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प्लास्टिक की पतली पन्नियां पर्यावरण और जीवन के लिए खतरा

प्लास्टिक की पतली पन्नियां  पर्यावरण और जीवन के लिए खतरा

विकसित देशों के नागरिक स्वच्छता के प्रति अधिक सजग रहते हैं। विकसित देशों में कहीं सड़कों पर कचरा फैला हुआ नहीं दिखाई देता। कचरे की समस्या विकासशील तथा अविकसित देशों में अधिक है। भारत अभी भी एक विकासशील देश ही है। भारत के लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता अब धीरे-धीरे बढ़ रही है। प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का असर अगले कुछ वर्षों में अवश्य ही नजर आने लगेगा। इसके लिए नि:संदेह में जागरूकता अत्यन्त महत्वपूर्ण है, परन्तु सरकार को भी कुछ नियमों और कानूनों में परिवर्तन करके यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कचरे में शामिल प्लास्टिक जैसे हानिकारक तत्वों के इस्तेमाल को कैसे  नियंत्रित किया जाये।

भारत में प्लास्टिक की छोटी-बड़ी, पतली और मोटी हर प्रकार की थैलियां सामान्य खरीददारी का अंग बन चुकी हैं। विशेष समस्या प्लास्टिक की अत्यन्त पतली और पारदर्शी थैलियों की है, जो रोज के कूड़े-कचरे में इस प्रकार मिल जाती हैं कि सफाई की प्रक्रिया में उनको अलग करना भी मुश्किल हो जाता है। किसी भी गांव या शहर के कूड़े में पतला प्लास्टिक कई दिन तक गर्मी के कारण सड़ता रहता है। इस प्रकार सबसे पहले तो यह प्लास्टिक की थैलियां अपने अंदर के रसायनिक पदार्थों को वायुमंडल में छोड़कर प्रदूषण फैलाती रहती हैं। किसी स्थान का कितना वायु प्रदूषण हो रहा है इसका आकलन सामान्यत: दिखाई नहीं दे सकता, परन्तु वैज्ञानिक यह सिद्ध कर चुके हैं कि प्लास्टिक पदार्थों के जलने या गर्मी से सडऩे के कारण होने वाला वायु प्रदूषण सारी धरती के लिए एक खतरा बनता जा रहा है।

बाहर कूड़ा-कचरा कई दिन तक सड़ता है और अन्तत: उस कूड़े-कचरे को शहरों के किसी कोने में बड़े-बड़े गढ्ढों में दबाया जाता है। इस प्रकार प्रारंभ होती है एक नये प्रदूषण की प्रक्रिया। गढ्ढों में यदि गाय के गोबर जैसे महत्वपूर्ण पदार्थ को कुछ माह के लिए दबाया जाता है तो बड़ी लाभकारी और प्राकृतिक गुणों से युक्त खाद बनता है। इन्हीं गढ्ढों में यदि पेड़ों से गिरे पत्ते और कूड़े-कचरे के रूप में यदि कागज और सूती कपड़ा भी दब जाता है तो वह सब भूमि की अंदरूनी प्रतिक्रिया से खाद बनाने में सहायक होता है क्योंकि, इन पदार्थों में रसायनिक मिश्रण वाले प्लास्टिक जैसे पदार्थ नहीं होते। इसके विपरीत यदि इन्हीं गढ्ढों में प्लास्टिक मिश्रित कूड़ा-कचरा डाला जाये तो उसकी रसायनिक क्रिया भूमि के लिए अत्यन्त हानिकारक सिद्ध होती है। भूमि के अंदर इस प्लास्टिक कचरे से उत्पन्न रासायनिक क्रिया भू-जल को भी प्रदूषित कर देती है।

कुछ लोग जो विज्ञान के इन पहलुओं को समझते हैं और समाज, वायुमंडल, जल तथा धरती को शुद्ध बनाये रखने के प्रति अपनी जिम्मेदारी को महसूस करते हैं, वे नियमित रूप से घर से बाहर निकलते समय अपने साथ एक सुन्दर थैला अवश्य रखते हैं ताकि आवश्यकता पडऩे पर वे खरीदे हुए सामान के लिए उसका प्रयोग कर सकें। इस प्रकार के लोग अपने सामान को सुरक्षित रूप से ले जाने में भी सफल होते हैं।

हमारे देश में प्लास्टिक प्रबंधन को नियंत्रित करने के लिए आज भी कोई विशेष प्रभावी नियम-कानून लागू नहीं हो सके हैं। मैंने हाल ही में राज्यसभा के माध्यम से पर्यावरण मंत्रालय के समक्ष कुछ विशेष प्रश्न रखे, जिनके उत्तर में मुझे पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेड़कर ने सूचित किया है कि हमारे देश में 15,342 टन प्लास्टिक कचरा प्रतिदिन उत्पन्न होता है, जिसमें केवल 9,205 टन प्लास्टिक कचरे को पुन:प्रयोग प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे देश में प्रतिदिन लगभग 6,000 टन प्लास्टिक बिना पुन:चक्रण प्रक्रिया के अभाव में सड़ता रहता है। पूरे वर्ष में यह आंकड़ा 21,90,000 टन से भी अधिक पहुंच जाता है। व्यापक रूप में यदि हम इस समस्या पर चिंतन करें तो यह अपने आपमें एक बहुत भयानक समस्या है।

