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स्ट्रीट फूड जिसे देख मन ललचाए

स्ट्रीट फूड जिसे देख मन ललचाए

दिल्ली का विकास जिस रफ्तार से हो रहा है, उसी रफ्तार से यहां ‘स्ट्रीट फूड’ की खपत भी बढ़ती जा रही है। यहां की सड़कों पर लगी समोसे, छोले-कुलचे और खाद्य पदार्थों की दुकानों पर लोगों की अच्छी-खासी भीड़ होती है। स्ट्रीट फूड यानी सड़क किनारे लगी छोटी-छोटी दुकानों पर सजे एक से बढ़ कर एक स्वादिष्ट-चटपटे व्यंजन। छोले-भटूरे, छोले-कुलचे, आलू टिक्की, दही-भल्ले या फिर राजमा-चावल, गली-नुक्कड़ की दुकानों पर सजे ऐसे तमाम व्यंजन हमारा ध्यान बड़ी आसानी से खींचते हैं। दिल्ली के स्ट्रीट कल्चर में तो इन व्यंजनों की खास पहचान है।

चाहे गर्मियों की तपती धूप हो या कड़ाके की ठंड, दिल्लीवालों के लिए स्ट्रीट फूड की बहार ही रहती है। भुनी हुई शकरकंदी, बारीक हरी मिर्च और प्याज से सजे उबले अंडे, ताजे फलों की चाट, या चाट-पापड़ी, गोलगप्पे, आलू टिक्की, समोसा, दही-भल्ला, छोले-भटूरे, छोले-कुलचे, काठी-कबाब, कुल्फी फालूदा कुछ ऐसे स्ट्रीट फूड हैं, जो हर गली-नुक्कड़ पर हमारा ध्यान खींचते हैं और इन्हें खाने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है। इनके अलावा दिल्ली की स्ट्रीट कल्चर में दूसरे राज्यों और देशों के व्यंजन भी मिलते हैं, जिनमें चाउमीन, हॉट-स्वीट कॉर्न इन बटर, मोमो, बर्गर, इडली, डोसा आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं।

दिल्ली में स्ट्रीट फूड का चलन मुगलकाल से है। पहले खोमचे, रेहड़ी वाले हुआ करते थे, आज आसपास की गलियों या सड़कों के किनारे मिलने वाले खाने के स्टॉल हर किसी की पसंद का खयाल रखते हुए स्वादिष्ट और वैराइटी फूड सर्व करने लगे हैं। स्ट्रीट फूड का आनंद उठाने के लिए आपको बहुत ज्यादा भटकने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह हर इलाके के किसी कॉर्नर या साइड में मिल जाएगा। यहां मिलने वाला फूड जेब पर भारी भी नहीं पड़ता। ऑफिस के लोगों व छात्रों के अलावा खरीदारी के लिए निकले लोगों के बीच भी स्ट्रीट फूड खूब लोकप्रिय हैं।

03-07-2016

दिल्ली के खास स्ट्रीट फूड कॉर्नर्स में दरीबा कलां कॉर्नर की जलेबी, ज्ञानी का रबड़ी-फालूदा, नया बांस की लस्सी, परांठे वाली गली के परांठे, शाहजहां रोड की चाट, पंचकुइयां रोड के समोसे, पहाडग़ंज के भटूरे, खान मार्केट में खान चाचा कबाब कॉर्नर, जामा मस्जिद में करीम, ग्रीन पार्क मार्केट में मोमो, आईआईटी फ्लाई ओवर के नीचे परांठे और तंदूरी फिश के लिए खास करोल बाग का गणेश रेस्तरां। गोलगप्पे खाने के शौकीनों के लिए ग्रेटर कैलाश की एम ब्लॉक मार्केट में स्थित प्रिंस पान और चाट कॉर्नर बेहतरीन जगह मानी जाती हैं। क्रिस्पी कॉर्न फ्लोर से बने गोलगप्पे, जिसमें आलू और इमली के खास स्वाद भरे होते हैं, लोगों का पसंदीदा फूड है। सरोजिनी नगर, लाजपत नगर, कटवरिया सराय और ग्रेटर कैलाश में भी आप किसी भी समय स्ट्रीट फूड का लुत्फ उठा सकते हैं।

छोले-भटूरे खाने के शौकीनों के लिए दिल्ली में ठिकानों की कमी नहीं है। कमला नगर में किरोड़ीमल कॉलेज के पीछे चाचा के छोले-भटूरे खाने के लिए छात्रों के साथ ही हर उम्र के लोगों की भीड़ दिखाई देती है। सुबह दस बजे से शुरू खाना दोपहर दो बजे तक खत्म मिलता है। 30 रुपए की एक प्लेट इतनी जायकेदार होती है कि खाते जाओ, पर मन नहीं भरता। रोहिणी में ओम जी छोले भटूरे वाले के यहां छोले-भटूरों की इतनी जबर्दस्त मांग रहती है कि कभी-कभी दोपहर 1 बजे ही सारा खाना खत्म हो जाता है। करोल बाग शॉपिंग करने गए हैं तो हरिओम छोले-भटूरे के गर्म-गर्म भटूरों का आनंद उठा सकते हैं। जंतर-मंतर बस स्टाप के पास 6 फूड स्टॉल हैं, जहां आपको ब्रेड-पकौड़ा, भल्ले-पापड़ी, आलू-बोंडा, इडली, वड़ा, समोसा, डोसा, राजमा-चावल और तंदूरी रोटी, मक्के की रोटी-सरसों का साग, छोले-चावल आदि मिल जाएंगे।

क्या है ‘स्ट्रीट फूड’?

