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सामाजिक समता और हिन्दू संगठन

सामाजिक समता और हिन्दू संगठन

प्राचीनकाल में जो व्यवस्थायें निर्माण हुईं वे उस काल की आवश्यकता के अनुरूप तैयार की गयीं, ऐसा मुझे लगता है। आज यदि उनकी आवश्यकता न हो, उनकी उपयोगिता सामप्त हो गयी हो, तो हमें उनका त्याग करना चाहिये। अपनी वर्ण-व्यवस्ता का ही विचार करें तो हमारे ध्यान में आयेगा कि समाज में चार  प्रकार के कार्य समाज-धारण के लिये अच्छे ढंग से होने आवश्यक हैं,  ऐसा मानकर तथा समाज के विविध व्यक्तियों और व्यक्ति समूहों की स्वाभाविक क्षमता और प्रकृति को देखते हुए ही इस प्रकार की व्यवस्था निर्मित हुई। किन्तु उस व्यवस्था में भेदों की कल्पना कदापि नहीं थी।

कुछ विद्वानों के मतानुसार प्रारंभ में यह जन्मानुसार नहीं थी। किन्तु आगे चलकर इस विशाल देश में तथा जनसमूह में गुणों यानी एपटीट्यूट को कैसे पहचाना जाए, यह प्रश्न विचारशील लोगों के मन में उठा होगा। किसी भी विशिष्ट परीक्षा-पद्धति के अभाव में उन्होंने शायद जन्म से ही वर्ण का बोध स्वीकार किया होगा। ऐसा मैं समझता हूं। किन्तु उसमें ऊंच-नीच का भाव नहीं था बल्कि सहस्रशीर्ष, सहस्राक्ष, सहस्रापाद ऐसे विराट समाज के ये सभी महत्वपूर्ण अवयव हैं, यही कल्पना इसके पीछे रही है। अत: यह स्पष्ट है कि इसमें, पैरों से जंघायें श्रेष्ठ और जंघाओं से हाथ अथवा हाथों से सिर श्रेष्ठ है, इस प्रकार की विपरीत या हास्यास्पद भावना कदापि नहीं थी।

इसी कारण एक जमाने में यह व्यवस्था सर्वमान्य थी और कुछ काल तक सुचारू रूप से चल रही थी। इसके लिए संयमन और संतुलन की व्यवस्था थी। ज्ञानशक्ति को पृथक किया गया। उसे सम्मान तो दिया, पर साथ में दारिद्रय भी दिया। दंड-शक्ति से दूर रखा। धन-शक्ति को दंड शक्ति से नहीं मिलने दिया। इस प्रकार जब तक यह संयमन और संतुलन ठीक तरह से काम करते रहे तब तक यह व्यवस्था भी सुचारू रूप से चली। किन्तु बाद में इस ओर दुर्लक्ष्य होने से तथा अन्य कारणों से यह व्यवस्ता टूट गयी।

जन्म से जाति की सीमा- जन्म से अर्थात आनुवंशिकता से गुण-संपदा आती है, इस प्रकार का विचार पूर्वजों ने किया, किन्तु उस काल में भी उन्होंने जन्मत: आने वाले गुणों की मर्यादा को समझा, इसलिये-

शूद्रोअपि शीलसम्पन्नों गुणवान ब्राह्मणों भवेत्।

ब्राह्मणोअपि क्रियाहीन: शूद्रात् प्रत्यवरो भवेत्।।

अर्थात शूद्र भी यदि शीलवान और गुणवान हो, तो वह ब्राह्मण बन जाता है तथा ब्राह्मण यदि कर्महीन हो जाये तो वह शूद्र से भी नीच है। इसी प्रकार ‘जात्या ब्राह्मण इति चेत न’ अर्थात जन्म से ब्राह्मण होता है, ऐसा कहना उचित नहीं- यह बताते हुए ऋष्यशंग, वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्त्य आदि अन्य जातियों में जन्मे लोग भी धर्माचरण के कारण ब्राह्मण ही हुए, यह स्पष्ट किया है।

