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मां से बढ़कर कौन?

मां से बढ़कर कौन?

मैं यह बात अच्छी तरह से जानता हूं कि जो स्त्री किसी बच्चे को नौ महीने कोख में ढोई हो, प्रसव पीड़ा झेली और पैदा होने के बाद भर-नजर नवजात को देखी हो वह कितनी भी बदजात हो, बापजी। बच्चे को कभी भुला नहीं पाएगी। जब-जब उसे अपना पैदा किया हुआ बच्चा याद आएगा, वह कल्पना में ही सही, उसकी  सूरत देखने का प्रयास जरूर करेगी।’’ यह पंक्तियां उपन्यास ‘कोख’ की हैं जिन्हें पढ़ कर यह तो साफ समझ में आता है कि एक मां और उसके बच्चे के भावनात्मक लगाव की बात की जा रही है। इस उपन्यास में सन् 1984 में एक किशोरी एक राजा की हवश का शिकार बनती है। उसकी कोख से जन्मे बच्चे सीमान्त के मन में करीब 25 साल बाद अपने सांवले रंग और नयन-नक्श को लेकर संदेह पैदा होता है। संदेह पुख्ता होता है, तो वह पिता से लड़ता है अपनी मां के लिए, उसकेवजूद को जानने के लिये। यहां तक कि इसके लिये वह अपनी उस मां से जिसने उसे यशोदा की तरह पाला-पोसा और अपने पिता दोनों के लिये बेरूखी भरा व्यवहार अपना लेता है। हालंकि उसके मन में अपने माता-पिता जिन्होंने उसे पाल-पोस कर इतना बढ़ा किया है उनके लिये भी प्रेम और आदर है, लेकिन अपनी सगी मां के बारे में सब कुछ जानने को आतुर है, इसके चलते वह अपने वर्तमान के परिजनों को ठेस पहुंचाने से भी पीछे नहीं रहता है। वह अपनी उस मांको हर हाल में पा लेना चाहता है जिसने उसे जन्म दिया और फिर सदा के लिये उससे दूर चली गई।

03-07-2016कोख

लेखक                    : रोशन प्रेमयोगी

प्रकाशक             : परमेश्वरी प्रकाशन

मूल्य                      : 300 रु.

पृष्ठ                        : 168

 उपन्यास में तीन महिला पात्र हैं। इनमें मधुरिमा सिंह जो सीमान्त का पालन-पोषण करने वाली मां हैं उनका चरित्र बहुत प्रभावशाली है। वह पहले तो सौतेली मां की तरह लगती हैं, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती गई, वह धरती की तरह धैर्यवान और समुद्र की तरह अथाह गहराई वाली मां लगीं। आई.ए.एस. प्रभुनाथ सिंह, सीमान्त के पिता पहले खलनायक लगते हैं, लेकिन जब कहानी खुलती है तो तमाम पूर्वाग्रह ध्वस्त हो जाते हैं। शैलजा जिसकी शादी सीमान्त से होने वाली है वह बहुत ही प्यारी और समझदार लड़की है, वह सीमान्त को बिखरने से बचाती है। दरअसल शैलजा खंड-खंड होकर नष्ट होने को तत्पर कुछ लोगों को फिर से एक परिवार बनने के लिए प्रेरित करती है। देखा जाए तो अपने व्यक्त्वि से शैलजा ही इस उपन्यास को बड़ा बनाती है। शैलजा ही सारी परिस्थतियों को समझते हुए सीमान्त के और उसके परिवार के लिये बड़ा सहारा बनकर उभरती है। शैलजा जितना सीमान्त को समझती है उतना ही उसके परिवार के सदस्यों को भी समझने में सफल होती है। उसकी यही समझ उसे इस परिवार को टूटने से बचा लेती है। शैलजा इस उपन्यास की सबसे मजूबत कड़ी है।

गायत्री देवी सीमान्त को जन्म देने वाली मां हैं जिनका संघर्ष और दंश मन को झकझोर देता है। गायत्री देवी के चरित्र के माध्यम से समाज की उन स्त्रीयों को इंगित किया गया है जो हर वक्त समाज में पुरूषों के आगे दबी कुचली रहतीं हैं। और मजबूरी वश उन्हें वही जीवन जीना पड़ता है जो पुरूष समाज उनके लिये सुनिश्चित करता है। इस उपन्यास में गायत्री देवी का चरित्र पाठकों के मन को अंत तक बांधे रखता हैं, लेकिन यह थोड़ा अजीब लगता है कि गायत्री देवी के दंश को लेखक ने बेटे के प्यार और नैतिकता के बोझ तले दबा दिया, वैसे यह पुरुष प्रधान समाज की रीति है।

उपन्यास में मधुरिमा को उनके पति एक जगह बांझ कह कर पुकारते हैं। तो वहीं गायत्री देवी बच्चे को जन्म देकर उससे दूर जाने को मजबूर हो जाती हैं। इन दो महिला चरित्र के माध्यम से हमारे समाज में महिलाओं की स्थिती को दर्शाया गया है।

 प्रीति ठाकुर

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