संयुक्त राष्ट्र के कृषि और खाद्य संगठन के अनुसार, ‘सड़कों और गलियों के किनारे लगी ब्रेड-पकौड़े, समोसे और खाने की दुकानें जहां खाद्य पदार्थों को इस तरह से तैयार किया जाता है कि लोग इसे फटाफट खा सके’।

03-07-2016

स्ट्रीट फूड’ का बढ़ता चलन

विकासशील देशों में भी अब स्ट्रीट फूड और फास्ट फूड का चलन बढ़ता जा रहा है। अब लोग घर में खाना बनाने के बजाए बाहर का बना-बनाया खाना ही खाना पसंद करते हैं। इस गलाकाट प्रतियोगिता के दौर में लोगों के पास खाना बनाने का समय ही नहीं है। वहीं दूसरी ओर स्टुडेन्ट्स, पैसेंजर और कम आमदनी वाले भी इसे अपनी भूख शांत करने का एक अच्छा विकल्प मानते हैं।’ एक वर्ग ऐसा भी है जो इसके चटपटे स्वाद के कारण इनकी ओर खिंचा चला आता है।

क्या हैं खतरे?

रोड के किनारे लगी इन दुकानों पर खाना बनाते समय साफ-सफाई का बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता है। जिस पानी का इस्तेमाल खाना बनाते समय करते हैं, वो साफ नहीं होता है। इसकी वजह से इन खाद्य पदार्थों में ‘इकोलाई’ और ‘साल्मोनेला’ जैसे जीवाणु होते हैं जो पेट व आंत संबंधी बीमारियों को जन्म देते है। यहां खाना खाने वालों को कभी-कभी ‘फूड प्वाइजनिंग’ भी हो जाता है। इन दुकानों पर हाथ साफ करने के लिए साबुन वगैरह भी नहीं होता जिससे लोग खाने से पहले हाथ धो सकें। बर्तनों की सफाई पर खास ध्यान नहीं दिया जाता है। खाने में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं में भी मिलावट होतीहै। इनके वेस्ट डिस्पोजल, पर्यावरण को नुकसान तो पहुंचाते ही है वहीं रोड के किनारे इनकी मौजूदगी यातायात को भी बाधित करती है।

हजारों लोगों को रोजगार देने वाला ‘स्ट्रीट फूड’ का व्यवसाय आज आम लोगों की जरूरत बन चुका है। साथ ही खतरनाक बीमारियों का घर भी। तो आगे से स्ट्रीट फूड को हाथ लगाने से पहले वहां की साफ-सफाई पर नजर डालना न भूलें, नहीं तो ये आपके लिए मुसीबत भी खड़ी कर सकते हैं।

स्ट्रीट फूड का व्यवसायीकरण

स्ट्रीट फूड को यह नाम क्यों दिया गया है? इसलिए नहीं कि यह सड़क किनारे, गलियों और फुटपाथ आदि पर गर्मा-गर्म और ताजा मिल जाता है, बल्कि इसलिए कि यह इतनी कम कीमत में मिलता है कि साधारण आदमी भी खाकर गुजारा कर सके। यह सड़क के आदमी का खाना है, इसलिए यह स्ट्रीट फूड है, हालांकि लुभाता यह हर किसी को है। हो सकता है इन्हें गरीब लोगों ने ईजाद किया हो। इन्हें पकाने की विधि आसान होती है, ताकि कहीं भी, कम से कम तामझाम में तैयार हो जाएं। राजा-महाराजाओं, बड़े लोगों की रसोइयों में विकसित व्यंजन अलग होते हैं। वे महंगे खाद्य पदार्थों के साथ बड़ी फुर्सत से बनाए जाते हैं। खाने का यह विभाजन पूरी दुनिया में है। शायद ही कोई देश होगा, जहां स्ट्रीट फूड का चलन न हो। यह गरीबों के लिए आवश्यकता है तो अमीरों के लिए पिकनिक, रोमांच, या फैशन।

03-07-2016

स्ट्रीट फूड की इकोनॉमी कम दाम और ज्यादा बिक्री पर टिकी होती है। चीजें कम बिकेंगी तो धंधा बंद हो जाएगा। दिल्ली में समोसा बेचने वालों को दिन भर में सैकड़ों समोसे तलने होते हैं। इसी तरह मुंबई में वड़ा पाव वाले दिनभर अपने काम में लगे रहते हैं। लेकिन इधर आम जनता की हर चीज को प्रदर्शन की वस्तु में बदल देने का चलन हो गया है। देश में फूड फेस्टिवल का क्रेज बढ़ रहा है। इसमें एक ही जगह देश भर के सैकड़ों व्यंजन मिलते हैं। इससे खानपान का क्षेत्रीय लेन-देन बढ़ता है और इसके बहाने सांस्कृतिक मेलजोल भी बढ़ता है। लेकिन इस प्रक्रिया में आम आदमी कहीं नहीं है। फूड फेस्टिवल सिर्फ उनके लिए है जिनकी जेब भारी हो।

देश में आम जनता से जुड़ी कई चीजें अब इतनी महंगी हो गई हैं कि साधारण आदमी उन्हें लेने की कल्पना ही नहीं कर सकता। मधुबनी पेंटिंग या राजस्थान की कठपुतली कला की ऐसी ब्रांडिंग हो गई है कि वह साधारण ग्राहकों के दायरे से बाहर निकल गई है। क्या स्ट्रीट फूड का भी यही हाल होने वाला है? कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ चीजों की ऐसी ब्रांडिंग हो जाए कि उन्हें स्ट्रीट पर बनाना ही बंद कर दिया जाए। स्ट्रीट वेंडरों की दशा बदलनी चाहिए। उनका प्रोफाइल भी सुधरना चाहिए। लेकिन उन्हें बाजार तंत्र की मार से बचाया जाए, इस्तेमाल होने से बचाया जाए।

 

नीलाभ कृष्ण

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