पुराणों में ऐसी कथा है कि शूद्र स्त्री का पुत्र महीदास अपने गुणों के कारण ब्राह्मण बना तथा उसने ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ की रचना की। जिनके पिता का पता नहीं, ऐसे बालक का उपनयन-संस्कार कर उसके गुरू ने उसे ब्राह्मण बनाया- उपनिषद की यह कथा भी प्रसिद्ध है। प्रचीन पद्धति में आवश्यक लचीलापन होने के कारण ही यह संभव हुआ होगा।

रोटी – बेटी व्यवहार- अपने यहां रोटी-बेटी व्यवहार शब्द प्रचलित है। पहले रोटी-व्यवहार भी जाति तक ही सीमित था। किन्तु अब तो बंधन टूट चुके हैं और रोटी-व्यवहार सभी जातियों में शुरू हो गया है। इस कारण जाति-भेद की तीव्रता कम होने में काफी मदद मिली है। अब विभिन्न जातियों के बीच बेटी-व्यवहार  भी शुरू हो गया है। यह अधिक पैमाने पर हुआ तो जाति-भेद समाप्त  करने तथा सामाजिक एकरसता निर्माण होने में वह अधिक सहायक होगा, यह स्पष्ट ही है। अत: रोटी-बेटी के बंधनों का टूटना स्वागतयोग्य है। किन्तु बेटी-व्यवहार, रोटी-व्यवहार जैसा आसान नहीं हैं। यह बात सभी को ध्यान में रखकर, संयम न खोते हुए, धैर्य से आचरण करना चाहिये। विवाह करते ही अच्छी जोड़ी का विचार होना स्वाभाविक ही है। अत: ऐसे विवाह शैक्षणिक, आर्थिक, और जीवन-स्तर की समानता के आधार पर ही होंगे । जिस मात्रा में लोगों के निवास की बस्तियां एक स्थान पर होकर साथ-साथ रहने की प्रवृति बढ़ेगी, समान शिक्षा-सुविधा के साथ लोगों का जाति-निरपेक्ष आर्थिक स्तर ऊंचा उठेगा, उतनी मात्रा में ही यह स्वाभाविक रूप से संभव हो सकेगा। कानून बनाकर अथवा धन का लालच दिखाकर यह संभव नहीं। न ही यह कोई जल्दबाजी का विषय है। यह बात सभी को ध्यान में रखनी चाहिये।

अस्पृश्यता एक भयंकर भूल- अस्पृश्यता (छुआछूत) अपने समाज की विषमता का एक अत्यंत दुखद और दुर्भाग्यजनक पहलू है। विचारशील लोगों का मत है कि अति प्राचीनकाल में भी इसका अस्तित्व नहीं था तथा काल के प्रवाह में यह किसी अनाहूत की भांति समाविष्ट होकर रूढ़ बन गयी। वास्तविकता कुछ भी हो, किन्तु हमें यह स्वीकार करना चाहिये कि अस्पृश्यता एक भयंकर भूल है और इसका पूर्णतया उन्मूलन आवश्यक है। हम सभी को यह सोचना चाहिये कि यदि ‘अस्पृश्यता गलत नहीं है, तो कुछ भी गलत नहीं है। अत: हम सभी के मन में सामाजिक विषमता के उन्मूलन का ध्येय अवश्य होना चाहिये। हमें लोगों के सामने यह स्पष्ट रूप से रखना चाहिये कि विषमता के कारण हमारे समाज में किस प्रकार दुर्बलता आयी और उसका विघटन हुआ। उसे दूर करने के उपाय बतलाने चाहिए तथा इस प्रयास में हरेक व्यक्ति को अपना योगदान देना चाहिए।

