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मिलावट का काला धंधा

मिलावट का काला धंधा

डब्लयूएचओ में दक्षिण पूर्व एशिया की क्षेत्रीय निदेशक डॉ. पूनम खेत्रपाल सिंह का कहना है कि दुनिया भर में खाने-पीने की चीजों में मिलावट के कारण प्रतिवर्ष बीस लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। प्रदूषित भोजन के कारण 200 से भी अधिक बीमारियां हो जाती हैं। इन बीमारियों का कारण तलाशने में लंबा समय लग जाता है और तब तक बीमारी एडवांस स्टेज पर पहुंच चुकी होती है। सर गंगाराम अस्पताल के गेस्टोलोजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अनिल अरोड़ा का कहना है कि आमतौर पर पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में फ्लेवरिंग और कलरिंग एजेन्ट मिलाए जाते हैं। इनके लंबे समय तक खाने से उदर रोग हो जाता है। पेट दर्द, पेट फूलना, दस्त, पेट में मरोड़ आना, एलर्जी वगैरह आम बात है। मिलावटी भोजन पेट में आता है तो छोटी आंत में पचता है बार-बार परेशानी होने पर छोटी आंत की क्षमता कम होने लगती है और बिना पचे खाना बाहर निकल जाता है। अगर खाद्य पदार्थों के साथ लेड जैसी भारी पदार्थ शरीर के अंदर पहुंचते हैं तो इसे पेट पचा नहीं पाता, जिससे एनीमिया और कैंसर जैसी भयानक बीमारी हो जाती है। साथ में दी गई तालिका बताती है कि किस खाद्य पदार्थ में किसकी मिलावट से कौन-सा रोग होता है।

सब्जियों और फलों को इंजेक्शन लगा कर पकाया जाता है। केले को कार्बाइड से पकाया जा रहा है। सूखे मेवों को गंधक में रख कर कमरे में बंद कर दिया जाता है। मसालों में गोबर और लीद मिला दी जाती है, लाल मिर्च में ईंट का पीसा हुआ चूरा मिला दिया जाता है। इसी तरह नमक, तेल में भी कुछ न कुछ अखाद्य पदार्थ मिलाया जा रहा है। तेल को एक बार इस्तेमाल करके दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। परंतु हलवाई कढ़ाई के बचे हुए तेल को बार-बार इस्तेमाल करते हैं जिससे कैंसर जैसी भयानक बीमारी हो जाती हैं। आहार विशेषज्ञों के अनुसार बार-बार पके तेल का प्रयोग करने से वह खराब हो जाता है। उसकी गंध एवं पौष्टिकता नष्ट हो जाती है। कढ़ाई में बचे हुए तेल में ऐसे तत्व भी उत्पन्न हो जाते है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।

एक शोध के अनुसार जब एक बार तेल गरम किया जाता है तो उसमें एचएनई हाइड्रोक्सिनोल पदार्थ बनने शुरू हो जाते हैं। ये विषाक्त पदार्थ होते हैं। जितनी बार तेल को गरम किया जाता है उतने ही अधिक एचएनई बनते हैं अर्थात तेल उतना ही अधिक विषैला हातो जाता है जिसमें लिनोलेइक एसिड अधिक होता है। ग्रेपसीड कॉर्न ऑयल और सेफलाऊट तेल का उपयोग कुकिंग के लिए किया जा सकता है परंतु ये डीप फ्राई के लिए उपयुक्त नहीं है। जब इन्हें बार-बार गरम किया जाता है तो इसमें फोरिडक्लस उत्पन्न हो जाते हैं और जब इनमें पका भोजन खाया जाता है तो ये रेडिक्लस स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट कर देती है और ये पेट में कॉलेस्ट्रॉल बनाती है जिससे अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारियां हो जाती है।

