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विवेक, संयम, भक्ति, साहस, सदाचार और शक्ति के ‘सार’ हनुमान

विवेक, संयम, भक्ति, साहस, सदाचार और शक्ति के ‘सार’ हनुमान

हनुमान ने अपना संपूर्ण जीवन दूसरों की सेवा में व्यतीत कर दिया। उन्होंने पहले सुग्रीव की और फिर राम की सेवा की। वे अपने दास्य भाव के माध्यम से भक्ति का आदर्श रूप प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार का समर्पण, अहंकार को नष्ट करने का उत्कृष्ट साधन है। उन्होंने विनम्रता से अहंकार रहित होकर पूर्ण समर्पण के साथ अपने कर्तव्यों का पालन किया। उन्होंने अविवाहित रहना और अपना परिवार न बनाना ही पसंद किया, ताकि वे स्वयं को पूर्ण रूप से दूसरों की सेवा में लगा सकें। उन्होंने समर्थ होने के बावजूद, अपने स्वामी की आज्ञा की अवहेलना नहीं की। उदाहरण के लिए, वे आसानी से रावण को मारकर, अपने बल पर ही लंका को जीत सकते थे, जैसा कि इनकी माता ने कहा भी था, किंतु इन्होंने ऐसा करने से स्वयं को रोक लिया क्योंकि, वे अपने प्रभु के सच्चे सेवक बनकर उनकी आज्ञा का पालन करना चाहते थे।

वे सात चिरंजीवियों (जो इस सृष्टि के मौजूदा चक्र के खात्मे तक जीवित रहेंगे) में से एक हैं।  वे अपनी महान प्रतिभा के लिए जाने जाते हैं। कहते हैं, उन्हें नौ व्याकरणों (वेदों की व्याख्या) का पूर्ण ज्ञान है और उन्होंने स्वंय ही, सूर्यदेव से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया था। वे विवेकशीलों में परम विवेकशील, शक्तिशालियों में परम शक्तिशाली और वीरों में महावीर हैं। वे जैसा चाहते, वैसा रूप धारण करने में समर्थ हैं, अपने शरीर को पर्वताकार कर सकते हैं तो अंगूठे के नाखून जितना छोटा भी कर सकते हैं। जो व्यक्ति इनका स्मरण करेगा वह जीवन में सामथ्र्य, शक्ति, समृद्धि सफलता प्राप्त करेगा।

राम हनुमान के विषय में स्वयं कहते हैं, ”वीरता, चतुराई, मनोबल, दृढ़ता, समझदारी, पराक्रम और बल ने हनुमान में आश्रय लिया है।’’ महार्षि अगस्त्य ने जब राम से कहा,    ”हे राघव! बल, गति और प्रतिभा में हनुमान जैसा कोई नहीं है,’’ तो उन्होंने भी अपनी सहमति प्रकट की है।  हनुमान राम मंत्र के जप द्वारा सुलभ हैं। इसी को उलटकर यह भी समझा जाता है कि प्रभु राम को पाने का सबसे सरल तरीका हनुमान की पूजा करना है। इनकी पूजा शनि और मंगल ग्रहों से जुड़ी होने के कारण शनिवार और मंगलवार को की जाती है। ये दोनों ही ग्रह, मृत्यु एवं शत्रुता से संबंधित हैं और अपने अशुभ प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में तोड़-फोड़ करते हैं।

हनुमान को अर्पित की जाने वाली वस्तुएं अत्यंत सादी हैं। उत्तर भारत में सिंदूर, तिल के तेल, छिलके वाले काले चने तथा विशिष्ट वृक्ष (कैलोट्रोपिस जाइजेंटिका) की माला और दक्षिण भारत में पान के पत्तों की माला चढ़ाई जाती है। दक्षिण में इनकी मूर्तियों पर मक्खन मला जाता है और यह विचित्र बात है कि तेज गर्मी में भी मक्खन पिघलता नहीं। इनकी मूर्ति पर चावल और दाल के बड़ों की माला भी चढ़ाई जाती है।

गूढ़ अर्थ में देखें तो लाल रंग, बल और पौरुष  का प्रतीक है। तिल का तेल पहलवानों और व्यायाम करने वालों द्वारा शरीर की मालिश के लिए प्रयोग किया जाता है। मक्खन और दाल, प्रोटीन तथा ऊर्जा देते हैं और सहनशक्ति एवं मासपेशियों के विकास के स्रोत माने जाते हैं।

                साभार: श्री हनुमान लीला   

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