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पुलिस सुधारों सेपरहेज क्यों?

पुलिस सुधारों सेपरहेज क्यों?

गुजरात में 2002 के दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसायटी कांड, जिसमें पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी समेत कई लोगों की हत्या हो गई थी और करीब 31 लोग लापता हो गए थे, के अदालती फैसले पर न सिर्फ उनकी विधवा जाकिया जाफरी ने नाराजगी जाहिर की, बल्कि कई लोगों ने पुलिस की भूमिका पर  सवाल खड़े किए। इसी तरह 3 जून 2016 को मथुरा में कथित तौर पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की विचारधारा में यकीन करने वाले आजाद भारत विधिक वैचारिक क्रांति सत्याग्रही नामक संगठन के सदस्यों को सरकारी जमीन से हटाने के लिए पुलिसिया कार्रवाई पर भी कई सवाल उठे। इस दौरान भड़की हिंसा में दो पुलिस अधिकारी मारे गए क्योंकि कथित तौर पर संगठन के सदस्यों ने बंदूक से हमला बोल दिया तो बाकी पुलिसवाले भाग खड़े हुए। फिर, हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा के लिए प्रकाश सिंह जांच समिति की रिपोर्ट में राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को हिंसा रोकने में नाकाम रहने का दोषी पाया गया। पूर्व पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह से अब हरियाणा पुलिस की गड़बडिय़ों को चिन्हित करने को कहा गया है।

भारी राजनैतिक दखलंदाजी

हाल ही में गुजरात में 2004 के इशरत जहां (और तीन अन्य) मुठभेड़ कांड और मालेगांव (महाराष्ट्र) तथा मक्का मस्जिद (हैदराबाद) के मामलों के अदालती फैसलों में बरी हुए और दोषी पाए गए लोगों को लेकर पुलिस की जांच-पड़ताल और उसके राजनीतिकरण को लेकर कई सवाल उठे। वैसे भी, पुलिस के राजनीतिकरण की चर्चाएं देश में आजादी के बाद से ही जारी हैं। यही नहीं, जेहादी बनाम हिंदू आतंक से जुड़ी खबरें भी पुलिस की आतंकवाद और उग्रवाद की चुनौतियों से निबटने के तौर-तरीकों और अधूरी तैयारी को जाहिर करके मामले को पेचीदा बना देती है। इससे यह भी पता चलता है कि देश में राजनैतिक नेता अपने विरोधियों को बदनाम करने के लिए कैसे-कैसे तरीके अपनाते हैं और पुलिस खुशी-खुशी उनका औजार बन जाती है। बिहार में तो पुलिस की करतूतों के वीडियो आजकल सोशल मीडिया और यू-टयूब पर खूब चल रहे हैं। इनमें पुलिसवाले शराबबंदी के नाम पर राज्य से गुजरती गाडिय़ों में शराब की बोतलें रख देते हैं और फिर उनसे रिश्वत वसूलते हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस के दिल्ली के कुछ प्रोफेसरों-बुद्धिजीवियों पर माओवादियों से संबंध के आरोप भी पुलिसिया तौर-तरीकों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

लगभग सभी राजनैतिक पार्टियों के नेताओं का रवैया अमूमन यह होता है कि वे जहां सत्ता में होते हैं, अपने पुलिसवालों के रवैए पर मौन रहते हैं और जहां विपक्ष में होते हैं, वहां हल्ला मचाते हैं। लेकिन कोई भी, देश के किसी कोने में भी पुलिस सुधारों के लिए आवाज नहीं उठाता। मसलन, गुजरात की चर्चा आते ही चारों ओर से सियासी आवाजें तेज हो उठती हैं कि चौदह साल पहले हजारों लोगों के मारे जाने का कोई दोषी क्यों नहीं है। लेकिन इस हो-हल्ले और टीवी की बड़बोली बहसों में पुलिस के पक्षपातपूर्ण रवैए की वजहों पर कोई चर्चा नहीं होती।

