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विकास का वाहक बन पाएगा नीति आयोग?

विकास का वाहक बन पाएगा नीति आयोग?

By राजीव रंजन तिवारी

नीति आयोग बनने से सबसे बड़ा बदलाव देश में योजनाओं के निर्माण और उनके क्रियान्वयन में होगा। योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए केंद्र राज्यों को धन देता था। राज्यों की सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि उन्हें कई केंद्रीय योजनाओं को ढोना पड़ता है।

भारत के प्लानिंग कमीशन का नाम अब नीति आयोग (नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) होगा। बीते माह प्रधानमंत्री ने सोवियत ढर्रे पर आधारित योजना आयोग को एक ‘टीम इंडिया’ कॉन्सेप्ट पर आधारित बॉडी में बदलने को लेकर मुख्यमंत्रियों से चर्चा की थी। स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री ने संकेत दिए थे कि 64 साल पुराने योजना आयोग की प्रांसगिकता समाप्त हो गई है। बाद में उन्होंने नई प्लानिंग बॉडी को लेकर ट्विटर पर लोगों से राय मांगी थी। योजना आयोग की शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय 15 मार्च 1950 में की गई थी। योजना आयोग का मुख्य उद्देश्य भारतीय कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए विकास का रोडमैप तैयार करना था।

प्रधानमंत्री ‘नीति आयोग’ के चेयरमैन होंगे। हालांकि बदलाव सिर्फ इसके स्वरूप और योजना आयोग के नाम तक ही सीमित नहीं है। हकीकत में आयोग की जगह लेने वाला नया निकाय, बीते पांच दशकों से परंपरागत रूप से हो रहे कामों को रोक सकता है। यदि नीति आयोग पर कैबिनेट नोट पर गौर करें तो इस निकाय के धनराशि के आवंटन या पंचवर्षीय योजना बनाने के काम में लगे रहने का अनुमान कम ही है। यह प्रशासन के नीतिगत पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। वैसे, पिछले कुछ दशकों से विवादास्पद रहे योजना आयोग की विदाई अप्रत्याशित नहीं है, फिर भी यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह कवायद सिर्फ राजनीतिक विचारधाराओं के सांकेतिक संघर्ष में उलझकर न रह जाए। ध्यान यह भी दिया जाना चाहिए कि यह कवायद महज निवेशकों के हितों की पोषक बनकर भी न रह जाए, बल्कि सही अर्थों में बदलाव की वाहक बने। सरकार का दावा है कि नीति आयोग अंतरमंत्रालय और केंद्र-राज्य सहयोग से नीतियों के धीमे क्रियान्वयन को खत्म करेगा। यह राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं की साझा सोच बनाएगा।

दिसम्बर 2014 के पहले हफ्ते में योजना आयोग के पुनर्गठन पर विचार-विमर्श के लिए प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक में ज्यादातर राज्यों ने इसका समर्थन किया था। बैठक के संकेत से लगा कि सरकार एक ऐसे निकाय की स्थापना का विचार कर रही है जिसमें प्रधानमंत्री, कुछ कैबिनेट मंत्री तथा कुछ मुख्यमंत्री शामिल होंगे। साथ ही विभिन्न तकनीकि विषयों एवं क्षेत्रों के विशेषज्ञों को भी रखा जाएगा। नए निकाय में मुख्यमंत्रियों को बारी-बारी से प्रतिनिधित्व मिलेगा। राज्यों को योजनागत कोष को अपने आवश्यकतानुसार खर्च करने की छूट मिलेगी। चर्चा के दौरान कांग्रेस की सरकार वाले राज्यों ने योजना आयोग को दुरुस्त करने के विचार का तो समर्थन किया, लेकिन प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित इस आयोग को समाप्त करने के विचार से सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि आयोग को नये ढंग से विकसित किया जाना चाहिए। खैर, ‘नीति आयोग’ पर आए नोट में पंचवर्षीय योजनाओं और वार्षिक योजनाओं या राज्य सरकारों को संसाधनों के आवंटन में आयोग की क्या कोई भूमिका होगी, इस पर चुप्पी कायम रखी गई है। इस प्रकार क्या भारत में पंचवर्षीय योजना की प्रक्रिया खत्म होने जा रही है, जिसे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1950 में शुरू किया था और बाद में प्रख्यात सांख्यिकीविद व अर्थशास्त्री पी.सी. महालनोबिस ने उसे रफ्तार दी थी।

