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दो साल के बाद प्रधानमंत्री मोदी

दो साल के बाद प्रधानमंत्री मोदी

मोदी सरकार के दो साल पूरे हुए। सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री उम्मीदों पर खरे उतरे हैं? अगर आप सोशल मीडिया, दिल्ली के एलिट क्लबों और प्रमुख बुद्धिजीवियों तथा टिप्पणीकारों की बातों पर गौर करें तो मोदी भारी निराशाजनक साबित हुए हैं। लेकिन तथ्य यह भी है कि इन भद्र पुरुष और महिलाओं ने मोदी को वोट नहीं दिया है। इन लोगों ने तो कल्पना में भी नहीं सोचा होगा कि मोदी कभी प्रधानमंत्री बनेंगे। दरअसल मोदी के कामकाज को खारिज करने का यह अभियान दरअसल मोदी के खिलाफ शुरू से जारी लगातार अभियानों का ही सिलसिला है। इसी वजह से उनकी निराशा को मैं कुछ हल्के-फुल्के अंदाज में लेता हूं।

दूसरी तरफ कुछ प्रमुख मीडिया समूहों के जनमत सर्वेक्षणों को देखें तो तस्वीर कुछ मिली-जुली सी दिखती है। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक सर्वेक्षण में सरकार में पहले साल के बाद मोदी की लोकप्रियता करीब ७५ प्रतिशत बताई गई, जो दूसरे साल के बाद कुछ घटी है। इंडिया टुडे के फरवरी २०१६ में सर्वेक्षण के मुताबिक मोदी अभी भी सबसे बेहतर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। इस साल अप्रैल में इकोनॉमिक टाईम्स के सर्वेक्षण के मुताबिक ”सरकार का आर्थिक प्रदर्शन को सही ठहराने वाले ८६ प्रतिशत लोग थे जबकि ६२ प्रतिशत ने कहा कि सरकार ने रोजगार के अवसर पैदा किए हैं और ५८ प्रतिशत के अनुसार भविष्य बेहतर होने की उम्मीद है। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें अभी यकीन है कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’।’’ टाईम्स ऑफ इंडिया के २६ मई २०१६ को प्रकाशित सर्वे में कहा गया ”दो साल बाद नरेंद्र मोदी सरकार के कामकाज को महानगरों के ६२ प्रतिशत लोगों ने अच्छा या बहुत अच्छा बताया।’’

यह भी तथ्य है कि २६ मई २०१६ में जब से मोदी ने केंद्र की गद्दी संभाली है, दुनिया के नेता भारत को कुछ अधिक गंभीरता से लेने लगे हैं। पाकिस्तान और चीन से संबंधित मोदी की नीतियां बहुत उत्साहवद्र्धक नहीं हैं लेकिन मोदी कम से कम ऐसा साकारात्मक माहौल पैदा कर पाए हैं जिससे दूसरे देश भारत के साथ कारोबार कर सकते हैं जो मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी वर्षों में संभव नहीं था क्योंकि वह अक्सर कांग्रेस पार्टी के आंतरिक खींचतान से ही लाचार हो गई थी। मोदी ने दो महत्वपूर्ण कारकों अपने फायदे में बेहतर इस्तेमाल किया है जो देश की विदेश नीति के लिए बहुत अहम हैं। उन्होंने बखूबी इजहार किया कि भारत जैसे यथास्थितिवादी देश की क्षेत्रीय बढ़त की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और भारत अपने विशाल ”युवा’’ श्रम शक्ति के बदौलत दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी जाहिर किया कि हम वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता वाले जिम्मेदार परमाणु ताकत संपन्न देश हैं। दूसरे, मोदी विदेश में रहने वाले करीब २.५ करोड़ भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के प्रिय नेता बनकर उभरे हैं। ये लोग अपने श्रम और बुद्धि से प्रमुख औद्योगिक और सैन्य क्षमता वाले देशों में अपने को स्थापित कर चुके हैं।

