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कुष्ठ एवं त्वचा रोग निवारक औषधीय पादप नीम

कुष्ठ एवं त्वचा रोग निवारक औषधीय पादप नीम

स्वास्थयवर्धक एवं आरोग्यता प्रदान करने वाला वृक्ष नीम है। ‘निम्बति सिंचति स्वस्थ्य इति निम्बम्’। नीम मृत्युलोक का कल्पवृक्ष कहा जाता है। यह सब प्रकार की व्याधियों को हरने वाला है। वसंत ऋतु (विशेषता चैत्र मास) में नीम के कोमल पत्तों के सेवन का विशेष महत्व है, इससे रक्त शुद्ध होता है तथा चेचक आदि भयंकर व्याधियां नहीं पनपतीं।

जो व्यक्ति नीम के पत्ते का साग विधिपूर्वक खाता है उसे एक वर्ष तक विष से कोई भय नहीं रहता तथा विषैले जंतु के काटने पर भी कोई समस्या नहीं होती। नीम पत्र क्वाथ वर्णों के प्रक्षालनार्थ कार्बोलिक साबुन से भी अधिक उपयोगी बताया गया है। चरक ने चन्दन, जटामांसी, अमलतास आदि 10 कंडूघ्न औषधियों में नीम की गणना की है। नीम चर्मरोग नाशक होने के साथ-साथ अनेक घातक जीवाणुओं जैसे ई-कोलाई, सालमोनेला  टाइफी, स्टैफिलोकोकस आदि कीटाणुओं को नष्ट करता है। शोध से ज्ञात हुआ है कि नीम लगभग 200 प्रकार के कीटों के लिए घातक वनौषधि है। यह एक प्रचण्ड जीवाणुनाशी है, इसके रोम-रोम में रक्तशोधक गुण भरे पड़े हैं।

नीम की पत्तियों के गाढ़े लेप से शीघ्र बढऩे वाली घातक कोशिकाओं की वृद्धि दर कम हो जाती है। इस दृष्टि से यदि नीम पर शोध किया जाए तो कैंसर-रोधी दवा भी खोजी जा सकती है। विश्व स्वस्थ्य संगठन के एक दल ने नीम को प्रजनन विरोधी पौधों की सूचि में भी रखा है।

बाह्यस्वरूप

नीम 15 से 20 मीटर ऊंचा, संघन, शाखा-प्रशाखायुक्त सदाहरित वृक्ष है। कांड स्कंध सीधा एवं लम्बा, शाखाएं फैली हुईं, कण्डत्वक-धूसर अथवा गहरे धूसर वर्ण की, खुरदुरी तथा अंतभाग में रक्ताभ-भूरे वर्ण की होती हैं। इसके पत्र संयुक्त, एकांतर, 20-38 सेंटीमीटर लम्बे, किनारों पर कटे हुए, चमकीले हरे रंग के, नवीन पत्र हलके लाल वर्णीय, स्वाद में कटु होते हैं। पुष्प छोटे 6-8 मिलीमीटर लम्बे हरिताभ-श्वेत अथवा पांडुर पीत वर्ण के मधु-गंधी होते हैं। इसके फल चिकने 1-3 से 1-8 सेंटीमीटर लम्बे, अपक्कावस्था में हरे, पक्कावस्था में पीत वर्ण के, सुगंधित, काष्ठीय अंत-फलभिति युक्त, बीज एकल, नुकीले अंडाकार, तैलीय, स्थूल तथा मांसल होते हैं। नीम का पुष्पकाल जनवरी से अप्रैल तक तथा फलकाल अप्रैल से अगस्त तक होता है।