धर्माचार्यों से अनुरोध- अपने धर्मगुरू, संत, महात्मा और विद्धानों का जनमानस पर प्रभाव है। इस कार्य में उनका सहयोग भी आवश्यक है। हमारा उनसे यही अनुरोध है कि वे लोगों को अपने प्रवचनों -उपदेशों द्वारा यह बतायें कि अपने धर्र्म के शाश्वत मूल्य कौन से हैं तथा कालानुरूप परिवर्तनीय बातें कौन सी हैं? शाश्वत-अशाश्वत का विवेक रखने वाले सभी आचार्यों, महंतों और संतों की आवाज देश के कोने-कोने में फैलनी चाहिए। समाज की रक्षा का दायित्व हमारा है और वह मठों से बाहर निकलकर समाज-जीवन में घुल-मिलकर रहने से ही पूर्ण होगा, ये बातें उन्हें समझनी चाहिए।

उनके प्रयास प्रारंभ होने के शुभ संकेत भी मिलने लगे हैं। हमारे दिवंगत संरसंघचालक श्रीगुरूजी ने ऐसे सभी संत-महात्माओं को एक साथ लाकर, उन्हें इस दृष्टि से विचार करने हेतु प्रवृत किया था। इसी का यह सुफल है कि अनेक धर्मपुरूष तथा साधु-संत समाज के विभिन्न घटकों में घुलने-मिलने लगे और धर्मांतरित बांधवों को स्वधर्म में शामिल करने को तैयार हुए।

समाज के अन्य समझदार लोगों पर भी बड़ा दायित्व है। उन्हें ऐसे मार्ग सुझाने चाहिए कि जिनसे काम तो बनेगा किन्तु समाज में कटुता उत्पन्न नहीं होगी। ‘उपायं चिन्तयन प्राज्ञ:अपायमपि चिन्तयेत’- समाज में सौहार्द, सामंजस्य और परस्पर सहयोग का वातावरण स्थापित करने के लिये ही हमें समानता चाहिये। इस बात को भूलकर अथवा इसे न समझते हुए जो लोग बोलेंगे, लिखेंगे और आचरण करेंगे, वे निश्चय ही अपने उद्देश्यों को बाधा पहुंचायेंगे।

योग्य दिशा योग्य प्रकार- हिन्दू समाज के किसी भी वर्ग को अन्याय व अत्याचार का पुतला कहकर कोसते रहना, अपमानित करना, आत्महत और तेजोहत करना कदापि उचित नहीं। उनका आत्मबल बनाये रखकर  नये प्रकार के अच्छे सामाजिक व्यवहार के उदाहरण और आदर्श उनके सामने रखा जाना आवश्यक है। आखिर वे सभी हिन्दू-समाज के ही अंग हैं। अत: उनका स्वाभिमान भी बना रहे, इसका ध्यान रखना होगा। जाति-व्यवस्था तथा अस्पृश्यता का उन्मूलन करना हो तो जो लोग उसे मानते हैं, उनमें भी परिवर्तन लाना होगा। जो उसे मानते हैं, ऐसे लोगों पर टूट पडऩे अथवा उनसे संघर्ष करने की बजाय कार्य करने का दूसरा मार्ग भी खोजना चाहिये।

संघ के संस्थापक आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार के साथ काम करने का सौभाग्य मुझे मिला है। वे कहा करते थे- ”हमें न तो अस्पृश्यता माननी है और न उसका पालन करना है।’’ संघ शाखाओं और कार्यक्रमों की रचना भी उन्होंने इसी आधार पर की। उन दिनों भी कुछ और ढंग  सोचने वाले लोग थे। किन्तु डॉक्टरजी को विश्वास था कि आज नहीं तो कल वे अपने विचारों से सहमत होंगे ही। अत: उन्होंने न तो उसका ढोल पीटा और न किसी से झगड़ा किया, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि दूसरा व्यक्ति भी सत्प्रवृत है। यदि उसे समय दिया गया तो वह भी अपनी भूल निश्चित ही सुधार लेगा। प्रारंभिक दिनों में, एक संघ-शिविर में, कुछ बन्धुओं ने महार(हरिजन) बन्धुओं के साथ भोजन करने में संकोच व्यक्त किया। डॉक्टर जी ने उन्हें नियम बताकर शिविर से निकाला नहीं। सभी अन्य स्वयंसेवक, डॉक्टरजी और मैं एक साथ भोजन के लिए बैठे। जिन्हें संकोच था वे अलग बैठे। किन्तु उसके बाद दूसरे भोजन के समय वे ही बन्धु हम सभी के साथ ही बैठे।

