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मोदी सरकार के २ साल नई बुलंदियों की ओर

मोदी सरकार के २ साल  नई बुलंदियों की ओर

हर नई सरकार से लोगों को अनेक उम्मीदें होती हैं। सरकार की कामयाबी उसके द्वारा शुरू की गईं ऐसी नीतियों और कार्यक्रमों से होती है जो समाज, राजनीति और बौद्धिक माहौल में क्रांतिकारी बदलाव ला दें। ऐसे बदलाव की नींव ज्यादातर सत्ता के पहले साल में ही रखी जाती हैं। पहले साल ही राजीव गांधी सैम पित्रोदा को ले आए और सी-डॉट की स्थापना की। दूरसंचार के क्षेत्र में मौजूदा क्रांति का श्रेय राजीव गांधी की उसी पहल को जाता है। पी.वी. नरसिंह राव ने अपने पहले बजट से ही उद्योगों को लाइसेंस राज से मुक्त करके आर्थिक उदारीकरण की ओर कदम बढ़ाया जिसके दूरगामी नतीजे हुए। बराक ओबामा ने अल अजहर विश्वविद्यालय में अपने संबोधन से मुसलमानों की भावनाओं को छूने की कोशिश की और अमेरिका द्वारा बुश की विदेश नीति में बदलाव का संकेत दे दिया। उन्होंने तभी ईराक और अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी का भी संकेत दे दिया था। अभी सत्ता में दो साल पूरे करने वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने कुर्सी संभालते ही मेक इन इंडिया, जन धन योजना, डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत जैसी क्रांतिकारी योजनाओं के जरिए एक नया अध्याय जोड़ा है।

मोदी सरकार का दो साल का समय नीतियों में बदलाव के मायने में बेहद घटनापूर्ण, भारी राजनैतिक उथल-पुथल और दुनिया भर में आर्थिक उठापटक का दौर रहा है। मई 2014 में केंद्र में कद्दावर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने राजकाज संभाला। आज, वह देश के सबसे लोकप्रिय राजनैतिक नेता हैं। कुछ जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक उन्हें 74 प्रतिशत लोग लोकप्रिय नेता मानते हैं। देश के सियासी हलके में एक वर्ग भले नीतीश कुमार जैसों की बात करे मगर आज भी मोदी का कोई मुकाबला नहीं है। अब भारतीय जनता पार्टी दक्षिण भारत के केरल में और पूरब में बंगाल में दो अंकों की वोट हिस्सेदारी और असम में ऐतिहासिक जीत के साथ वाकई राष्ट्रीय पार्टी बनने की ओर अग्रसर है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि आज अगर लोकसभा चुनाव हो जाएं तो भाजपा ही सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगी।

इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी को मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के बिखराव से कई मायने में फायदा पहुंच रहा है। कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व में देश में करीब छह दशकों तक राज कर चुकी है। आज, यह पार्टी देश की बदलती स्थितियों में खुद को अप्रासंगिक पा रही है, क्योंकि देश का युवा अब राजनीति में खानदानशाही को पसंद नहीं करता। इसलिए कांग्रेस अपना आकर्षण खो चुकी है।

यही वजह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बुरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। वे न सिर्फ नेतृत्व करने में नाकाम रहे हैं, बल्कि मोदी सरकार को कारगर ढंग से चुनौती भी नहीं दे पाए हैं। मोदी के खिलाफ खड़े किए जाने वाले दूसरे क्षेत्रपों की देशव्यापी अपील नहीं है, जैसी मोदी ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल से सफलतापूर्वक हासिल की है और आज वे देश के सबसे ताकतवर नेता बन गए हैं।

अगर सफलता का पैमाना मुख्य विपक्षी पार्टी का सिकुडऩा-सिमटना है तो मोदी सरकार बेशक कामयाब रही है क्योंकि, उसने कांग्रेस राज में हुए कई घोटालों को उछालकर उसे बचाव की मुद्रा में ला दिया है। उधर, मोदी के नेतृत्व में भाजपा उन इलाकों में भी पैठ जमा रही है, जहां उसकी जड़ें नहीं थीं। मसलन, पूर्वोत्तर और दक्षिणी राज्य केरल में भाजपा तेजी से फैल रही है और इस तरह वह सही मायने में राष्ट्रीय पार्टी बनती जा रही है।

हालांकि, सरकार का आर्थिक प्रदर्शन ही उसके भविष्य की सियासत को तय करेगा। वैसे तो फिलहाल देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर चलती दिख रही है। मोटे अनुमान यही हैं कि हमारे देश ने तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की कसौटी पर चीन को पीछे छोड़ दिया है। जिस दौर में विश्व की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मजबूत अमेरिकी डॉलर और जिंसों के गिरते दाम की वजह से संकट में हैं, तो वहीं भारत कुछेक चमकते क्षेत्रों की तरह है। मोदी ने जब मई 2014 में गद्दी संभाली तब खुदरा महंगाई दर 8.28 प्रतिशत पर थी, वह इस साल अप्रैल में 5.39 प्रतिशत पर आ गई है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडी के मुताबिक देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2014 में 7.2 प्रतिशत के मुकाबले इस साल 7.6 प्रतिशत पर रहने की उम्मीद है। पिछले साल भारत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए पसंदीदा ठिकाना के मामले में भी चीन को पीछे छोड़ चुका है। इसका श्रेय मोटे तौर पर मोदी सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के जरिए उत्पादन क्षेत्र को मिले प्रोत्साहन को जाता है।

वैसे, यह भी सही है कि प्रधानमंत्री किसी बड़े आर्थिक सुधार को आगे नहीं बढ़ा पाए हैं जिसकी बात वे अपने चुनाव प्रचार के दौरान करते रहे हैं। इससे एक वर्ग में भारी निराशा हुई है। इनमें एक तो वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) विधेयक ही है, जिसका मकसद सभी प्रत्यक्ष और परोक्ष करों को एक मानक दर पर ले आना है। यह विधेयक लोकसभा और खासकर राज्यसभा में कांग्रेस और विपक्षी दलों के हंगामे के कारण लटका हुआ है। हालांकि यह विधेयक कांग्रेस ने ही तैयार किया था और तब इसमें विपक्ष में बैठी भाजपा अड़ंगा लगाती रही थी। अब कांग्रेस वही रणनीति अपना कर मोदी सरकार को झटका देना चाहती है।