त्वचा रोग में औषधीय प्रयोग

चेचक

  • नीम की रक्तवर्णीय कोमल पत्तियां 7 नग, काली मिर्च 7 नग आपस में मिलाकर 1 महीने तक नियमपूर्वक खाने से 1 साल तक चेचक निकलने का डर नहीं रहता।
  • चेचक के दानों में यदि बहुत गर्मी अनुभव हो तो नीम की 10 ग्राम कोमल पत्तियों को पीसकर उसे पतलाकर लेप करना चाहिए, चेचक के दानों पर कभी भी मोटा लेप नहीं लगाना चाहिए।
  • नीम के बीजों की 5-10 गिरी पानी में पीसकर लेप करने से चेचक के दानों की जलन शांत होती है।
  • यदि चेचक के रोगी को अधिक प्यास लगती हो, तो नीम की छाल जला लें, फिर अंगारों को पानी में डालकर बुझा लें और इस पानी को छानकर रोगी को पिलाएं अथवा एक लीटर पानी में 10 ग्राम कोमल पत्तियों को उबालें, जब आधा पानी शेष रहे, इसे छानकर पिलाएं। प्यास के अतिरिक्त यह पानी चेचक के विष एंव ज्वर के वेग को भी हल्का करता है और चेचक के दानें शीघ्र सूखते हैं।
  • यदि चेचक निकलते समय रोगी में बेचैनी हो, तो नीम की हरी पत्तियों का रस 10 मिलीलीटर सुबह, दोपहर तथा शाम पिलाना चाहिए व चेचक ठीक होने पर नीम के पत्तों के क्वाथ से स्नान करना चाहिए।
  • चेचक के दाने सूखने पर उनकी जगह छोटे-छोटे गड्ढे दिखाई देते हैं। इन स्थानों पर नीम का तेल अथवा नीम के बीजों की मगज, पानी में घिसकर लगाने से दाग मिट जाते हैं।
  • यदि चेचक के रोगी के बाल झड़ जायें, तो सिर में कुछ दिनों तक नीम का तेल लगाने से बाल फिर उग जाते हैं।
  • नीम का उबटन : नीम की जड़ की ताजी छाल और नीम के बीज की गिरी 10-10 ग्राम, दोनों को अलग-अलग नीम के ताजे पत्र के रस में पीसकर भली प्रकार मिला लें। मिलाते समय ऊपर से पत्ते का रस डालते जायें, जब वह उबटन की तरह हो जाये, तब खुजली, दाद, वर्षा तथा ग्रीष्म में होने वाली फुन्सियों, शीतपित्त, शारीरिक दुर्गन्ध, पसीने में अधिक नमक का अंश निकलने आदि त्वचा के सभी विकारों को दूर करता है।

गलित कुष्ठ

  • नीम की छाल और हल्दी 1-1 किलो तथा 2 किलो गुड़ लें, तीनों को बड़े मटके में भरकर उसमें 50 लीटर जल डालकर मुंह बंद करें व घोड़े की लीद से पूरे मटके को ढक दें, 15 दिन बाद खोल कर अर्क निकालें। इसे 10-20 मिली. की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से गलित कुष्ठ में लाभ होता है। दवा सेवन के बाद घी के साथ बेसन की रोटी खायें।
  • कुष्ठ रोगी को बारह मास नीम वृक्ष के नीचे निवास करना चाहिए। नीम की लकड़ी की दातून करनी चाहिए। नीम की पत्तियों के क्वाथ से स्नान करें, नीम के तेल में नीम की पत्तियों की राख मिलाकर व्रणों पर रोज लगाये।

प्रात:काल 10 मिली. नीम पत्र स्वरस पीना चाहिए। पूरे शरीर में नीम पत्र स्वरस व नीम तेल की मालिश करें और भोजनोपरांत दोनों समय 50-50 मिली. नीम का मद पीना चाहिए। यह प्रयोग कुष्ठ रोग में अत्यंत लाभदायक है।

