीतना कठिन होगा। कर्नाटक में 2018 में चुनाव होने वाले हैं और मुख्यमंत्री सिद्धरमैया भ्रष्टाचार के आरोपों से धिरे हैं। इसके अलावा कर्नाटक में अहम बात ये हुई है कि बीजेपी में पार्टी नेता के तौर पर पूर्व प्रमुख रहे येदियुरप्पा की वापसी हो गई है। येदियुरप्पा पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और उन्हें पिछली विधानसभा में इस्तीफा देना पड़ा था। लेकिन वे अभी भी लिंगायत समुदाय में काफी लोकप्रिय हैं। उनकी वापसी से अगले चुनाव में भाजपा के जीतने की उम्मीद बढ़ गई है।

ऐसे में कांग्रेस के पास उत्तर पूर्व के 3 राज्य मणिपुर, मिजोरम और मेघालय रह जाते हैं जिनकी आबादी एक प्रतिशत से भी कम है। कांग्रेस के इन हालातों के कारण भाजपा सोचती है 2018 के विधानसभा चुनावों में वह लगभग ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ बनाने में सफल होगी।

अक्सर कई राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस की तुलना पौराणिक कथाओं के फिनिक्स पक्षी से करते हैं। जो मर जाने के बाद फिर जिंदा हो उठता है। कांग्रेस भी चुनावों में करारी हार के बाद कई बार फिर जिंदा हुई और उसने फिर सत्ता हासिल की। इस कारण आम कांग्रेसी को अब भी विश्वास है कि कांग्रेस एक दिन फिर केंद्र में सत्ता में लौटकर आएगी। लेकिन अब कांग्रेस में यह फिनिक्स पक्षीवाला गुण कम होता जा रहा है। कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है। 1981, 1991 और 2004-2014 में कांग्रेस सत्ता में लौटकर आई। लेकिन हर बार उसकी ताकत कम होती गई। 1984-89 में उसकी ताकत 415 थी जो 1991 में घटकर 244 रह गई, उसके बाद जब वह 2004 में सत्ता में लौटी तब उसकी ताकत 206 रह गई थी जो 2014 के चुनाव में 45 रह गई। ऐसे में कांग्रेस की फिर से सत्ता में वापसी नामुमकिन लगती है।

कांग्रेस के बारे में विश्लेषकों की एक और राय रही है कि जब भी कोई कांग्रेस जैसी विचारधारा वाला या दबे कुचले वर्ग में जनाधार रखने वाला कोई राजनीतिक दल उभरता है, तो कांग्रेस के जनाधार में सेंध लगता रहा है। यह परंपरा मंडल और बसपा से शुरू होने के बाद ओडिशा में नवीन पटनायक, पश्चिमी बंगाल में ममता बनर्जी, सीमांध्रा-तेलंगाना में जगमोहन रेड्डी और चंद्रशेखर राव या हाल ही में दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल तक जारी हैं। आम आदमी पार्टी को तो 70 में से 67 सीटें कांग्रेस के जनाधार पर कब्जा करने के कारण ही हासिल हो सकीं। यही कारण है जिस कांग्रेस का वोट शेयर 2008 में 40.3 प्रतिशत था वह 9.7 प्रतिशत रह गया। अब आम आदमी पार्टी पंजाब और गोवा में यही इतिहास दोहराना चाहती है। एक बार कांग्रेस वोटों में सेंध लगने के बाद यह वोट वापस नहीं लौटता।

05-06-2016

इस तरह से कांग्रेस के ह्रास के साथ-साथ  वोट शेयर भी लगातार गिरता जा रहा है। दरअसल जहां भाजपा और क्षेत्रीय दलों का वोट प्रतिशत लगातार बढ़ता रहा है, वहीं कांग्रेस के वोट शेअर में कमी आई है। भाजपा को 1991 के चुनाव में 20.11 प्रतिशत वोट मिले थे जो 2014 में 31.1 प्रतिशत तक हो गया। क्षेत्रीय दलों का प्रतिशत 1991 में 39.44 प्रतिशत था, जो 2014 में 46.6 प्रतिशत हो गया। जबकि कांग्रेस के प्रतिशत में लगातार गिरावट आ रही है। उसका प्रतिशत 1991 में 36.26 था, जो 2014 में 19.3 प्रतिशत रह गया। इस तरह भाजपा और क्षेत्रीय दल कांग्रेस की कीमत पर आगे बढ़े।

अब वह वक्त आ गया है जब कांग्रेसियों को कांग्रेस की इस दयनीय स्थिति पर वस्तुनिष्ठ तरीके से और निर्मम होकर विश्लेषण करना चाहिए। दरअसल कांग्रेस के मौजूदा हालात के लिए कांग्रेसी स्वयं ही जिम्मेदार हैं। सत्ता पर बने रहने के मोह में उन्होंने कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय और लोकतांत्रिक पार्टी को एक परिवार के हाथों में सौंप दिया। कांग्रेसियों की दलील यह होती थी कि इस परिवार के बगैर कांग्रेस में एकता नहीं रह पाएगी और इस परिवार की हस्तियों का करिश्मा ही कांग्रेस को वोट दिला पाता है। लेकिन, अब गांधी नेहरू परिवार का जादू खत्म हो गया है। इसके कारण यह परिवार कांग्रेस का खेवनहार नहीं उसका बोझ बन गया है। यदि कांग्रेसजन चाहते हैं कि कांग्रेस का अस्तित्व बना रहे तो उसे अब जितनी जल्दी हो सके गांधी नेहरू परिवार के वर्चस्व से मुक्ति पा लेनी चाहिए। तभी उसमें राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नेतृत्व का उदय हो पाएगा। हाल ही के चुनावों में एक बात साबित हो गई है कि गांधी परिवार की कांग्रेस को वोट दिलाने की क्षमता खत्म हो गई है। इसलिए सोनिया गांधी, और राहुल के बाद प्रियंका को राजनीति में लाने की कोशिश चल रही है, मगर इस बात क्या गारंटी है कि प्रियंका केवल इंदिरा गांधी जैसा व्यक्तित्व होने के कारण कांग्रेस को अपना खोया हुआ गौरव दिलाने में कामयाब हो जाएंगी। प्रियंका तो अभी बंधी मुट्ठी हैं। जो जब तक मुट्ठी बंधी है तब तक लाख की, खुलते ही खाक की हो जाएगी। उनका भी वही हश्र हो सकता है जो सोनिया और राहुल का हुआ है। आज कांग्रेस मुक्त  भारत की दयनीय स्थिति से बचने का एक ही रास्ता है पहले कांग्रेस गांधी नेहरू परिवार से मुक्ति पाए। तब वह सही मायने में लोकतांत्रिक पार्टी बन पाएगी और उसकी प्रगति के रास्ते खुलेंगे।

सतीश पेडणेकर

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