पिछले वर्ष मैगी में लेड की अधिकता की चर्चा जोरों पर रही और मैगी बनाने वाली कंपनी नेस्ले विवादों में आ गई। ध्यान रहे भारत में मिलने वाली मैगी में लेड की अधिकता पाई गई जिसे खाने में कैंसर जैसी भयानक बीमारी हो जाती है। मैगी में शीशे की मिलावट की खबर अभी आई ही थी कि चावल में चीन के बने प्लास्टिक चावलों की मिलावट की नई खबर आ गई। 8 जुलाई 2015 को सुग्रीव दुबे नामक के एक वकील ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसमें दावा किया गया था कि असली चावल में चीन से आयातित नकली प्लास्टिक चावल मिलाकर बेचा जा रहा है। इस याचिका को गंभीरता से लेते हुए चीफ जस्टिस जी. रोहिणी और जस्टिस जयंती नाथ की पीठ ने सुनवाई की। वकील सुमन दुबे के अनुसार चीन से हू-ब-हू चावल जैसा ही प्लास्टिक का नकली चावल आता है और उसे चावल के साथ मिलाकर भारत के बाजारों में बेचा जा रहा है। दरअसल चीन के शांगसी राज्य में आलू, शलगम और प्लास्टिक को मिलाकर चावल बनाया जाता है और इसमें रेजिन अर्थात सरेस या राल की मिलावट की जाती है। रेजिन पेट से निकलने वाला एक तरह का हाइड्रोकार्बन द्रव है जिसका प्रयोग गुब्बारे और प्लास्टिक की दूसरी चीजें बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। इन चीजों के मिश्रण को मशीनों से असली चावल का आकार दिया जाता है, इौर उसे पहचाना पाना बहुत कठिन है। यह चावल अगर 25 ग्राम खा लिया जाये तो समझिए प्लास्टिक की एक थैली पेट में चली गई। इन नकली चाइनीज प्लास्टिक चावल की बिक्री की खबर सुनकर आम जनता में बड़ी बेचैनी हो रही है। आम उपभोक्ताओं में दहशत फैली हुई है। आहार विशेषज्ञों के अनुसार इसकी पहचान करने का तरीका यह है कि यह चावल पकने पर प्लास्टिक की गंध देगा जिसका माड कड़वा लगेगा और उसमें भी प्लास्टिक की गंध आयेगी, यह चावल पकने पर महकता, खिलता नहीं।

चीन भारत की अर्थव्यवस्था को नष्ट करने पर उतारू है। इस दिशा में यह भी उसका एक कदम है। त्योहारों के सीजन में और अन्य विशेष अवसरों पर बूंदी की लड्डू बनाए जाते हैं और व्यापारी वर्ग इस अवसर का लाभ उठाते हैं। ये लोग पैसे कमाने के चक्कर में  तय मात्रा से ज्यादा सिंथेटिक कलर का इस्तेमाल करते हैं। 26 दिसंबर 2001 को दिल्ली के पहाड़ी धीरज सदर बाजार में नियुक्त फूड इंस्पेक्टर ने एक स्वीट कॉर्नर से बूंदी के लड्डूओं के सैंपल उठाए और जांच के लिए पब्लिक एनालिस्ट के पास भेजा गया। पब्लिक एनालिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार बूंदी के लड्डू मिलावटी थे। उसमें 100 पीपीएम की तय सीमा से अधिक सिंथेटिक कलर टाट्रीजन का इस्तेमाल किया गया था। दुकान मालिक के विरुद्ध प्रिवेन्शन ऑफ फूड एडल्ट्रेशन एक्ट 1954 के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज किया गया। एडिशनल चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट गौरव राय ने उन व्यापारियों को दो तथा तीन वर्ष कैद की सजा तथा 1 लाख रुपये का जुर्माना किया। अदालत ने मिलावट 267.5 पीपीएम के लगभग पाई। अदालत ने इसे समाज के लिए खतरनाक बताते हुए कहा कि यह बेकसूर उपभोक्ताओं की जिन्दगी के साथ खिलवाड़ है और दोषियों को सजा से ही मिलावटखोर अपराधियों पर लगाम लगेगी।

03-07-2016

पता नहीं भारत में लोग पैसा कमाने के लिए किस हद तक जा सकते हैं! वे इंसान की जिन्दगी के साथ खिलवाड़ करने में जरा भी नहीं हिचकते। सब्जियों और दालों को रासायनिक रंगों से रंगा जा रहा है, पीसे हुए आटे में मिलावट है, दालों में कंकर/पत्थर के टुकड़े मिलना आम बात है। पान मसाला एवं पान के अंदर पडऩे वाले तत्वों में भी मिलावट है। सबसे ज्यादा गड़बड़ तो दूध में है। जो देश दूध की नदियों के रूप में जाना जाता था, वहां आज जहरीला दूध बेचा जा रहा है। पता चला है कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई गैर-कानूनी फैक्टरियां काम कर रही हैं, जहां यूरिया खाद से दूध बनाया जात है। यह दूध बड़े दूध सप्लायरों को बेचा जाता है। 30 प्रतिशत यूरिया वाला दूध असली दूध में मिला दिया जाता है। दूध में झाग पैदा करने के लिए साबुन बनाने वाला कॉस्टिक सोडा, अरारोट और स्टार्च भी मिलाया जा रहा है। यह खुलासा स्वयं खाद्य एवं औषधि नियंत्रण विभाग हरियाणा ने किया है।