उल्लेखनीय है कि पुराने योजना आयोग के औचित्य पर इसलिए सवाल उठते रहे हैं, क्योंकि एक राज्य के सफल मॉडल दूसरे राज्यों में नहीं दोहराए जा सके। आम आदमी के टैक्स का पैसा बचाने के कदम नहीं उठाए गए। राज्यों को ज्यादा प्रतिनिधित्व नहीं मिला, परियोजनाओं में देरी होती रही और अफसरशाही हावी रही। नीति आयोग से इन्हीं खामियों को दूर करने की उम्मीद की जा रही है। योजना आयोग के तहत जो पंचवर्षीय योजनाएं बनती थीं, वह राज्यों के परफॉर्मेंस आउटपुट से नहीं जुड़ी होती थीं। नीति आयोग से प्रधानमंत्री को जिस तरह के कामकाज की उम्मीद है, उसके तहत राज्यों को मिलने वाले फंड परफॉर्मेंस आउटपुट से जुड़े रहेंगे। केंद्र राज्यों को जो मदद देगा, उसके रियल टाइम नतीजों का एनालिसिस होने से राज्यों की जवाबदेही बढ़ेगी। वे पैसे की बर्बादी को रोकने के लिए प्रेरित होंगे। टैक्स अदा करने वाले आम लोगों को इससे परोक्ष रूप से फायदा पहुंचेगा। देश में योजनाएं केंद्र के स्तर पर बनती हैं और राज्य उन्हें अपने क्षेत्रों में लागू करते हैं। राज्य अपने मुताबिक कार्यक्रमों को डिजाइन कर सकेंगे। उसके लिए मिलने वाली आर्थिक मदद पर भी उनका नियंत्रण होगा। इस तरह वे क्षेत्रीय जरूरतों के मुताबिक केंद्र से मदद हासिल कर पाएंगे। नीति आयोग के तहत केंद्र के पास कुछ वित्तीय कार्यक्रमों को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चलाने का भी विकल्प रहेगा। चीन में राष्ट्रीय स्तर पर सुधार करने से पहले पायलट प्रोजेक्ट चलाए जाते हैं। यूपीए सरकार ने बड़ी तादाद में इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाएं बनाई थीं, लेकिन राज्य सरकारों की मंजूरी नहीं मिलने से ये अटकी पड़ी थीं। नीति आयोग राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं को राज्यों से मंजूरी दिलाने में अहम भूमिका निभा सकता है। इससे देश में बुनियादी ढांचे के विकास को गति मिलेगी। लेकिन राज्यों के साथ कोऑपरेटिव फेडरलिज्म का कॉन्सेप्ट तभी कारगर होगा, जब पहले केंद्र सरकार के मंत्रालय आपसी तालमेल सुधारें। मिसाल के तौर पर एनर्जी से जुड़े मसलों पर पेट्रोलियम, केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर, कोल और माइन्स जैसे मंत्रालयों के बीच समन्वय होना जरूरी है। नीति आयोग के जरिए मैक्सिमम गवर्नेंस के लक्ष्य हासिल करना विशेषज्ञों के बगैर संभव नहीं है। योजना आयोग में उच्च  पदों पर आईएएस या आईईएस अधिकारी होते थे। देश के बाकी मंत्रालयों की तरह यहां भी अफसर आते-जाते रहते थे। इसके लिए विभिन्न पदों पर लेटरल एंट्री के मौके खोले जा सकते हैं।