सरकार हालांकि अर्थव्यवस्था में दूरगामी असर पैदा करने वाले दूसरे उपाय ले आई है। मसलन, देनदारी और दिवालिया संहिता विधेयक पारित हो गया है। इससे कारोबार करना आसान हो जाएगा क्योंकि, यह देनदारियों के निपटाने की समय-सीमा तय करता है। इससे वित्तीय क्षेत्र और बैंकों को कर्ज वसूली में भी आसानी हो जाएगी। यह विजय माल्या प्रकरण का असर है। ऐसी दूसरी योजनाओं में जन धन योजना है, जिसका मकसद लाभार्थी के खाते में सीधे सब्सिडी की रकम का हस्तांतरण करना है। इससे सब्सिडी की अदायगी में देरी और भ्रष्टाचार घटेगा, जो यूपीए के राज में बेहिसाब बढ़ गया था। इसी के साथ पहली बार सरकार रसोई गैस गरीबों के घरों तक पहुंचा रही है। सरकार ने इसके लिए प्रधानमंत्री उज्जवला योजना की शुरुआत की है जिसके तहत अगले तीन साल में गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले 5 करोड़ परिवारों को रसोई गैस मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया है। इस वित्त वर्ष का लक्ष्य 1.5 करोड़ घरों तक रसोई गैस पहुंचाना है। इस योजना की आंशिक रकम मौजूदा धनी परिवारों के सब्सिडी स्वेच्छा से छोडऩे से हुई बचत से आएगी। प्रधानमंत्री के आवाहन पर एक करोड़ लोगों ने सब्सिडी लेनी छोड़ दी है।


गरीबों के साथ भारत निर्माण’’


05-06-2016

भारतमाला परियोजना के तहत कई कामों के डीपीआर बन गए हैं। 2,67,200 करोड़ की लागत से देश के पिछड़े जिलों को जोड़ा जाएगा। पर्यटन स्थलों को आपस में जोड़ा जाएगा तथा धार्मिक स्थलों के बीच सड़क की चैन बनाई जाएगी। कई जगह पर काम भी शुरू हो गएहैं। देश में 52 लाख किमी सड़क की लंबाई है। इसमें 96 हजार किमी नेशनल हाईवे था। हमने तय किया है कि अगले पांच साल में नेशनल हाईवे की लंबाई दो लाख किमी तक ले जाएंगे। ‘‘ यह कहना है केन्द्रीय सड़क परिवहन, राजमार्ग व जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी का उदय इंडिया से हुई बातचीत में। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश।

पिछले दो साल में आपकी सरकार ने सड़क और शिपिंग क्षेत्र के लिये क्या कदम उठाये हैं? 

सड़क और शिपिंग क्षेत्र में अभी दो लाख करोड़ का काम शुरू हो चुका है। अगले साल तक हम पांच लाख करोड़ तक का काम शुरू करने का लक्ष्य तय किया हैं। यह बहुत बड़ी चुनौती है। अब 41 किमी प्रतिदिन रोड निर्माण का लक्ष्य तय किया गया है। पिछले दो साल में सड़क निर्माण की जो गति बढ़ी है, वह भी अपने आप में रिकॉर्ड है। पहले 25 किमी प्रतिदिन का टारगेट रखा गया था, लेकिन बाद में उसे 30 किमी कर दिया गया। किसी काम का टारगेट ज्यादा रखकर मुख्य टारगेट के नजदीक तक पहुंचा जा सकता है। इसके पहले सिर्फ दो किमी प्रतिदिन सड़क बन रही थी। इस समय 20 किमी प्रतिदिन सड़क बन रही है। लोगों को भले ही लगे कि हमने जो कहा उससे दूर हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि पिछले दो साल में सड़क क्षेत्र में हमने जो किया है वह ऐतिहासिक है। इससे हम मंदी के दौर से गुजर रहे देश को इससे बाहर निकाल सकेंगे।

चारधाम परियोजना का विचार आपको कैसे आया और अब तक क्या प्रगति हुई है?

आपदा के आने से कई लोगों की मौत हो गई और मेरा मन बहुत दुखी हुआ। मेरे मन में विचार आया कि क्यों न ऐसी सड़क बनाई जाये जिससे लोगों को किसी भी मौसम में दिक्कत नहीं हो। इसके लिए 12 हजार करोड़ रूपये खर्च करके ग्यारह सौ किमी की ऐसी सड़क बना रहे हैं, जिससे हर मौसम में गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ लोग जा सकेंगे। किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा आने पर भी सड़क मार्ग बंद नहीं होंगे। छह सौ करोड़ के वर्क ऑर्डर दिए जा चुके हैं। काम भी शुरू हो चुका है। हमारी कोशिश दो साल में इस परियोजना को पूरा करने की है। मानसरोवर को देहरादून की तरफ से जोडऩे का काम भी हम कर रहे हैं। इस काम के भी अगले अप्रैल तक पूरा हो जाने की पूरी उम्मीद है। इसके लिये ऑस्ट्रेलिया से लाई गई मशीन से पहाड़ काटने का काम हो रहा है। काफी कठिन काम है हिमालय काटकर रास्ता बनाना है।

सड़क दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, इनसे बचने के लिये क्या सुरक्षा व्यवस्थाएं की गई हैं?

करीब 726 दुर्घटना वाले स्थान चिहिंत किये गए हैं। ग्यारह हजार करोड़ रूपये खर्च करके उन मार्गों को सुधारा जाएगा, जहां लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं। ऐसे रोड़ों पर लाइट लगाईं जाएंगी। सिग्नल लगाए जाएंगे। इसका कैबिनेट नोट बन रहा है, वहां से फैसला होने के बाद काम प्रारंभ हो जाएगा। इसके अलावा हमने प्रधानमंत्री सुरक्षित सड़क योजना बनाई है। जिसमें हर साल दुर्घटना वाली सड़कों के लिए सीआरएफ  फंड में दो हजार करोड़ रूपये आरक्षित किये जाएंगे। मोटर व्हीकल एक्ट भी मंजूर होना चाहिए। इसमें राज्य सरकार के सहयोग की आवश्यकता है। राजस्थान के मंत्री युनुस खान की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई है। उन्होंने सभी राज्यों के स्टेट ट्रासपोर्ट मंत्रियों से चर्चा की है। वह जल्द हमें रिपोर्ट देने वाले हैं। उस रिपोर्ट के आने के बाद एक्ट जल्द आ जाएगा। बांग्लादेश, भारत, नेपाल, और भूटान के लिए हम तीस हजार करोड़ की सड़क बना रहे हैं। सड़क चिहिंत करने का काम शुरू हो गया है। अभी अगरतला से कोलकता आने में 18 घंटे लगते थे। अब छह घंटे में आया जा सकेगा। अगरतला से ढांका बाया कोलकता, बांग्लादेश के साथ एग्रीमेंट किया गया है। जिसमें ब्रम्हपुत्रा से माल भेजा जा सकेगा। फरख्खा पावर प्रोजेक्ट भी बांग्लादेश में जा रहा है। साहिबगंज में मल्टीपल हब हम बना रहे हैं। वहां से सीधे माल बांग्लादेश को जाने लगेगा।

भारतमाला परियोजना के विषय में कुछ बताईये?