हरियाणा के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र गुडग़ांव, सोनीपत, फरीदाबाद में धड़ल्ले से दूध  में मिलावट हो रही है। मिलावटी दूध से उल्टी एवं दस्त की शिकायत हो सकती है। सिंथेटिक दूध किडनी और लीवर को खराब कर देती है। इससे त्वचा संबंधी रोग हो सकते है। इससे कैंसर तक हो सकती है। असली दूध की पहचान हो सकती है क्योंकि सिंथेटिक दूध में साबुन जैसी गंध आती है। असली दूध को हथेली पर रगडऩे से चिकनाई नहीं होती जबकि मिलावटी दूध में चिकनाई आ होती है। यह चिकनाई डिटरजेंट जैसी होती है। घटिया किस्म का दूध फट जायेगा, इसका स्वाद कड़वा होगा और देर तक रखे रहने पर दूध का रंग पीला पड़ जायेगा। स्टार्च मिश्रित दूध को आयोडिन मिलाकर गरम करने से उसका रंग नीला हो जायेगा। 6 मई 2016 को मथुरा (उत्तर प्रदेश) में मिड-डे-मील में जहरीला दूध पीने से तीन बच्चों की मौत हो गई और 28 बच्चे मौत से जुझने लगे। इसी प्रकार कन्नौज (उत्तर प्रदेश) 1 हजार लीटर जहरीला दूध मिला और 5 टन दूध का पाउडर मिला, जो जहरीला था जिसकी तारीख समाप्त हो चुकी थी। उसको मिला कर छान कर 1 लाख लीटर जहरीला दूध बना कर मिड-डे-मील में बच्चों को दिया जाना था।

यह दूध जहर बन चुका था जिसके पीने से बच्चे काल के ग्रास बन जाते। उसी दिन संसद की कार्यवाही देखने आए छात्रों ने स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा से पूछ लिया, ”अंकल, यह मिलावट कब रुकेगी। खाने-पीने की चीजों में मिलावट हो रही है। लोग बीमार हो रहे हैं सरकार क्या कर रही है?’’ मंत्री महोदय ने छात्रों की बातें सुनी और कहा कि इसका हल निकलेगा। राज्यसभा में भी उसी दिन शून्य काल में न केवल विपक्षी सदस्यों ने बल्कि सत्ताधारी भाजपा के सदस्यों ने भी खाने-पीने की चीजों में मिलावट की बढ़ती घटनाओं पर चिन्ता व्यक्त की। उप-सभापति महोदय पी. जे. कुरियन ने भी सदस्यों का समर्थन करते हुए कहा कि कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं, इसका कारण खाने-पीने की चीजों में मिलावट है।