कांग्रेस के कुशासन का हल्ला मचाने वाली भाजपा ने भी दशकों से अपने शासित राज्यों में पुलिस सुधारों पर कोई पहल नहीं की है। गुजरात में भी नहीं! हर पुलिसिया भूल-चूक या गलती, जो अमूमन (राजनैतिक सहित) कई तरह के दबावों के कारण होती है, के लिए भारतीय समाज के नैतिक पहरुए भी पुलिस अधिकारियों को ही दोषी ठहराते हैं, भले ही वह पुलिस अधिकारी ड्यूटी करते जान ही क्यों न गंवा बैठा हो। राजनैतिक पार्टियां अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को खुलकर कुछ भी बोलने और करने की छूट दिए रहती हैं और बड़े नेता मौन साधे रहते हैं। इससे पुलिस का मनोबल और गिरता है। जाहिर है, मौजूदा सरकार के पास भी खाकीवर्दी वालों के तौर-तरीके बदलने का कोई विचार या योजना नहीं है।

केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के अलावा किसी अन्य राष्ट्रीय दल या क्षेत्रीय पार्टियों की राज्य सरकारों का रवैया भी लगभग एक समान है। पश्चिम बंगाल इसका अनोख उदाहरण है। वहां पहले माकपा ने पुलिस का राजनीतिकरण किया और अब वही पुलिस ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की सेवा में लगी है। दिल्ली में भारी बहुमत से सत्ता में आई अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के तहत लाने के लिए केंद्र सरकार (और भाजपा) से उलझी हुई है। इस प्रक्रिया में केजरीवाल लगातार पुलिस पर तोहमत लगाते रहते हैं और उसके लिए ठुल्ला जैसे अपमानजनक शब्द का भी इस्तेमाल करते हैं। ऐसे रवैयों से पुलिस सुधारों का मामला और पीछे चला गया है।

पुलिस सुधार के सूत्र

दो सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों प्रकाश सिंह तथा एन.के. सिंह और एनजीओ कॉमन कॉज के एच.डी. शौरी ने 1996 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी और मांग की थी कि देश में पुलिस सुधारों की पहल में तेजी लाई जाए। सर्वोच्च अदालत ने इस पर 2006 में केंद्र और राज्य सरकारों को फौरन जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट को फैसला सुनाने में दस साल लगे तो केंद्र और राज्य सरकारों ने भी दशक भर से इस मसले पर कुछ नहीं किया है।

सर्वोच्च अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को सात निर्देश दिए थे। एक, राज्य सुरक्षा आयोग का गठन किया जाए। दो, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के दो साल का कार्यकाल तय किया जाए। तीन, एसपी और एसएचओ का कार्यकाल भी दो साल का तय किया जाए। चार, जांच-पड़ताल और कानून-व्यवस्था पर अमल की जिम्मेदारियां अलग की जाएं। पांच, हर राज्य में पुलिस स्थापना बोर्ड का गठन हो। छह, राज्य और जिला स्तर पर पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन हो। सात, केंद्र में राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग का गठन हो।

इन निर्देशों पर शायद ही कुछ हुआ है और कुछ हुआ भी है तो दिखावटी ही है, बुनियादी मसले जस के तस हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तो हर निर्देश के पालन के लिए एक समय-सीमा भी तय की थी, जिसकी ज्यादातर राज्यों ने अनदेखी की है। 23 अगस्त 2007 को प्रकाश सिंह ने छह राज्यों–गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के खिलाफ अवमानना याचिका भी दायर की। इस फेहरिस्त से जाहिर है कि ज्यादातर पार्टियां और अनेक प्रमुख नेता इस मामले में अवमानना के दोषी हैं।