सब के साथ भोजन करूंगा- इससे भी अधिक उद्बोधनक उदाहरण मेरे मित्र पं. बच्छराज जी व्यास का  है। जिस शाखा का मैं प्रमुख था, उसी शाखा के वे स्वयंसेवक थे। उसके घर का वातावरण पुराना, कट्टरपंथी होने के कारण वे उन दिनों मेरे यहां भी भोजन के लिये नहीं आते थे। जब वे पहली बार संघ-शिविर में आये, तब उनके भोजन की समस्या खड़ी हो गई। सब लोगों का एक-साथ तैयार किया गया तथा परोसा गया भोजन उन्हें नहीं चलता था।

मैंने डॉक्टरजी से पूछा तो उन्होंने नियम बताकर बच्छराज जी को शिविर में आने से नहीं रोका। क्योंकि उन्हें बच्छराज जी के संबन्ध में विश्वास था कि उनमें उचित परिवर्तन अवश्य होगा। अत:उन्होंने मुझे कहा कि बच्छराज जी को शिविर में आने दो। हम उन्हें अलग रसोई पकाने की छूट देंगे। पहले साल तो यही हुआ, किन्तु दूसरे वर्ष स्वयं बच्छराजजी ने कहा कि मैं भी सब लोगों के साथ ही भोजन करूंगा। बाद में वे जैसे-जैसे संघकार्य में रमते गये वैसे-वैसे उनके व्यवहार में (धार्मिक वृत्ति होने के बावजूद) किस प्रकार परिवर्तन हुआ, यह सर्वविदित है। वे संघ के एक निष्ठावान कार्यकर्ता बने और राजस्थान के अनेक वर्षों तक प्रान्त-प्रचारक के नाते कार्यरत रहे। बाद में वे भारतीय जनसंघ के अखिल भारतीय अध्यक्ष भी रहे।

आलोचना नहीं सहयोग- दलित अथवा अस्पृश्य माने गये बंधुओं ने काफी अत्याचार व कष्ट सहन किये हैं। अत:यह अभिप्रेत है कि अन्याय समाप्त होकर, उन्हें सबके साथ समानता का स्थान प्राप्त हो। अत: सभी  लोगों को इस दृष्टि से प्रयास करना चाहिये। उन प्रयत्नों के लिये पोषक भाषा का उपयोग और आचरण होना ही आवश्यक है। समाज की अन्यायपूर्ण तथा बुरी बातों की निन्दा अथवा आलोचना तो अवश्य होनी चाहिये। किन्तु साथ ही अपने समाज के दोषों के प्रति व्यथा की भावना भी प्रकट होनी चाहिये। सभी को इस बात की सावधानी बरतनी चाहिये कि भूतकाल के झगड़ों को वर्तमान में घसीटकर अपने भविष्य को खतरे में न डाल दें। हम सब इसी समाज के अंग हैं। इसी भावना के आधार पर अपेक्षित सामाजिक समरसता का वातावरण बन सकेगा।

महात्मा फुले, गोपालाराव आगरकर अथवा डॉ. अम्बेडकर प्रभृति महापुरूषों ने अपने समाज की बुराइयों पर कड़े प्रहार किये हैं। कुछ जातियों तथा ग्रन्थों की भी कटु आलोचना की है। इसका क्या प्रयोजन था तथा उस समय की परिस्थिति क्या थी, इसे हमें समझना होगा। व्यक्ति प्रारम्भ में किसी बात की ओर ध्यान  आकर्षित  करने के लिये तथा जनमत जाग्रत करन के लिये कड़ी भाषा का प्रयोग करता है। किन्तु सदा-सर्वदा ऐसा करते रहना सबके लिए आवश्यक नहीं है। मेरी यह धारणा है कि दलित बंधु किसी की कृपा नहीं चाहते। वे बराबरी का स्थान चाहते हैं और वह भी अपने पुरूषार्थ से ही।

                (साभार : पाथेय कण)

बालासाहब देवरस

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