योजना आयोग के स्थान पर स्थापित की गई नई संस्था नीति आयोग को लेकर सिर्फ कांग्रेस शासित राज्य ही नहीं, बल्कि भाजपा शासित राज्यों में कुलबुलाहट साफ नजर आ रही है। हालांकि भाजपा शासित राज्यों पर वृहद स्तर पर तो इस प्रस्ताव को सराहा जा रहा है। कुछ राज्यों का कहना है कि उनकी जो भी चिंताए है व उनका आसान समाधान चाहते हैं। वहीं कांग्रेस शासित राज्य जैसे केरल, कर्नाटक और असम को योजना आयोग के अचानक खत्म हो जाने के कारण योजना क्रियान्वन संबंधी प्रक्रिया का डर भी सता रहा है। इसके साथ ही राज्यों द्वारा वार्षिक योजना आवंटन पर पडऩे वाले त्वरित प्रभावों पर भी चिंता जाहिर की जा रही है। आंध्र प्रदेश का कहना है कि वह राज्य स्तरीय नीति आयेाग को स्थापित करने पर विचार कर रहा है। वहीं तेलंगाना के मुताबिक किसी योजना आयोग के न रहने पर केंद्रीय योजनाओं पर बिना किसी रुकावट के खर्च किया जा सकेगा। असम के मुताबिक छठीं अनुसूची में शामिल राज्यों को इस नई संस्था द्वारा कैसे वित्त दिया जाएगा वो भी अभी साफ  नहीं हुआ है। राज्यों का यह भी मानना है कि अगर नीति आयोग पीएमओ की जेबी संस्था की तरह कार्य करता है तो हो सकता है कि यह नई सलाहकारी संस्था पर एक पार्टी का दबदबा कायम हो जाए जिससे लाभ कम और नुकसान अधिक होगा। अधिकतर राज्यों का कहना है कि चूंकि इस वर्ष के लिए अब तक किसी वार्षिक योजना पर चर्चा नहीं की गई है, इसलिए अब राज्यों द्वारा वित्त आंवटन के मसले पर पूरी तरह से अनभिज्ञता जताई जा रही है। योजना आयोग के पुनर्गठन और उसका नाम बदलकर नीति आयोग करने के फैसले का विपक्ष ने तीखा विरोध किया है। केंद्र के इस कदम को सतही और दिखावटी करार देते हुए विपक्ष ने राज्यों के साथ भेदभाव की आशंका जताई है। साथ ही इसे दुर्नीति व अनीति आयोग जैसे विशेषणों से नवाजते हुए कहा है कि अब नीति बनाने में कारपोरेट घरानों की चलेगी।

नीति आयोग बनने से सबसे बड़ा बदलाव देश में योजनाओं के निर्माण और उनके क्रियान्वयन में होगा। योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए केंद्र राज्यों को धन देता था। राज्यों की सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि उन्हें कई केंद्रीय योजनाओं को ढोना पड़ता है। इस आयोग की खासियत यह है कि केंद्रीय योजनाओं की संख्या घटेगी और विकसित, विकासशील और पिछड़े राज्यों की योजनाएं अलग होंगी। यह सच है कि मार्च, 1950 में गठित योजना आयोग ने शुरुआती दशकों में निश्चित तौर पर आधारभूत संरचना और आर्थिक विकास के लिहाज से बेहतर काम किया था, लेकिन बाद में वह धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खोने लगा था। खासतौर पर 1991 में नई आर्थिक नीतियों और उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद योजना आयोग पर सवालिया निशान लगने लगे थे। इसकी एक वजह यह भी रही कि योजना आयोग केंद्रीय सत्ता के एक समानांतर केंद्र की तरह राज्यों पर नियंत्रण कर रहा था और उनकी नीतियों और योजनाओं को प्रभावित कर रहा था। भारत के संघीय ढांचे में राज्यों की प्रमुख भूमिका होती है, लेकिन हालत यह थी कि मुख्यमंत्रियों तक को अपने राज्यों के हितों के लिए योजना आयोग के समक्ष दीन-हीन बनकर हाथ फैलाना पड़ता था। ऐसे मामले कम ही हैं जब आयोग ने किसी राज्य को उसके मुख्यमंत्री की ओर से मांगी रकम दी हो। बहरहाल, अब देखना है कि आगे क्या होता है?

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