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घुसपैठ के घातक अंजाम

घुसपैठ के घातक अंजाम

किसी देश की शांति और स्थिरता उसके सामाजिक और आर्थिक संसाधनों पर सबकी सहज पहुंच पर ही निर्भर रहती है। परन्तु संसाधन की एक नियति है कि वह अपने ऊपर एक हद तक ही बोझ बर्दाश्त कर सकते हैं। प्रत्येक देश के विकास के लिए अत्यावश्यक होते हुए भी भारत जैसा विकासशील देश इससे अनजान बना हुआ है। ऐसा इसलिए कि हाल के दशकों में पूर्वी भारत के बंगाल और पूर्वोत्तर के असम में जिस तरह बांग्लादेशी शरणार्थियों की आवक बढ़ी है उससे यह साफ लगने लगा है कि आने वाले दिनों में भारत की जनसांख्यिकी पर खासा प्रभाव ये शरणार्थी डालने वाले हैं। इनमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही घुसपैठ कर रहे हैं। हिन्दू घुसपैठ मूल रूप से कट्टरपंथियों के भय से और बांग्लादेशियों के अत्याचार से पनप रही है लेकिन मुस्लिम क्यों घुसपैठ कर रहे हैं? क्या बांग्लादेश में भी सीरिया और इराक के आई.एस.आई.एस. जैसे हालात हैं या यह इन लोगों का खतरनाक मंसूबा है।

राजनीतिक साठ-गांठ से वोटों की घातक फसल बनते ये मुस्लिम घुसपैठिये इन दोनों राज्यों से भारत के हर प्रांत में हर बड़े नगर में केन्द्रित होने लगे हैं। महानगरों में इनके संकेन्द्रण से आपराधिक गतिविधियों में खासी बढ़ोत्तरी देखी जा सकती है। 2011 की जनगणना के अनुसार असम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम घुसपैठियों की जनसंख्या 2001 के मुकाबले 5-7 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है। अब सोचिये जिस असम में 1971 में मुस्लिम आबादी 36 लाख ही थी, वही 1991 में लगभग दुगुनी यानी 68 लाख के करीब पहुंच चुकी थी और तो और हालात यहीं तक नहीं रुके बल्कि 2011 के आंकड़ों में यह 1 करोड़ 8 लाख के लगभग थी। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि तीन जिलों धुबरी, बारपेटा और करीमगंज में असम के मूल निवासी अल्पसंख्यक बन चुके हैं और आयातित वोट बैंक बहुसंख्यक हो चुका है। यहां धुबरी में 80 प्रतिशत बारपेटा में 71 प्रतिशत और करीमगंज में 57 प्रतिशत मुस्लिम आबादी यह बखूबी बयां कर देती है कि सीमा पर स्थित इस राज्य की स्थिति कितनी खौफनाक होती जा रही है। काबिलेगौर बात तो यह है कि सरकारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती, क्योंकि इनके लिए यह वोटों की लहलहाती फसल है जिसको हर चुनाव में यह काटते हैं। असम में कांग्रेस सरकार के तरुण गोगोई के 15 वर्ष के शासन में घुसपैठियों की हरसंभव मदद की गई। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के तो ये बड़े वोट बैंक हैं ही साथ ही बंगाल और असम में हर हिंसक गतिविध् में इनका भरपूर योगदान रहता है। अभी कुछ दिनों पूर्व असम का वह सांप्रदायिक ज्वार जो बंगलुरू जैसे आईटी हब तक पहुंच गया और जिसने इस समस्या के हर पहलू पर सोचने की ओर मुखातिब किया। लेकिन हम घटना होने तक तो अति संवेदनशील रहते हैं पर जब वह बीत जाती है तो चादर तान कर चैन की नींद सो जाते हैं। खैर जनता क्या कर सकती है जब उसके पैरोकार राजनेताओं की कुंभकर्णी नींद ही नहीं टूट पाती है।