स्वदेश में, मेादी और उनके मंत्रियों का यह कहना जायज है कि इन दो साल में देश को भ्रष्टाचार मुक्त शासन का अहम तोहफा मय्यसर हुआ है। पूर्व मनमोहन सिंह सरकार के कथित तौर पर अनेक घपलों-घोटालों में लिप्त रहने की बात पर गौर करें तो यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। हालांकि मोदी अपनी उस छवि पर खरे नहीं उतर पाए हैं कि वे साहसिक सुधारक हैं। आजकल तो उनको सुनने से लगेगा कि वे किसी कांग्रेस सरकार के मुखिया की तरह ही कल्याणकारी योजनाओं के जरिए ग्रामीण गरीबों और किसानों पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। मोदी के हाल के सभी भाषणों में इसी पर जोर है कि कैसे उनकी सरकार सिर्फ देश के गरीबों पर ध्यान दे रही है और वे कई कल्याणकारी योजनाएं लेकर आए हैं। बेशक, गरीबों के देश में कोई भी प्रधानमंत्री गरीबों की उपेक्षा करके नहीं रह सकता। लेकिन मोदी ने तो यह वादा किया था कि वे ऐसा माहौल बनाएंगे जिसमें कोई गरीब रहेगा ही नहीं। मोदी ने सब्सिडी के रूप में खैरात बांटने नेहरूवादी मॉडल से अलग होकर गरीबों को सशक्त बनाने की बात की थी, लोगों को गरीब बनाने वाले कारणों को ही मिटा देने की बात की थी।

मोदी का यह कहना जायज है कि सही मायनों में आर्थिक सुधार देश से गरीबी मिटा देंगे। लेकिन उनके दो साल के राज में ऐसे बड़े सुधार नहीं दिखे हैं। इसकी एक वजह तो यह है कि संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में उनके पास बहुमत नहीं है। विपक्षी पार्टियां कांग्रेस के नेतृत्व में एकजुट हो गई हैं, जो मोदी के सुधार की दिशा में उठने वाले हर कदम को रोकने को तत्पर है। फिर भी मोदी के बारे में मेरी राय यह है कि वे उन सुधारों की ओर भी आगे नहीं बढ़ पाए जिसके लिए संसदीय मंजूरी की दरकार नहीं है। कोई प्रशासनिक, पुलिस कार्यप्रणाली या शिक्षा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार नहीं किए जा सके हैं।

इसी तरह मैं इस विचार से भी सहमत होने लगा हूं कि मोदी का बहुप्रचारित ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम भी सिर्फ सेमिनारों में चर्चा का विषय बनता जा रहा है। अगर मोदी वाकई चाहते हैं कि देश की जीडीपी का एक-तिहाई उत्पादन क्षेत्र से (फिलहाल यह १८ प्रतिशत से कम है) पैदा हो जिससे हमारे युवाओं को रोजगार मिले और देश में धन की वृद्धि हो तो उन्हें शुरू में शोध और शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए था, न कि विदेशी निवेश पर। असल में सवाल है कि हमारे पास क्या रोजगार सक्षम युवा पर्याप्त संख्या में हैं? क्या हमारे पास विदेशी तकनीक और तकनीक के हस्तांतरण में पारंगत श्रम शक्ति है?

मोदी की दूसरी समस्या यह है कि वे बहुत ज्यादा बोलते या वादे करते हैं और उस पर आगे ज्यादा कुछ नहीं करते। वे इस कदर वादे करते हैं कि उनमें गहराई नहीं दिखती और बेहद साधारण-से लगते हैं। मसलन, उन्होंने बड़े जोर-शोर से ”स्वच्छ भारत’’ अभियान की शुरुआत की। लेकिन उन्होंने इसकी कोई व्यवस्था नहीं की कि कैसे इस पर अमल हो। उन्हें यह देखने के लिए दिल्ली से बाहर जाने की  भी जरूरत नहीं है कि स्वच्छता अभियान कैसे ज्यादा कागजों पर ही है। लुटियन दिल्ली के बाहर के इलाके हमेशा की तरह गंदगी से भरे पड़े हैं।

मोदी यह बताने का भी कोई मौका जाया नहीं करते कि भारत में आबादी के गणित के काफी फायदे हैं, खासकर यहां की आधी आबादी युवा है। लेकिन इस क्षमता का दोहन तभी हो सकेगा जब ये युवा अच्छे रोजगार  पाएंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यही आबादी दुर्दशा का कारण बन जाएगी। इस संदर्भ में श्रम ब्यूरो से हाल ही में जारी हुए आंकड़े वाकई चिंताजनक हैं। आठ श्रम साध्य क्षेत्रों (कपड़ा, सिले-सिलाए कपड़े, चमड़ा, जेवरात, बीपीओ, हथकरघा, धातु और वाहन) में रोजगार सृजन २०१५ में महज १.३५ लाख ही हुआ जबकि उसके पिछले साल यह आंकड़ा ४.९  लाख था और २००९  में तो १२.५  लाख था। इससे भी बुरी खबर यह है कि २०१५  की आखिरी तिमाही में इन आठ क्षेत्रों में और गिरावट आई है।