भारतमाला परियोजना के तहत कई कामों के डीपीआर बन गए हैं। 2,67,200 करोड़ की लागत से देश के पिछड़े जिलों को जोड़ा जाएगा। पर्यटन स्थलों को आपस में जोड़ा जाएगा तथा धार्मिक स्थलों के बीच सड़क की चैन बनाई जाएगी। कई जगह पर काम भी शुरू हो गए हैं। देश में 52 लाख किमी सड़क की लंबाई है। इसमें 96 हजार किमी नेशनल हाईवे था। हमने तय किया है कि अगले पांच साल में नेशनल हाईवे की लंबाई दो लाख किमी तक ले जाएंगे। इससे देश का 80 प्रतिशत यातायात नेशनल हाईवे में शिफ्ट हो जाएगा। दस हजार किमी की सड़क फोरलेन बनाएंगे। जिससे दुर्घटना में कमी आएगी। सारी सड़क सीमेंट, कंक्रीट की बनाई जाएंगी। समूचे कार्य को 2022 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

तटीय और सीमावर्ती इलाकों की सड़कों और छोटे बंदरगाह को जोडऩे के लिए 7 हजार किमी का मार्ग बनाया जाएगा। जिसमें 80 हजार 250 करोड़ रूपए खर्च होने का अनुमान है। धार्मिक  स्थलों, पर्यटन क्षेत्रों और पिछले इलाकों को जोडऩे के लिए 7 हजार किमी सड़क बनाई जाएगी। जिसमें 85 हजार 250 करोड़ की लागत आने का अनुमान है।  सभी  जिला मुख्यालयों को राष्ट्रीय राजमार्ग से जोडऩे के लिए 60 हजार करोड़ की लागत से 9 हजार किमी लंबी सड़क बनाने की योजना है।

भारतमाला योजना के तहत असम में कोचीगांव से रायमना, जयगांव, लंकापाड़ा होकर वीरपाड़ा तक 123 किमी की सड़क बनाई जाएगी। जिसमें एक हजार 230 करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान है। ओडिशा मे भारतमाला के तहत कोर्णाक, अस्तांग, नौगांव, पारादीप, रतनपुर, सतभाया, धामरा, वासुदेवपुर, तलपाड़ा, चांदीपुर, चंदनेश्वर और दीघा को जोडऩे 430 किमी लंबी सड़क बनाई जाएगी। इसी योजना में छतरपुर से सतपाड़ा तक 70 किमी की सड़क बनाकर एनएच-16 को एनएच-316 से जोड़ा जाएगा। ओडिशा में पर्यटन स्थल को जोडऩे के लिए एनएच-57 के खोडा से चंदका होते हुए एनएच-16 स्थित कटक से जोड़ा जाएगा। ओडिशा के पिछड़े इलाकों को जोडऩे के लिए 621 किमी सड़क बनाने का प्रस्ताव है।

केरल में भारतमाला परियोजना के तहत 170 किमी की सड़क बनाकर कोच्ची को कालीकट राष्ट्रीय राजमार्ग से जोडऩे की योजना है। जिसमें 2 हजार करोड़ रूपये का खर्च आने का अनुमान है। भारतमाला योजना के अंतगर्त उत्तरप्रदेश में सात सौ करोड़ की लागत से 140 किमी सड़क बनाने की योजना है। धार्मिक महत्व के स्थलों को जोडऩे के लिए 6 हजार करोड़ की लागत से 12 सौ किमी सड़क बनाई जाएगी। जिसमें सहारनपुर, वाराणसी, अयोध्या, कन्नौज, हरदोई, सीतपुर, बाराबंकी, चित्रकूट  को जोड़ा जाएगा। भारतमाला योजना के तहत पंजाब में गुरूदासपुर से डेराबाबा नानक, अमृतसर होकर खेमकरण तक 162 किमी लंबी दो लेन की सड़क बनाई जाएगी।

आप अंतर्देशीय जल परिवहन प्रणाली विकास की बात कर रहे हैं, इसके लिये क्या बजट है? और आप इसे कैसे प्राप्त करेंगें?

भारत में समुद्री परिवहन के लिए अपार क्षमता है–देश में 12 प्रमुख बंदरगाहों के साथ 7500 किमी से अधिक का विशाल समुद्र तट है और 180 से ज्यादा गैर-प्रमुख बंदरगाह हैं जहां से भारत का लगभग 95 प्रतिशत व्यापार होता है। भारत में नदियों, नहरों, बांद समेंत 14,500 किमी लंबा अंतर्देशीय जल मार्ग का एक व्यापक नेटवर्क है। जहाजरानी मंत्रालय ने पिछले दो सालों में भारत में ग्रीनफिल्ड बंदरगाहों के माध्यम से समुद्री क्षेत्र की क्षमता का दोहन करने पर ध्यान केन्द्रित किया है। जिससे बंदरगाहों की क्षमता बढ़ाने और अधुनिकीकरण  एवं शिपिंग, जहाजों के निर्माण और जहाजों की मरम्मत के क्षेत्र के रखरखाव पर जोर दिया जा रहा है, जिससे अंतर्देशीय जल परिवहन और निकटस्थ क्षेत्रों में, बहुविध परिवहन के माध्यम से कनेक्टिवटी में सुधार हो सके। इसके लिये 4.12 लाख करोड़ का बजट होगा। इस साल बंदरगाहों से 6,000 करोड़ रूपये का लाभ प्राप्त हुआ है। आगामी वर्ष में इस लाभ के 8,000 करोड़ तक पहुंचने के पूरे आसार हैं। पांच साल में यह लाभ लगभग 50,000 करोड़ तक होगा। बैंकों में एफडी (फिक्स डिपोजिट) भी किया जा चुका है। हम इन जमाओं, निवेश और ऋण पर बैंकिंग कर रहे हैं। अगर हम 2-2.5 प्रतिशत पर 15 साल का ऋण ले तो आसानी से हमे 50,000 करोड़ मिलेगा।

अंडरपास और ओवर ब्रिज के विकास के लिये आपकी क्या योजनाएं है?

