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कैराना का सच

कैराना का सच

राजधानी दिल्ली से महज 124 किमी. दूर, उत्तर प्रदेश के शामली में कैराना से हिंदुओं के पलायन की खबरों से देश का मानस बुरी तरह हिल उठा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक कैराना में 30 फीसदी हिंदू और 68 फीसदी मुसलमान आबादी थी। लेकिन, आज, बकौल स्थानीय प्रशासन वहां सिर्फ 8 फीसदी हिंदू बचे हैं जबकि, मुसलमान आबादी 92 फीसदी हो गई है। इस मामले में कैराना कोई इकलौता मामला नहीं है। देश में ऐसी कई जगहें हैं जो ”छोटा पाकिस्तान’’ कहलाती हैं। सेकुलर विचार तब तक अच्छा है जब तक उसमें एक महीन संतुलन कायम है। हालात ये हैं कि अब पश्चिम बंगाल में मालदा, केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्से, पुराना हैदराबाद, मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से पूरी तरह मुसलमानों के नियंत्रण में हैं। वहां उन्हीं की चलती है। यहां तक कि सरकारों की भी उनकी मर्जी के आगे झुकने के सिवाय कोई चारा नहीं है। 1990 में कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में भारी दंगे भड़के। निशाने पर वहां का बेहद अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडित समुदाय था, जो पिछले 1100 साल से कश्मीरियत का अभिन्न अंग रहा है। कश्मीरी पंडित वहां की आबादी में महज 4.5 फीसदी ही रहे हैं। ये लोग धनी और उद्यमी रहे हैं। वे नौकरशाही और तमाम अच्छे पदों पर रहे हैं। कश्मीरी मुसलमान बहुसंख्यक थे और आज भी हैं। वे तब भी गरीबी में गुजर कर रहे थे, आज भी कर रहे हैं। कश्मीरी पंडितों को नियोजित ढंग से निकाला गया। उन्हें दिनदहाड़े पीटकर मारा गया, उनकी औरतों की हत्या कर दी गई। उनकी संपत्तियां जला दी गईं या गैर-कानूनी रूप से उन पर कब्जा कर लिया गया। इससे बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ। वे अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रहने को मजबूर हैं। उत्तर प्रदेश में कैराना के लोग आज वही कुछ महसूस कर रहे हैं। स्थानीय सांसद तथा पूर्व मंत्री हुकुम सिंह के दावे के मुताबिक हिंदू परिवारों का पलायन कश्मीरी पंडितों के साथ नब्बे के दशक में हुई घटना की याद दिला जाता है। उत्तर प्रदेश में ऐसी कई घटनाएं पहले ही देखने को मिल चुकी हैं, जिनमें राज्य सरकार लोगों की रक्षा करने में नाकाम रही है। सबसे ताजा मिसाल मथुरा के जवाहर पार्क इलाके की है। एक अकेले आदमी ने पूरी गैर-कानूनी बस्ती बसा दी और वह राज्य सरकार की पहुंच से दूर बना रहा। इसी से उस राज्य की दुर्दशा का अंदाजा हो जाता है। कैराना और मथुरा के संदर्भ भले अलग हो सकते हैं, लेकिन दोनों घटनाओं का निष्कर्ष एक ही निकलता है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की हालत कितनी दयनीय है।

यह भी याद किया जा सकता है कि कुछ समय पहले बिहार के पुर्णिया में बंगाल के मालदा जैसी स्थितियां देखने को मिली थीं। उसके बाद पड़ोसी राज्य झारखंड के नवाटांड में भी ऐसा ही देखने को मिला। नवाटांड ऐसा गांव है, जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या जहां-जहां हिंदू संख्या में कम हो जाएंगे, वहां कश्मीर जैसी बर्बरता शुरू हो जाएगी? यह अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि देश के कई इलाकों में आबादी का धार्मिक संतुलन बदल रहा है। यह बदलाव सबसे ज्यादा पश्चिम उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रहा है, खासकर ऊपरी दोआब (पुराने सहारनपुर, पुराने मुजफ्फरनगर और पुराने मेरठ जिले के इलाके) और उत्तरी रूहेलखंड (बिजनौर, पुराना मुरादाबाद, रामपुर और बरेली के इलाके) में।

यहां कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। कैराना से संबंधित जिला अधिकारियों का कहना है कि पलायन की मुख्य वजह सांप्रदायिक नहीं है, बल्कि बढ़ता अपराध और बेहतर रोजगार की संभावनाओं का अभाव है। अगर हम यह भी मान लें तो इससे भी अखिलेश यादव की सरकार ही दोषी साबित होती है। सरकार एक तरफ अपने लोगों को रोजगार और सुरक्षा नहीं मुहैया करा पा रही है और दूसरी ओर वह एक खास समुदाय को राजनैतिक फायदे के लिए शह दे रही है। यह बेहद खतरनाक है। खास समुदाय को सरकार की शह के कारण जिला प्रशासन के लिए कैराना में अपराधियों पर नकेल कसना मुश्किल हो रहा है। लिहाजा, अपराधी छुट्टा घूम रहे हैं और असहाय लोग अपनी रक्षा खुद करने पर मजबूर हैं। इससे लोग पलायन कर रहे हैं। वहां अपराधियों पर फौरन नकेल कसने की जरूरत है, वरना कैराना भी कश्मीर बन जाएगा। इसके अलावा, चुनावी फायदे के लिए कैराना के पलायन को अनदेखा करने की कोशिश महंगी पड़ सकती है, जैसा कि समाजवादी पार्टी कर रही है। सेकुलर ब्रिगेड ने भी कैराना के पलायन को चुनावी शोशा बताकर अनदेखा करने की कोशिश की है। दरअसल राज्य में कानून-व्यवस्था की हालत बेहद खस्ता है और सरकार को उसे सुधारने का फौरन प्रयास करना चाहिए।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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