कुछ सिविल सोसायटी समूहों के दबाव में कांग्रेस ने अपने 2009 के चुनाव घोषणा-पत्र में वादा किया कि ”पुलिस सुधारों की प्रक्रिया तेज की जाएगी’’ और इस मकसद से ”राजनैतिक कार्यपालिका और पुलिस प्रशासन के बीच स्पष्ट विभाजन रेखा खींची जाएगी।’’ वह वादा अधूरा रहा तो पार्टी ने 2014 में फिर वादा किया कि ”पुलिस आधुनिकीकरण’’ को जारी रखा जाएगा, जो सुधार की प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा नहीं है। पार्टी ने यह भी वादा किया कि वह ”आश्वस्त करेगी कि पुलिस बल सुप्रशिक्षित और लोगों की जरूरतों के प्रति संववेदनशील बने।’’ भाजपा भी भला क्यों पीछे रहती। उसने भी वादा किया कि ”भारतीय पुलिस को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाया जाएगा।’’ पार्टी ने प्रशिक्षण, हथियार तथा तकनीक के आधुनिकीकरण, ”सुचनाओं के आदान-प्रदान और अपराध नियंत्रण के लिए देश भर के थानों की नेटवर्किंग’’ (जो पहले ही जिपनेट के रूप में मौजूद है), जांच-पड़ताल की प्रक्रिया को मजबूत करने, खुफिया सूचनाओं और उनके आदान-प्रदान को चुस्त करने, जेल व्यवस्था के आधुनिकीकरण, राष्ट्रीय मानक व्यवस्था बनाने, साइबर अपराध की रोकथाम, नौवहन पुलिस व्यवस्था को चुस्त करने और लोगों के साथ पुलिस के व्यवहार को सुधारने के लिए सामुदायिक पुलिस व्यवस्था के विकास का भी वादा किया। भाजपा के घोषणा-पत्र में पुलिसवालों की कार्य-स्थितियों को सुधारने, उनके कल्याण और सहयोगी संघवाद विकसित करने का भी वादा किया गया।

19-06-2016

सुधार कैसे और क्यों हों

आजादी के बाद से ही पुलिस सुधार लंबित हैं। संघीय ढांचे को ध्यान में रखकर केंद्र ने इसे राज्यों पर छोड़ रखा था। फिर, इमरजेंसी के कड़वे अनुभव के बाद केंद्र ने 15 नवंबर 1977 को एक पुलिस आयोग का गठन किया। इसकी जरूरत 1979 में और तेजी से महसूस की गई जब मई-जून के महीनों में देशव्यापी पुलिस हड़ताल में पुलिस बल की बेहद खराब कार्य स्थितियों और भारी राजनीतिकरण का मसला प्रकाश में आया। हालांकि 1960 और 1970 के दशक में ज्यादातर राज्यों ने पुलिस आयोग का गठन किया था। इसमें सभी 29 राज्य और सात केंद्र शासित प्रदेश समाहित हो जाते हैं। इन आयोगों ने 1861 के पुलिस कानून की जगह नया पुलिस कानून बनाने की सिफरिश तो नहीं की लेकिन कई सांगठनिक और प्रक्रियागत सुधारों की पेशकश की। 1861 का कानून 1857 के सिपाही विद्रोह (या पहले स्वतंत्रता संग्राम) के बाद अंग्रेजों ने अपनी औपनिवेशिक दासता को मजबूत करने के लिए बनाया था। बेशक, सांगठनिक और कार्यप्रणाली में बदलाव की प्रक्रिया कोई एक दिन की नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, लेकिन बड़े बदलाव के लिए कानून में बदलाव जरूरी है। धरमवीर की अगुआई में बने पुलिस आयोग की आठ खंड में पेश की गई रिपोर्ट का यही सार है।

राष्ट्रीय पुलिस आयोग की ये सिफारिशे बाद में रिबेरो कमेटी (1998), के. पद्मनभैया कमेटी (2000), आपराधिक न्याय सुधारों पर वी.एस. मलिमथ कमेटी (2000) की रिपोर्टों से भी पुष्ट हुईं। सोली सोराबजी  कमेटी ने भी एक मानक पुलिस अधिनियम की सिफारिश की थी, जिसके मुताबिक सभी राज्यों में कानून बनाने की दरकार थी। इस कानून को ज्यादातर राज्यों ने अभी स्वीकार नहीं किया है और नीतीश कुमार के बिहार जैसे जिन राज्यों ने स्वीकार किया भी है तो वहां पुलिस कानून 1861 के कानून से भी अधिक प्रतिगामी बना दिए गए हैं। उधर, पुलिस का तंत्र अत्याचारी और प्रतिगामी बना हुआ है। पुलिस बल में 80 प्रतिशत तक सिपाहियों की फौज है, जो अपने अफसरों के अद्र्ध-गुलाम की तरह होते हैं और पुराने जर्जर बैरकों में बिना परिवार के रहते हैं। उनसे काफी घंटों तक काम लिया जाता है और वे लोगों की नजर में भी सबसे बदनाम हैं। इसके अलावा पुलिस का राजनैतिक इस्तेमाल भी धड़ल्ले से जारी है।