सेतुभारत परियोजना के तहत 208 अंडरपास और ओवर ब्रिज हम बना रहे हैं। इस पर 50,800 करोड़ खर्च किए जाएंगे। इस साल काम में तेजी आएगी। 15 सौ पुराने ब्रिज का नए सिरे से निर्माण किया जाएगा। इस पर सात हजार करोड़ रूपये खर्च किये जाएंगे। देश के सभी पुलों का रिकॉर्ड बनाया जा रहा है। उसके अध्ययन का काम चल रहा है।

ग्रीन हाईवे प्रोजेक्ट की शुरूआत कब से शुरू की जा रही है और यह कैसे महत्वपूर्ण है?

इस साल जून-जुलाई में ग्रीन हाईवे प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया जाएगा। परियोजना में आगामी पांच साल में पांच लाख पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है। आउटसोर्सिंग के जरिए वृक्षारोपण और रखरखाव प्रक्रिया के आधार पर होगा। पेड़ काटने की बोली लगाने की बजाय उसका प्रत्यारोपण किया जाने पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। वृक्षारोपण के लिए एजेंसियों का चयन एमओआरटीएच, एनएचएआई, आईएचएमसीएल द्वारा किया जाएगा। जिन स्थानों पर वृक्षारोपण किया जाएगा, वहां क्या वनस्पति के पौधे लगाए जा सकते हैं, इसका अवलोकन एजेंसियों स्थानीय लोगों के परामर्श से करेंगी। क्षेत्र के हिसाव से किन वृक्षों को लगाना उपयुक्त होगा इसके लिए वन विभाग और बागवानी विभाग के विशेषज्ञों से सलाह ली जाएगी। नोडाल एजेंसियों को स्वसहायता समूहों को प्रोत्साहित करने के लिए कहा जाएगा। सड़क किनारे होने वाले वृक्षारोपण की निगरानी इसरो द्वारा विकसित गगन और भुवन उपग्रह के जरिए की जाएगी। अगले पांच साल में पांच लाख करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट आवंटित किये जाने हैं उनमें से पांच हजार करोड़ रूपये वृक्षारोपण के लिए रखे जाएंगे। प्रोजेक्ट कॉस्ट(टीपीसी) की एक फीसदी रकम को प्लांटेशन फंड बनाया जाएगा। जिसे अधिकृत एजेंसी के पास अलग खाते में रखा जाएगा।


05-06-2016

बजट 2016-17 में स्वास्थ्य क्षेत्र में तीन योजनाओं की घोषणा की गई- स्वास्थ्य बीमा, जन औषधि योजना और डायलिसिस कार्यक्रम। स्वास्थ्य बीमा के तहत 1 लाख रु. तक के अस्पताल के खर्चों का कवर मुहैया कराया गया है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए 30,000 रु. का अतिरिक्त कवरेज है। सरकार कमजोर तबकों के लोगों के लिए आधार आधारित कार्यक्रम से आठ करोड़ परिवारों को यह बीमा मुफ्त मुहैया कराएगी। जन औषधि कार्यक्रम के तहत सरकार सस्ती जेनेरिक दवाइयों की देश भर में 3,000 दुकानें खोलेगी। गुर्दे की खराबी की बीमारियां बढ़ रही हैं। हर साल 2.2 लाख लोग ऐसी बीमारियों से पीडि़त हो रहे हैं, इसलिए सभी जिला अस्पतालों में डायलिसिस की सुविधा मुहैया कराई जाएगी। पिछले दो साल से मोदी ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन’ के अपने मंत्र को ही साधने में लगे हैं और अफसरशाही के लिए ऐसी जवाबदेही तय करने में लगे हैं जो देश के भविष्य के लिए बेहतर होगा। भ्रष्टाचार पर सरकार के कठोर रवैए के कारण ‘क्रोनी कैपिटिलिज्म’ (याराना पूंजीवाद) की संपत्ति घटकर 2008 में जीडीपी के 18 प्रतिशत से इस साल 3 प्रतिशत पर आ गई है। पिछले दो साल में केंद्र सरकार में भ्रष्टाचार के एक भी मामले नहीं खुले हैं।


हमारा उद्देश्य रोजगार व कौशल विकास का सृजन’’


05-06-2016पिछले साल 7 अगस्त को चेन्नई में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा हैंडलूम दिवस की घोषणा की गई, ताकि हैंडलूम की एक अलग पहचान बने, और हैंडलूम एक मार्का बने। इस काम के आधार पर हमने  हैंडलूम की क्वालिटी को भी मैनेज करने का काम किया है। जो भी क्वालिटी हैंडलूम की आ रही है हम उसे सही स्वरूप देने का काम कर रहे हैं। हमने यह भी देखा है कि बुनकरों की संख्या बढ़ नहीं रही है। तो हम इस कोशिश में लगें हैं कि जो बुनकर हैंडलूम से जुड़े हैं उनकी आय कम-से-कम 500 रूपये प्रतिदिन हो। इस दिशा में हमें अच्छी सफलता मिल रही है और इस दिशा में हम सब मिलकर एक साथ आगे बढ़ रहे हैं, यह कहा संतोष गंगवार, केन्द्रीय राज्यमंत्री, (स्वतंत्र प्रभार) टेक्सटाइल, ने। उदय इंडिया की संवाददाता प्रीति ठाकुर से हुई बातचीत में। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-

मोदी सरकार को दो साल हो गये हैं सत्ता में आये हुए। आपकी सरकार ने क्या-क्या उपलब्धियां प्राप्त की हैं? 