इसमें दो राय नहीं कि श्रम ब्यूरो के आंकड़ों से बड़ी तस्वीर का पता नहीं चलता क्योंकि देश में ज्यादातर नौकरियां असंगठित क्षेत्र में होती हैं। दरअसल एक सिद्धांत तो यह कहता है कि हाल के वर्षों में बेरोजगारी की समस्या दुरूह होने के बावजूद गरीबी घटी है तो उसकी वजह असंगठित क्षेत्र में पारिश्रमिक वृद्धि है। लेकिन श्रम ब्यूरो के आंकड़े दो अशुभ संकेत दे रहे हैं। एक, देश में सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों की नौकरियां सिकुड़ रही हैं। इसके मुताबिक सरकारी नौकरियां १९९६-९७ के १.९६ करोड़ से घटकर अब १.७ करोड़ ही रह गई हैं। इसकी एक वजह युवाओं का रोजगार कुशल न होन है जिसकी हम पहले चर्चा कर चुके हैं। लेकिन समस्या इससे भी गंभीर इसलिए है क्योंकि अच्छे या कुशल युवा ज्यादातर सेवा क्षेत्र में ऊंची तनख्वाह वाली नौकरियों में जा रहे हैं जबकि देश को बेरोजगारी दूर करने के लिए उत्पादन क्षेत्र में ज्यादा नौकरियों की दरकार है।

यहां यह गौर करना चाहिए कि मोदी का या एक मायने में भाजपा को परंपरागत वोट आधार आकांक्षी मध्य वर्ग है। और यही वर्ग अब कहने लगा है कि मोदी ने कुछ अलग किस्म का प्रधानमंत्री होने का वादा किया था लेकिन वास्तव में वे तो किसी परंपरागत प्रधानमंत्री की ही तरह बोलने और काम करने लगे हैं। अब यह मध्यवर्ग  खुद को एक तरह से असहाय महसूस कर रहा है क्योंकि मोदी हर वक्त सिर्फ गरीबों और पिछड़ों की बात करते दिखते हैं। मोदी सरकार ने मध्य वर्ग पर ही प्रत्यक्ष या परोक्ष करों का ज्यादा से ज्यादा बोझ लाद दिया है। सेवा कर में लगातार इजाफा हो रहा है और बैंक की देय ब्याज दरें लगातार घट रही हैं, इसका बोझ भी सीधे मध्यवर्ग पर ही पड़ता है। भविष्य निधि की ब्याज दरों के साथ छेड़छाड़ की कोशिश से मोदी सरकार की छवि सबसे अधिक प्रभावित हुई है। इसी तरह सावधिक जमा के ब्याज दरों में कटौती ने भी उसकी छवि मलिन की है।

मैं इसी श्रेणी में मध्य वर्ग के उन असंतुष्टों को भी रखना चाहूंगा  जो अफसोस जताते हैं कि मोदी ने हिंदुओं की गंभीर चिंता के मामलों में भी कोई पहल नहीं की है। ऐसे लोगों के मुताबिक, ”यह भी दूसरी वाजपेयी सरकार  बनती जा रही है, इसकी जबान पर तो कुछ हिंदू समर्थक बातें होती हैं लेकिन दिल में वही वाजपेयी जैसी बातें हैं।’’ ऐसी नाराजगी में कुछ सच्चाई भी है। मोदी के राज में तमाम हल्ले के बावजूद संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में अभी वामपंथियों और तथाकथित सेक्युलरवादियों का कब्जा है। दो साल गुजर गए मगर संस्कृति और मानव संसाधन मंत्रालय के तहत सैकड़ों पद या तो खाली हैं या फिर उन पर वामपंथी/सेकुलर तत्वों का कब्जा है। संकेत यही हैं कि सेक्युलरवादियों का यह प्रभुत्व कायम है और यह प्रभुत्व मोदी के बाकी तीन साल को और दयनीय बना दे सकता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मोदी उन उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए अभी बहुत कुछ नहीं कर पाए हैं, जो उन्होंने दो साल पहले भारतीयों में जगाई थी। वे अभी भी बहुत बोलते हैं। अब ठोस काम करने का वक्त आ गया है। मैं तो यह सुझाव देने की  हद तक सोच रहा हूं कि मोदी को बाकी तीन साल में अब कोई और नया कार्यक्रम नहीं देना चाहिए। उन्हें बस उन्हीं पर ध्यान लगाना चाहिए जिसका वे वादा कर चुके हैं।

प्रकाश नंदा

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