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दो-टुक फैसलों के सिंह

दो-टुक फैसलों के सिंह

राजनाथ सिंह राजनैतिक अनुभवों और अनेकानेक किस्सों के सागर की तरह हैं। आखिर उनका लंबा राजनैतिक सफर बेहद घटनाप्रधान जो रहा है। भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, दो बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अब बतौर केंद्रीय गृहमंत्री वे नरेंद्र मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत में हैं। गौरतलब है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने युवा और तेज-तर्रार राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी थी और राजनाथ सिंह के अटल निर्णय ने ही लालकृष्ण आडवाणी और उनके समर्थकों के भारी विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते राज्य के विकास के लिए कई बड़े फैसले किए थे। ऐसा ही एक फैसला वह है जिसमें उन्होंने सरकारी नौकरियों के आरक्षण के ढांचा ऐसा बनाने की कोशिश की, जिससे दलित और ओबीसी जातियों मेें पिछड़े वर्गों को ज्यादा अवसर मिल सके। दक्षिण भारत में भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार के सफल गठन का भी श्रेय उन्हीं को जाता है। पार्टी अध्यक्ष के उनके कार्यकाल के दौरान ही भाजपा ने 33 फीसदी पद महिलाओं को देने का रिकॉर्ड कायम किया।

अटल बिहारी वाजपेयी के पक्के अनुयायी राजनाथ सिंह उदार पथ के पथिक हैं। उनकी हर जमात में समान स्वीकार्यता है और उनके विरोधी भी उनकी सराहना खुलकर करते हैं। उत्तर प्रदेश में उन्होंने वाजपेयी के गढ़ लखनऊ को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाया है। इसलिए राज्य के आगामी चुनावों में उनकी बड़ी भूमिका की उम्मीद की जा रही है। अटकलें तो ये भी हैं कि देश के सबसे बड़े राज्य की गद्दी संभालने वापस जा सकते हैं लेकिन वे इसे हल्की मुस्कान के साथ खारिज कर देते हैं। वे कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में पार्टी में नेताओं की कमी नहीं हैै और उन्हें बतौर मुख्यमंत्री वहां जाने की कोई जरूरत नहीं होगी। हालांकि अमित शाह अपने वफादार नेताओं के साथ अपनी रणनीति पर काम शुरू कर चुके हैं और मोदी भी कोई कसर बाकी नहीं छोडऩा चाहते। वे राजनाथ सिंह के साथ तमाम रैलियां लगातार कर रहे हैं। आखिर, मोदी इससे वाकिफ हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में राजनाथ काफी मायने रखते हैं और उनकी हरी झंडी के बिना कोई रणनीति कारगर नहीं हो सकती। पार्टी उत्तर प्रदेश में कोई जोखिम मोल नहीं ले सकती क्योंकि मोदी और राजनाथ समेत कई वरिष्ठ मंत्री इसी राज्य से सांसद हैं।

आरएसएस के करीबी राजनाथ हमेशा ही संघ के वरिष्ठ नेताओं के भरोसेमंद रहे हैं। लेकिन, वाजपेयी की तरह ही, राजनाथ भी एक सीमा के बाद संघ के फैसलों का विरोध करना पसंद नहीं करते। गजब के वक्ता राजनाथ की आवाज में एक तरह की जादुई छुअन है और हिंदुत्व तथा सनातन धर्म की उनकी समझ तो लाजवाब है ही। हिंदी प्रदेशों में उनके समर्थक तो बहुतायत में हैं ही, देश भर में संघ कार्यकर्ता उनके मुरीद हैं। लेकिन राजनीति में बुलंदी पर पहुंचने के बाद राजनाथ अपने कट्टर समर्थकों और वफादारों को साथ लेकर नहीं चल सके। यही वजह है कि आज बहुत-से उनसे नाता तोड़ चुके हैं। इसकी वजहें भी कई हैं। राजनीति में सही या गलत फैसलों का नफा-नुकसान भी झेलना पड़ता है। यह तो समय ही बताएगा कि सरकार में नंबर दो की हैसियत के बावजूद सरकार में मोदी के बाद उनकी पकड़ क्यों नहीं दिखती।

हालांकि राजनाथ सिंह की छाप गृह मंत्रालय के हर मोर्चे पर स्पष्ट दिखती है। इस मंत्रालय के सामने हमेशा ही चुनौतियां रही हैं, अतीत में रही हैं और आगे भी रहेंगी। यह इतना विशाल देश है कि किसी न किसी हिस्से में कुछ न कुछ घटनाओं का होना स्वाभाविक है। लेकिन यह कहा जा सकता है कि पिछले दो साल में आतंकवाद, अलगाववाद या माओवाद हर मोर्चे पर सरकार ने कई कामयाबियां दर्ज की हैं। इन तीनों ही मोर्चों पर वारदातें न्यूनतम हैं। देश में आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद के संदर्भ में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति में काफी सुधार दिख रहा है। देश के कई इलाके अति वामपंथी ताकतों की हिंसा का शिकार रहे हैं लेकिन पिछले दो साल में इसे जड़ से मिटाने के कई उपाय अपनाए गए हैं। अति वामपंथी ताकतों की समस्या से पूरी तरह निजात पाने के लिए राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना बनाई गई है। इसके तहत संबंधित इलाकों में सुरक्षा, विकास, स्थानीय समुदायों के अधिकारों को आश्वस्त करना, और जनधारणा को दुरुस्त करने की चौतरफा नीति अपनाई गई है। गौरतलब है कि माओवादियों की गतिविधियों का केंद्र कोई एक राज्य नहीं है। यह दो या उससे अधिक राज्यों में फैला हुआ है। इसलिए विभिन्न स्तर पर बेहतर अंतर-राज्यीय तालमेल और कई तरह की पहल की दरकार है। इसी तरह, देश की सीमाओं को देश-विरोधी ताकतों से सुरक्षित करके ऐसी व्यवस्था कायम करना राजनाथ के सीमा प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य है, ताकि देशविरोधी ताकतें भी कोई हरकत न कर पाएं और वैध व्यापार तथा कारोबार भी जारी रहे। लेकिन सीमाओं के चुस्त प्रबंधन की, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे जरूरी है, कई चुनौतियां हैं। देश की सीमाओं की सुरक्षा और देशहित की रक्षा के लिए जरूरी है कि देश की प्राशासनिक, कूटनीतिक, सुरक्षा, खुफिया, कानूनी और आर्थिक एजेंसियों में बेहतर तालमेल के साथ एक लय में काम करें। सीमाओं की सुरक्षा के साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कई कदम उठाए गए हैं। हालांकि इस सबके बावजूद एक काम बाकी है और वह पुलिस सुधारों का। फिर भी, एक बात तो दावे के साथ कही जा सकती है कि राजनाथ सिंह दो-टुक फैसले लेने वाले नेता हैं और उनके नेतृत्व में गृह मंत्रालय कामयाबी की नई मंजिलों को  हासिल करेगा।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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