हमने अपनी एक अलग पहचान बनाने का काम किया है। सरकार बनने से पहले लोग टेक्सटाइल मंत्रालय पर ध्यान नहीं देते थे। क्योंकि, टेक्सटाइल मंत्रालय की कोई पहचान नहीं बन पा रही थी। लेकिन इस सरकार के आने के बाद हमने अपने से संबंधित सभी क्षेत्रों में काम किया है और एक नई दिशा देने का प्रयास किया है। हम बहुत ही जिम्मेदारी के साथ कह सकते हैं, कि मंत्रालय ने जो प्रगति की है उसके परिणाम अब नजर आने लगे हैं। जैसे कपड़ा मंत्रालय का मुख्य संबंध रहता है कॉटन से। कॉटन के उत्पादन में आज हमारा देश दुनिया मे नंबर वन पर है। आज कृषि के क्षेत्र में हत्या की खबरें सुनने को मिलती हैं। लेकिन कॉटन उत्पादन करने वाले किसानों को कहीं पर भी इस समस्या का समना नहीं करना पड़ा रहा है। एक और विशेष बात है, जिसकी हम कॉटन उत्पादन करने वाले किसानों को बधाई भी देते हैं। दुनिया भर में कॉटन उत्पादन में हमारा देश नंबर वन पर है और पिछले वर्ष भी रहा है। हमने 18 हजार करोड़ रूपये की एमएसपी के माध्यम से कॉटन की खरीददारी की। जो सरकारी व्यवस्था हमने की उसकी बजह से आज बिल्कुल भी कॉटन हमारे पास शेष नहीं है। हमारे भंडारों में कहीं भी कॉटन का भंडारण नहीं है। हमने सही तरीके से इसे आगे बढ़ाने का काम किया है।

हैंडलूम क्षेत्र को और अधिक बढ़ावा मिले इसके लिए आप क्या कर रहे हैं?

पिछले साल 7 अगस्त को चेन्नई में प्रधानमंत्री के द्वारा हैंडलूम दिवस की घोषणा की गई, ताकि हैंडलूम की एक अलग पहचान बने, और हैंडलूम एक मार्का बने। इस काम के आधार पर हमने हैंडलूम की क्वालिटी को भी मैनेज करने का काम किया है। जो भी क्वालिटी हैंडलूम की आ रही है हम उसे सही स्वरूप देने का काम कर रहे हैं। हमने यह भी देखा है कि बुनकर लोगों की संख्या बढ़ नहीं रही है। तो हम इस कोशिश में लगें हैं कि जो बुनकर हैंडलूम से जुड़े हैं उनकी आय कम-से-कम 500 रूपये प्रतिदिन हो। इस दिशा में हमें अच्छी सफलता मिल रही है और इस दिशा में हम सब मिलकर एक साथ आगे बढ़ रहे हैं।

जूट क्षेत्र की सही पहचान के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं?

मैं यहां पर यह कहना चाहूंगा कि जूट अपने आप में एक अहम हिस्सा है हैंडलूम का, और जूट समान्यत: पश्चिमी बंगाल में होता है। इस बार जूट की पैदावार कम हुई। लोगों का मानना है कि जूट की पैदावर सिर्फ बोरों के लिए होती है। हम इसकी डायवस्र्टी के हिसाब से काम कर रहे हैं। जूट की सही पहचान बने और अन्य चीजों में जूट का चाहे बैग हों या कुछ और इसके लिये जूट को बढ़ावा दिया जाये। इसके लिए हम त्रिपुरा और दूसरे राज्यों से जुड़कर काम कर रहे हैं। हमारी एक महत्वपूर्ण योजाना है टेक्सटाइल पार्क की। पिछले 8-10 वर्षों में 50 टेक्सटाइल पार्क स्वीकृत हुए, उनके कामों की प्रगति हम देख रहे हैं। पिछले डेढ़ से 2 सालों के कार्यकाल में हमने 24 टेक्सटाइल पार्क स्वीकृत किये हैं। वास्तव में यह एक बड़ा काम हुआ है। इस काम में अच्छी संख्या में रोजगार और उद्यमियों को उद्यम लगाने के लिए भी हम अच्छा माहौल मुहैया कराने का काम कर रहे हैं। टेक्सटाइल पार्कों की दिशा में हम सक्रियता से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण कार्य जो लंबे समय से लंबित था आईएसडीएस स्कील डेवलेपमेंट का हमने लक्ष्य रखा है। 15 लाख लोगों को स्कील डेवलेपमेंट करवाने का लक्ष्य है जिसे हम सही दिशा में आगे बढ़ायेंगे।


विदेश नीति के मोर्चे पर सरकार इस छोटी अवधि में ही अपनी अनोखी छाप छोडऩे में कामयाब रही है। उसने भारत को दुनिया में अहम स्थान दिला दिया है। गुट-निरपेक्षता के दिन लद गए हैं। इसके बदले सहमना देशों से पक्की साझेदारी करने से भारत की आर्थिक और कूटनीतिक ताकत बढ़ी है। सीमावर्ती क्षेत्रों में सेना को कार्रवाई करने की अधिक स्वायत्तता दी गई है। इस तरह कूटनीति को देश की रक्षा नीति का अनिवार्य अंग बना दिया गया है। भारत की रणनीतिक पहल अनजाने क्षेत्रों में भी हुई है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विदेश नीति में खासकर एशिया में संस्कृति और व्यावहारिकता को पर्याप्त जगह दी है। भारत की ‘पूरब देखो/पूरब कदम बढ़ाओ’ नीति के तहत मोदी ने एशिया के लोगों में सांस्कृतिक अपील पैदा की है। अंतर्राष्ट्रीय दायरे में आर्थिक-राजनैतिक-रणनीतिक जरूरतों के साथ आध्यात्मिक पुट देकर मोदी ने भारत को एक ऐसी सभ्यता के रूप में पेश करने की कोशिश की है जहां सहस्राब्दियों से संचित ज्ञान में आज की दुनिया की समस्याओं का हल है। असल में 19वीं सदी में जैसा स्वामी विवेकानंद ने किया, उसी तरह मोदी भारत को विविध संस्कृतियों के मंच और नैतिक सत्ता के रूप में पेश कर रहे हैं।


पर्यावरण संबंधित कड़े कानूनों का अब सख्ती से पालन’’


05-06-2016

प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन गया है। औद्योगिक प्रदूषण, नदी प्रदूषण, वायु प्रदूषण आदि कई तरह के प्रदूषण फैले हुए हैं। अत: पर्यावरण मंत्रालय प्रदूषण अनुसंधान संस्थान की स्थापना करने की सोच रहा है, ताकि प्रदूषण के दुषप्रभावों का अध्ययन करके ये संस्थान पर्यावरण मंत्रालय को बता सके की इसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है,’’ यह कहा केन्द्रीय पर्यावरण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रकाश जावड़ेकर ने, डी.के.रथ के साथ हुई विशेष बातचीत में। प्रस्तुत है प्रमुख अंश:-

निर्माण और विध्वंस अपशिष्ट का लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसके नियंत्रण के लिए आप क्या कर रहे हैं?

