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सुख के सब साथी, दु:ख में ना कोय…

सुख के सब साथी, दु:ख में ना कोय…

By सुधीर गहलोत

ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने उपन्यास ‘हम न मरब’ में दु:ख-दर्द, हास्य-उपहास, व्यंग्य और विनोद का मनोहारी चित्रण किया है। लोगों के लिए ‘कभी मरेंगे ही नहीं’ वाले वयोवृद्ध ‘बब्बा’ एक ग्रामीण पृष्ठभूमि के उस स्तंभकार की तरह हैं तो दुख में भी विनोद करने से बाज नहीं आते। लेकिन, अंतोगत्वा बब्बा की मृत्यु हो जाती है। लगभग मृत्यु को पराजित मान चुके बब्बा की मृत्यु पर लोगों को विश्वास नहीं हो पाता।

बब्बा की कहानी बुलंदेखंड के गांव लुगासी की है। बब्बा की मृत्यु पर कर्मकांड होते हैं। उनके बेटे अपने पिता की मृत्यु पर दुखी होने का दिखावा तो करते हैं, लेकिन संपत्ति के बंटवारे को लेकर परिवार में एक तरह से मनमुटाव आ जाता है। वर्षों से मृत्यु की प्रतीक्षा में बिस्तर पर पड़ी बब्बा की धर्मपत्नी और नाती-पोतों वाले उनके बेटों की लगवाग्रस्त मां मृत्यु के प्रति आशान्वित हो उठती हैं, लेकिन संपत्ति का मोह-माया से मुक्त नहीं हो पातीं या यह कह लें कि वर्षों से बिस्तर पर अकेले पड़े रहने की पीड़ा कुंठित होकर बाहर आती है। उनकी गूं-गूं की बेकल आवाज कुछ ऐसा ही प्रतीत करती हैं।

अम्मा घर के एक अंधेर कोठरी में वर्षों से पड़ी हैं। उनकी गूं-गूं की निकली आवाजरूपी इशारे को उनकी बड़ी बहु सावित्री ही समझ पाती है। बंटवारे की खबर लगते ही अम्मा भी अपनी बड़ी बहु का हाथ पकड़ कर इशारों-इशारों में कहती हैं कि संपत्ति में उनको भी हिस्सा चाहिए। ऐसा न हो उनका हिस्सा भी उनके लड़के ले जाएं। अम्मा के लड़के मां की गूं-गूं की आवाज को समझने का प्रयास करते हैं, लेकिन समझ नहीं पाते हैं। सावित्री अम्मा को शांत रहने के लिए बार-बार समझाती है, लेकिन अम्मा चीखती रहती हैं।

बब्बा के तीन पुत्र हैं, जिसमें सबसे बड़ा पुत्र आदर्शवादी है। बाकी के पुत्र संपत्ति के बंटवारे के लिए ललायित रहते हैं। आदर्शवादी पिता का पुत्र और बब्बा का पौत्र रज्जन अपने पिता से ठीक उलटा है। जमाने भर पर उसकी नजर रहती है। वहीं कहानी में रामजी चौबे नाम का एक अन्य रोचक किरदार भी है जिसे सच्चाई कहने और सुनने की भयंकर बीमारी है।

कहानी में मृत्यु से जुझने के दर्द को समझने से लेकर मृत्यु को पछाडऩे तक के बीच सांसारिक बातों को हास्य-विनोद के जरिए ज्ञान चतुर्वेदी ने बहुत ही शानदार तरीके से पेश किया है। दर्द के प्रवाह में बहने के दौरान किरदारों की बातें हंसने को मजबूर कर देती हैं। गांवों में गम भूलाने और अपने अनुकूल माहौल पैदा करने वाले बुजुर्गों से लेकर अलमस्त बच्चों के संवाद हास्य पैदा करते हैं। गंवई वार्तालाप में गालियां माहौल को वास्तविकता प्रदान करती हैं।

ज्ञान चतुर्वेदी अपनी व्यंग्य के लिए जाने जाते हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखने वाले ज्ञान चतुर्वेदी की उपन्यास ‘हम न मरब’ को बार-बार पढ़ा जा सकता है, लेकिन गालियों और ग्रामीण पृष्ठभूमि एवं संवाद से परहेज करने वाले पाठकों के लिए यह उपन्यास थोड़ा अरूचिकर हो सकता है।

31-01-2015

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