पिछले वर्ष मैगी में शीशे की मिलावट का मुद्दा बड़े जोर-शोर से उछला था तो आज खाने वाली ब्रेड में पोटैशियम ब्रोमेट तथा पोटाशियम आयोडेट की मिलावट की बात सामने आई है। सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) के एक अध्ययन में सामान्य तौर पर उपलब्ध 38 ब्रेड के सैंपल लिए गए जांच करने पर उसमें 84 प्रतिशत (32/38) में पोटाशियम ब्रोमेट तथा पोटाशियम आयोडेट की मिलावट पाई गई। इन सैंपलों में बे्रड, पाव तथा बन शामिल थे। आहार विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों तत्व केमिकल कार्सिनोजेनिक होते हैं जिससे कैंसर तथा थायराइड की बीमारी हो सकती है। स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के कारण अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ के देशों, कनाड़ा, ऑस्टे्रलिया, न्यूजीलैंड, श्रीलंका, नाईजीरिया, पेरू, ब्राजील, कोलम्बिया, जापान आदि देशों में इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। आहार विशोषज्ञ नीला लूला का कहना है कि पोटाशियम ब्रोमेट के सेवन से कैंसर तथा पोटाशियम आयोडेट से थायराइड की बीमारी हो सकती है। किसी भी रूप में अगर शरीर के अंदर कार्सिनोजेनिक एजेंट जाता है तो उससे कैंसर होने का खतरा है। कैंसर के अलावा पाचन तंत्र धीमा होने का खतरा होता है। पोटाशियम आयोडेट से थायराइड होता है और शरीर का संतुलन बिगडऩे लगता है। उन्होंने बताया कि पोटाशियम ब्रोमेट ब्रेड में मिलाने से उसकी बाइंडिंग बेहतर तरीके से होती है और प्रोडक्ट अच्छे से फूल जाता है। यदि यह ठीक तरह से कुक नहीं किया जाए और कच्चा रह जाए तो यह बड़ी आंत में जा कर चिपक जाता है। आयोडेट ब्रेड की लाइफ बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह एक तरह का प्रिजरवेटिव होता है। यह भी कैंसर का कारण बनता है। यह शरीर के अन्दर एनर्जी लेवल को रोकता है जिससे शरीर का सन्तुलन खराब हो जाता है। एम्स की आहार विशेषज्ञ अंजलि भोला का कहना है कि पोटाशियम ब्रोमेट का थोड़ा सा अंश भी शरीर में रह जाता है तो तुरन्त इसका रिएक्शन होता है। शुरू में उल्टी, डायरिया, सिरदर्द होता है और बाद में कैंसर बन जाता है। सेन्टर फॉर साइन्स ऐंड एनवायरमेंट के प्रमुख फूड सेफ्टी चन्द्रभूषण तथा अमित खुराना ने बताया  कि देश में बारह कंपनियां हैं जो ब्रेड, पिजा, पाव आदि बनाती हैं। ये इस प्रकार हैं- हारवेस्ट गोल्ड, एल.आर. फूडस, मिसेज बेक्टरज फूड स्पेशलिस्ट ले मार्च, ब्रिटानिया इन्डस्ट्रीज, नरूला कार्न हाऊस पिजा हट, जुबिलयन्ट फूड वक्र्स, ग्रीन हाऊस एन्ड हेस्टोसोफ्ट फूडस, मैक्डोनलड हार्डकेसल रेस्तरां तथा केएफसी चीन की कंपनी-जब इनसे पूछताछ की गई तो कुछ ने ये रासायनिक तत्व मिलाने से साफ इनकार कर दिया। वहीं ऑल इंडिया ब्रेड मैनुफैक्चरिंग एसोसिएशन  (एआईबीएमए) के अध्यक्ष रमेश मांगो ने कहा कि हमने किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया, कोई गैर-कानूनी काम नहीं किया, सरकार द्वारा तय मानकों के आधार पर अपने प्रोडक्ट बनाए हैं। सीएसई की रिपोर्ट-हम खाने में जहर खा रहे हैं- के आधार पर भारतीय खाद्य सुरक्षा और फूड रेगुलेटर एफएसएसएआई ने ब्रेड खाने से कैंसर का डर देखते हुए पोटाशियम ब्रोमेट तथा आयोडेट के ब्रेड में इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

03-07-2016

मिलावट करने वालों के हौसले इतने बुलंद हैं कि आम आदमी की तो बिसात क्या वे प्रधानमंत्री के भोजन में भी मिलावट करने से नहीं हिचकते। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जुलाई 2010 में जब कानपुर में किसी दौरे के लिए गए तो उनके लिए जो भोजन बन रहा था, उसमें जहरीले रसायनों की मिलावट पाई गई। गनीमत यह रही कि मिलावट का पता लग गया। अब आप अनुमान लगा सकते हैं कि समस्या कितनी गंभीर है।