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले 70 सालों में भारत में हुए निर्माण और विध्वंस के अपशिष्ट पदार्थों पर किसी ने भी चिंता नहीं जाहिर की। मैंने मेट्रो जगत देखा है जहां प्रतिदिन टनों मिट्टी की खुदाई की जाती है, लेकिन इन शहरों में प्रदूषण का कोई असर नजर नहीं आता क्योंकि, सारा काम वैज्ञानिक तरीकों से किया जाता है। लेकिन हमने पहली बार भारत में निर्माण और विध्वंश प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए कुछ मानदंडों और नियमों का निर्धारण किया है। मलबे को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए मालवाहक वाहनों को ढक कर और पानी का छिड़काव करके ले जाया जाये और मलबे की पुनारावृत्ति की जाये। सरकार मलबे को किसी भी स्थान पर डंप करने की अनुमति नहीं देती है। मलबे के लिये जो स्थान निर्धारित किये गये हैं डंपिंग वहीं होनी चाहिए।

आपने बताया कि सरकार प्रदूषण अनुसंधान संस्थान कि स्थापना करने जा रही है। इसके बारे में हमें कुछ बताईये?

प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन गया है। औद्योगिक प्रदूषण, नदी प्रदूषण, वायु प्रदूषण आदि कई तरह के प्रदूषण फैले हुए हैं। अत: पर्यावरण मंत्रालय प्रदूषण अनुसंधान संस्थान की स्थापना करने की सोच रहा है, ताकि प्रदूषण के दुष्प्रभावों का अध्ययन करके ये संस्थान पर्यावरण मंत्रालय को बता सके की इसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। हमें वायु प्रदूषण पर कुछ शोध करने की जरूरत है। जैसे कि हम दूसरे क्षेत्रों में भी कर चुके हैं। इसके लिए हम अलग से वायु प्रदूषण अनुसंधान संस्थान की स्थापना करने की भी सोच रहे हैं। यह संस्थान लोगों को और सरकार को प्रदूषण रोकने के बारे में जानकारी प्रदान करेगा जिससे हमें शासन व्यवस्था को और अधिक बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।

डब्लूएचओ के एक अध्ययन के मुताबिक विश्व के 30 सबसे प्रदूषित शहर भारत में ही स्थित हैं। इस पर अंकुश लगाने के लिये क्या कदम उठाये जा रहे हैं? 

यह एक गलत धारणा है और एक आंशिक रिपोर्ट है। क्योंकि इस रिपोर्ट में सिर्फ 2.5 पीएम (पार्टीकुलेटिड मैटर्ज) प्रदूषण की बात कही गई है। डब्लूएचओ यहां सिर्फ विकासशील देशों की बात कर रहा है। अगर बात करें अमेरिकन और यूरोपियन देशों की तो वह भी ओजोन प्रदूषण, बेंजीन प्रदूषण, धुंध प्रदूषण जैसे तमाम तरह के प्रदूषणों की चपेट में हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि हर शहर किसी-न-किसी प्रदूषण की चपेट में है। यह तो सर्वविदत है कि अमेरिका जैसा देश  भी प्रदूषण की वजह से परेशान है। हम जल्द ही भारत और विश्व में बढ़ रहे प्रदूषण पर कुछ दस्तावेज जारी करेंगे, जिनमें स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालने वाले प्रदूषणों के विषय में पूर्ण विवरण होगा।

आप भारत में स्वच्छ शहरों की बात कर रहे हैं। लेकिन बैंगलूरू, गाजीपुर, दिल्ली बॉर्डर जैसी जगहों के बारे में क्या कहेंगे जहां कचरा बेतरतीब ढंग से कहीं भी फेंक दिया जाता है?

मैं इस बात से सहमात हूं कि 70 फीसदी लोग ऐसे हैं जो कि स्वच्छता और पर्यावरण का ध्यान नहीं रखते हैं। दिल्ली पिछले 2 सालों में प्रदूषित नहीं हुई है यह समस्या तो पहले से ही चली आ रही है। हम पहले से ही ठोस कचरा प्रबंधन नियम, ई-कचरा प्रबंधन नियम, प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, जैव चिकित्सा और अन्य खतरनाक अपशिष्ट पदार्थों के प्रबंधन नियमों समेत सभी तरह के कचरा प्रबंधन नियमों के पुर्नोत्थान में लगे हैं। लोगों में कचरे को तीन श्रेणियों में बांटने की जिम्मेदारी की शुरूआत की गई है- गीला, शुष्क और खतरनाक अपशिष्ट। लोगों को इस तरह के अपशिष्ट को इक्ट्ठा करने वाले को ‘उपयोगकर्ता शुल्क’ का भुगतान करना होगा। कूड़े-करकट को फैलाने और कूड़े को श्रेणियों में न बांटने वाले को ‘स्पॉट फाइन’ का भुगतान करना होगा। भुगतान कितना करना होगा वह स्थानिय निकायों द्वारा निर्णय लिया जायेगा। सरकार औपचारिक क्षेत्र के लिए अनौपचारिक क्षेत्र से कचरा बीनने वालों के एकीकरण के लिए उत्सुक है। साथ ही हमारा ध्यान कचरे के पुनरावृत्ति पर भी है। जो कानून का उल्लंघन करेगा उसे सजा दी जायेगी। सरकार ने 10 हजार से लेकर 10 करोड़ रूपये तक की पेनल्टी का प्रवधान रखा है। इसके अंतगर्त चाहे स्थानीय निकाय हों या फिर कॉरपरेशन सभी को दंडित किया जायेगा।

दो साल पहले आपने भारत को 2030 तक ‘लैंड डीग्रेडेेशन न्यूट्रल’ बनाने की बात की थी। इसके लिये क्या कदम उठाये गये हैं?

भारत में पहले ही एक तिहाई भूमि का क्षरण हो चुका है। हम चाहते हैं कि इस भूमि पर पुन: वन उगाये जायें। यह काम कैम्पा बिल के माध्यम से किया जायेगा। जो कि लोकसभा में पहले ही पारित किया जा चुका है। इसके तहत वनसंवर्धन की क्षतिपूर्ति के लिए 40,000 से 42,000 करोड़ रूपये सुनिश्चित किये गये हैं। इसके तहत जहां पहले वन्य भूमि थी वहां भी वन उगाये जायेंगे और जो जगह खाली पड़ी है वहां पर भी वनसंवर्धन के लिये इस राशि का प्रयोग किया जायेगा।

कैम्पा लॉ क्या है और इसके क्या महत्व हैं?