जो किया जाना चाहिए

फिलहाल देश की बागडोर ऐसे दो राजनैतिक नेताओं–प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह–के हाथ है, जो मुख्यमंत्री रह चुके हैं। मोदी के 2002 में गुजरात में मुख्यमंत्री बनाए जाने के कुछ ही दिनों बाद वहां दंगे हुए। वे पुलिस सुधारों को न करने के सामाजिक-राजनैतिक असर से वाकिफ हैं। फिर भी, उनके लंबे कार्यकाल में कोई पुलिस सुधार नहीं हुए, जैसा कि 2007 में प्रकाश सिंह की अवमानना याचिका से जाहिर है। राजनाथ सिंह 2001-02 में सोलह महीने तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। वैसे तो किसी बड़े सुधार के लिए यह छोटी अवधि है लेकिन किसी अच्छी पहल के लिए इतनी छोटी भी नहीं है। जो भी हो, भाजपा केंद्र में दो साल से सत्ता में है और राजनीति के इन दो दिग्गजों के हाथ में देश की कमान है। उन्हें किसी बड़ी पहल में खास अड़चन नहीं आनी चाहिए। आखिर, इसी सरकार ने योजना आयोग को खत्म करने का साहसिक कदम उठाया है। बेशक, यह प्रतिबद्धता का ही मामला है।

एनडीए सरकार सहकारी संघवाद की कसम खाती है और भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में भी इसका जिक्र किया है। इसलिए यह बताना जरूरी है कि क्या किया जा सकता है। अंतर-राज्यीय परिषद और ऐसे ही दूसरे सहकारी संघवाद के मंचों को सक्रिय करना जरूरी है और यह अगली सरकार के लिए भी चुनौती बना रहेगा। ऐसी संस्थाओं को सक्रिय करने के लिए सभी राजनैतिक पार्टियों में सहमति तैयार करने की चुनौती सबसे बड़ी है, ताकि सभी संस्थाओं की कार्यप्रणाली में व्यापक भलाई और साझापन पर जोर हो। यह हमारी विविधता के लिए बेहद जरूरी है।

19-06-2016

सुप्रीम कोर्ट की सलाह के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के गठन से राज्यों के बीच सहमति का वातावरण तैयार होगा। यह भी गौरतलब है कि जिन रिपोर्टों का ऊपर जिक्र किया गया है, उनके अलावा कई छोटी रिपोर्टें और कुछ अनोखी पहल भी हैं जिन पर गौर किया जा सकता है। दूसरे केंद्र-राज्य आयोग (2009) के कार्यबल 5 की रिपोर्ट में आतंकवाद से निबटने में पुलिस को सक्षम बनाने के लिए एक और तंत्र की सिफारिश की गई है। केरल ने सिपाहियों के लिए आठ घंटे के काम और हफ्ते में छुट्टी का नियम बनाया और उस पर अमल किया है। पुलिस रिसर्च और विकास ब्यूरो के एक अध्ययन से पता चलता है कि पुलिस का तनाव कम करने के लिए केरल का मॉडल अपनाना संभव है। कॉमनवेल्थ मानवाधिकार पहल ने एक आभासी पुलिस थाना भी बनाया है जिससे लोगों को अच्छे-बुरे पुलिस व्यवहार की जानकारी मिलती है।

इन सभी उपायों पर आसानी से अमल किया जा सकता है और उन लोगों की भी मदद ली जा सकती है जो पुलिस सुधारों की गुहार लगाते हैं। हालांकि राजनैतिक इच्छाशक्ति तो शीर्ष नेतृत्व से ही आएगी, जिसमें यह सरकार सक्षम है। तो, क्या केंद्रीय गृह मंत्री इस दिशा में पहला कदम उठाएंगे?

अजय के. मेहरा

(लेखक सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स, नोएडा के मानद निदेशक हैं।)

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