16वीं लोकसभा चुनाव में बदरूद्दीन अजमल की पार्टी ने तो तीन लोकसभा सीटों पर कब्जा जमाकर यह जता दिया कि भविष्य की राजनीति में वही असम के धर्मविशेष के कर्ता-धर्ता हैं। हालांकि इस विधनसभा चुनाव में उनको वह सफलता नहीं मिली, जो उन्होंने पिछली विधनसभा और अभी की लोकसभा में हासिल की थी, क्योंकि इसकी सबसे बड़ी वजह मुस्लिम वोटों का भाजपा गठबंधन को हराने वाले की ओर एकमुश्त जाना तय सा लग रहा था। आखिर इसका मंसूबा सिर्फ बीजेपी को हराना है, कतई नहीं, बल्कि यह तो उन पार्टियों को मुलायम चारे के समान है जो भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण कर धर्म विशेष के वोटरों की नई पौधा को रोपने के लिए तैयार बैठी हैं। यही हाल बंगाल का है। यहां पहले लगता था कि दीदी का करिश्माई नेतृत्व बंगालवासियों के लिए कुछ न कुछ लेकर आयेगा, लेकिन हुआ एकदम उलट। आखिर दीदी भी वोट की कीमत को जल्दी भांप गयीं, परन्तु इस ताकत को मापने में अरविन्द केजरीवाल से ज्यादा पैनी निगाह किसी की नहीं है। तभी तो घुसपैठियों की सबसे बड़ी पनाहगार झुग्गी-बस्तियों के दिलों पर राज करने वाले मसीहा बन कर उभरे हैं। यह काम पहले कांग्रेसियों का था। पर केजरीवाल की तेजी से वोट फसल कटाई से लगता है कि वह जल्द कांग्रेस मुक्त भरत बनाने के पक्षधर हैं। दीदी ममता बनर्जी ने तो हठधिर्मता की भी हद कर दी है। सत्ता के लड्डू के लालच में वह बहुसंख्यक बंगालियों को धता बताकर बांग्लादेशियों की मुस्लिम आबादी की गोद में जा बैठी हैं। उनकी और उनके पूर्व लेफ्ट की कारस्तानी के कारण बंगाल में घुसपैठियों की पौ-बारह हो रही है। आज बंगाल की आबादी में 28 प्रतिशत के लगभग मुस्लिम आबादी है। यह आबादी आजादी से पहले इस मात्रा में कतई नहीं थी। आजादी के पूर्व पूर्वी बंगाल यानी आज का बांग्लादेश मुस्लिम बहुसंख्यक तथा पश्चिमी बंगाल हिन्दू बहुसंख्यक था। जहां 1947 से पहले यह अनुपात 15-85 का था जो आज 28-72 का हो चुका है।

19-06-2016

यह स्थिति की भयावहता को तब और प्रकट कर देता है जब असम और पश्चिम बंगाल से भी संक्रमण देश के अन्य राज्यों में होता दिखता है। अब सोचिये कि यदि ये घुसपैठिये इन राज्यों में ही स्थायी तौर पर बस गये होते तो आज इनकी जनसंख्या निश्चित तौर पर हिन्दू आबादी से कहीं अधिक हो गई होती, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया, क्योंकि इन्होंने सिलसिलेवार घुसपैठ करते हुए पूरे भारत भर में पैर फैला लिए। होता यही था कि पहले असम या बंगाल में घुसो, फिर यहां से बिहार के पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार होते हुए दिल्ली और तमाम अन्य शहरों का रुख करो। ऐसा त्रिपुरा के रास्ते भी चलता रहता है, लेकिन वहा से यह म्यानमार की ओर भी चला जाता है। इसी घुसपैठ की म्यानमार के रोहिंग्या मुस्लिमों पर बौद्धों के हमलों के मद्देनजर परख भी की जा सकती है। इसी तरह की स्थिति भविष्य में भारत में भी हो सकती है। इसके पीछे संसाधनों की खींचतान एक जरूरी कारण हो सकता है। हालांकि अभी से भारत में इन घुसपैठियों की कारस्तानी मालदा की घटना तथा महानगरों की झुग्गी-बस्तियों में पनप रहे अपराध में पूरी तरह से नजर आने लगी है। देश की राजधनी दिल्ली के अंतर्गत जहांगीरपुर, मुस्तफाबाद, पुश्ता, उस्मानपुर, सीलमपुर, ओखला, सीमापुरी और पुरानी दिल्ली आदि ऐसे इलाके हैं जहां इन घुसपैठियों की मुस्लिम आबादी ने सट्टा, स्मगलिंग, मादक पदार्थ, देह-व्यापार और अन्य अपराधों को बढ़ावा दिया है। आखिर इसके पीछे की वजह क्या है? क्यों ये इस कदर भारत की अस्मिता के साथ खेल रहे हैं। इसका एकमात्र कारण है वोट-बैंक की घातक राजनीति। आज देश दोयम दर्जे का हो चुका है। बस नेताओं और पार्टियों को पद और पैसे की चिन्ता बची है। क्या केजरीवाल, क्या कांग्रेस, क्या लालू क्या नीतिश, क्या मुलायम, क्या मायावती सबको आखिर इनके वोट की दरकार जो है। आजकल इस लिस्ट में ममता बनर्जी अव्वल चल रही हैं, क्योंकि इन्हीं के रहमो-करम पर उनकी अगली सियासी पारी मिली है। एक तरफ तुर्की जैसा देश है जो शरणार्थियों पर शक की निगाह मात्र से रणनीति में बदलाव कर सीमा पर ही या तो गोली मार रहा है या उन्हें गिरफ्तार कर घर वापसी का रास्ता दे रहा है, लेकिन हम तो घुसपैठियों को रिश्तेदारों की भांति इज्जत और प्यार मुफ्त बांट रहे हैं वो भी इसलिए कि आगे वही तो इसका ब्याज वोट के रूप में चुकाएगा और भाजपा की हार को प्रशस्त करेगा।

आज भारत को जितना खतरा पाकिस्तान से नहीं है, उससे ज्यादा खतरा बांग्लादेश से आते घुसपैठियों से है और उनके पनाहगार सम्पूर्ण विपक्ष से है। देर-सबेर इसके खतरे भारत को अवश्य जल्द दिखेंगे।

आर.के. चौहान

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