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मोदी मंत्र बरकरार?

मोदी मंत्र बरकरार?

पिछले सप्ताह मोदी सरकार ने दो साल पूरे किए और सरकार के कामकाज का डंका बज रहा है। नरेंद्र मोदी बतौर नेता भारतीय राजनीति में ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय जगत में भी खास हो गए हैं। लेकिन, सरकार का कामकाज अभी लोगों की तथाकथित ”ऊंची उम्मीदों’’ पर पूरी तरह खरा नहीं उतर पाया है। भाजपा एक कैडर आधारित पार्टी है और अपने वैचारिक परिवार की सुध लेना बेहद जरूरी है। इसका भी अभी इंतजार है। यह जरूर है कि सरकार पार्टी की वैचारिक प्रतिबद्धताओं से बंधी हुई है। सरकार के लिए जरूरी जिंसों की बढ़ती कीमतें अभी भी दु:स्वप सरीखी बनी हुई हैं। सरकार से जिन सुधारों की उम्मीद थी, वे अभी भी लटके हुए हैं। पहली बार कांग्रेस ने विपक्षी दल के नाते फैसलाकुन भूमिका निभाई जिसका संदेश साफ है कि यह महज राजनैतिक शोशेबाजी है कि ”मोदी कामकाज के प्रति गंभीर हैं।’’

यहां यह बताना मुनासिब है कि भारत विचार का केंद्रीय तत्व विविधता पर उसका जोर है। भारतीय गणतंत्र की बुनियाद इस वादे पर खड़ी है कि इसके सभी नागरिकों को समान अवसर मुहैया होंगे जिसमें वे पूरी आजादी के साथ जीवनयापन कर सकते हैं और यकीन रख सकते हैं कि उनकी सभी बुनियादी जरूरतें पूरी होंगी तथा उन्हें कानून की एक समान सुरक्षा हासिल होगी। नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो छद्म धर्मनिरपेक्ष ब्रिगेड ने यह आरोप लगाया कि नई सरकार का ‘भारत विचार’ अलहदा है, वह बहुसंख्यक प्रभुत्व के विचार से प्रेरित है, जो इस देश की बुनियादी सामाजिक-राजनैतिक दर्शन के विपरीत है। उन लोगों ने गहरी आशंका जाहिर की कि भारत का यह अलहदा विचार दंगों तथा ध्रुवीकरण की ओर ले जाएगा, निजी क्षेत्र को रियायात देने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण के मद में सरकारी खर्चों में कटौती करेगा, और विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों की चोरी को बढ़ावा देगा। लेकिन दो साल बाद वे पूरी तरह गलत साबित हुए और यह प्रधानमंत्री मोदी के देश के समग्र विकास के प्रति प्रतिबद्धता की वजह से हुआ है। उनकी प्रतिबद्धता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने पिछले दो साल में कभी छुट्टी नहीं ली।

कहने की जरूरत नहीं कि उनके नेतृत्व में भारत दुनिया से अधिक जुड़ा है और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा बढ़ रहा है। लेकिन सरकार का अर्थिक प्रदर्शन ही भविष्य की दिशा तय करेगा। देश की अर्थव्यवस्था फिलहाल बेहतर दिख रही है। आकलन यह है कि देश दुनिया में सबसे तेज गति से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था के मामले में चीन को पीछे छोड़ चुका है। जिस दौर में विश्व की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मजबूत अमेरिकी डॉलर और जिंसों के गिरते दाम की वजह से संकट में हैं, भारत कुछेक चमकते क्षेत्र की तरह है। मोदी ने जब मई 2014 में गद्दी संभाली तब खुदरा मुद्रस्फीती 8.28 प्रतिशत पर थी, वह इस साल अप्रैल में 5.39 प्रतिशत पर आ गई है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडी के मुताबिक देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2014 के 7.2 प्रतिशत के मुकाबले इस साल 7.6 प्रतिशत पर रहने की उम्मीद है। पिछले साल भारत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए पसंदीदा ठिकाने के मामले में भी चीन को पीछे छोड़ चुका है। इसका श्रेय मोटे तौर पर मोदी सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के जरिए उत्पादन क्षेत्र को मिले प्रोत्साहन को जाता है। इस मामले में ठोस नेतृत्व, निर्णय प्रक्रिया को चुस्त करने, वित्तीय अनुशासन और मौद्रिक नीति की स्वायत्तता के प्रति सम्मान की नीतियों से काफी मदद मिली है।

दरअसल इन दो साल में मोदी ने खुद को केंद्र में शासनाध्यक्ष के तौर पर ही पेश नहीं किया है, बल्कि वे सरकार के प्रेरणादायी नेता के तौर पर भी पेश आए हैं जो लोगों में लगातार आत्मविश्वास भरने की कोशिश में लगा रहता है। इसलिए, आश्चर्य नहीं कि जिस सरकार की कॉरपोरेट परस्ती के लिए आलोचना की जाती रही है, उसका गरीबों के लिए काम करने का रिकॉर्ड उम्दा रहा है। जब किसान आत्महत्या की खबरें सुर्खियों में थीं तो सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के रूप में उम्मीद की किरण लेकर आई। सरकार प्रधानमंत्री उज्जवला योजना भी लेकर आई है जिसके तहत गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले 5 करोड़ परिवारों को अगले तीन साल में रियायती रसोई गैस का कनेक्शन मुहैया कराया जाएगा। इस वित्त वर्ष में 1.5 करोड़ परिवारों को रसोई गैस मुहैया कराने का लक्ष्य रखा गया है। बजट 2016-17 में स्वास्थ्य संबंधी तीन योजनाएं स्वास्थ्य बीमा, जन औषधि योजना और डायलिसिस कार्यक्रम की घोषणा की।

हालांकि सरकार को अभी बहुत कुछ करने की दरकार है। मसलन, उसे काला धन लाने, रोजगार देने और ऐसी व्यवस्था करने के अपने वादे पर खरा उतरना होगा, जिसमें हार-जीत का नतीजा एक समान हो। सभी प्रत्यक्ष और परोक्ष करो की एक मानक दर स्थापित करने के लिए वस्तु और सेवा कर (जीएसटी)जैसे बड़े सुधारों का वादा भी अभी लटका हुआ है।

इनके अलावा मोदी सरकार विकास के पथ पर सरपट दौड़ रही है। फिर भी मीडिया और बौद्धिकों के एक वर्ग में, कुछ नमूना सर्वेक्षणों के आधार पर मोदी सरकार की उपलब्धियों को मृगमरीचिका जैसा बताने की कोशिश हो रही है। इसलिए यह विवाद का विषय है आम आदमी खुश है या नहीं। लेकिन, एक असलियत से कोई इनकार नहीं कर सकता कि मोदी ने कई पहल शुरू की हैं, जिसके नतीजे कुछ साल बाद या लंबे समय में दिखेंगे। मसलन, किफायती आवासीय योजनाएं, इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश, निचले तबकों को बैंकिंग क्षेत्र से जोडऩे जैसी योजनाएं महत्वपूर्ण हैं लेकिन, इनके नतीजे दिखने में समय लगेगा। इसलिए इस मौके पर सरकार के कामकाज का सटीक मूल्यांकन कुछ जल्दीबाजी ही कहलाएगा।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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