देश का सर्वोच्च न्यायालय अक्सर हर प्रकार के प्रदूषण के प्रति चिन्तित रहता है। भारत में प्रदूषण नियंत्रण के लिए सर्वोच्च न्यायालय के ही एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में राष्ट्रीय हरित आयोग का भी गठन किया गया है। न्यायिक निर्देशन के चलते ही दिल्ली में 15 दिन के लिए सम-विषम संख्या की गाडिय़ों को बारी-बारी से चलाने का प्रयोग किया गया। ऐसे प्रयोगों से नि:संदेह नागरिकों को कुछ कष्ट होता है। परन्तु यदि देश के नागरिक स्वयं अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझते और पर्यावरण प्रदूषण को लेकर सचेत रहते तो शायद ऐसे प्रतिबंधों की आवश्यकता ही न पड़ती।

कुछ वर्ष पूर्व पंजाब के खन्ना शहर में स्थानीय सेवा संस्था के माध्यम से हमने बहुत बड़ी संख्या में कपड़ों के थैले बांटने का  सफल अभियान चलाया था। परन्तु यह अभियान भी स्थाई नहीं बना रह सका। उसका कारण स्पष्ट है कि जब हर दुकानदार प्लास्टिक की पतली थैलियों में सामान देने के लिए तैयार रहता है तो ग्राहक भी घर से थैला लेकर खरीददारी करने के लिए तैयार नहीं होते।

03-07-2016

आज प्लास्टिक को लेकर भी एक सख्त प्रतिबंध की नितान्त आवश्यकता है। पर्यावरण मंत्रालय ने अनेक समितियों के माध्यम से प्लास्टिक के अव्यवस्थित कचरे और उस कचरे में से प्लास्टिक को अलग से निकालकर पुन:चक्रण न कर पाने की समस्याओं पर कई वर्षों तक विचार-विमर्श किया है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री रंगनाथ मिश्रा जी की अध्यक्षता में भी ऐसी ही एक समिति गठित की गई थी। अनेक राज्यों ने भी प्लास्टिक से उत्पन्न पर्यावरण खतरों को महसूस किया है। इस सारी छानबीन और वैज्ञानिक परीक्षण आदि का मुख्य विचार केन्द्र एक ही है कि प्लास्टिक के पदार्थ इस प्रकार के होने चाहिए, जिन्हें व्यवस्थित रूप से कूड़े-कचरे से अलग करके एकत्रित किया जाये और उसके बाद उनका पुन:चक्रण किया जाये। प्लास्टिक की पतली-पतली थैलियां कूड़े-कचरे से अलग नहीं हो पाती हैं। इसलिए ये थैलियां एक तरफ  कूड़े-कचरे के मार्ग को भी अवरुद्ध करती हैं और दूसरी तरफ वायु, जल और भूमि प्रदूषण करके नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा कर रही हैं। यहां तक कि अनेक पशु भी इन पतली थैलियों में लिपटे खाद्य पदार्थों को खाने के चक्कर में प्लास्टिक को ही खा जाते हैं। परिणामस्वरूप वह अस्वस्थ हो जाते हैं या उनकी मृत्यु हो जाती है। खुले में मृत्यु होने से भी वायु प्रदूषण का खतरा बढ़ता है।

भारत सरकार ने इस संबंध में वर्ष 2011 में कुछ नियमों को लागू किया था, जिनके अनुसार स्थानीय निकायों जैसे नगर निगम, नगर परिषदें तथा ग्राम पंचायतों को इस संबंध में जागरूकता तथा प्रशिक्षण कार्यशालाएं संचालित करने के लिए योजनाएं बनाई गई थीं। वर्तमान सरकार अब इन नियमों को अधिक कारगर बनाने के उद्देश्य से कुछ नये परिवर्तन करने जा रही है।

मेरे विचार में प्लास्टिक की पतली थैलियों के उत्पादन और प्रयोग पर सारे देश में पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। सरकार को एक निश्चित मोटाई की थैलियों के उत्पादन की ही अनुमति प्रदान करनी चाहिए। केवल इस एक ठोस उपाय से जहां एक तरफ पतली थैलियों से होने वाले प्रदूषणों से मुक्ति मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ दुकानदारों और जनता को भी कोई विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। यदि सरकार प्लास्टिक के मोटे थैलों के अतिरिक्त अन्य पतली थैलियों पर प्रतिबंध लगा देती है तो इससे जनता को लाभ ही होगा। ऐसे थैले लम्बी अवधि तक प्रयोग किये जा सकेंगे। मोटे प्लास्टिक के बड़े थैलों में सामान देते हुए दुकानदार को भी यह अधिकार होगा कि वह विधिवत उन थैलों की अलग कीमत ग्राहक से ही वसूल कर सकें। इस प्रकार ग्राहक भी जहां तक सम्भव हो सकेगा खरीददारी के लिए थैला अपने घर से साथ लेकर जायेंगे। बड़े थैले बेशक प्लास्टिक के ही हों तो भी ऐसे थैलों को कूड़े-कचरे से अलग करने में कोई कठिनाई नहीं आयेगी। परिणामस्वरूप: बिना प्लास्टिक वाले कूड़े-कचरे की प्रक्रिया अलग चलेगी और प्लास्टिक के बड़े थैले आदि को अलग से पुन:चक्रण की प्रक्रिया में शामिल किया जा सकेगा। केवल इस एक नियम को क्रियान्वित करने के लिए सरकार सभी राज्यों और स्थानीय सरकारों को शामिल करके जो भी योजना बनायेगी वह अवश्य ही क्रियान्वित हो पायेगी।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के उपाध्यक्ष हैं)

अविनाश राय खन्ना

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