मिलावटखोरी केवल खाने-पीने की वस्तुओं में ही नहीं है। अन्य वस्तुओं में भी यह होती है। आज दूध, सब्जी, दाल, फल, मसाले, आचार, तेल, घी, दवाए, कोल्डड्रिंक और यहां तक कि खून में भी मिलावट पाई गई। जरा सोचिए जब कोई मरीज अत्यन्त गंभीर हालत में अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में दाखिल होता है और उस मरीज को खून की अत्यन्त आवश्यकता है और उसे जो खून दिया जा रहा है, दवाई दी जा रही है वो मिलावटी है तो बताइए कि वह मरीज मरेगा या जिएगा। हमारा कितना नैतिक पतन हो चुका है। इस देश में मिलावट की जो प्रवृति देखी जा रही है वह महज खाद्य पदार्थों तक ही सीमित नहीं है, पैट्रोलियम उत्पाद भी इससे अछूते नहीं हैं। उनमें भी मिलावट की जा रही है। देखा गया है कि पेट्रोल पम्पों से वितरित होने वाले ईंधन में मिलावट पाई जाती है। पेट्रोल में मिट्टी का तेल मिल दिया जाता है। मिट्टी का तेल डीजल व अन्य अनेक पदार्थ जो पेट्रोल से कम दाम में मिल जाते हैं वे महंगे पेट्रोलियम उत्पादों में मिला दिए जाते हैं। यह धारणा बिल्कुल सही है कि मिलावट का मूल कारण दो पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्यों में अन्तर होना है। यही अन्य वस्तुओं में मिलावट का कारण बनता है। स्वभाविक है कि यही हालत मुनाफाखोरों एवं मिलावटखोरों को प्रेरित एवं उत्साहित करती है। पेट्रोलियम उत्पादों में मिलावट से न केवल वाहनों के ईंजन खराब होते हैं, बल्कि उत्सर्जित धुएं से अवांछित गैस निकलती है और पर्यावरण संरक्षण के लिए हानिकारक है।

मिलावटखोरी की बात यहीं पर समाप्त नहीं होती, ये मिलावटखोरी हमारे पवित्र त्यौहारों की खुशी में भी रंग में भंग डाल देते हैं। दीवाली, होली या अन्य किसी पवित्र त्यौहार पर बनने वाली मिठाइयों में मिलावट करना आम बात हो गई है। होली में प्राय: रंगों एवं गुलाल से खेला जाता है परन्तु इन रंगों एवं गुलाल में डाला जाने वाला केमिकल हमारी सारी खुशियों को समाप्त कर देता है। हरे रंग में कांच डाला जाता है जो आंखों में एलर्जी और अंधेपन का कारण बन जाता है। बैंगनी रंग में क्रोमियम आयोडाइड डाला जाता है जिससे अस्थमा तथा एलर्जी जैसे रोग हो जाते हैं। काले रंग में मौजूद लेड आक्साइड किडनी खराब कर देता है। यह व्यक्ति के सीखने की क्षमता को समाप्त कर देता है। सिल्वर रंग में एल्युमिनियम ब्रोमाइड का इस्तेमाल किया जाता है जो त्वचा कैंसर का कारण बनता है। नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि आंखों में यदि रंग चला जाता है तो आंखें लाल हो जाती हैं। उनमें खुजली होने लगती है। होली के बाद आंखों में एलर्जिक कंजेक्टिवाइटिस, केमिकल से जलने, कार्नियल एब्रेजल ब्लट आई एंजुरी के मरीज अधिक आते हैं। रंगों में शीशे की मात्रा अधिक होने से आंखों का रेटिना खराब हो जाता है। ईएनटी विशेषज्ञों का कहना है कि मिलावटी रंग यदि कान के अंदर पहुंच जाए तो यह इयर केनाल के संसेटिव टिश्यू को खराब कर देता है। यह टिश्यू आवाज को इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदल कर ब्रेन तक पहुंचता है जिसके खराब होने से बहरापन हो जाता है। त्वचा विशेषज्ञों का कहना है कि रंगों में मिले केमिकल त्वचा के संपर्क में आते ही त्वचा को खराब करना आरंभ कर देते हैं। सिंथेटिक रंगों में हाइड्रोकार्बन हाइड्रोक्यूनोंस पैराबक्स रसायन होते हैं जो त्वचा में खुजली, लाल चकते, लाल फफोले तथा त्वचा को काली कर देते हैं।

कहने का अर्थ यह है कि मिलावटखोरी व्यापक है। मिलावटखोरों को यह समझना चाहिए कि वे खुद भी इसके शिकार हो रहे हैं। वे खुद अपनी मौत को निमंत्रण दे रहे हैं। सरकार को मिलावटखोरों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने चाहिए। इसके साथ ही समाज को भी जागरूक होना पड़ेगा, जब तक हम मिलावटखोरी की प्रवृत्ति पर समग्रता से प्रहार नहीं करेंगे, इस समस्या से छूटकारा पाना असंभव है।

श्रीकृष्ण मुदगिल

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