कैम्पा (कम्पेंसटरी अफ्फोरेस्टेशन फण्ड मैनेजमेंट एंड प्लानिंग अथॉरिटी) के पास बच गई अव्ययित राशि जो कि अभी 42,000 करोड़ है, का सही और तेज तरीकों से व्यय करने और इस अपव्ययित राशि, पर ब्याज और अन्य करारोपण से उपर्जित राशि जो की लगभग 6000 करोड़ प्रति वर्ष है का पारदर्शी और योग्य उपयोग करना ही इस नियम का लक्ष्य है। पिछले 13 सालों से यह राशि बिना किसी प्रयोग के बैंकों में पड़ी हुई है। यह राशि 2002 में मात्र 200 करोड़ थी जो कि ब्याज के साथ बढ़ते हुए 42,000 करोड़ रूपये हो गई है। इस राशि का इस्तेमाल अब भारत को हरित बनाने के लिये किया जायेगा।

जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता में कटौती करने के लिये आपकी क्या योजनाएं हैं?

हमने 2030 तक गैर-जीवश्म ईंधन से  40 प्रतिशत तक ऊर्जा पैदा करने की योजना बनाई है, जो अपने आप में काफी है। इतना तो संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी नहीं किया हैं। वहां भी सार्वजनिक और निजी भागीदारी क्षेत्र सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोमास ऊर्जा और पनबिजली ऊर्जा से गैर-जीवाश्म ईंधन का उत्पादन करने में लगे हैं। इसके परिणामस्वारूप आगामी वर्षों में भारत में जबरदस्त जीवाश्म ईंधन की दर में वृद्घि हो पायेगी।

देश में बड़े पैमाने पर सूखाग्रस्त हालात देखे जा रहे हैं, इसके क्या कारण हैं?

बाढ़ और सूखा दोनों ही प्राकृतिक आपदाएं हैं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग भी सूखे और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं के  लिए जिम्मेदार हैं। सरकार सूखेग्रस्त क्षेत्रों के प्रति संवेदनशील है और खराब मानसून के समय पानी की समस्या से निबटने के लिए स्थाई समाधान प्रदान करने के लिये ठोस कदम उठा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रत्येक राज्य के मंत्रियों और मशीनरियों के साथ तीन-तीन घंटे से अधिक की बैठक करके सूखा प्रभावित स्थानों की संवेदनशीलता पर चर्चा की है। पहले ऐसे स्थानों का जायजा लेने के लिये केन्द्र सरकार एक टीम भेजा करती थी और उसी टीम की समीक्षा के अनुसार धनराशि आवंटित की जाती थी। अब हम समस्याओं से निबटने के लिए राज्यों के अधिकारियों से सीधे संपर्क में हैं। जहां लोगों की समस्याएं सीधी सुनी जायें वह ही सुशासन है।

जीएम क्रॉप्स (जेनेटिकल मॉडीफाई क्रॉप्स) के बारे में आप क्या कहेंगे?

हमारी सरकार जेनेटिकल मॉडीफाई या जीएम फसलों के परीक्षण के साथ आगे बढऩे के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन व्यवसायीकरण पर यह निर्णय उचित वैज्ञानिक मूल्यांकन के बाद ही लिया जायेगा। जीएम क्रॉप्स के आने से फसल अच्छी होगी। हर किसी को अनाज उपलब्ध होगा, जिससे गरीब भी सम्मानित तरीके से जी सकेंगे। हमें खाद्य उत्पादन के सभी सुरक्षित तकनीकों का मूल्यांकन करने की जरूरत है।

मौजूदा पर्यावरण कानून में परिवर्तन पर आपकी क्या राय है?

हम कैम्पा लॉ व सिविल पैनाल्टीज लाएं हैं, जिसमें कूड़ा-कचरा फैलाने वाले नागरिकों के लिए दंड का प्रावधान भी हैं। अगर जरूरत पड़ी तो पर्यावरण को सुरक्षित बनाने के लिए हम और अधिक कानून लाएंगे।

पर्यावरण कानूनों और मानकों के अनुपालन में सुधार के लिए क्या प्रवधान किये गए हैं?

हमने पहले ही औद्योगिक घरानों के लिए और दूसरे क्षेत्रों के लिए भी मानक निर्धारित कर दिये हैं। मुझे अपने मोबाइल पर हर राज्य के पर्यावरण अनुपालन पर हर मिनट रिपोर्ट प्राप्त हो रही है। इसलिए मुझे लगता है कि प्रौद्योगिकी का उपयोग करके उद्योगों पर नियंत्रण लगाया जा सकता है।

देश में 19 करोड़ पशुधन मौजूद हैं जो कि विश्व के पशुधन का 14 प्रतिशत या इससे भी अधिक है। 15 करोड़ से अधिक स्वदेशी पशुधन हैं  इनकी सुरक्षा के लिये क्या कदम उठाये जा रहे हैं?

गाय और दूसरे पशुपालन केन्द्रों के उत्पादन में वृद्घि और सुरक्षा के विषय कृषि मंत्रालय देखता हैं। पर्यावरण मंत्रालय पशुओं के प्रति क्रूरता के कारक को ही देखता है।

व्यापक रूप से यह माना जाता है कि आपका मंत्रालय प्रो-इंडस्ट्री है जिससे समर्थक उद्योगों को पर्यावरण मंजूरी आसानी से मिल जाती है। 

हमने पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बना दिया है। हम इस प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी लाने के लिए विकेन्द्रीकृत और मानकीकरण कर रहे हैं। हम उद्योगों की योग्यता देखते हैं न कि उनके चेहरे। हम इस मामले में किसी का भी हस्तक्षेप नहीं चाहते हैं। यूपीए सरकार में पर्यावरण मंजूरी देने के लिए औसतन 600 दिन लगते थे, लेकिन अब सिर्फ 100 ही लगते है।

क्या आप इस मंत्रालय से खुश हैं या किसी दूसरे मंत्रालय की इच्छा रखते हैं?