  • नीम पंचाग का 10 ग्राम चूर्ण ब्रह्मचर्या पूर्वक नियमित रूप से खैर के 20 मिली. क्वाथ के साथ सेवन करने से भी बहुत लाभ होता है।
  • नीम के पांचों अंगों का 1-1 भाग लेकर शुष्क चूर्ण बना लें, फिर उसमें त्रिकुट व त्रिफला के प्रत्येक द्रव्य और हल्दी का चूर्ण 1-1 भाग मिलाकर सुरक्षित करें। 2 से 3 ग्राम तक शहद, घी या गर्म जल के साथ सेवन करने से खांसी, विष, प्रमेह, पिडिका एवं कुष्ठादि रोग नष्ट होते हैं।
  • नीम के बीजों की गिरी का प्रयोग : कुष्ठ रोगी को प्रथम दिन 1 गिरी, दूसरे दिन 2 गिरी, इसी प्रकार क्रमश: 1-1 गिरी बढ़ाते हुए, सौ गिरी पर आ जायें, तत्पश्चात इसका सेवन बंद कर दें। पथ्य सेवन में चने की रोटी और घी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं लें। कुष्ठ रोग में यह योग परम लाभदायक हैं।

03-07-2016

श्वेत कुष्ठ

  • ताजे नीम पत्र पांच नग और हरा आंवला 10 ग्राम (हरे आंवले के अभाव में आंवला शुष्क फल 6 ग्राम) लें। प्रात: सूर्योदय के पूर्व ही ताजे जल में पीस-छान कर इसे पी लें, तथा केले के क्षार को हल्दी व गौमूत्र के साथ पीसकर श्वेत दागों पर लगातार लगाते रहें, इससे लाभ मिलता है।
  • नीम पत्र, पुष्प तथा फल को समभाग लेकर जल के साथ महीन पीस लें। इसे 2 ग्राम की मात्रा में जल के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।

चर्म रोग

  • छाजन, दाद, खुजली, फोड़ा, फुंसी, उपदंश आदि रोग के लिए 100 वर्ष पुराने नीम वृक्ष की सूखी छाल को महीन पीस लें, रात्रि में 3 ग्राम चूर्ण को 250 मिली जल में भिगो दें और प्रात: छानकर शहद मिलाकर रोगी को पिलायें।
  • एग्जीमा गीला हो या शुष्क, नीम पत्र रस में पट्टी को तर कर बांधने से और बदलते रहने से लाभ होता है।
  • गीली छाजन में नीम के 8-10 पत्तों को पीसकर बांधना हितकर है।
  • असाध्ययाध्दु:साध्य छाजन में 10 ग्राम छाल के साथ समभाग मंजिष्ठादि क्वाथ के द्रव्य तथा पीपल की छाल और नीम, गिलोय मिला क्वाथ सिद्ध कर नित्य नियमपूर्वक 10-20 मिली की मात्रा सुबह-शाम 1 मास तक पिलाने से पूर्ण लाभ होता है।

दाद

  • नीम के 8-10 पत्तों को दही में पीसकर लेप करने से दाद में लाभ होता है।
  • नीम पत्र के रस में कत्था, गंधक, सुहागा, पित्त पापड़ा, नीलाथोथा व कलौंजी समभाग मिलाकर खूब घोट-पीसकर गोली बना लें, गोली को पानी में घिसकर दाद पर लगायें।

 


आयुर्वेदीय गुण


 

  • राजनिघंटुकार ने नीम को शीतल और रूक्ष कहा है, उनके विचार में यह कफध्न, व्रणरोपण, छर्दि निग्रहण और शोथहर है। यह नाना प्रकार के पित्त के उपद्रवों को जीतता है, ह्दय की दाह को शांत करता है। सुश्रुत ने नीम को उष्ण, रूक्ष और कटु विपाकी लिखा है। जिससे मालूम होता है कि नीम चाहे तात्कालिक परिणाम से शीतल हो, परंतु अंतिम परिणाम इसके उष्ण होते हैं।
  • नीम पत्र चक्षुष्य, विपाक में कटु, कृमिध्न, कुष्ठध्न और पित्त, अरूचि तथा विष विकार को दूर करता है।
  • नीम के कोमल पत्ते संकोचक, वातकारक तथा रक्त-पित्त, नेत्र रोग और कुष्ठ को नष्ट करने वाले हैं।
  • नीम की सींक रक्तविकार, खांसी, श्वास, बवासीर, गुल्म, कृमि और प्रमेह को दूर करती है।
  • नीम के फूल पित्तशामक, कड़वे तथा कृमि और कफ का शमन करने वाले हैं।
  • कच्ची निबौरी कटुरस, तिक्त, स्निग्ध, लघु, उष्ण तथा गुल्म, कृमि और प्रमेह को दूर करने वाली है।
  • पक्की निबौरी मधुर, कटु, स्निग्ध तथा रक्त-पित्त, नेत्र रोग, उर:क्षत तथा क्षय रोगों को नष्ट करने वाली है।
  • नीम की छाल स्वाद में कटु, संकोचक कफध्न, अरुचि, वमन, ग्रहणी, कृमि तथा यकृत विकारों में लाभदायक है।
  • नीम का पंचाग रुधिर विकार, कण्डु, व्रण, दाह और कुष्ठ का शमन करता है।
  • नीम का बीज रेचक और कृमिध्न है। पुरानी गठिया और खुजली पर इसका लेप करने से लाभ होता है।
  • नीम का तेल चर्म रोग नाशक है।

03-07-2016

 

शीतपित्त

  • नीम की अंत: छाल से निर्मित फाण्ट को 4 ग्राम आंवले के चूर्ण के साथ दिन में 2 बार खिलाने से, पुराने से पुराना जिद्दी शीतपित्त भी नष्ट हो जाता है।

व्रण

  • जो फोड़ा हमेशा बहता रहता हो, उसे नीम के पत्तों के क्वाथ से अच्छी प्रकार धोकर फिर उसमें छाल की राख भर देने से 7-8 दिन में पूर्ण लाभ होता है।
  • नीम की गिरी को 100 मिली नीम तेल में 20 ग्राम मोम डालकर पकायें, जब दोनों अच्छी तरह मिल जायें, तो आग से उतार कर 10 ग्राम राल का चूर्ण मिलायें व अच्छी तरह हिलाकर रख लें। यह मलहम, अग्नि से जले हुये और अन्य घावों के लिए लाभदायक है।
  • अग्नि से जले हुये स्थान पर नीम तेल को लगाने से शीघ्र लाभ होता है। इससे जलन भी शांत हो जाती है।
  • 50 मिली नीम के तेल में 10 ग्राम कपूर मिला कर रख लें, इसमें रूई का फाहा डुबोकर घाव पर रखने से घाव का शोधन तथा रोपण होता है। सर्वप्रथम घाव को नीम पत्र क्वाथ में थोड़ी फिटकरी डाल कर साफ कर लें।
  • भगन्दर एवं अन्य स्थानों के व्रणों पर नीम तेल में कपूर मिलाकर उसकी बत्ती अन्दर रखें एवं ऊपर भी इसी तेल की पट्टी बांधने से लाभ होता है। इस उपचार से कंठमाला-गलगंड आदि में भी लाभ मिलता है।
  • दुष्ट व्रणों के शोधन के लिए उन पर 8-10 नीम पत्र को शहद के साथ पीसकर लेप करें।
  • 6 ग्राम निम्ब पंचाग चूर्ण को नित्य नियमपूर्वक सेवन करने से जीर्ण भगन्दर में लाभ होता है।

फुंसी

  • वर्षा ऋतु में बच्चों को फोड़े-फुंसियां निकल आती हैं, नीम की 6-10 पकी निबौली को 2-3 बार जल के साथ देने से फुन्सियां नष्ट होती हैं।

उपयुक्त विशिष्टताओं से युक्त होने के बावजूद दुर्बल कामशक्ति वालों को नीम का प्रयोग नहीं करना चाहिए। प्रात:काल उठकर मद्यपान करने वालों को भी इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

फिर भी सामान्य रूप से 1-3 ग्राम चूर्ण व 50-100 मिली. क्वाथ सेवन सामान्यत: निरापद है, विशेष उद्देश्य के लिए इसे चिकित्सक के परामर्श से लें, और ‘नीम’ जैसी वनौषधि से किसी भी प्रकार के त्वचा रोग से मुक्ति पायें।

                साभार: योग संदेश

आचार्य बालकृष्ण

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