युवा अवस्था से ही मेरा सपना रहा है कि मैं लोगों की सेवा करूं। अब वक्त आ गया है कि मैं इस काम को पूरी लगन से पूरा करूं।


05-06-2016

मोदी के राज में देश ने जापान, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ सैन्य अभ्यास किया, जो पहले चीन की नाराजगी की आशंका से नहीं किया जाता था। केंद्र सरकार ने अफगानिस्तान से सुरक्षा रिश्ते सुधारने के लिए काबुल को जंगी हेलिकॉप्टर मुहैया कराये। गहरे समुद्र में नौवहन की सुरक्षा पर अमेरिका से संधि करके देश ने दक्षिण चीन सागर में चीन और उसके पड़ोसियों के विवाद में हस्तक्षेप करने की नीति भी अपनाई है। पाकिस्तान के साथ संबंधों का मामला भारतीय राजनीति में हमेशा ही संवेदनशील रहा है। लेकिन, सरकार खाड़ी के देशों खासकर सऊदी अरब से अपने रिश्तों के जरिए पाकिस्तान पर आतंकवाद को शह देने की नीति छोडऩे का दबाव बनाने की नीति को अपनाया है। सऊदी अरब परंपरागत रूप से पाकिस्तान का दोस्त रहा है।


नवनिर्माण के लिए शिक्षा नीति’’


UPENDRA

बिहार जैसे प्रदेश से राजनीतिक कैरियर की शुरुआत करके राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आना और केंद्रीय मंत्रीमंडल में एक जगह बनना वाकई काफी दुरूह कार्य है। इसी दुरूह और चुनौतीपूर्ण कार्य को अंजाम देने का काम किया है उपेंद्र कुशवाहा ने, जो फिलहाल केंद्रीय मंत्री मंडल में मानव संसाधन  विकास राज्य मंत्री (स्कूल एजुकेशन एंड लिट्रेसी) का पदभार निभा रहे है। साथ ही वे राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के चेयरमैन भी हैं। हमारे संवाददाता संजय सिन्हा की उनके आवास पर उनसे कई मुद्दों पर बातचीत हुई। पेश है मुख्य अंश-

राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चा में शामिल होकर मंत्री पद तक पहुंचना और इतना अरसा गुजारने का अनुभव कैसा रहा आपका?

बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। विशेषकर मैं मंत्रिमंडल के मुखिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को धन्यवाद देता हूं जिन्होंने मुझे काफी कोऑपरेट किया और कदम-कदम पर उनका मार्गदर्शन भी मिला। मैं उनसे बेहद प्रभावित भी हूं। लम्बे अर्से के बाद देश को ऐसा जुझारू और काबिल प्रधानमंत्री मिला। मुझे जो भी मंत्रालय दिए गए, उसके लिए पुरे समर्पण और उत्साह के साथ मैंने कार्य किया।

इन दिनों आप मानव संसाधन विकास मंत्रालय का महत्वपूर्ण पद निभा रहे हैं। स्कूल शिक्षा और साक्षरता के क्षेत्र में किस तरह का विकास हो रहा है? कमजोर होती स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर कैसे लगाम लगाएंगे?

स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में कई तरह के सार्थक बदलाव लाया जा रहा है। इस परिवर्तन से निश्चित तौर पर देश को लाभ पहुंचेगा। शिक्षा नीति में हमलोग एक सबसे बड़ा काम बच्चों के लिए व्यवहारिक शिक्षा के क्षेत्र में कर रहे हैं। बच्चों के लिए स्कूली और बेसिक शिक्षा के साथ साथ फॉर्मल एजुकेशन भी बेहद जरूरी है। सोशल और मोरल वैल्यूज की महत्ता भी उन्हें बतानी होगी तभी देश का सार्थक विकास हो पाएगा। स्किल डेवलपमेंट पर हमारा विशेष ध्यान रहेगा।

इन बिन्दुओं पर आपका ध्यान कैसे गया?

हम लोगों ने महसूस किया और देश के कई हिस्सों से हमारे पास सुझाव भी आ रहे थे। हम लोगों ने पहली बार बिल्कुल जमीनी स्तर से कार्य शुरू किया। स्कूली शिक्षा को लेकर हर स्तर के लोगों से फीडबैक लिए गए। मेरा मनना है कि बेसिक शिक्षा के क्षेत्र में आमूल -चूल परिवर्तन होना चाहिए। क्योंकि व्यवहारिक शिक्षा के साथ-साथ स्वावलंबन कि भावना भी जरूरी है। बेसिक एजुकेशन के क्षेत्र में और भी कई तरह के परिवर्तन किये जा रहे हैं।

आपको लगता है कि इन बदलावों से शिक्षा के क्षेत्र में कुछ लाभ होगा?

जी बिलकुल फायदा होगा। जो भी बदलाव किये जा रहे हैं उसके लिए देश भर के लोगों की राय और एक्सपट्र्स की सहायता ली जा रही है। क्योंकि पहले की शिक्षा नीति काफी त्रुटिपूर्ण थी। लिहाज परिवर्तन जरूरी है।

इस कार्य में कहां तक प्रगति हुई है?

एक्सरसाइज वर्क लगभग पूरा हो चुका है। मंत्रालय की विशेष कमेटी इस कार्य में लगी हुयी है। जल्दी ही ड्राफ्टिंग का काम भी शुरू हो जायेगा।

नई शिक्षा नीति को लागू होने में लगभग कितना वक्त लगेगा?

देखिये कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है। बहुत जल्दी हम नयी शिक्षा नीति को लागु करेंगे।

अपने राजनीतिक संगठन राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को लेकर कितना गंभीर हैं आप?

ये संगठन देश भर में अपनी पहचान बन रहा है। हमने बिहार, झारखण्ड, राजस्थान आदि कई राज्यों में संगठन बनाया है। आगे भी कार्य चल रहा है।

अगले चुनाव को लेकर क्या स्ट्रेटजी बनाई गयीं हैं?

अभी तक तो नहीं बनी है। चुनाव से ठीक पहले हम चुनावी स्ट्रेटजी बनाएंगे। ये तय है की हमारा झुकाव एनडीए की तरफ ही रहेगा, क्योंकि एनडीए की पॉलिसी हमें पसंद है।


दो साल में मोदी सरकार ने बहुत कुछ किया है लेकिन, अभी बहुत कुछ करने की दरकार है। सबके लिए आवास, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, किसान बीमा योजना, जीविकोपार्जन मिशन और ऐसी कई योजनाएं हैं जिनसे आम आदमी का जीवन बदल सकता है। मौजूदा सरकार की नीतियों का अलग-सा पहलू यह है कि इनसे जीडीपी के तेज विकास की उम्मीद जागती है। इनसे राजस्व बढऩे, क्रय शक्ति बढऩे और सामाजिक सेवाओं के बेहतर होने की उम्मीद भी बनती है। इसमें दो राय नहीं कि अभी ये मोदी सरकार के शुरुआती दिन ही हैं। भारी और बढ़ती उम्मीदों के इस दौर में अगले तीन साल में मोदी सरकार की नीतियों की परीक्षा होगी और उसी से 2019 के आम चुनाव की संभावनाएं तय होंगी।

नीलाभ कृष्ण

 

 

 

 

 

 

 

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